21 सूरए अंबिया -छटा रूकू

21 सूरए  अंबिया -छटा रूकू


और नूह को जब इससे पहले उसने हमें पुकारा तो हमने उसकी दुआ क़ुबूल की और उसे और उसके घर वालो को बड़ी सख़्ती से निजात दी(1){76}
(1) यानी तूफ़ान से और शरीर लोगों के झुटलाने से.

और हमने उन लोगों पर उसको मदद दी जिन्होंने हमारी आयतें झुटलाई, बेशक वो बुरे लोग थे हमने उन सब को डुबो दिया{77} और दाऊद और सुलैमान को याद करो जब खेती का एक झगड़ा चुकाते थे जब रात को उसमें कुछ लोगों की बकरियां छूटीं(2)
(2) उनके साथ कोई चराने वाला न था, वो खेती खा गई. यह मुक़दमा हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम के सामने पेश हुआ. आपने प्रस्ताव किया कि बकरियाँ खेती वाले को दे दी जाएं, बकरियों क़ीमत खेती के नुक़सान के बराबर थी.

और हम उनके हुक्म के वक़्त हाज़िर थे {78} हमने वह मामला सुलैमान को समझा दिया(3)
(3)  हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम के सामने जब यह मामला पेश हुआ तो आपने फ़रमाया कि दोनों पक्षों के लिये इससे ज़्यादा आसानी की शक्ल भी हो सकती है. उस वक़्त हज़रत की उम्र शरीफ़ ग्यारह साल की थी. हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने यह प्रस्ताव पेश किया कि बकरी वाला काश्त करें और जब तक खेती वाला बकरियों के दूध वगै़रह से फ़ायदा उठाए और खेती इस हालत पर पहुंच जाने के बाद खेती वाले को खेती दे दी जाय. बकरी वाले को उसकी बकरियाँ वापस कर दी जाएं. यह प्रस्ताव हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम ने पसन्द फ़रमाया. इस मामले में ये दोनो हुकम इज्तिहादी थे और उस शरीअत के अनुसार थे. हमारी शरीअत में हुक्म यह है कि अगर चराने वाला साथ न हो तो जानवर नुक़सान करे उसका ज़मान लाज़िम नहीं. मुजाहिद का क़ौल है कि हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम ने जो फ़ैसला किया था. वह इस मसअले का हुक्म था और हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने जो तजवीज़ फ़रमाई, यह सुलह की सूरत थी.

और दोनों को हुक़ूमत और इल्म अता किया(4)
(4)  इज्तिहाद के कारणों और अहकाम के तरीक़े वग़ैरह का. जिन उलमा को इज्तिहाद की योग्यता हासिल है उन्हें इन बातों में इज्तिहाद का हक़ है जिसमें वो किताब और सुन्नत का हुक्म न पाएं और अगर इज्तिहाद में ख़ता भी हो जाए तो भी उनपर पकड़ नहीं. बुखारी व मुस्लिम की हदीस है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया जब हुक्म करने वाला इज्तिहाद के साथ हुक्म करे और उस हुक्म में दुरूस्त हो तो उसके लिये दो सवाब हैं और अगर इज्तिहाद में ग़लती हो जाए तो एक सवाब.

और दाऊद  के साथ पहाड़ मुसख़्ख़र फ़रमा दिये कि तस्बीह करते और परिन्दे (5)
(5)  पत्थर और पक्षी आपके साथ आपकी संगत में तस्बीह करते थे.

और ये हमारे काम थे {79} और हमने उसे तुम्हारा एक पहनावा बनाना सिखाया कि तुम्हें तुम्हारी आंच (ज़ख़्मी होने) से बचाए(6)
(6) यानी जंग में दुश्मन के मुक़ाबले में काम आए और वह ज़िरह यानी बकतर है. सब से पहले ज़िरह बनाने वाले हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम हैं.

तो क्या तुम शुक्र करोगे {80} और सुलैमान के लिये तेज़ हवा मुसख़्ख़र कर दी कि उसके हुक्म से चलती उस ज़मीन की तरफ़ जिसमें हमने बरकत रखी(7)
(7) इस ज़मीन से मुराद शाम है जो आपका निवास था.

और हम को हर चीज़ मालूम है{81} और शैतानों में से वो जो उसके लिये ग़ोता लगाते(8)
(8) नदी की गहराई में दाख़िल होकर, समन्दर की तह से आपके लिये जवाहरात निकाल कर लाते.

और इसके सिवा और काम करते(9)
(9)  अजीब अजीब सनअतें, इमारतें, महल, बर्तन, शीशे की चीज़ें, साबुन वग़ैरह बनाना.

और हम उन्हें रोके हुए थे(10){82}
(10) कि आप के हुक्म से बाहर न हों.

और अय्यूब को (याद करो) जब उसने अपने रब को पुकारा(11)
(11) यानी अपने रब से दुआ की, हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम, हज़रत इस्हाक अलैहिस्सलाम की सन्तान में से हैं अल्लाह तआला ने आपको हर तरह की नेअमतें अता फ़रमाई थीं. हुस्न व सूरत भी, औलाद की बहुतात भी, माल मत्ता भी. अल्लाह तआला ने आपको आज़माइश में डाला और आपके बेटे और औलाद मकान के गिरने से दब कर मर गए. तमाम मवेशी जिन में हज़ारों ऊंट हज़ारों बकरियाँ थीं सब मर गए. सारी खेतियाँ और बाग़ बर्बाद हो गए, कुछ भी बाक़ी न रहा और जब आप को इन चीज़ों के हलाक होने और ज़ाया होने की ख़बर दी जाती थी तो आप अल्लाह की तअरीफ़ करते और फ़रमाते मेरा क्या है जिसका था उसने लिया. जब तक मुझे दिया और मेरे पास रखा उसका शुक्र अदा नहीं हो सकता. मैं उसकी मर्ज़ी पर राज़ी हूँ. फिर आप बीमार हुए. सारे शरीर में छाले पड़ गए. बदन सब का सब ज़ख़्मों से भर गया. सब लोगों ने छोड़ दिया, बस आपकी बीबी साहिबा आपकी सेवा करती रहीं. यह हालत सालों साल रही. आख़िरकार कोई ऐसा कारण पेश आया कि आप ने अल्लाह की बारगाह में दुआ की.

कि मुझे तकलीफ़ पहुंची और तू सब मेहर वालों से बढ़कर मेहर वाला {83} तो हमने उसकी दुआ सुन ली तो हमने दूर करदी जो तकलीफ़ उसे थी(12)  
(12) इस तरह कि हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम से फ़रमाया कि ज़मीन पर पाँव मारिये. आपने मारा, एक चश्मा ज़ाहिर हो गया. हुक्म दिया गया इस से स्नान कीजिये. ग़ुस्ल किया तो शरीर के ऊपर की सारी बीमारियाँ दूर हो गई. फिर आप चालीस क़दम चले, फिर दोबारा ज़मीन पर पाँव मारने का हुक्म हुआ. आपने फिर पाँव मारा उससे भी एक चश्मा ज़ाहिर हुआ जिसका पानी बहुत ठण्डा था. आपने अल्लाह के हुक्म से पिया, इससे अन्दर की सारी बीमारियाँ दूर हो गई और आपको भरपूर सेहत हासिल हुई.

और  हमने उसे उसके घरवाले और उनके साथ उतने ही और अता किये (13)
(13) हज़रत इब्दे मसऊद और हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुम और कई मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला ने आपकी सारी औलाद को ज़िन्दा फ़रमा दिया और आपको उतनी ही औलाद और इनायत की. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा की दूसरी रिवायत में है कि अल्लाह तआला ने आपकी बीबी साहिबा को दोबारा जवानी अता की और उनके बहुत से बच्चे हुए.

अपने पास से रहमत फ़रमाकर और बन्दगी वालों के लिये नसीहत(14){84}
(14) कि वो इस वाक़ए बलाओं पर सब्र करने और उसके महान पुण्य से बाख़बर हों और सब्र करें और सवाब पाएं.

और इस्माईल और इद्रीस और ज़ुल-किफ़्ल को (याद करो), वो सब सब्र वाले थे(15) {85}
(15) कि उन्होंने मेहनतों और बलाओं और इबादतों की मशक्क़तों पर सब्र किया.

और उन्हें हमने अपनी रहमत में दाख़िल किया, बेशक वो हमारे ख़ास क़ुर्ब के हक़दारों में हैं{86} और ज़ुन्नून को (याद करो)(16)
(16) यानी हज़रत यूनुस इब्ने मता को.

जब चला ग़ुस्से में भरा(17)
(17) अपनी क़ौम से जिसने उनकी दावत न क़ुबूल की थी और नसीहत न मानी थी और कुफ़्र पर क़ायम रही थी. आपने गुमान किया कि यह हिजरत आपके लिये जायज़ है क्योंकि इसका कारण सिर्फ़ कुफ़्र और काफ़िरों के साथ दुश्मनी और अल्लाह के लिये ग़ज़ब करना है. लेकिन आपने इस हिजरत में अल्लाह के हुक्म का इन्तिज़ार न किया.

तो गुमान किया कि हम उसपर तंगी न करेंगे(18)
(18) तो अल्लाह तआला ने उन्हें मछली के पेट में डाला.

तो अंधेरियों में पुकारा(19)
(19) कई तरह की अंधेरियाँ थी. नदी की अंधेरी, रात की अंधेरी, मछली के पेट की अंधेरी. इन अंधेरियों में हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम ने अपने रब से इस तरह दुआ की कि—-

कोई मअबूद नहीं सिवा तेरे, पाकी है तुझको, बेशक मुझसे बेजा हुआ(20){87}
(20) कि मैं अपनी क़ौम से तेरी इजाज़त पाने से पहले अलग हुआ. हदीस शरीफ़ में है कि जो कोई मुसीबत का मारा अल्लाह कि बारगाह में इन शब्दों से दुआ करे, तो अल्लाह तआला उसकी दुआ क़ुबूल फ़रमाता है.

तो हमने उसकी पुकार सुन ली और उसे ग़म से निजात बख़्शी, (21)
(21)  और मछली को हुक्म दिया तो उसने हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम को दरिया के किनारे पहुंचा दिया.

और ऐसी ही निजात देंगे मुसलमानों को(22){88}
(22) मुसीबतों और तकलीफ़ों से जब वो हम से फ़रियाद करें और दुआ करें.

और ज़करिया को(याद करो), जब उसने अपने रब को पुकारा ऐ मेरे रब मुझे अकेला न छोड़ (23)
(23) यानी बे-औलाद बल्कि वारिस अता फ़रमा.

और तू सब से बेहतर वारिस(24){89}
(24) सृष्टि की फ़ना के बाद बाक़ी रहने वाला. मतलब यह है कि अगर तू मुझे वारिस न दे तब भी मुझे कुछ ग़म नहीं क्योंकि तू बेहतर वारिस है.

तो हमने उसकी दुआ क़ुबूल की और उसे (25)
(25) नेक बेटा.

यहया अता फ़रमाया और उसके लिये उसकी बीबी संवारी(26)
(26) जो बांझ थी उसको बच्चा पैदा करने के क़ाबिल बनाया.

बेशक वो(27)
(27) यानी वो नबी जिनका ज़िक्र गुज़रा.

भले कामों में जल्दी करते थे और हमें पुकारते थे उम्मीद और डर से, और हमारे हुज़ूर गिड़गिड़ाते हैं {90} और उस औरत को जिसने अपनी पारसाई निगाह रखी(28)
(28) पूरे तौर पर कि किसी तरह कोई बशर उसकी पारसाई को छू न सका. इससे मुराद हज़रत मरयम है.

तो हमने उसमें अपनी रूह फूंकी(29)
(29) और उसके पेट में हज़रत ईसा को पैदा किया.

और उसे और उसके बेटे को सारे जगत के लिये निशानी बनाया(30){91}
(30) अपनी भरपूर क़ुदरत की कि हज़रत ईसा को उसकी कोख़ से बग़ैर बाप के पैदा किया.

बेशक तुम्हारा यह दीन एक ही दीन है(31)
(31)  दीने इस्लाम, यही सारे नबियों का दीन है. इसके सिवा जितने दीन हैं सब झूठे हैं. सब को इस्लाम पर क़ायम रहना लाज़िम हैं.

और मैं तुम्हारा रब हूँ (32)
(32) न मेरे सिवा कोई दूसरा रब, न मेरे दीन के सिवा और कोई दीन.

तो मेरी इबादत करो{92} और औरों ने अपने काम आपस में टुकड़े टुकड़े कर लिये(33)
(33) यानी दीन में विरोध किया और सम्प्रदायों में बंट गए.

सब को मारी तरफ़ फिरना है(34){94}
(34) हम उन्हें उनके कर्मों का बदला देंगे.

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