21 सूरए अंबिया -चौथा रूकू

21 सूरए  अंबिया -चौथा रूकू

तुम फ़रमाओ रात दिन तुम्हारी निगहबानी कौन करता है रहमान से(1)
(1) यानी उसके अज़ाब से.

बल्कि वो अपने रब की याद से मुंह फेरे हैं(2){42}
(2) जब ऐसा है तो उन्हें अल्लाह के अज़ाब का क्या डर हो वो अपनी हिफ़ाज़त करने वालों को क्या पहचानें.

क्या उनके कुछ ख़ुदा है(3)
(3) हमारे सिवा उनके ख़याल में.

जो उनको हम से बचाते हैं (4)
(4)   और हमारे अज़ाब से मेहफ़ूज़ रखते हैं ऐसा तो नहीं है और अगर वो अपने बुतों के बारे में यह अक़ीदा रखते हैं तो उनका हाल यह है कि.

वो अपनी ही जानों को नहीं बचा सकते (5)
(5) अपने पूजने वालों को क्या बचा सकेंगे.

और न हमारी तरफ़ से उनकी यारी हो {43} बल्कि हमने उनको(6)
(6) यानी काफ़िरों को.

और उनके बाप दादा को बर्तावा दिया(7)
(7)  और दुनिया में उन्हें नेअमत और मोहलत दी.

यहाँ तक कि ज़िन्दगी उनपर दराज़ (लम्बी) हुई(8)
(8)  और वो इस से और घमण्डी हुए और उन्होंने गुमान किया कि वो हमेशा ऐसे ही रहेंगे.

तो क्या नहीं देखते कि हम(9)
(9)  काफ़िरों के रहने की जगह की—

ज़मीन को उसके किनारों से घटाते आ रहे हैं(10)
(10)  दिन प्रतिदिन मुसलमानों को उस पर तसल्लुत दे रहे हैं और एक शहर के बाद दूसरा शहर फ़त्ह होता चला आ रहा है, इस्लाम की सीमाएं बढ़ रही हैं और कुफ़्र की धरती घटती चली आती है. और मक्कए मुकर्रमा के आस पास के इलाकों पर मुसलमानों का तसल्लुत होता जाता है, क्या मुश्रिक जो अज़ाब तलब करने में जल्दी कर रहे हैं, इसको नहीं देखते और सबक़ नहीं पकड़ते.

तो क्या ये ग़ालिब होंगे(11){44}
(11) जिनके क़ब्ज़े से ज़मीन दम ब दम निकलती जा रही है, या रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और उनके सहाबा जो अल्लाह के फ़ज़्ल से फ़त्ह पा रहे हैं और उनके क़ब्ज़े़ दम ब दम बढ़ते जा रहे हैं.

तुम फ़रमाओ कि मैं तुम को सिर्फ़ वही (देववाणी) से डराता हूँ(12)
(12) और अज़ाबे इलाही का उसी की तरफ़ से ख़ौफ़ दिलाता हूँ.

और बहरे पुकारना नहीं सुनते जब डराए जाएं(13){45}
(13) यानी काफ़िर, हिदायत करने वाले और ख़ौफ़ दिलाने वाले के कलाम से नफ़ा न उठाने में बेहरे की तरह हैं.

और अगर उन्हें तुम्हारे रब के अज़ाब की हवा छू जाए तो ज़रूर कहेंगे हाय ख़राबी हमारी बेशक हम ज़ालिम थे(14){46}
(14)   नबी की बात पर कान न रखा और उनपर ईमान न लाए.

और हम अदल (न्याय) की तराजुएं रखेंगे क़यामत के दिन तो किसी जान पर कुछ ज़ुल्म न होगा, और अगर कोई चीज़ (15)
(15) कर्मों में से.

राई के दाने के बराबर हो तो म उसे ले आएंगे, और हम काफ़ी हैं हिसाब को{47}और बेशक हमने मूसा और हारून को फ़ैसला दिया(16)
(16) यानी तौरात अता की जो सच झूठ में अन्तर करने वाली है.

और उजाला (17)
(17) यानी रौशनी है, कि उससे मोक्ष की राह मालूम होती है.

और परहेज़गारी को नसीहत (18){48}
(18) जिससे वो नसीहत हासिल करते हैं और दीन की बातों का इल्म हासिल करते है।.

वो जो बे देखे अपने रब से डरते हैं और उन्हें क़यामत का डर लगा हुआ है{49} और यह है बरकत वाला ज़िक्र कि हमने उतारा (19)
(19) अपने हबीब मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर, यानी क़ुरआन शरीफ़, यह बहुत सी भलाई वाला है और ईमान लाने वालों के लिये इसमें बड़ी बरकतें हैं.
तो क्या तुम उसके इन्कारी हो{50}

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