20 सूरए तॉहा -सातवाँ रूकू

20 सूरए तॉहा -सातवाँ रूकू


और जब हमने फ़रिश्तों से फ़रमाया कि आदम को सज्दा करो तो सब सज्दे में गिरे मगर इब्लीस, उसने न माना{116} तो
हमने फ़रमाया ऐ आदम बेशक यह तेरा और तेरी बीबी का दुश्मन है(1)
(1) इस से मालूम हुआ कि बुज़ुर्गी और प्रतिष्ठा वाले को तस्लीम न करना और उसका आदर करने से मुंह फेरना हसद, ईषर्या
और दुश्मनी की दलील है. इस आयत में शैतान का हज़रत आदम को सज्दा न करना आपके साथ उसकी दुश्मनी की दलील क़रार दिया गया.

तो ऐसा न हो कि वो तुम दोनो को जन्नत से निकाल दे फिर तू मशक़्क़त में पड़े (2){117}
(2) और अपनी गिज़ा, आहार, और ख़ुराक के लिये ज़मन जोतने, खेती करने, दाना निकालने, पीसने, पकाने की मेहनत में जकड़ा जाए और चूंकि औरत का नफ़क़ा यानी गुज़ारा भत्ता मर्द के ज़िम्मे है इसलिये उसकी सारी मेहनत की निस्बत सिर्फ़ हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की तरफ़ फ़रमाई गई.

बेशक तेरे लिये जन्नत में यह है कि न तू भूखा हो न नंगा हो{118} और यह कि तुझे न इससे प्यास लगे न धूप(3){119}
(3) हर तरह का ऐशों राहत जन्नत में मौजूद है. मेहनत और परिश्रम से बिल्कुल अम्न है.

तो शैतान ने उसे वसवसा दिया बोला ऐ आदम क्या में तुम्हें बतादूं हमेशा जीने का पेड़(4)
(4) जिसको खा कर खाने वाले को हमेशा की ज़िन्दगी हासिल होती है.

और वह बादशाही कि पुरानी न पड़े (5){120}
(5) और उसमें पतन न आए.

तो उन दोनों ने उसमें से खा लिया अब उनपर उनकी शर्म की चीज़ें ज़ाहिर हुई(6)
(6) यानी जन्नती लिबास उनके शरीर से उतर गए.

और जन्नत के पत्ते अपने ऊपर चिपकाने लगे(7)
(7) गुप्तांग छुपाने और बदन ढकने के लिये.

और आदम से अपने रब के हुक्म में लग़ज़िश वाक़े हुई {121} तो जो मतलब चाहा था उसकी राह न पाई(8)
(8) और उस दरख़्त के खाने से हमेशा की ज़िन्दगी न मिली. फिर हज़रत आदम अलैहिस्सलाम तौबह और इस्तिग़फ़ार में लग गए और अल्लाह की बारगाह में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के वसीले या माध्यम से दुआ की.

फिर उसके रब ने चुन लिया तो उस पर अपनी रहमत से रूजू फ़रमाई और अपने ख़ास क़ुर्ब (समीपता) की राह दिखाई {122} फ़रमाया तुम दोनो मिलकर जन्नत से उतरो तुम में एक दूसरे का दुश्मन है फिर अगर तुम सब को मेरी तरफ़ से हिदायत आए(9)
(9) यानी किताब और रसूल.

तो जो मेरी हिदायत का पैरो हुआ वह न बहके(10)
(10) यानी दुनिया में.

न बदबख़्त हो(11){123}
(11)  आख़िरत में, क्योंकि आख़िरत का दुर्भाग्य दुनिया में सच्चाई के रास्ते से बहकने का नतीजा है. जो कोई अल्लाह की किताब और सच्चे रसूल का अनुकरण करे और उनके आदेशानुसार चले, वह दुनिया में बहकने से और आख़िरत में उसके अज़ाब और वबाल से छुटकारा पाएगा.

और जिसने मेरी याद से मुंह फेरा (12)
(12) और मेरी हिदायत से मुंह फेरा.

तो बेशक उसके लिये तंग ज़िन्दगी है,(13)
(13) दुनिया में क़ब्र में या आख़िरत में या दीन में या इन सब में, दुनिया की तंग ज़िन्दगी यह है कि हिदायत का अनुकरण न करने से बुरे कर्म और हराम में पड़े या क़नाअत से मेहरूम होकर लालच में गिरफ़्तार हो जाए और माल मत्ता की बहुतात से भी उसको मन की शान्ति और चैन प्राप्त न हो. हर चीज़ की तलब में आवारा हो और लालच के दुख से कि यह नहीं, वह नहीं, हाल अंधेरा और समय खराब रहे. और अल्लाह पर भरोसा करने वाले मूमिन की तरह उसको सुक़ून और शान्ति हासिल ही न हो जिसको पाक ज़िन्दगी कहते हैं. और क़ब्र की तंग ज़िन्दगी यह है कि हदीस शरीफ़ में आया कि काफ़िर पर निनानवे अजगर
उसकी क़ब्र में मुसल्लत किये जाते है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया. यह आयत असवद बिन अब्दुल उज़्ज़ा मख़जूमी के बारे में उतरी और क़ब्र की ज़िन्दगी से मुराद क़ब्र का इस सख़्ती से दबाना है जिस से एक तरफ़ की पसलियाँ दूसरी तरफ़ आ जाती है और आख़िरत में तंग ज़िन्दगी जहन्नम के अज़ाब हैं जहाँ ज़क़्क़ूम और खोलता हुआ पानी और जहन्नमियों के ख़ून और उनके पीप खाने पीने के लिये दिये जाएंगे और दीन में तंग ज़िन्दगी यह है कि नेकी की राहे तंग हो जाएं और आदमी हराम कामों में पड़ जाए. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि बन्दे को थोड़ा मिले या
बहुत, अगर ख़ुदा का ख़ौफ़ नहीं तो उसमें कुछ भलाई नहीं  और यह तंग ज़िन्दगी है. (तफ़सीरे कबीर, ख़ाज़िन और मदारिक वग़ैरह)

और हम उसे क़यामत के दिन अंधा उठाएंगे{124}कहेगा ऐ रब मेरे मुझे तूने क्यों अंधा उठाया मैं तो अखियारा था(14){125}
(14) दुनिया में.

फ़रमाएगा यूंही तेरे पास हमारी आयतें आई थीं(15)
(15) तो उनपर ईमान न लाया और-

तूने उन्हें भुला दिया और ऐसे ही आज तेरी कोई ख़बर न लेगा(16){126}
(16) जहन्नम की आग में जला करेगा.

और हम ऐसा ही बदला देते हैं जो हद से बढ़े और अपने रब की आयतों पर ईमान न लाए और बेशक आख़िरत का अज़ाब सबसे सख़्त तर और सब से देरपा है {127} तो क्या उन्हें इससे राह न मिली कि हमने उनसे पहले कितनी संगते (कौमें) हलाक कर दीं(17)
(17) जो रसूलों को नहीं मानती थीं.

कि यह उनके बसने की जगह चलते फिरते हैं (18)
(18) यानी कुरैश अपने सफ़रों में उनके इलाक़ों पर गुज़रते हैं और उनकी हलाकत के निशान देखते हैं.

बेशक इसमें निशानियां हैं अक़्ल वालों को (19){128}
(19) जो सबक पकड़े और समझें कि नबियों को झुटलाने और उनके विरोध का अंजाम बुरा है.

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