20 सूरए तॉहा -छटा रूकू

20 सूरए   तॉहा -छटा रूकू

और तुमसे पहाड़ों को पूछते हैं(1)
(1)हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि सक़ीफ़ क़बीले के एक आदमी ने रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से पूछा कि क़यामत के दिन पहाड़ों का क्या हाल होगा. इस पर यह आयत उतरी.

तुम फ़रमाओ इन्हें मेरा रब रेज़ा रेज़ा करके उड़ा देगा{105} तो ज़मीन को पटपर (चटियल मैदान) हमवार करके छोड़ेगा{106} कि तू इसमें नीचा ऊंचा कुछ न देखे{107} उस दिन पुकारने वाले के पीछे दौड़ेंगे(2)
(2) जो उन्हें क़यामत के हिसाब के मैदान की तरफ़ बुलाएगा और पुकारेगा कि चलो रहमान के समक्ष पेश होने को और यह पुकारने वाले हज़रत इस्राफ़ील होंगे.

उसमें कजी न होगी(3)
(3) और उस बुलाने से कोई मुंह नहीं मोड़ पाएगा.

और सब आवाज़ें रहमान के हुज़ूर (4)
(4) हैबत और जलाल से.

पस्त होकर रह जाएंगी तो तू न सुरेगा मगर बहुत आहिस्ता आवाज़ (5){108}
(5) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि इसमें सिर्फ़ होंटों की हरकत होगी.

उस दिन किसी की शफ़ाअत काम न देगी मगर उसकी जिसे रहमान ने(6)
(6) शफ़ाअत करने का.

इज़्न(आज्ञा) दे दिया है और उसकी बात पसन्द फ़रमाई{109} वह जानता है जो कुछ उनके आगे है और जो कुछ उनके पीछे(7)
(7) यानी सारा गुज़रा हुआ और सारा आने वाला और दुनिया और आख़िरत के सारे काम. यानी अल्लाह का इल्म बन्दों की ज़ात और सिफ़ात और समस्त हालात को घेरे हुए है.

और उनका इल्म उसे नहीं घेर सकता(8){110}
(8) यानी सारी सृष्टि का इल्म अल्लाह की ज़ात का इहाता नहीं कर सकता. उसकी ज़ात की जानकारी सृष्टि के इल्म की पहुंच से बाहर है. वह अपने नामों और गुणों और क्षमताओं और हिकमत की निशानियों से पहचाना जाता है. कुछ मुफ़स्सिरों ने आयत के ये मानी बयान किये हैं कि ख़ल्क़ के उलूम ख़ालिक़ से सम्बन्धित जानकारी का इहाता नहीं कर सकते.

और सब मुंह झुक जाएंगे उस ज़िन्दा क़ायम रहने वाले के हुज़ूर(9)
(9) और हर एक इज्ज़ और नियाज़ की शान के साथ हाज़िर होगा, किसी में सरकशी न रहेगी, अल्लाह तआला के क़हर व हुकूमत का सम्पूर्ण इज़हार होगा.

और बेशक नामुराद रहा जिसने ज़ुल्म का बोझ लिया(10){111}
(10) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने इसकी तफ़सीर में फ़रमाया जिसने शिर्क किया वह टोटे में रहा. बेशक शिर्क सबसे बुरा जुर्म है और जो इस जुर्म में जकड़ा हुआ हिसाब के मैदान में आए उससे बढ़कर नामुराद कौन है.

और जो कुछ नेक काम करे और हो मुसलमान तो उसे न ज़ियादत का ख़ौफ़ होगा न नुक़सान का(11){112}
(11)  इस आयत से मालूम हुआ कि फ़रमाँबरदारी और नेक कर्म सब की क़ुबूलियत ईमान के साथ जुड़ी है कि ईमान हो तो सब नेकियाँ कारआमद हैं और ईमान न हो, सारे अमल बेकार.

और यूंही हमने इसे अरबी क़ुरआन उतारा और इस में तरह तरह से अज़ाब के वादे दिये(12)
(12) फ़र्ज़ों के छोड़ने और मना की हुई बातों को अपनाने पर.

कि कहीं उन्हें डर हो या उनके दिल में कुछ सोच पैदा करे(13){113}
(13) जिससे उन्हें नेकियों की रग़बत और बुराईयों से नफ़रत हो और वो नसीहत हासिल करें.

तो सब से बलन्द है अल्लाह सच्चा बादशाह, (14)
(14) जो अस्ल मालिक है और तमाम बादशाह उसके मोहताज.

और क़ुरआन में जल्दी न करो जब तक इस की वही (देववाणी) तुम्हें पूरी न होले(15)
(15) जब हज़रत जिब्रील क़ुरआन शरीफ़ लेकर उतरते थे तो हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम उनके साथ पढ़ते थे और जल्दी करते थे ताकि ख़ूब याद हो जाए. इस पर यह आयत उतरी और फ़रमाया गया कि आप मशक़्क़त न उठाएं और सूरए क़यामह में अल्लाह तआला ने ख़ुद ज़िम्मा लेकर आपकी और ज़्यादा तसल्ली फ़रमा दी.

और अर्ज़ करो कि ऐ मेरे रब मुझे इल्म ज़्यादा दे{114} और बेशक हमने आदम को इससे पहले एक ताक़ीदी हुक्म दिया था(16)
(16) कि जिस दरख़्त के पास जाने से मना किया गया है उसके पास न जाएं.
तो वह भूल गया और हमने उसका इरादा न पाया{115}

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