19 सूरए मरयम -पाँचवा रूकू

19 सूरए मरयम -पाँचवा रूकू

 

और आदमी कहता है क्या जब मैं मर जाऊंगा तो ज़रूर अनक़रीब जिलाकर निकाला जाऊंगा(1){66}
(1) इन्सान से यहाँ मुराद वो काफ़िर हैं जो मौत के बाद ज़िन्दा किये जाने के इन्कारी थे जैसे कि उबई बिन ख़लफ़ और वलीद बिन मुग़ीरा. उन्हीं लोगों के हक़ में यह आयत उतरीं और यही इसके उतरने की परिस्थति है.

और क्या आदमी को याद नहीं कि हमने इससे पहले उसे बनाया और जब वह कुछ न था,(2){67}
(2) तो जिसने मअदूम को मौजूद फ़रमाया उसकी क़ुदरत से मुर्दे को ज़िन्दा कर देना क्या आश्चर्य.

तो तुम्हारे रब की क़सम हम उन्हें (3)
(3) यानी मौत के बाद उठाए जाने का इन्कार करने वालों के साथ.

और शैतानों को सबको घेर लाएंगे (4)
(4) यानी काफ़िरों को उनके गुमराह करने वाले शैतानों के साथ इस तरह कि हर काफ़िर शैतान के साथ एक जंजीर में जकड़ा होगा.

और उन्हें दोज़ख़ के आसपास हाज़िर करेंगे, घुटनों के बल गिरे{68} फिर हम(5)
(5) काफ़िरों के.

हर गिरोह से निकालेंगे जो उनमें रहमान पर सबसे ज़्यादा बेबाक होगा(6){69}
(6) यानी दोज़ख़ होने में,जो सबसे ज़्यादा सरकश और कुफ़्र में सख़्त होगा वह आगे किया जाएगा. कुछ रिवायतों में है कि काफ़िर सब के सब जहन्नम के गिर्द ज़ंजीरों में जकड़े, तौक़ डाले हुए हाज़िर किये जाएंगे फिर जो कुफ़्र और सरकशी में सख़्त होंगे वो पहले जहन्नम में दाख़िल किये जाएंगे.

फिर हम ख़ूब जानते हैं जो उस आग में भूनने से ज़्यादा लायक़ हैं{70} और तुम में कोई ऐसा नहीं जिसका गुज़र दोज़ख़ पर न हो, (7)
(7) नेक हो या बुरा, मगर नेक सलामत रहेंगे और जब उनका गुज़र दोज़ख़ पर होगा तो दोज़ख़ से आवाज़ उठेगी कि ऐ मूमिन गुज़र जा कि तेरे नूर ने मेरी लपट ठण्डी कर दी. हसन क़तादा से रिवायत है कि दोज़ख़ पर गुज़रने से पुले सिरात पर गुज़रना मुराद है जो दोज़ख़ पर है.

तुम्हारे रब के ज़िम्मे पर यह ज़रूर ठहरी हुई बात है(8){71}
(8) यानी जहन्नम में दाख़िला अल्लाह के आदेशों में से है जो अल्लाह तआला ने अपने बन्दों पर लाज़िम किया है.

फिर हम डर वालों को बचा लेंगे(9)
(9) यानी ईमानदारों को.

और ज़ालिमों को उसमें छोड़ देंगे घुटनों के बल गिरे{72} और जब उनपर हमारी रौशन आयतें पढ़ी जाती हैं(10)
(10)  नज़र बिन हारिस वग़ैरह के जैसे कुरैश के काफ़िर बनाव सिंगार करके, बालों में तेल डालकर, कंघियाँ करके, उमदा लिबास पहन कर घमण्ड के साथ ग़रीब फ़कीर—

काफ़िर मुसलमानों से कहते हैं कौन से गिरोह का मकान अच्छा और मजलिस बेहतर है(11){73}
(11) मतलब यह है कि जब आयतें उतारी जाती हैं और दलीलें और निशानियाँ पेश की जाती हैं तो काफ़िर उनमें तो ग़ौर नहीं करते और उनसे फ़ायदा नहीं उठाते,इसकी जगह दौलत और माल और लिबास और मकान पर घमण्ड करते है.

और हमने उनसे पहले कितनी संगते खपा दीं(12)
(12) उम्मतें हलाक कर दीं.

(क़ौमे हलाक कर दीं) कि वो उनसे भी सामान और नमूद (दिखावे) में बेहतर थे{74}तुम फ़रमाओ जो गुमराही में हो तो उसे रहमान ख़ूब ढील दे,(13)
(13) दुनिया में उसकी उम्र लम्बी करके और उसको गुमराही और बुराई में छोड़कर.

यहां तक कि जब  वो देखें वो चीज़ जिसका उन्हें वादा दिया जाता है या तो अज़ाब (14)
(14) दुनिया का क़त्ल और गिरफ़्तारी.

या क़यामत(15)
(15)जो तरह तरह की रूस्वाई और अज़ाब पर आधारित है.

तो अब जान लेंगे कि किस का बुरा दर्जा है और किसकी फ़ौज कमज़ोर(16){75}
(16) काफ़िरों की शैतानी फ़ौज या मुसलमानों का नूरी लश्कर. इसमें मुश्रिकों के उस क़ौल का रद है जो उन्होंने कहा था कि कौन से गिरोह का मकान अच्छा और मजलिस बेहतर है.

और जिन्होंने हिदायत पाई (17)
(17) और  ईमान लाए.

अल्लाह उन्हें और हिदायत बढाएगा (18)
(18) इसपर इस्तक़ामत अता फ़रमाकर और अधिक सूझबूझ और तौफ़ीक़ देकर.

और बाक़ी रहने वाली नेक बातों का (19)
(19) ताअतें और आख़िरत के सारे कर्म और  पाँचों वक़्त की नमाज़ और अल्लाह तआला की स्तूति और  ज़िक्र और  सारे नेक कर्म, ये सब बाक़ी रहने वाली नेक बातें हैं कि मूमिन के काम आती हैं.

तेरे रब के यहां सब से बेहतर सवाब और सबसे भला अंजाम(20){76}
(20) काफ़िरों के कर्मों के विपरीत कि वो निकम्मे, निरर्थक और बातिल है.

तो क्या तुमने उसे देखा जो हमारी आयतों का इन्कारी हुआ और कहता है मुझे ज़रूर माल व औलाद मिलेंगे(21){77}
(21) बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस में है कि हज़रत ख़बाब बिन अरत का जिहालत के ज़माने में आस बिन वाइल सहमी पर क़र्ज़ था. वह उसके पास तक़ाज़े को गए तो आस ने कहा कि मैं तुम्हारा क़्रर्ज़ अदा न करूंगा जब तक तुम मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) से फिर न जाओ और कुफ़्र इख़्तियार न कर लो. हज़रत ख़बाब ने फ़रमाया ऐसा कभी नहीं हो सकता यहाँ तक कि तू मरे और मरने के बाद ज़िन्दा होकर उठे, वह कहने लगा क्या मैं मरने के बाद ज़िन्दा होकर उठूंगा. हज़रत ख़बाब ने कहा हाँ. आस ने कहा तो फिर मुझे छोड़िये यहाँ तक कि मैं मर जाऊं और  मरने के बाद फिर ज़िन्दा होंऊं और मुझे माल व औलाद मिले, जब ही आपका क़र्ज़ अदा करूंगा. इसपर ये आयतें उतरीं.

क्या ग़ैब को झांक आया है(22)
(22) और उसने लौहे मेहफ़ूज़ में देख लिया है कि आख़िरत में उसको माल और औलाद मिलेगी.

या रहमान के पास कोई क़रार रखा है{78} हरगिज़ नहीं(23)
(23) ऐसा नहीं है तो—-

अब हम लिख रखेंगे जो वह कहता है और उसे ख़ूब लम्बा अज़ाब देंगे{79} और जो चीज़ें कह रहा है(24)
(24) यानी माल और औलाद उन सबसे उसकी मिल्क और उन्हें इस्तेमाल करने का हक़ सब उसके हलाक होने से उठ जाएगा और

उनके हमीं वारिस होंगे और हमारे पास अकेला आएगा (25){80}
(25) कि न उसके पास माल होगा न औलाद और उसका ये दावा करना झूटा हो जाएगा.

 और अल्लाह के सिवा और ख़ुदा बना लिये(26)
(26) यानी मुश्रिकों ने बुतों को मअबूद बनाया और उनको पूजने लगे इस उम्मीद पर—

कि वो उन्हे ज़ोर दें(27){81}
(27) और उनकी मदद करें और  उन्हें अज़ाब से बचाएं.

हरगिज़ नहीं(28)
(28) ऐसा हो ही नहीं सकता.

कोई दम जाता है कि वो(29)
(29) बुत, जिन्हें ये पूजते थे.

उनकी बन्दगी से इन्कारी होंगे और उनके मुख़ालिफ़ हो जाएंगे(30){82}
(30) उन्हें झुटलाऐंगे और उन पर लानत करेंगे. अल्लाह तआला उन्हे ज़बान देगा और वह कहेंगे यारब उन्हें अज़ाब कर.

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