19 सूरए मरयम – दूसरा रूकू

19 सूरए मरयम – दूसरा रूकू


और किताब में मरयम को याद करो(1)
(1) यानी ऐ नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम, क़ुरआन शरीफ़ में हज़रत मरयम का वाक़िआ पढ़कर इन लोगों को सुनाइये ताकि इन्हें उनका हाल मालूम हो.

जब अपने घर वालों से पूरब की तरफ़ एक जगह अलग हो गई(2){16}
(2) और अपने मकान में  या बैतुल मक़दिस की पूर्वी दिशा में लोगों से जुदा होकर इबादत के लिये तन्हाई में बैठे.

तो उनसे उधर(3)
(3) यानी अपने और घर वालों के दरमियान.

एक पर्दा कर लिया, तो उसकी तरफ़ हमने अपना रूहानी भेजा(4)
(4) जिब्रईल अलैहिस्सलाम.

वह उसके सामने एक तंदुरूस्त आदमी के रूप में ज़ाहिर हुआ{17} बोली मैं तुझसे रहमान की पनाह मांगती हूँ अगर तुझे ख़ुदा का डर है {18} बोला मैं तेरे रब का भेजा हुआ हूँ कि मैं तुझे एक सुथरा बेटा दूँ {19} बोली मेरे लड़का कहाँ से होगा मुझे तो किसी आदमी ने हाथ न लगाया न मैं बदकार हूँ {20} कहा यूंही है (5)
(5) यही अल्लाह की मर्ज़ी है कि तुम्हें बग़ैर मर्द के छुए ही लड़का प्रदान करे.

तेरे रब ने फ़रमाया है कि ये (6)
(6) यानी बग़ैर बाप के बेटा देना.

मुझे आसान है, और इसलिये कि हम उसे लोगों के वास्ते निशानी  (7)
(7) और अपनी क़ुदरत का प्रमाण.

करें और अपनी तरफ़ से एक रहमत(8)
(8) उनके लिये जो उसके दीन का अनुकरण करें, उसपर ईमान लाएं.

और यह काम ठहर चुका है(9){21}
(9) अल्लाह के इल्म में. अब न रद हो सकता है न बदल सकता है. जब हज़रत मरयम को इत्मीनान हो गया और उनकी परेशानी जाती रही तो हज़रत जिब्रील ने उनके गिरेबान में या आस्तीन में या दामन में या मुंह में दम किया और वह अल्लाह की क़ुदरत से उसी समय गर्भवती हो गई. उस वक़्त हज़रत मरयम की उम्र तेरह या दस साल की थी.

अब मरयम ने उसे पेट में लिया फिर उसे लिये हुए एक दूर जगह चली गई(10){22}
(10) अपने घर वालों से और वह जगह बैतुल लहम थी. वहब का क़ौल है कि सबसे पहले जिस शख़्स को हज़रत मरयम के गर्भ का इल्म हुआ वह उनका चचाज़ाद भाई यूसुफ़ बढ़ई है जो बैतुल मक़दिस की मस्जिद का ख़ादिम था और बहुत बड़ा इबादत गुज़ार व्यक्ति था. उसको जब मालूम हुआ कि मरयम गर्भवती हैं तो काफ़ी हैरत हुई. जब चाहता था कि उनपर लांछन लगाए तो उनकी इबादत का तक़वा और हर वक़्त का हाज़िर रहना किसी वक़्त ग़ायब न होना याद करके ख़ामोश हो जाता था. और जब गर्भ का ख़्याल करता था तो उनको बुरी समझना मुश्किल मालूम होता था. आख़िर में उसने हज़रत मरयम से कहा कि मेरे दिल में एक बात आई है, बहुत चाहता हूँ कि ज़बान पर न लाऊं मगर अब रहा नहीं जाता. आप कहें तो मैं बोल दूँ ताकि मेरे दिल की परेशानी दूर हो जाए. हज़रत मरयम ने कहा कि अच्छी बात कहो. तो उसने कहा कि ऐ मरयम मुझे बताओ क्या खेती बीज के बिना और पेड़ बारिश के बिना और बच्चा बाप के बिना हो सकता है. हज़रत मरयम ने कहा कि हाँ, तुझे मालूम नहीं कि अल्लाह तआला ने जो सबसे पहले खेती पैदा की वह बीज के बिना पैदा की और पेड़ अपनी क़ुदरत से बारिश के बिना उगाए. क्या तू यह कह सकता है कि अल्लाह पानी की मदद के बिना दरख़्त पैदा करने की क्षमता नहीं रखता. यूसुफ़ ने कहा मैं यह तो नहीं कहता बेशक मैं मानता हूँ कि अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है जिसे “होजा” फ़रमाए वह हो जाती है. हजरत मरयम ने कहा कि क्या तुझे नहीं मालूम नहीं कि अल्लाह तआला ने हज़रत आदम और उनकी बीबी को माँ बाप के बिना पैदा किया. हज़रत मरयम की इस बात से यूसुफ़ का शक दूर हो गया और हज़रत मरयम गर्भ के कारण कमज़ोर हो गई थीं इस लिये वह मस्जिद की ख़िदमत में उनकी सहायता करने लगा. अल्लाह तआला ने हज़रत मरयम के दिल में डाला कि वह अपनी क़ौम से अलग चली जाएं. इसलिये वह बैतुल – लहम में चली गई.

फिर उसे जनने का दर्द एक खजूर की जड़ में ले आया (11)
(11) जिसका पेड़ जंगल में सूख गया था. तेज़ सर्दी का वक़्त था. आप उस पेड़ की जड़ में आई ताकि उससे टेक लगाएं और फ़ज़ीहत व लांछन के डर से—

बोली हाय किसी तरह मैं इससे पहले मर गई होती और भूली बिसरी हो जाती{23} तो उसे(12)
(12) जिब्रईल ने घाटी की ढलान से.

उसके तले से पुकारा कि ग़म न खा(13)
(13) अपनी तन्हाई का और खाने पीने की कोई चीज़ मौजूद न होने का और लोगों के बुरा भला कहने का.

बेशक तेरे रब ने नीचे एक नहर बहा दी है(14){24}
(14) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने या हज़रत जिब्रईल ने अपनी एड़ी ज़मीन पर मारी तो मीठे पानी का एक चश्मा जारी हो गया और खजूर का पेड़ हरा भरा हो गया, फल लाया. वो फल पककर रसदार हो गए और हज़रत मरयम से कहा गया—-

और खजूर की जड़ पकड़ कर अपनी तरफ़ हिला तुझपर ताज़ी पक्की खजूरें गिरंगी(15) {25}
(15) जो ज़च्चा के लिये बेहतरीन ग़िज़ा हैं.

तो खा और पी और आँख ठन्डी रख,(16)
(16) अपने बेटे ईसा से—

फिर अगर तू किसी आदमी को देखे(17)
(17) कि तुझसे बच्चे को पूछता है.

तो कह देना मैंने आज रहमान का रोज़ा माना है तो आज हरगिज़ किसी आदमी से बात न करूंगी(18){26}
(18) पहले ज़माने में बोलने का भी रोज़ा था जैसा कि हमारी शरीअत में खाने और पीने का रोज़ा होता है. हमारी शरीअत में चुप रहने का रोज़ा स्थगित हो गया. हज़रत मरयम को ख़ामोशी की नज्र मानने का इसलिये हुक्म दिया गया ताकि हज़रत ईसा कलाम फ़रमाएं और उनका बोलना मज़बूत प्रमाण हो जिससे लांछन दूर हो जाए. इससे कुछ बातें मालूम हुई. जाहिलों के जवाब में ख़ामोशी बेहतर है. कलाम को अफ़ज़ल शख़्स की तरफ़ तफ़वीज़ करना अच्छा है. हज़रत मरयम ने भी इशारे से कहा कि मैं किसी आदमी से बात न करूंगी.

तो उसे गोद में ले अपनी क़ौम के पास आई (19)
(19) जब लोगों ने हज़रत मरयम को देखा कि उनकी गोद में बच्चा है तो रोए और ग़मग़ीन हुए क्योंकि वो नेक घराने के लोग थे और.

बोले ऐ मरयम बेशक तूने बहुत बुरी बात की {27} ऐ हारून की बहन(20)
(20) और हारून या तो हज़रत मरयम के भाई का नाम था या तो बनी इस्रईल में से निहायत बुज़ुर्ग और नेक शख़्स का नाम था जिनके तक़वा और परहेज़गारी से उपमा देने के लिये उन लोगों ने हज़रत मरयम को हारून की बहन कहा था हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के भाई हज़रत हारून ही की तरफ़ निस्बत की जबकि उनका ज़माना बहुत दूर था और हज़ार बरस का समय गुज़र चुका था मगर चूंकि यह उनकी नस्ल से थीं इसलिये हारून की बहन कह दिया जैसा कि अरबों का मुहावरा है कि वो तमीमी को या अख़ा तमीम कहते हैं.

तेरा बाप (21)
(21) यान इमरान.

बुरा आदमी न था और न तेरी माँ (22)
(22) हन्ना.

बदकार {28} इसपर मरयम ने बच्चे की तरफ़ इशारा किया(23)
(23) कि जो कुछ कहना है ख़ुद उनसे कहो. इसपर क़ौम के लोगों को ग़ुस्सा आया और —

वह बोले हम कैसे बात करें उससे जो पालने में बच्चा है(24){29}
(24)यह बातचीत सुनकर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने दूध पीना छोड़ दिया और अपने बाएं हाथ पर टिक कर क़ौम की तरफ़ मुतवज्जेह हुए और दाएं हाथ से इशारा करके कलाम शुरू किया.

बच्चे ने फ़रमाया, मैं हूँ अल्लाह का बन्दा(25)
(25) पहले बन्दा होने का इक़रार किया ताकि कोई उन्हें ख़ुदा और ख़ुदा का बेटा न कहे क्योंकि आपकी निस्बत यह तोहमत लगाई जाने वाली थी. और यह तोहमत अल्लाह तआला पर लगती थी. इसलिये रसूल के मन्सब का तक़ाज़ा यही था कि वालिदा की बेगुनाही का बयान करने से पहले उस तोहमत को दूर करदें जो अल्लाह तआला की ज़ाते पाक पर लगाई जाएगी और इसी से वह तोहमत भी दूर हो गई जो वालिदा पर लगाई जाती, क्योंकि अल्लाह तआना इस बलन्द दर्जे के साथ जिस बन्दे को नवाज़ता है यक़ीनन उसकी पैदाइश और उसकी सृष्टि निहायत पाक और ताहिर है.

उसने मुझे किताब दी और मुझे ग़ैब की ख़बर बताने वाला (नबी) किया(26){30}
(26) किताब से इंजील मुराद है. हसन का क़ौल है कि आप वालिदा के पेट ही में थे कि आपको तौरात का इल्हाम फ़रमा दिया गया था और पालने में थे जब आपको नबुव्वत अता कर दी गई और इस हालत में आपका कलाम फ़रमाना आपका चमत्कार है. कुछ मुफ़स्सिरों ने आयत के मानी यह भी बयान किये है कि यह नबुव्वत और किताब की ख़बर थी जो बहुत जल्द आप को मिलने वाली थी.

और उसने मुझे मुबारक किया(27)
(27) यानी लोगों के लिये नफ़ा पहुंचाने वाला और भलाई की तअलीम देने वाला, अल्लाह तआला और उसकी तौहीद की दावत देने वाला.

मैं कहीं हूँ और मुझे नमाज़ व ज़कात की ताकीद फ़रमाई जब कि जियूं{31} और अपनी माँ से अच्छा सुलूक करने वाला(28)
(28) बनाया.

और मुझे ज़बरदस्त बदबख़्त न किया{32} और वही सलामती मुझ पर (29)
(29) जो हज़रत यहया पर हुई.

जिस दिन मैं पैदा हुआ और जिस दिन मरूं और जिस दिन ज़िन्दा उठाया जाऊं(30){33}
(30) जब हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने यह कलाम फ़रमाया तो लोगों को हज़रत मरयम की बेगुनाही और पाकीज़गी का यक़ीन हो गया और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम इतना फ़रमाकर ख़ामोश हो गए और इसके बाद कलाम न किया जब तक कि उस उम्र को पहुंचे जिसमें बच्चे बोलने लगते हैं.(ख़ाजि़न)

यह है ईसा मरयम का बेटा, सच्ची बाते जिसमें शक करते हैं(31){34}
(31) कि यहूदी तो उन्हें जादूगर और झूठा कहते हैं (मआज़ल्लाह) और ईसाई उन्हें ख़ुदा और ख़ुदा का बेटा और तीन में का तीसरा कहते हैं. इसके बाद अल्लाह तआला अपनी तन्ज़ीह बयान फ़रमाता है.

अल्लाह को लायक़ नहीं कि किसी को अपना बच्चा ठहराए पाकी है उसको(32)
(32)इससे.

जब किसी काम का हुक्म फ़रमाता है तो यूंही कि उससे फ़रमाता है हो जा वह फ़ौरन हो जाता है{35} और ईसा ने कहा बेशक अल्लाह रब है मेरा तुम्हारा (33)
(33) और उसके सिवा कोई रब नहीं.

तो उसकी बन्दगी करो यह राह सीधी है{36} फिर जमाअतें आपस में मुख़्तलिफ़ हो गई(34)
(34) और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में ईसाईयों के कई फ़िरक़े हो गए, एक यअक़ूबिया, एक नस्तूरिया, एक मलकानिया, यअक़ूबिया कहता था कि वह अल्लाह है, ज़मीन पर उतर आया था, फिर आसमान पर चढ गया. नस्तूरिया का क़ौल है कि वह ख़ुदा का बेटा है, जब तक चाहा उसे ज़मीन पर रखा फिर उठा लिया और तीसरा सम्प्रदाय कहता था कि वह अल्लाह के बन्दे हैं, मख़लूक़ हैं, नबी है. यह ईमान वाला समुदाय था (मदारिक)

तो ख़राबी हे काफ़िरों के लिये एक बड़े दिन की हाज़िरी से(35){37}
(35) बड़े दिन से क़यामत का दिन मुराद है.

कितना सुनेंगे और कितना देखेंगे जिस दिन हमारे पास हाज़िर होंगे(36)
(36) और उस दिन का देखना और सुनना कुछ नफ़ा न देगा जब उन्होंने दुनिया में सच्चाई की दलीलों को नहीं देखा और अल्लाह की चेतावनियों को नहीं सुना. कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा कि यह कलाम तहदीद के तौर पर है कि उस रोज़ ऐसी हौलनाक बातें सुनेंगे और देखेंगे जिनसे दिल फट जाएं.

मगर आज ज़ालिम खुली गुमराही में है(37){38}
(37) न हक़ देखें, न हक़ सुनें, बहरे, अन्धे बने हुए हैं. हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को खुदा और मअबूद ठहराते हैं जबकि उन्होंने खुले शब्दों में अपने बन्दे होने का ऐलान फ़रमाया

और उन्हें डर सुनाओ पछतावे के दिन का (38)
(38)  हदीस शरीफ़ में है कि जब काफ़िर जन्नत की मन्ज़िलों को देखेंगे जिनसे वो मेहरूम किये गए तो उन्हें हसरत और शर्मिन्दगी होगी कि काश वो दुनिया में ईमान ले आए होते.

जब काम हो चुकेगा(39)
(39) और जन्नत वाले जन्नत में और दोज़ख़ वाले दोज़ख़ में पहुंचेंगे, ऐसा सख़्त दिन दरपेश है.

और वो ग़फ़लत में हैं(40)
(40) और उस दिन के लिये कुछ फ़िक्र नहीं करते.

और नहीं मानते{39} बेशक ज़मीन और जो कुछ उस पर है सब के वारिस हम होंगे(41)
(41) यानी सब फ़ना हो जाएंगे, हम ही बाक़ी रहेंगे.

और वो हमारी ही तरफ़ फिरेंगे(42){40}
(42) हम उन्हें उनके कर्मों का बदला देंगे.

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