22 सूरए हज -तीसरा रूकू

22 सूरए  हज -तीसरा रूकू

बेशक अल्लाह दाख़िल करेगा उन्हें जो ईमान लाए और अच्छे काम किये बहिश्तों (स्वर्ग)में जिनके नीचे नहरें बहें उसमें पहनाए जाएंगे सोने के कंगन और मोती, (1)
(1) ऐसे जिनकी चमक पूर्व से पश्चिम तक रौशन कर डाले. (तिरमिज़ी)

और वहां उनकी पोशाक रेशम है(2){23}
(2) जिसका पहनना दुनिया में मर्दों को हराम है. बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस में है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, जिसने दुनिया में रेशम पहना, आख़िरत में न पहनेगा.

और उन्हें पाकीज़ा बात की हिदायत की गई (3)
(3) यानी दुनिया में, और पाकीज़ा बात से तौहीद का कलिमा मुराद है. कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा, क़ुरआन मुराद है.

और सब ख़ूबियों सराहे की राह बताई गई(4){24}
(4) यानी अल्लाह का दीन, इस्लाम.

बेशक वो जिन्हों ने कुफ़्र किया और रोकते हैं अल्लाह की राह(5)
(5) यानी उसके दीन और उसकी इताअत से.

और उस अदब (आदर) वाली मस्जिद से (6)
(6) यानी उस में दाख़िल होने से. यह आयत सुफ़ियान बिन हर्ब वग़ैरह के बारे में उतरी जिन्होंने सैयदे आलम सललल्लाहो अलैहे वसल्लम को मक्कए मुकर्रमा में दाख़िल होने से रोका था. मस्जिदे हराम से या ख़ास काबा मुराद है, जैसा कि इमाम शाफ़ई रहमतुल्लाह अलैहे फ़रमाते हैं. उस सूरत में मानी ये होंगे कि वह सारे लोगों का क़िबला है. वहाँके रहने वाले और परदेसी सब बराबर हैं. सब के लिये उस का आदर और पाकी और उसमें हज के संस्करों की अदायगी एक सी है. और तवाफ़ और नमाज़ की फ़ज़ीलत में शहरी और परदेसी के बीच कोई अन्तर नहीं. और इमामे आज़म अबू हनीफ़ा रदियल्लाहो अन्हो के नज़दीक यहाँ मस्जिदे हराम से मक्कए मुकर्रमा यानी पूरा हरम मुराद है. इस सूरत में मानी ये होंगे कि हरम शरीफ़ शहरी और परदेसी सब के लिए एकसा है. उसमें रहने और ठहरने का हर किसी को हक़ है सिवाय इसके कि कोई किसी को निकाले नहीं. इसीलिये इमाम साहिब मक्कए मुकर्रमा की ज़मीन के क्रय विक्रय और किराए को मना फ़रमाते हैं. जैसा कि हदीस शरीफ़ में है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि मक्कए मुकर्रमा हरम है इसकी ज़मीने बेची न जाएं. (तफ़सीरे अहमदी)

जिसे हमने सब लोगों के लिये मुकर्रर किया कि उसमें एकसा हक़ (अधिकार) है वहां के रहने वाले और परदेसी का और जो उसमें किसी ज़ियादती का नाहक़ इरादा करे हम उसे दर्दनाक अज़ाब चखाएंगे(7){25}
(7) “किसी ज़ियादती का नाहक इरादा करे” नाहक़ ज़ियादगी से या शिर्क और बुत परस्ती मुराद है. कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा कि हर वर्जित क़ौल और काम मुराद है, यहाँ तक कि ख़ादिम को गाली देना भी. कुछ ने कहा इससे मुराद है हरम में बग़ैर इहराम के दाख़िल होना. या मना की हुई बातों का करना जैसे शिकार मारना और पेड़ काटना. और हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया मुराद यह है कि जो तुझे न क़त्ल करे, तू उसे क़त्ल करे या जो तुझ पर ज़ुल्म न करे, तू उस पर ज़ुल्म करे. हज़रत इब्ने अब्बास से रिवायत है कि नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अब्दुल्लाह बिन अनीस को दो आदिमयों के साथ भेजा था जिन में एक मुहाजिर था दूसरा अन्सारी. उन लोगो ने अपनी अपनी वंशावली यानी नसब बयान किये तो अब्दुल्लाह बिन अनीस को ग़ुस्सा आया और उसने अन्सारी को क़त्ल कर दिया और ख़ुद मुर्तद होकर मक्कए मुकर्रमा की तरफ़ भाग गया. इस पर यह आयत उतरी.

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22 सूरए हज -चौथा रूकू

22 सूरए   हज -चौथा रूकू


और जबकि हमने इब्राहीम को उस घर का ठिकाना ठीक बता दिया(1)
(1) काबा शरीफ़ की तामीर के वक़्त. पहले यह इमारत हज़रत आदम अलैहिस्सलाम ने बनाई थी, तूफ़ाने नूह के वक़्त वह आसमान पर उठा ली गई. अल्लाह तआला ने एक हवा मुक़र्रर की जिसने उसकी जगह को साफ़ कर दिया और एक क़ौल यह है कि अल्लाह तआला ने एक बादल भेजा जो ख़ास उस स्थान के मुक़ाबिल था जहाँ काबाए मुअज़्ज़मा की इमारत थी. इस तरह हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को काबे की जगह बताई गई और आपने उस पुरानी बुनियाद पर काबे की इमारत तामीर की और अल्लाह तआला ने आपको वही फ़रमाई.

और हुक्म दिया कि मेरा कोई शरीक न कर और मेरा घर सुथरा रख(2)
(2) शिर्क से और बुतों से और हर क़िस्म की नापाकियों से.

तवाफ़ (परिक्रमा) वालों और एतिकाफ़ (मस्जिद में बैठना) वालों और रूकू सज्दे वालों के लिये (3)(26)
(3) यानी नमाज़ियों के.

और लोगों में हज की आम निदा (घोषणा) कर दे(4)
(4) चुनांचे हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अबू क़ुबैस पहाड़ पर चढ़कर जगत के लोगों को आवाज़ दी कि बैतुल्लाह का हज करों. जिनकी क़िस्मत में हज है उन्होंने बापों की पीठ और माओं के पेट से जवाब दिया : “लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक” हम हाज़िर हैं ऐ हमारे रब, हम हाज़िर हैं. हसन रदियल्लाहो अन्हो का क़ौल है कि इस आयत में “अज़्ज़िन” यानी “आम पुकार कर दे” का सम्बोधन सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को है. चुनांचे आख़िरी हज में एलान फ़रमा दिया और इरशाद किया कि ऐ लोगो, अल्लाह ने तुम पर हज फ़र्ज़ किया तो हज करो.

वो तेरे पास हाज़िर होंगे प्यादा और हर दुबली ऊंटनी पर कि हर दूर की राह से आती है(5){27}
(5) और बहुत ज़्यादा सफ़र और घूमने से दुबली हो जाती हैं.

ताकि वो अपना फ़ायदा पाएं(6)
(6) दीनी भी और दुनियावी भी जो इस इबादत के साथ ख़ास हैं, दूसरी इबादत में नहीं पाए जाते.

और अल्लाह का नाम लें(7)
(7) ज़िब्ह के समय.

जाने हुए दिनों में(8)
(8) जाने हुए दिनों से ज़िलहज का अशरा यानी दस दिन मुराद हैं जैसा कि हज़रत अली और इब्ने अब्बास व हसन और क़तादा रदियल्लाहों अन्हुम का क़ौल है और यही मज़हब है हमारे इमामे आज़म हज़रत अबू हनीफ़ा रदियल्लाहो अन्हो का और साहिबैन के नज़्दीक जाने हुए दिनों से क़ुर्बानी के दिन मुराद हैं. यह क़ौल है. हज़रत इब्ने उमर रदियल्लाहो अन्हो का और हर सूरत में यहाँ इन दिनों से ख़ास ईद का दिन मुराद है. (तफ़सीरे अहमदी)

इसपर कि उन्हें रोज़ी दी बेज़बान चौपाए(9)
(9) ऊंट, गाय, बकरी और भेड़.

तो उनमें से ख़ुद खाओ और मुसीबत के मारे मोहताज (दरिद्र) को खिलाओ (10){28}
(10) हर एक क़ुर्बानी से, जिन का इस आयत में बयान है, खाना जायज़ है, बाक़ी क़ुर्बानियों से जायज़ नहीं. (तफ़सीरे अहमदी)

फिर अपना मैल कुचैल उतारें(11)
(11) मूंछ कतरवाएं, नाख़ुन तराशें, बग़लों और पेडू के बाल साफ़ करें.

और अपनी मन्नतें पूरी करें(12)
(12) जो उन्होंने मानी हों.

और उस आज़ाद घर का तवाफ़ (परिक्रमा) करें(13){29}
(13) इससे तवाफ़े ज़ियारत यानी हज़ का फ़र्ज़ तवाफ़ मुराद है. हज के मसाइल तफ़सील से सूरए बक़रा पारा दो में ज़िक्र हो चुके.

बात यह है और जो अल्लाह की हुरमतों (निषेधों) का आदर करें(14)
(14) यानी उसके एहकाम की, चाहे वो हज के संस्कार हों या उनके सिवा और आदेश. कुछ मुफ़स्सिरों ने इस से हज के संस्कार मुराद लिये हैं और कुछ ने बैते हराम, व मशअरे हराम व शहरे हराम व बलदे हराम व मस्जिदे हराम मुराद लिये हैं.

तो वह उसके लिये उसके रब के यहाँ भला है और तुम्हारे लिये हलाल किये गए बेज़बान चौपाए(15)
(15) कि उन्हें ज़िब्ह करके खाओ.

सिवा उनके जिनकी मुमानिअत(मनाही) तुम पर पढ़ी जाती है(16)
(16) क़ुरआन शरीफ़ में, जैसे कि सुरए माइदा की आयत “हुर्रिमत अलैकुम” में बयान फ़रमाई गई.

तो दूर हो बुतों गन्दगी से (17)
(17) जिनकी पूजा करना बदतरीन गन्दगी में लिथड़ना है.

और बचो झुटी बात से {30} एक अल्लाह के होकर कि उसका साझी किसी को न करो और जो अल्लाह का शरीक करे वह मानो गिरा आसमान से कि परिन्दे उसे ले जाते हैं(18)
(18) और बोटी बोटी करके खा जाते हैं.

या हवा उसे किसी दूर जगह फैंकती है(19){31}
(19) मुराद यह है कि शिर्क करने वाला अपनी जान को बहुत बुरी हलाकत में डालता है. ईमान को बलन्दी में आसमान से मिसाल दी गई है और ईमान छोड़ने वाले को आसमान से गिराने वाले के साथ और उसकी नफ़सानी ख़्वाहिशों को जो उसके विचारों को उलट पुलट करती हैं, बोटी बोटी ले जाने वाले पक्षियों के साथ और शैतानों को जो उसको गुमराही की घाटी में फैंकते है, हवा के साथ उपमा दी गई है और इस नफ़ीस मिसाल से शिर्क का बुरा परिणाम समझाया गया.

बात यह है और जो अल्लाह के निशानों का आदर करें तो यह दिलों की परहेज़गारी से है(20){32}
(20) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि अल्लाह के निशानों से मुराद क़ुरबानी के जानवर हैं और उनका आदर यह है कि मोटे ताज़े ख़ूबसूरत और क़ीमती लिये जाएं.

तुम्हारे लिये चौपायों में फ़ायदें हैं(21)
(21)  ज़रूरत के वक़्त उन पर सवार होने और उनका दूध पीने के.

एक निश्चित मीआद तक(22)
(22) यानी उनके ज़िब्ह के वक़्त तक.

फिर उनका पहुँचना है उस आज़ाद घर तक(23){33}
(23) यानी हरम शरीफ़ तक जहाँ वो ज़िब्ह किये जाएं.

22 सूरए हज -पांचवाँ रूकू

22 सूरए  हज -पांचवाँ रूकू

और हर उम्मत के लिये(1)
(1) पिछली ईमानदार उम्मतों में से.

हमने एक क़ुरबानी मुक़र्रर फ़रमाई कि अल्लाह का नाम लें उसके दिये हुए बेज़बान चोपायों पर(2)
(2) उनके ज़िब्ह के वक़्त.

तो तुम्हारा मअबूद एक मअबूद है(3)
(3) तो ज़िब्ह के वक़्त सिर्फ़ उसी का नाम लो. इस आयत में दलील है इसपर कि ख़ुदा के नाम का ज़िक्र करना      ज़िब्ह के लिये शर्त है. अल्लाह तआला ने हर उम्मत के लिये मुक़र्रर फ़रमा दिया था कि उसके लिये तक़र्रूब के तरीक़े पर क़ुरबानी करें और तमाम क़ुरबानियों पर उसी का नाम लिया जाए.

तो उसी के हुज़ूर गर्दन रखो(4)
(4) और सच्चे दिल से उसकी आज्ञा का पालन करो.

और ऐ मेहबूब ख़ुशी सुना दो उन तवाज़ों वालों को {34} कि जब अल्लाह का ज़िक्र होता है उनके दिल डरने लगते हैं  (5)
(5) उसके हैबत और जलाल से.

और जो मुसीबत पड़े उसके सहने वाले और नमाज़ क़ायम रखने वाले और हमारे दिये से ख़र्च करते हैं(6){35}
(6) यानी सदक़ा देते हैं.

और क़ुरबानी के डीलदार जानवर ऊंट और गाय हमने तुम्हारे लिये अल्लाह की निशानियों से किये(7)
(7) यानी उसके दीन के ऐलाम से.

तुम्हारे लिये उनमें भलाई है, (8)
(8) दुनिया में नफ़ा और आख़िरत में अज्र और सवाब.

तो उनपर अल्लाह का नाम लो(9)
(9) उनके ज़िब्ह के वक़्त जिस हाल में कि वो हों.

एक पांव बंधे तीन पाँव से खड़े(10){}
(10) ऊंट के ज़िब्ह का यही मस्नून तरीक़ा है.

फिर जब उनकी कर्वटें गिर जाएं(11)
(11) यानी ज़िब्ह के बाद उनके पहलू ज़मीन पर गिरें और उनकी हरकत ठहर जाए.

तो उनमें से ख़ुद खाओ(12)
(12) अगर तुम चाहो.

और सब्र से बैठने वाले और भीख मांगने वाले को खिलाओ, हमने यूही उनको तुम्हारे बस में दे दिया कि तुम एहसान मानो{36} अल्लाह को हरगिज़ न उनके गोश्त पहुचँते हैं न उनके ख़ून, हाँ तुम्हारी परहेज़गारी उस तक पहुँचती हे(13)
(13) यानी क़ुरबानी करने वाले सिर्फ़ नियत की सच्चाई और तक़वा की शर्तों  की रिआयत से अल्लाह तआला को राज़ी कर सकते हैं. जिहालत के ज़माने के काफ़िर अपनी क़ुरबानियों के ख़ून से काबे की दीवारों को गन्दा करते थे और इसको तक़र्रूब का साधन मानत थे. इसपर यह आयत उतरी.

यूंही उनको तुम्हारे बस में कर दिया कि तुम अल्लाह की बड़ाई बोलो इस पर कि तुम को हिदायत फ़रमाई, और ऐ मेहबूब ख़ुश ख़बरी सुनाओ नेकी वालों को (14){37}
(14) सवाब की.

बेशक अल्लाह बलाएं टालता है मुसलमानों की(15)
(15) और उनकी मदद फ़रमाता है.

बेशक अल्लाह दोस्त नहीं रखता हर बड़े दग़ाबाज़ नाशुक्रे को(16){38}
(16) यानी काफ़िरों को, जो अल्लाह और उसके रसूल की ख़ियानत और ख़ुदा की नेअमतों की नाशुक्री करते हैं.

22 सूरए हज -छटा रूकू

22 सूरए   हज -छटा रूकू


परवानगी (आज्ञा) अता  हुई उन्हें जो काफ़िर से लड़ते है (1)
(1) जिहाद की.

इस बिना पर कि उनपर ज़ुल्म हुआ(2)
(2) मक्के के काफ़िर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथियों को रोज़मर्रा हाथ और ज़बान से सख़्त यातनाएं देते थे और कष्ट पहुंचाते रहते थे और सहाबा हुज़ूर के पास इस हाल में पहुंचते थे कि किसी का सर फटा है, किसी का हाथ टूटा है, किसी का पाँव बंधा हुआ है. रोज़ाना इस क़िस्म की शिकायतें हुज़ूर की बारगाह में पहुंचती थीं और सहाबए किराम काफ़िरों के अत्याचारों और यातनाओ की हुज़ूर के दरबार में फ़रियाद करते थे. हुज़ूर यह फ़रमा दिया करते कि सब्र करो, मुझे अभी जिहाद का हुक्म नहीं दिया गया. जब हुज़ूर ने मदीनए तैय्यिबह को हिजरत फ़रमाई तब यह आयत उतरी और यह वह पहली आयत है जिसमें काफ़िरों के साथ जंग करने की इजाज़त दी गई है.

और बेशक अल्लाह उनकी मदद करने पर ज़रूर क़ादिर (सक्षम) है{39} वो जो अपने घरों से नाहक़ निकाले गए(3)
(3) और बेवतन किये गए.

सिर्फ़ इतनी बात पर कि उन्होंने कहा हमारा रब अल्लाह है(4)
(4) और यह सच्चा कलाम है और सच्चाई पर घरों से निकालना और बेवतन करना बिल्कुल नाहक़.

और अल्लाह अगर आदमियों में एक को दूसरे से दफ़ा न फ़रमाता(5)
(5) जिहाद की इजाज़त दे कर और सीमाएं निर्धारित फ़रमाकर, तो नतीजा यह होता कि मुश्रिकों का ग़लबा हो जाता और कोई दीनों मिल्लत वाला उनके ज़ालिम हाथों से न बचता.

तो ज़रूर ढा  दी जातीं ख़ानक़ाहें (आश्रम) (6)
(6) पादरियों की.

और गिरजा,(7)
(7) ईसाइयो के.

और कलीसे(8)
(8) यहूदियो के.

और मस्जिदें(9)
(9) मुसलमानों की.

जिनमें अल्लाह का बहुत नाम लिया जाता है,और बेशक अल्लाह ज़रूर मदद फ़रमाएगा उसकी जो उसके दीन की मदद करेगा, बेशक ज़रूर अल्लाह क़ुदरत वाला ग़ालिब है{40} वो लोग कि अगर हम उन्हें ज़मीन में क़ाबू दें(10)
(10) और उनके दुश्मनों के मुक़ाबिल उनकी मदद फ़रमाएं.

तो नमाज़ क़ायम रखें और ज़कात दें और भलाई का हुक्म करें और बुराई से रोकें(11)
(11) इसमें ख़बर दी गई है कि आयन्दा मुहाजिरों को ज़मीन में क़ब्ज़ा अता फ़रमाने के बाद उनकी सीरतें ऐसी पवित्र रहेंगी और वो दीन के मामलों में सच्चे दिल से लगे रहेंगे, इसमें ख़ुलफ़ाए राशिदीन के न्याय और उनके तक़वा और परेज़गारी की दलील है जिन्हें अल्लाह तआला ने शौकत, प्रतिष्ठा और हुकूमत अता फ़रमाई और न्याय करने वाली सीरत अता की.

और अल्लाह ही के लिये सब कामों का अंजाम {41} और अगर ये तुम्हें झुटलाते हैं(12)
(12) ऐ हबीबे अकरम सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम।

तो बेशक उन से पहले झुटला चुकी है नूह की क़ौम और आद (13)
(13) हज़रत हूद की क़ौम.

और समूद (14){42}
(14) हज़रत सालेह की क़ौम.

और इब्राहीम की क़ौम और लूत की क़ौम {43} और मदयन वाले(15)
(15) यानी हज़रत शुऐब की क़ौम.

और मूसा को झुटलाया गया(16)
(16) यहाँ मूसा की क़ौम न फ़रमाया, क्योंकि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की क़ौम बनी इस्राईल ने आपको झुटलाया न था बल्कि फ़िरऔन की क़ौम क़िब्तियों ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को झुटलाया था. इन क़ौमों का बयान और हर एक के अपने रसूलों को झुटलाने का बयान सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली के लिये है कि काफ़िरों का यह पुराना तरीक़ा है. पिछले नबियों के साथ भी यही तरीक़ा रहा है.

तो मैं ने काफ़िरों को ढील दी(17)
(17) और उनके अज़ाब में विलम्ब किया और उन्हें मोहलत दी.

फिर उन्हें पकड़ा (18)
(18) और उनके कुफ़्र और सरकशी की सज़ा दी.

तो कैसा हुआ मेरा अज़ाब  (19){44}
(19) आप को झुटलाने वालों को चाहिये कि अपना परिणाम सोचें और सबक़ पकड़ें.

और कितनी ही बस्तियां हमने खपा दीं (हलाक कर दीं)(20)
(20) और वहाँ के रहने वालों को हलाक कर दिया.

कि वो सितमगार थीं (21)
(21)  यानी वहाँ के रहने वाले काफ़िर थे.

तो अब वो अपनी छतों पर ढै पड़ी हैं और कितनू कुंवें बेकार पड़े(22)
(22) कि उनसे कोई पानी भरने वाला नहीं.

और कितने महल गच किये हुए(23){45}
(23) वीरान पड़े हैं

तो क्या ज़मीन में न चले (24)
(24) काफ़िर कि इन हालात का अवलोकन करें, देखें.

कि उनके दिल हों जिन से समझें(25)
(25) कि नबियों को झुटलाने का क्या परिणाम हुआ और सबक़ पकड़े.

या कान हों जिन से सुनें(26){}
(26)पिछली उम्मतों के हालात और उनका हलाक होना और उनकी बस्तियों की वीरानी कि उससे नसीहत मिले.

तो यह कि आंखें अन्धी नहीं होतीं(27)
(27) यानी काफ़िरों की ज़ाहिरी हिस यानी दृष्टि बातिल नहीं हुई है वो इन आँखों से देखने की चीज़ें देखते हैं.

बल्कि वो दिल अंधे होते हैं जो सीनों में हैं(28){46}
(28) और दिलों ही का अन्धा होना बहुत बुरा है. इसी लिये आदमी दीन की राह पाने से मेहरूम रहता है.

और ये तुम से अज़ाब मांगने में जल्दी करते हैं (29)
(29) यानी मक्के के काफ़िरों जैसे नज़र बिन हारिस वग़ैरह. और यह जल्दी करना उनका हंसी बनाने के तौर से था.

और अल्लाह हरगिज़ अपना वादा झूटा न करेगा(30)
(30) और ज़रूर वादे के मुताबि क़ अज़ाब उतरेगा. चुनांचे यह वादा बद्र में पूरा हुआ.

और बेशक तुम्हारे रब के यहाँ (31){}
(31) आख़िरत में अज़ाब का.

एक दिन ऐसा है जैसे तुम लोगों की गिनती में हज़ार बरस(32){47}
(32) तो ये कुफ़्फ़ार क्या समझ कर अज़ाब की जल्दी करते हैं.

और कितनी बस्तियाँ कि हमने उनको ढील दी इस हाल पर वो सितमगार थीं फिर मैं ने उन्हें पकड़ा (33)
(33) और दुनिया में उन पर अज़ाब उतारा.

और मेरी ही तरफ़ पलट कर आता है(34){48}
(34) आख़िरत में.

22 सूरए हज -सातवाँ रूकू

22 सूरए   हज -सातवाँ रूकू


तुम फ़रमा दो कि ऐ लोगो मैं तो यही तुम्हारे लिये खुला डर सुनाने वाला हूँ {49} तो जो ईमान लाए और अच्छे काम किये उनके लिये बख़्शिश है और इज़्ज़त की रोज़ी(1) {50}
(1)  जो कभी टूटे नहीं, वह जन्नत है.

और वो जो कोशिश करते हैं हमारी आयतों में हार जीत के इरादों से(2)
(2) कि कभी इन आयतों को जादू कहते हैं, कभी कविता, कभी पिछलों के क़िस्से और वो यह ख़याल करते हैं कि इस्लाम के साथ उनका यह छल चल जाएगा.

वो जहन्नमी हैं{51} और हमने तुमसे पहले जितने रसूल या नबी भेजे(3)
(3) नबी और रसूल में फर्क़ है. नबी आम है और रसूल ख़ास. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि रसूल शरीअत की व्याख्या करने वाले होते हैं और नबी उसके सरक्षंक और निगहबान. जब सूरए नज्म उतरी तो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने मस्जिदे हराम में उसकी तिलावत फ़रमाई और बहुत आहिस्ता आहिस्ता आयतों के बीच रूक रूक कर जिससे सुनने वाले ग़ौर भी कर सके और याद करने वालों को याद करने में मदद भी मिलें. जब आपने आयत “व मनातस सालिसतल उख़रा” पढ़कर दस्तूर के मुताबिक़ वक़्फ़ा फ़रमाया तो शैतान ने मुश्रिकों के कान में इस से मिलाकर दो कलिमें ऐसे कह दिये जिन से बुतों की तारीफ़ निकलती थी.जिब्रईले अमीन ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर होकर यह हाल अर्ज़ किया. इससे हुज़ूर को दुख हुआ. अल्लाह तआला ने आप की तसल्ली के लिये यह आयत उतारी.

सब पर कभी यह घटना घटी कि जब उन्होंने पढ़ा तो शैतान ने उनके पढ़ने में लोगों पर कुछ अपनी तरफ़ से मिला दिया तो मिटा देता है अल्लाह उस शैतान के डाले हुए को फिर अल्लाह अपनी आयतें पक्की कर देता है(4)
(4)  जो पैग़म्बर पढ़ते हैं और उन्हें शैतानी कलिमों की मिलावट से मेहफ़ूज़ फ़रमाता है.

और अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है {52} ताकि शैतान के डाले हुए को फ़ित्ना कर दे (5)
(5) और मुसीबत और आज़माइश बना दे.

उनके लिये जिनके दिलों में बीमारी है(6)
(6)  शक और दोहरी प्रवृत्ति की.

और जिनके दिल सख़्त हैं(7)
(7) हक़ को क़ुबूल नहीं करते और ये मुश्रिक हैं.

और बेशक सितमगार हैं(8)
(8) यानी मुश्रिक और दोहरी प्रवृत्ति वाले लोग.

धुर के झगड़ालू हैं {53} और इसलिये कि जान लें वो जिनको इल्म मिला है(9)
(9) अल्लाह के दीन का और उसकी आयतों का.

कि वह (10)
(10) यानी क़ुरआन शरीफ़.

तुम्हारे रब के पास से हक़ (सत्य) है तो उस पर ईमान लाएं तो झुक जाएं उस के लिये उनके दिल, और बेशक अल्लाह ईमान वालों को सीधी राह चलाने वाला है{54}और काफ़िर उससे(11)
(11) यानी क़ुरआन से या दीने इस्लाम से.

हमेशा शक में रहेंगे यहां तक कि उनपर क़यामत आ जाए अचानक(12)
(12) या मौत, कि वह भी छोटी क़यामत है.

या उनपर ऐसे दिन का अज़ाब आए जिस का फल उनके लिशे कुछ अच्छा न हो(13){55}
(13) इससे बद्र का दिन मुराद है. जिससे काफ़िरों के लिये कुछ आसानी और राहत न थी और कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा कि इस रोज़ से क़यामत मुराद है.

बादशाही उस दिन(14)
(14) यानी क़यामत के दिन.

अल्लाह ही की है वह उनमें फ़ैसला कर देगा तो जो ईमान लाए और (15)
(15) उन्होंने.
अच्छे काम किये वो चैन के बाग़ों में हैं{56} और जिन्होंने कुफ़्र किया और हमारी आयतें झुटलाई उनके लिये ज़िल्लत का अज़ाब है{57}

22 सूरए हज -आठवाँ रूकू

22 सूरए   हज -आठवाँ रूकू

और  वो जिन्होंने अल्लाह की राह में अपने घर बार छोड़े(1)
(1) और उसकी रज़ा के लिये अज़ीज़ों(प्रियजनों) और रिश्तेदारों को छोड़कर वतन से निकले और मक्कए मुकर्रमा से मदीनए तैय्यिबह की तरफ़ हिजरत की.

फिर मारे गये या मर गए तो अल्लाह ज़रूर उन्हें अच्छी रोज़ी देगा(2)
(2) यानी जन्नत का रिज़्क़, जो कभी बन्द या ख़त्म न हो.

और बेशक अल्लाह की रोज़ी सबसे बेहतर है{58} ज़रूर उन्हें ऐसी जगह ले जाएगा जिसे वो पसंद करेंगे (3)
(3) वहाँ उनकी हर मुराद पूरी होगी और काई नागवारी पेश न आएगी. नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से आपके कुछ सहाबा ने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, हमारे जो साथी शहीद हो गए. हम जानते हैं कि अल्लाह की बारगाह में उनके बड़े दर्ज़े हैं और हम जिहादों में हुज़ूर के साथ रहेंगे, लेकिन अगर हम आपके साथ रहे और बे शहादत के मौत आई तो आख़िरत में हमारे लिये क्या है. इसपर यह आयतें उतरी.

और बेशक अल्लाह इल्म और हिल्म वाला है {59} बात यह है, और जो बदला ले (4)
(4) कोई मूमिन ज़ुल्म का, मुश्रिक से.

जैसी तकलीफ़ पहुंचाई गई फिर उस पर ज़ियादती की जाए (5)
(5) ज़ालिम की तरफ़ से उसे बेवतन करके.

तो बेशक अल्लाह उसकी मदद फ़रमाएगा(6)
(6) यह आयत मुश्रिकों के बारे मे उतरी जिन्होंने मुहर्रम महीने की आखिरी तारीख़ों में मुसलमानों पर हमला किया और मुसलमानों ने मुबारक महीने की पवित्रता के ख़याल से लड़ना न चाहा, मगर मुश्रि क न माने और उन्होंने जंग शुरू  कर दी. मुसलमान उनके मुक़ाबले में डटे रहे. अल्लाह तआला ने उनकी मदद फ़रमाई.

बेशक अल्लाह माफ़ करने वाला बख़्शने वाला है(7){60}
(7) यानी मज़लूम और पीड़ित की मदद फ़रमाना इसलिये है कि अल्लाह जो चाहे उसपर क़ादिर और सक्षम है और उसकी क़ुदरत और क्षमता की निशानियाँ ज़ाहिर हैं.

यह इसलिये कि अल्लाह तआला रात को डालता है दिन के हिस्से में(8)
(8) यानी कभी दिन को बढ़ाता, रात को घटाता है और कभी रात को बढ़ाता दिन को घटाता है, इसके सिवा कोई उसपर क़ुदरत नहीं रखता. जो ऐसा क़ुदरत वाला है, वह जिसकी चाहे मदद फ़रमाए और जिसे चाहे ग़ालिब करे.

और दिन को लाता है रात के हिस्से में और इसलिये कि अल्लाह सुनता देखता है {61} यह इसलिये (9)
(9) यानी, और यह मदद इसलिये भी है.

कि अल्लाह ही हक़ है और उसके सिवा जिसे पूजते हैं(10)
(10)  यानी बुत.

वह बातिल (झूट) है और इसिलये कि अल्लाह ही बलन्दी बड़ाई वाला है {62} क्या तूने न देखा कि अल्लाह ने आसमान से पानी उतारा तो सुबह को ज़मीन(11)
(11) सब्ज़े से.

हरियाली हो गई, बेशक अल्लाह पाक ख़बरदार है {63} उसी का माल है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है, और बेशक अल्लाह ही बेनियाज़ सब ख़ूबियों सराहा है{64}

22 सूरए हज -नवाँ रूकू

22 सूरए   हज -नवाँ रूकू


क्या तून ने देखा कि अल्लाह ने तुम्हारे बस मे कर दिया जो कुछ ज़मीन में है (1)
(1) जानवर वग़ैरह, जिन पर तुम सवार होते हो और जिनसे तुम काम लेते हो.

और किश्ती कि दरिया में उसके हुक्म से चलती है(2)
(2) तुम्हारे लिये उसके चलाने के वास्ते हवा और पानी को आधीन किया.

और वह रोके हुए है आसमान को कि ज़मीन पर न गिर पड़े मगर उसके हुक्म से, बेशक अल्लाह आदमियों पर बड़ी मेहर वाला मेहरबान है(3){65}
(3) कि उसने उनके लिये लाभ के दरवाज़े खोले और तरह तरह के नुक़सान से उनको मेहफ़ूज़ किया.

और वही है जिसने तुम्हें ज़िन्दा किया (4)
(4) बेजान नुत्फ़े से पैदा फ़रमा कर.

फिर तुम्हें मारेगा (5)
(5) तुम्हारी उम्रें पूरी होने पर.

फिर तुम्हें जिलाएगा(6)
(6) दोबारा उठाए जाने के दिन सवाब और अज़ाब के लिये.

बेशक आदमी बड़ा नाशुक्रा है(7){66}
(7) कि इतनी नेअमतों के बावुज़ूद उसकी इबादत से मुंह फेरता है और बेजान मख़लूक़ की पूजा करता है.

हर उम्मत के(8)
(8) दीन वालों और क़ौमों में से .

लिये हमने इबादत के क़ायदे बना दिये कि वह उनपर चले(9)
(9) और आमिल हो.

तो हरगिज़ वो तुम से इस मामले में झगड़ा न करें(10)
(10) यानी दीन के काम या ज़बीहे के मामले में. यह आयत बदील इब्ने वरक़ा और बशर बिन सुफ़ियान और यज़ीद इब्ने ख़नीस के बारे में उतरी. उन लोगों ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सहाबा से कहा था क्या कारण है जिस जानवर को तुम ख़ुद क़त्ल करते हो उसे तो खाते हो और जिसको अल्लाह मारता है उसे नहीं खाते, इस पर यह आयत उतरी.

और अपने रब की तरफ़ बुलाओ (11)
(11) और लोगों को उसपर ईमान लाने और उसका दीन क़ुबूल करने और उसकी ईबादत में लगने की दावत दो.

बेशक तुम सीधी राह पर हो{67} और अगर वो(12)
(12) तुम्हारे देने के बावुज़ूद.

तुम से झगड़ें तो फ़रमा दो कि अल्लाह ख़ूब जानता है तुम्हारे कौतुक {68} अल्लाह तुम में फै़सला कर देगा क़यामत के दिन जिस बात में विरोध कर रहे हो(13){69}
(13) और तुम पर सच्चाई ज़ाहिर हो जाएगी.

क्या तूने न जाना कि अल्लाह जानता है जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है, बेशक यह सब एक किताब में है(14)
(14) यानी लौहे मेहफ़ूज़ में.

बेशक यह (15)
(15) यानी उन सब की जानकारी या सारी घटनाओं का लौहे मेहफ़ूज़ में दर्ज़ फ़रमाना.

अल्लाह पर आसान है(16){70}
(16) इसके बाद काफ़िरों की जिहालतों का बयान फ़रमाया जाता है कि वो ऐसों की इबादत करते हें जो पूजे जाने के क़ाबिल नहीं.

और अल्लाह के सिवा ऐसों को पूजते हैं (17)
(17) यानी बुतों को.

जिनकी कोई सनद उसने न उतारी और ऐसों को पूजते हैं(18)
(18) यानी उनके पास अपने इस बाम की न कोई अक़्ली दलील है न नक़ली. केवल जिहालत और  नादानी से गुमराही में पड़े हुए है और जो किसी तरह पूजे जाने के मुस्तहिक़ नहीं उनको पूजते हैं. यह सख़्त ज़ुल्म है.

और सितमगारों का (19)
(19) यानी मुश्रिकों का.

कोई मददगार नहीं(20){71}
(20) जो तुम्हें अल्लाह के अज़ाब से बचा सके.

और जब उनपर हमारी रौशन आयतें पढ़ी जाएं(21)
(21) और  क़ुरआने करीम उन्हें सुनाया जाए जिसमें अहक़ाम बयान और हलाल व हराम की तफ़सील है.

तो तुम उनके चेहरों पर बिगड़ने के आसार देखोगे जिन्होंने कुफ़्र किया क़रीब है कि लिपट पड़ें उनको जो हमारी आयतें उनपर पढ़ते हैं, तुम फरमा दो क्या मैं तुम्हें बता दूं जो तुम्हारे इस हाल से भी(22)
(22) यानी तुम्हारे इस ग़ुस्से और नागवारी से भी जो क़ुरआन शरीफ़ सुनकर तुममें पैदा होती है.
बदतर है, वह आग है, अल्लाह ने उसका वादा दिया है काफ़िरों को और क्या ही बुरी पलटने की जगह{72}