17 – सूरए बनी इस्राईल

पन्द्रहवां पारा – सुब्हानल्लज़ी
 
17 – सूरए बनी इस्राईल – पहला  रूकू


सूरए बनी इस्राईल मक्का में उतरी, इसमें 111 आयतें  12 रूकू हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए बनी इस्राइल का नाम सूरए अस्रा और सूरए सुब्हान भी है. यह सूरत मक्की है मगर आठ आयतें व इन कादू ल-यफ़-तिन-नका से नसीरन तक, यह क़ौल क़तादा का है. मगर बैज़ावी का कहना है कि यह सूरत सारी की सारी मक्की है. इस सूरत में बारह रूकू और एक सौ दस आयतें बसरी हैं और कूफ़ी एक सौ ग्यारह और पांच सौ तैंतीस कलिमे और तीन हज़ार चार सौ साठ अक्षर हैं.

पाकी है उसे(2)
(2) पाक है उसकी ज़ात हर ऐब और दोष से.

जो अपने बन्दे(3)
(3) मेहबूब मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

को रातों रात ले गया(4)
(4) शबे मेअराज.

मस्जिदे हराम से मस्जिदे अक़्सा तक(5)
(5)जिसका फ़ासला चालीस मंज़िल यानी सवा महीने से ज़्यादा की राह है. जब सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम शबे मेअराज ऊंचे दर्जे और बलन्द रूत्बे पर बिराजमान हुए तो रब तआला ने ख़िताब फ़रमाया ऐ  मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम यह फ़ज़ीलत और यह सम्मान मैंने तुम्हें क्यों अता फ़रमाया. अर्ज़ किया, इसलिये कि तूने मुझे अब्द यानी बन्दे की हैसियत से अपनी तरफ़ मन्सूब किया. इसपर यह आयत  उतरी. (ख़ाज़िन)

जिसके गिर्दा गिर्द हमने बरकत रखी(6)
(6) दीनी भी, दुनियावी भी, कि वह पाक धर्ती, वही उतरने की जगह और नबियों की इबादत गाह और उनके ठहरने की जगह और इबादत का क़िबला है. और नहरों और दरख़्तों की बहुतात से वह ज़मीन हरी भरी तरो ताज़ा और मेवों और फलों की बहुतात से बेहतरीन आराम और राहत की जगह है. मेअराज शरीफ़ नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का एक बड़ा चमत्कार और अल्लाह तआला की भारी नेअमत है और इससे हुज़ूर का अल्लाह की बारगाह में वह कुर्ब ज़ाहिर होता है जो मख़लूक़ में आपके सिवा किसी को हासिल नहीं नबुव्वत के बारहवें साल हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मेअराज से नवाज़े गए. महीने में इख़्तिलाफ़ है. मगर मशहूर यही है कि सत्ताईस्वीं रजब को मेअराज हुई. मक्कए मुकर्रमा से हुज़ूर पुरनूर का बैतुल मक़दिस तक रात के छोटे हिस्से में तशरीफ़ ले जाना क़ुरआनी आयत से साबित है. इसका इन्कार करने वाला काफ़िर है. और आसमानों की सैर और क़ुर्ब की मंज़िलों में पहुंचना सही हदीसों से साबित है जो हदे तवातुर के क़रीब पहुंच गई हैं. इसका इन्कार करने वाला गुमराह है. मेअराज़ शरीफ़ बेदारी हालत में जिस्म और रूह दोनों के साथ वाक़े हुई. इसी पर एहले इस्लाम की सर्वसम्मति है. और रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सहाबा इसी को मानते हैं. क़ुरआनी आयतों और हदीसों से भी यही निष्कर्ष निकलता है. तीरा और माग़ान फ़लसफ़े के औहामे फ़ासिदा महज़ बातिल हैं. अल्लाह की क़ुदरत के मानने वाले के सामने वो सारे संदेह महज़ बेहक़ीक़त है. हज़रत जिब्रील का बुराक़ लेकर हाज़िर होना, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्ल्म को बेहद अदब और एहितराम के साथ सवार करके ले जाना, बैतुल मक़दिस में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का नबियों की इमामत फ़रमाना, फिर वहाँ से आसमानों की सैर की तरफ़ मुतवज्जह होना, जिब्रीले अमीन का हर हर आसमान का दर्वाज़ा ख़ुलवाना और हर हर आसमान पर वहाँ के साहिबे मक़ाम अम्बिया अलैहिस्सलाम की ज़ियारत करना और हुज़ूर का सम्मान करना, तशरीफ़ आवरी की मुबारक -बादें देना, हुज़ूर का एक आसमान से दूसरे आसमान की तरफ़ सैर फ़रमाना, वहाँ के चमत्कार देखना और तमाम मुक़र्रिबीन की आख़िरी मंज़िल सिद-रतुल-मुन्तहा को पहुंचना जहाँ से आगे बढ़ने की किसी बड़े से बड़े फ़रिश्ते की भी मजाल नहीं है. जिब्रीले अमीन का वहाँ मजबूरी ज़ाहिर करके रह जाना, फिर ख़ास कुर्ब के मक़ाम में हुज़ूर का तरक़्कियाँ फ़रमाना और उस अअला क़ुर्ब में पहुंचना कि जिसके तसव्वुर तक सृष्टि की सोचने और विचार करने की शक्ति नहीं पहुंच सकती, वहाँ अल्लाह की रहमत और करम का हासिल करना और इनआमों और अच्छी नेअमतों से नवाज़ा जाना और आसमान व ज़मीन के फ़रिश्तों और उनसे ज़्यादा इल्म पाना और उम्मत के लिये नमाज़ें फ़र्ज़ होना, हुज़ूर का शफ़ाअत फ़रमाना, जन्नत व दोज़ख़ की सैर और वापस अपनी जगह तशरीफ़ लाना इस वाक़ए की ख़बरें देना, काफ़िरों का उसपर आलोचना करना और बैतुल मक़दिस की इमारत का हाल और शाम प्रदेश जाने वाले क़ाफ़िलों की क़ैफ़ियत हुज़ूर अलैहिस्लातो वस्सलाम से दरियाफ़्त करना, हुज़ूर का सब कुछ बताना और क़ाफ़िलों के आने पर उनकी पुष्टि होना, ये तमाम सहाबा की विश्वसनीय हदीसों से साबित है. और बहुत सी हदीसों में इन सारी बातों के बयान और उनकी तफ़सीलें आई हैं.

कि हम उसे अपनी अज़ीम निशानियाँ दिखाएं, बेशक वह सुनता देखता है{1} और हमने मूसा को किताब (7)
(7) यानी तौरात.

अता फ़रमाई और उसे बनी इस्राईल के लिये हिदायत किया कि मेरे सिवा किसी को कारसाज़ न ठहराओ{2} ऐ उनकी औलाद जिनको हमने नूह के साथ (8)
(8) किश्ती में,

सवार किया बेशक वह बड़ा शुक्र गुज़ार बन्दा था(9){3}
(9) यानी नूह अलैहिस्सलाम बहुत शुक्र किया करते थे. जब कुछ खाते पीते पहनते तो अल्लाह तआला की हम्द यानी तअरीफ़ करते और उसका शुक्र बजा लाते और उनकी सन्तान पर लाज़िम है कि वह अपने इज़्ज़त वाले दादा के तरीक़े पर क़ायम रहे.

और हमने बनी इस्राईल को किताब(10)
(10)तौरात

में वही (देववाणी) भेजी कि ज़रूर तुम ज़मीन में दोबारा फ़साद मचाओगे(11)
(11) इससे ज़मीने शाम और बैतुल मक़दिस मुराद है और दो बार के फ़साद का बयान अगली आयत में आता है.

और ज़रूर बड़ा घमण्ड करोगे(12){4}
(12) और ज़ुल्म और विद्रोह में जकड़ गए.

फिर जब उनमें पहली बार(13)
(13) के फ़साद के अज़ाब.

का वादा आया(14)
(14) और उन्होंने तौरात के आदेशों का विरोध किया और हराम कामों और गुनाहों में पड़ गए और हज़रत शोअया नबी अलैहिस्सलाम और एक क़ौल के मुताबिक़ हज़रत अरमिया को क़त्ल किया. (बैज़ावी वग़ैरह)

हमने तुमपर अपने बन्दे भेजे सख़्त लड़ाई वाले(15)
(15)  बहुत ज़ोर और क़ुव्वत वाले, उनको तुमपर हावी किया और वो सन्जारीब और उसकी फ़ौजें हैं या बुख्ते नसर या जालूत जिन्होंने बनी इस्राईल के उलमा को क़त्ल किया. तौरात को जलाया, मस्जिद को ख़राब किया और सत्तर हज़ार को उनमें से गिरफ़्तार किया.

तो वो शहरों के अन्दर तुम्हारी तलाश को घुसे(16)
(16) कि तुम्हें लूटें और क़त्ल और क़ैद करें.

और यह एक वादा था(17)
(17) अज़ाब का, कि लाज़िम था.

जिसे पूरा होना {5} फिर हमने उनपर उलट कर तुम्हारा हमला कर दिया(18)
(18) जब तुम ने तौबह की और घमण्ड और फ़साद से बाज़ आए तो हमने तुमको दौलत दी और उनपर ग़लबा इनायत फ़रमाया जो तुमपर मुसल्लत हो चुके थे.

और तुमको मालों और बेटों से मदद दी और तुम्हारा जत्था बढ़ा दिया{6} अगर तुम भलाई करोगे अपना भला करोगे(19)
(19) तुम्हें इस भलाई का बदला मिलेगा.

और बुरा करोगे तो अपना, फिर जब  दूसरी बार का वादा आया(20)
(20) और तुमने फिर फ़साद बरपा किया, हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के क़त्ल पर तुले. अल्लाह तआला ने उन्हें बचाया और अपनी तरफ़ उठा लिया. और तुमने हज़रत ज़करिया और हज़रत यहया अलैहुमस्सलाम को क़त्ल किया, तो अल्लाह तआला ने तुमपर फ़ारस और रूम वालों को मुसल्लत कर दिया कि तुम्हारे वो दुश्मन तुम्हें क़त्ल करें या क़ैद करें और तुम्हें इतना परेशान करें.

कि दुश्मन तुम्हारा मुंह बिगाड़ दें(21)
(21) कि रंज और परेशानी के भाव तुम्हारे चेहरों से ज़ाहिर हो.

और मस्जिदे में दाख़िल हो(22)
(22) यानी बैतुल मक़दिस में और उसको वीरान करें.

जेसे पहली बार दाख़िल हुए थे (23)
(23) और उसको वीरान किया था, तुम्हारे पहले फ़साद के वक़्त.

और जिस चीज़ पर क़ाबू पाएं(24)
(24) बनी इस्राईल के इलाकों से, उसको—-

तबाह करके बर्बाद कर दें{7} क़रीब है कि तुम्हारा रब तुमपर रहम करें(25)
(25) दूसरी बार के बाद भी, अगर तुम दोबारा तौबह करो, और गुनाहों से बाज़ आओ.

और अगर तुम फिर शरारत करो (26)
(26) तीसरी बार.

तो हम फिर अज़ाब करेंगे(27)
(27) चुनांचे ऐसा ही हुआ, और उन्होंने फिर अपनी शरारत की तरफ़ पलटा खाया और मुस्तफ़ा जाने रहमत सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के पाक दौर में हूज़ुरे अक़दस को झुटलाया, तो क़यामत तक के लिये उनपर ज़िल्लत लाज़िम कर दी गई और मुसलमान उनपर मुसल्लत फ़रमा दिये गए, जैसा कि क़ुरआन शरीफ़ में यहूदियों की निस्बत आया “दुरिबत अलैहिमुज़ ज़िल्लतु” यानी उनपर जमा दी गई ख़्वारी – (सूरए आले इमरान आयत 112)

और हमने जहन्नम को काफ़िरों का क़ैदख़ाना बनाया है {8} बेशक यह क़ुरआन वह राह दिखाता है जो सबसे सीधी है(28)
(28)  वह अल्लाह की तौहीद और उसके रसूलों पर ईमान लाना और उनका अनुकरण करना है.

और ख़ुशी सुनाता है ईमान वालों को जो अच्छे काम करें कि उनके लिये बड़ा सवाब है{9} और यह कि जो आख़िरत पर ईमान नहीं लाते हमने उनके लिये दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है{10}

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