17 सूरए बनी इस्राईल-सातवाँ रूकू

17 सूरए बनी इस्राईल-सातवाँ रूकू


और याद करो जब हमने फ़रिश्तों को हुक्म दिया कि आदम को सज्दा करो(1)
(1) तहिय्यत का यानी आदर  और तअज़ीम का.

तो उन सबने सज्दा किया सिवा इब्लीस के, बोला क्या मैं इसे सज्दा करूं जिसे तूने मिट्टी से बनाया{61} बोला (2)
(2) शैतान.

देख तो जो यह तूने मुझसे इज़्ज़त वाला रखा(3)
(3) और इसको मुझपर बुज़ुर्गी दी और इसको सज्दा कराया तो मैं क़सम खाता हूँ कि–

अगर तूने मुझे क़यामत तक मुहलत दी तो  ज़रूर मैं उसकी औलाद को पीस डालूंगा(4)
(4) गुमराह करके.

मगर थोड़ा(5){62}
(5) जिन्हें अल्लाह बचाए और मेहफूज़ रखे वो उसके मुख़लिस बन्दे हैं. शैतान के इस कलाम पर अल्लाह तआला ने उससे.

फ़रमाया दूर हो(6)
(6) तुझे पहले सूर फूंके जाने तक मोहलत दी  गई.

तो उनमें जो तेरे कहने पर चलेगा तो बेशक सब का बदला जहन्नम है भरपूर सज़ा{63}और  डिगा दे उनमें से जिसपर क़ुदरत पाए अपनी आवाज़ से(7)
(7) वसवसे डाल कर और गुनाह की तरफ़ बुलाकर. कुछ उलमा ने फ़रमाया कि इससे मुराद गाने बजाने, खेल तमाशे की आवाज़ें हैं. इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि जो आवाज़ अल्लाह तआला की मर्जी़ के ख़िलाफ़ मुंह से निकले वह शैतानी आवाज़ है.

और प्यादों का(8)
(8) यानी अपने सब छल पूरे कर ले और अपने सारे लश्करों से मदद ले.

और उनका साझी हो मालों और बच्चों में(9)
(9) ज़ुजाज ने कहा कि जो गुनाह माल में हो या औलाद में, इब्लीस उसमें शरीक है जैसे कि सूद और माल हासिल करने के दूसरे हराम तरीक़े और फ़िस्क़ और ममनूआत में खर्च करना और ज़कात न देना, ये माली काम हैं जिनमें शैतान की शिरकत है और ज़िना और नाज़ायज़ तरीक़े से औलाद हासिल करना, ये औलाद में शैतान की हिस्सेदारी है.

और उन्हें वादा दे(10)
(10) अपनी ताअत या अनुकरण पर.

और  शैतान उन्हें वादा नहीं देता मगर धोखे से {64} बेशक जो मेरे बन्दे हैं(11)
(11) नेक मुख़लिस नबी और बुज़ुर्गी और अच्छाई वाले लोग.

उनपर तेरा कुछ क़ाबू नहीं, और तेरा रब काफ़ी है काम बनाने को (12){65}
(12) उन्हें तुझ से मेहफ़ूज़ रखेगा और शैतानी विचार और वसवसों को दूर फ़रमाएगा.

तुम्हारा रब वह है कि तुम्हारे लिये दरिया में किश्ती रवाँ (प्रवाहित) करता है कि(13)
(13) उनमें व्यापार के लिये सफ़र करके.

तुम उसका फ़ज़्ल तलाश करो, बेशक वह तुम पर मेहरबान है, {66} और  जब तुम्हें दरिया में मुसीबत पहुंचती है (14)
(14) और डूबने का भय होता है.

तो उसके सिवा जिन्हें पूजते हैं सब गुम हो जाते हैं (15)
(15) और उन झूटे मअबूदों में से किसी का नाम ज़बान पर नहीं आता. उस वक़्त अल्लाह तआला से हाजतरवाई चाहते हैं.

फिर जब वह तुम्हें ख़ुश्की की तरफ़ निजात देता है तो मुंह फेर लेते हो(16)
(16) उसकी तौहीद से, और फिर उन्हीं नाकारा बुतों की पूजा शुरू कर देते हो.

और आदमी बड़ा नाशुक्रा है {67} क्या तुम(17)
(17)  दरिया से छुटकारा पाकर.

इससे निडर हुए कि वह ख़ुश्की ही का कोई किनारा तुम्हारे साथ धंसा दे(18)
(18) जैसा कि क़ारून को धंसा दिया था. मक़सद यह है कि ख़ुश्की और तरी, सब उसकी क़ुदरत के अन्तर्गत हैं. जैसा वह समन्दर में डूबाने और बचाने दोनों में समक्ष है, ऐसा ही खुश्की में भी ज़मीन के अन्दर धंसा देने और मेहफ़ूज़ रखने दोनों पर क़ादिर है. ख़ुश्की हो या तरी हर कहीं बन्दा उसकी रहमत का मोहताज है. वह ज़मीन में धंसाने पर भी क़ादिर है और यह भी क्षमता रखता है कि ……

या तुमपर पथराव भेजे(19)
(19) जैसा क़ौमे लूत पर भेजा था.

फिर अपना कोई हिमायती न पाओ(20){68}
(20) जो तुम्हें बचा सके.

या इससे निडर हुए कि तुम्हें दोबारा दरिया में, ले जाए फिर तुमपर जहाज तोड़ने वाली आंधी भेजे तो तुम को तुम्हारे कुफ़्र के सबब डुबो दे फिर अपने लिये कोई ऐसा न पाओ कि उसपर हमारा पीछा कर(21){69}
(21)  और हमसे पूछ सके कि हमने ऐसा क्यों किया, क्योंकि हम क़ुदरत और इख़्तियार वाले है, जो चाहते हैं करते हैं, हमारे काम में कोई दख़्ल देने वाला और दम मारने वाला.

 और  बेशक हमने आदम की औलाद को इज़्ज़त दी(22)
(22) अक़्ल व इल्म, बोलने की शक्ति, पाकीज़ा सूरत, अच्छा रंग रूप, और रोज़ी रोटी कमाने की युक्तियाँ और सारी चीज़ों पर क़ाबू और क़ब्ज़ा अता फ़रमाकर और इसके अलावा और बहुत सी बुज़ुर्गी देकर.

और उनको ख़ुश्की और  तरी में(23)
(23) जानवरों और दूसरी सवारियों और किश्तियों और जहाज़ों इत्यादि में.

सवार किया और  उनको सुथरी चीज़े रोज़ी दी(24)
(24) मज़ेदार और उमदा, हर तरह की ग़िज़ाएँ, ख़ूब अच्छी तरह पकी हुई, क्योंकि इन्सान के सिवा सब जानवरों में पकी हुई गिज़ा और किसी की ख़ुराक़ नहीं.

और उनको अपनी बहुत मख़लूक से अफ़ज़ल किया(25){70}
(25) हसन का क़ोल है कि “बहुत मख़लूक” से कुल सृष्टि मुराद है, और बहुत का शब्द कुल के मानी में बोला जाता है. क़ुरआने करीम में भी इरशाद हुआ “व अक्सरूहुम काज़िबूना” यानी उनमें से बहुत से झूटे हैं (सूरए शुअरा, आयत 223) और “मा यत्तबिअ अक्सरूहुम इल्ला ज़न्ना” यानी और उनमें अक्सर तो नहीं चलते मगर गुमान पर (सूरए यूनुस, आयत 36), में “अक्सर ” यानी बहुत शब्द कुल के अर्थ में है. लिहाज़ा इसमें फ़रिश्ते भी दाख़िल हैं और आदमियों में से सर्वोत्तम यानी नबी ख़ास फ़रिश्तों से अफ़जल है और आदमियों में से नेक और अच्छे लोग आम फ़रिश्तो से अफ़ज़ल हैं. हदीस शरीफ़ में है कि मूमिन अल्लाह के नज़दीक़ फ़रिश्तों से ज़्यादा बुज़ुर्गी रखता है. वजह यह है कि फ़रिश्ते ताअत पर मजबूर हैं यही उनकी सृष्टि है, उनमें अक़्ल है, वासना नहीं और जानवरों में शहवत है अक़्ल नहीं और आदमी अक़्ल और शहवत दोनों रखता है. तो जिसने अक़्ल को वासना या शहवत पर ग़ालिब किया वह फ़रिश्तों से अफ़ज़ल है और जिसने शहवत को अक़्ल पर ग़ालिब किया वह जानवरों से गया गुज़रा है.

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