17 सूरए बनी इस्राईल- पांचवाँ रूकू

17 सूरए बनी इस्राईल- पांचवाँ रूकू

और बेशक हमने इस क़ुरआन में तरह तरह से बयान फ़रमाया(1)
(1) दलीलों से भी, मिसालों से भी, हिकमतों से भी, इबरतों से भी और जगह जगह इस मज़मून को तरह तरह से बयान फ़रमाया.

कि वो समझे(2)
(2) और नसीहत हासिल करें.

और इससे उन्हें नहीं बढ़ती मगर नफ़रत (3){41}
(3) और सच्चाई से दूरी.

तुम फ़रमाओ अगर उसके साथ और ख़ुदा होते जैसा ये बकते हैं जब तो वो अर्श के मालिक की तरफ़ कोई राह ढूंढ निकालते(4){42}
(4) और उससे मुक़ाबला करते, जैसा बादशाहों का तरीक़ा है.

उसे पाकी और बरतरी उनकी बातों से बड़ी बरतरी{43} उसकी पाकी बोलते हैं सातों आसमान और ज़मीन और  जो कोई उनमें हैं(5)
(5) अपने अस्तित्व की ज़बान से, इस तरह कि उनके वुजूद बनाने वाले की क़ुदरत और हिकमत के प्रमाण हैं. या बोलती ज़बान से, और यही सही है. बहुत सी हदीसों में इसी तरह आया है और बुज़ुर्गों ने भी यही बताया है.

और कोई चीज़ नहीं(6)
(6) पत्थर, सब्ज़ा (वनस्पित) और जानदार.

जो उसे सराहती हुई उसकी पाकी न बोले(7)
(7) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया  हर ज़िन्दा चीज़ अल्लाह की तस्बीह करती है और हर चीज़ की ज़िन्दगी उसकी हैसियत के अनुसार है. मुफ़स्सिरों ने कहा कि दर्वाज़ा खोलने की आवाज़ और छत का चटख़ना यह भी तस्बीह करना है और इन सबकी तस्बीह “सुब्हानल्लाहे व बिहम्दिही” है. हज़रत इब्ने मसऊद रदियल्लाहो अन्हु से मन्क़ूल हैं. रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की मुबारक उंगलियों से पानी के चश्मे जारी होते हमने देखे और यह भी हमने देखा कि खाते वक़्त में ख़ाना तस्बीह करता था (बुख़ारी शरीफ़) हदीस शरीफ़ में सैयदे आलम  सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, मैं उस पत्थर को पहचानता हूँ जो मेरी नबुव्वत के ज़माने में मुझे सलाम करता था. (मुस्लिम शरीफ़) इब्ने उमर रदियल्लाहो अन्हु से रिवायत है कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम लकड़ी के एक सुतून से तकिया फ़रमा कर ख़ुतबा दिया करते थे. जब मिम्बर बनाया गया और हुज़ूर उसपर जलवा अफ़रोज़ हुए तो वह सुतून रोया. हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उसपर मेहरबानी का हाथ फेरा और शफ़क़त फ़रमाई और तस्कीन दी (बुखारी शरीफ़). इन सारी हदीसों से बेजान चीज़ों का कलाम और तस्बीह करना साबित हुआ.

हाँ तुम उनकी तस्बीह नहीं समझते(8)
(8) ज़बानों की भिन्नता या अलग अलग होने के कारण या उनके मानी समझने में दुशवारी की वजह से.

बेशक वह हिल्म (सहिष्णुता) वाला बख़्शने वाला है(9){44}
(9) कि बन्दों की ग़फ़लत पर अज़ाब मैं जल्दी नहीं फ़रमाता.

और ऐ मेहबूब तुमने क़ुरआन पढ़ा हमने तुमपर और उनमें कि आख़िरत पर ईमान नहीं लाते एक छुपा हुआ पर्दा कर दिया(10){45}
(10) कि वो आपको न देख सकें. जब आयत “तब्बत यदा” उतरी तो अबू लहब की औरत पत्थर लेकर आई. हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हज़रत अबू बक्र रदियल्लाहो अन्हु के साथ तशरीफ़ रखते थे. उसने हुज़ूर को न देखा और हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हु से कहने लगी, तुम्हारे आक़ा कहां हैं, मुझे मालूम हुआ है उन्होंने मेरी बुराई की है. हज़रत सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हु ने फ़रमाया, वो कविता नहीं करते हैं. तो वह यह कहती हुई वापस हुई कि मैं उनका सर कुचलने के लिये यह पत्थर लाई थी. हज़रत सिद्दीक़े अक़बर रदियल्लाहो अन्हु ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से अर्ज़ किया कि उसने हुज़ूर को देखा नहीं. फ़रमाया मेरे और उसके बीच एक फ़रिश्ता खड़ा रहा. इस घटना के बारे में यह आयत उतरी.

और  हमने उनके दिलों पर ग़िलाफ़ (पर्दे) डाल दिये हैं कि उसे न समझें और उनके कानों में टैंट (11)
(11) बोझ, जिसके कारण वो क़ुरआन नहीं सुनते.

और जब तुम क़ुरआन में अपने अकले रब की याद करते हो वो पीठ फेरकर भागते हैं नफ़रत करते {46} हम ख़ूब जानते हैं जिस लिये वो सुनते हैं(12)
(12)  यानी सुनते भी हैं तो ठट्ठा करने और झुटलाने के लिये.

जब तुम्हारी तरफ़ कान लगाते हैं और जब आपस में मशवरा करते हैं जब कि ज़ालिम कहते हैं तुम पीछे नहीं चले मगर एक ऐसे मर्द के जिस पर जादू हुआ(13){47}
(13) तो उनमें से कुछ आपको पागल कहते हैं, कुछ जादूगर, कुछ तांत्रिक, कुछ शायर.

देखो उन्होंने तुम्हें कैसी तशबीहें (उपमाएं) दीं तो गुमराह हुए कि राह नहीं पा सकते{48} और  बोले क्या जब हम हड्डियां और  रेज़ा रेज़ा हो जाएंगे क्या सच मुच नए बनकर उठेंगे(14){49}
(14) यह बात उन्होंने बड़े आश्चर्य से कही और मरने और ख़ाक़ में मिल जाने के बाद ज़िन्दा किये जाने को उन्हों ने बहुत दूर समझा. अल्लाह तआला ने उनका रद किया और अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को इरशाद फ़रमाया.

तुम फ़रमाओ कि पत्थर या लोहा हो जाओ {50} या और कोई मख़लूक़ (प्रणीवर्ग) जो तुम्हारे ख़याल में बड़ी हो(15)
(15) और ज़िन्दगी से दूर हो, जान उससे कभी न जुड़ी हो तो भी अल्लाह तआला तुम्हें ज़िन्दा करेगा और पहली हालत की तरफ़ वापस फ़रमाएगा. तो फिर हड्डियों और इस जिस्म के ज़र्रों का क्या कहना, उन्हें ज़िन्दा करना उसकी क़ुदरत से क्या दूर है. उनसे तो जान पहले जुड़ी रह चुकी है.

तो अब कहेंगे हमें कौन फिर पैदा करेगा, तुम फ़रमाओ वही जिसने तुम्हें पहली बार पैदा किया, तो अब तुम्हारी तरफ़ मसखरगी (ठठोल) से सर हिलाकर कहेंगे यह कब है(16)
(16) यानी क़यामत कब क़ायम होगी और मुर्दे कब उठाये जाएंगे.

तुम फ़रमाओ शायद नज़दीक ही हो {51} जिस दिन वह तुम्हें बुलाएगा (17)
(17) कब्रों से क़यामत के मैदान की तरफ़.

तो तुम उसकी हम्द करते चले आओगे(18)
(18) अपने सरों से मिट्टी झाड़ते और “सुब्हानकल्लाहुम्मा व बिहम्दिका” कहते और यह इक़रार करते की अल्लाह ही पैदा करने वाला है, मरने के बाद उठाने वाला है.

और समझोगे कि न रहे थे(19)
(19) दुनिया में या कब्रों में.
मगर थोड़ा {52}

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