17 सूरए बनी इस्राईल- चौथा रूकू

17 सूरए बनी इस्राईल- चौथा रूकू


और अपनी औलाद को क़त्ल न करो मुफ़लिसी(दरिद्रता) के डर से.(1)
(1) जिहालत के दौर में लोग अपनी लड़कियों को ज़िन्दा गाड़ दिया करते थे और इसके कई कारण थे. नादारी व मुफ़लिसी के डर, लूट का ख़ौफ़, अल्लाह तआला ने इसको मना फ़रमाया.

हम उन्हें भी रोज़ी देंगे और तुम्हें भी, बेशक उनका क़त्ल बड़ी खता है{31} और बदकारी के पास न जाओ बेशक वह बेहयाई है और बहुत ही बुरी राह{32} और कोई जान जिसकी हुरमत (प्रतिष्ठा) अल्लाह ने रखी है नाहक़ न मारो और जो नाहक़ मारा जाए तो बेशक हमने उसके वारिस को का़बू दिया है(2)
(2) क़िसास लेने का. आयत से साबित हुआ कि क़िसास लेने का हक़ वली को है और ख़ून के रिश्ते के हिसाब से हैं. और  जिसका वली न हो उसका वली सुल्तान है.

तो वह क़त्ल में हद से न बढ़े(3)
(3) और जिहालत के ज़माने की तरह एक मक़तूल के बदले में कई कई को या बजाए क़ातिल के उसकी क़ौम और जमाअत के और  किसी व्यक्ति को क़त्ल न करे.

ज़रूर उसकी मदद होनी है(4){33}
(4) यानी वली की या मक़तूले मज़लूम की या उस शख़्स की जिसको वली नाहक़ क़त्ल करे.

और यतीम के माल के पास न जाओ मगर उस राह से जो सबसे भली है(5)
(5) वह यह है कि उसकी हिफ़ाज़त करो और उसको बढ़ाओ.

यहां तक कि वह अपनी जवानी को पहुंचे(6)
(6) और वह अठारह साल की उम्र है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हा के नज़दीक यही मुख़्तार है और हज़रत इमामे आज़म अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह ने अलामात ज़ाहिर न होने की हालत में बालिग़ होने की मुद्दत की इन्तिहा अठारह साल क़रार दी. (अहमदी)

और एहद पूरा करो(7)
(7)  अल्लाह का भी, बन्दो का भी.

बेशक एहद से सवाल होना है{34} और नापों तो पूरा और बराबर तराज़ू से तौलो, यह बेहतर है और इसका अंजाम अच्छा{35} और उस बात के पीछे न पड़ जिसका तुझे इल्म नहीं(8)
(8) यानी जिस चीज़ को देखा न हो उसे न कहो कि मैं ने देखा. जिसको सुना न हो उसकी निस्बत यह न कहो कि मैं ने सुना. इब्ने हनीफ़ा से मन्क़ूल है कि झूठी गवाही न दो. इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा कहते है किसी पर वह इल्ज़ाम न लगाओ जो तुम न जानते हो.

बेशक कान और आँख और दिल इन सब से सवाल होना है(9){36}
(9) कि तुमने उनसे क्या काम लिया.

और ज़मीन में इतराता न चल(10)
(10) घमण्ड और  अपनी शान दिखाने से.

बेशक हरगिज़ ज़मीन न चीर डालेगा और हरगिज़ बलन्दी में पहाड़ों को न पहुंचेगा(11) {37}
(11) मानी ये हैं कि घमण्ड और झूठी शान दिखाने से कुछ लाभ नहीं.

यह जो कुछ गुज़रा इन में की बुरी बात तेरे रब को ना पसन्द है {38} यह उन वहियों (देव-वाणियों) में से है जो तुम्हारे रब ने तुम्हारी तरफ़ भेजी हिकमत की बातें(12)
(12) जिनकी सच्चाई पर अक़्ल गवाही दे और उनसे नफ़्स की दुरूस्त हो, उनकी रिआयत या उनका ख़्याल रखना लाज़िम है. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि इन आयतों का निष्कर्ष तौहीद और  बैरग़बती और आख़िरत की तरफ़ रग़बत दिलाना है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया ये अठारह आयतें “ला तजअल मअल्लाहे इलाहन आख़रा” से “मदहूरा” तक हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की तख़्तियों में थीं. इनकी शुरूआत तौहीद के हुक्म से हुई और  अन्त शिर्क की मुमानिअत पर. इससे मालूम हुआ कि हर हिकमत की बुनियाद तौहीद और ईमान है और कोई क़ौल और अमल इसके बिना क़ुबूल नहीं.

और ऐ सुनने वाले अल्लाह के साथ दूसरा ख़ुदा न ठहरा कि तू जहन्नम में फेंका जाएगा तअने पाता धक्के खाता {39} क्या तुम्हारे रब ने तुम को बेटे चुन दिये और अपने लिये फ़रिश्तों से बेटियां बनाई(13)
(13) यह हिकमत के  ख़िलाफ़ बात किस तरह कहते हो.

बेशक तुम बड़ा बोल बोलते हो(14){40}
(14) कि अल्लाह तआला के लिये औलाद साबित करते हो जो जिस्म की विशेषता से है और अल्लाह तआला इससे पाक. फिर उसमें भी अपनी बड़ाई रखते हो कि अपने लिये तो बेटे पसन्द करते हो और उसके लिये बेटियाँ बताते हो. कितनी बेअदबी और गुस्ताख़ी है.

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