16 सूरए नहल – पांचवाँ रूकू

16 सूरए नहल – पांचवाँ रूकू

और मुश्रिक बोले अल्लाह चाहता तो उसके सिवा कुछ न पूजते न हम और न हमारे बाप दादा और न उससे अलग होकर हम कोई चीज़ हराम ठहराते(1)
(1)बहीरा और सायबा की तरह. इससे उनकी मुराद यह थी कि उनका शिर्क करना और इन चीज़ों को हराम क़रार दे लेना अल्लाह की मर्ज़ी से है. इसपर अल्लाह तआला ने फ़रमाया.

ऐसा ही उनसे अगलों ने किया(2){26}
(2) कि रसूलों को झुटलाया और हलाल को हराम किया और ऐसे ही हंसी मज़ाक की बातें कहीं.

तो रसूलों पर क्या है मगर साफ़ पहुंचा देना (3){35}
(3) सच्चाई का ज़ाहिर कर देना और शिर्क के ग़लत और बुरा होने पर सूचित करना.

और बेशक हर उम्मत में हमने एक रसूल भेजा(4)
(4) और हर रसूल को हुक्म दिया कि वो अपनी क़ौम से फ़रमाएं.

कि अल्लाह को पूजो और शैतान से बचो तो उनमें(5)
(5) उम्मतों—

किसी को अल्लाह ने राह दिखाई (6)
(6) वो ईमान लाए.

और किसी पर गुमराही ठीक उतरी(7)
(7) वो अपनी अज़ली दुश्मनी और हटधर्मी से कुफ़्र पर मरे और ईमान से मेहरूम रहे.

तो ज़मीन में चल फिर कर देखो कैसा अंजाम हुआ झुटलाने वालों का (8){36}
(8) जिन्हें अल्लाह ने हलाक किया और उनके शहर वीरान किये. उजड़ी बस्तियां उनके हलाल की ख़बर देती हैं. इसको देखकर समझ लो कि अगर तुम भी उनकी तरह कुफ़्र और झुटलाने पर अड़े रहे तो तुम्हारा भी ऐसा ही अंजाम होना है.

अगर तुम उनकी हिदायत की हिर्स (लोभ) करो(9)
(9) ऐ मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, इस हाल में कि ये लोग उनमें से हैं जिनकी गुमराही साबित हो चुकी और उनकी शक़ावत पुरानी है.

तो बेशक अल्लाह हिदायत नहीं देता जिसे गुमराह करे और उनका कोई मददगार नहीं{37} और उन्होंने अल्लाह की क़सम खाई अपने हलफ़ में हद की कोशिश से कि अल्लाह मुर्दे न उठाएगा(10)
(10) एक मुश्रिक एक मुसलमान का क़र्ज़दार था. मुसलमान ने उससे अपनी रकम मांगी. बात चीत के दौरान उसने इस तरह की क़सम खाई कि उसकी क़सम, जिसमें मैं मरने के बाद मिलने की तमन्ना रखता हूँ. इसपर मुश्रिक ने कहा कि क्या तेरा यह ख़्याल है कि तू मरने के बाद उठेगा और मुश्रिक ने क़सम खा कर कहा कि अल्लाह मुर्दे न उठाएगा. इसपर यह आयत उतरी और फ़रमाया गया.

हां क्यों नहीं(11)
(11) यानी ज़रूर उठाएगा.

सच्चा वादा उसके ज़िम्मे पर लेकिन अक्सर लोग नहीं जानते(12){38}
(12) इस उठाने की हिकमत और उसकी क़ुदरत, बेशक वह मुर्दों को उठाएगा.

इसलिये कि उन्हें साफ़ बतादे जिस बात में झगड़ते थे (13)
(13) यानी मुर्दों को उठाने में कि वह सत्य है.

और इसलिये कि काफ़िर जान लें कि वो झूठे थे(14){39}
(14) और मुर्दों के ज़िन्दा किये जाने का इन्कार ग़लत.

जो चीज़ हम चाहें उससे हमारा फ़रमाना यही होता है कि हम कहें होजा वह फ़ौरन हो जाती है(15){40}
(15) तो हमें मुर्दों का ज़िन्दा करना क्या दुशवार है.

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