16 सूरए नहल -छटा रूकू

16 सूरए  नहल  -छटा रूकू

और जिन्होंने अल्लाह की राह में(1)
(1)  उसके दीन की ख़ातिर हिजरत की. क़तादा ने कहा यह आयत सहाबा के हक़ में उतरी जिनपर मक्का वालों ने बहुत ज़ुल्म किये और उन्हें दीन की ख़ातिर वतन छोड़ना ही पड़ा. कुछ उनमें से हबशा चले गये फिर वहाँ से मदीनए तैय्यिबह आए और कुछ मदीना शरीफ़ ही को हिजरत कर गए. उन्होंने.

अपने घर बार छोड़े मज़लूम होकर ज़रूर हम उन्हें दुनिया में अच्छी जगह देंगे(2)
(2)  वह मदीनए तैय्यिबह है जिसको अल्लाह तआला ने उसके लिये हिजरत का शहर बनाया.

और बेशक आख़िरत का सवाब बहुत बड़ा है किसी तरह लोग जानते (3){41}
(3) यानी काफ़िर या वो लोग जो हिजरत करने से रह गए कि इसका बदला कितना अज़ीम है.

वो जिन्होंने सब्र किया(4)
(4) वतन की जुदाई और काफ़िरों का ज़ुल्म और जान माल के खर्च करने पर.

और अपने रब ही पर भरोसा करते हैं(5){42}
(5) और उसके दीन की वजह से जो पेश आए उसपर राज़ी हैं और दुनिया से नाता तोड़कर बिल्कुल हक़ की तरफ़ मुतवज्जह हैं. सालिक के लिये सुलूक की चरम सीमा है.

और हमने तुमसे पहले न भेजे मगर मर्द (6)
(6) यह आयत मक्का के मुश्रिकों के जवाब में उतरी जिन्होंने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत का इस तरह इन्कार किया था कि अल्लाह तआला की शान इससे बरतर है कि वह किसी इन्सान को रसूल बनाए. उन्हें बताया गया कि अल्लाह की सुन्नत इसी तरह जारी है. हमेशा उसने इन्सानों में से मर्दों ही को रसूल बनाकर भेजा.

जिनकी तरफ़ हम वही(देववाणी) करते तो ऐ लोगो इल्म वालों से पूछो अगर तुम्हें इल्म नहीं(7){43}
(7)  हदीस  शरीफ़ में है कि जिहालत की बीमारी का इलाज उलमा से पूछना है इसलिये उलमा से पूछो, वो तुम्हें बता देंगे कि अल्लाह की सुन्नत यूँही जारी रही कि उसने मर्दों को रसूल बना कर भेज.

रौशन दलीलें और किताबें लेकर(8)
(8) मुफ़स्सिरों  का एक क़ौल यह है कि मानी ये हैं कि रौशन दलीलों और किताबों के जानने वालों से पूछो अगर तुम को दलील और किताब का इल्म न हो. इस आयत से इमामों की तक़लीद या अनुकरण का वाजिब होना साबित होता है.

और ऐ मेहबूब हमने तुम्हारी तरफ़ यह यादगार उतारी(9)
(9) यानी क़ुरआन शरीफ़.

कि तुम लोगो से बयान कर दो जो(10)
(10) हुक्म.

उनकी तरफ़ उतरा और कहीं वो ध्यान करें{44} तो क्या जो लोग बुरे मक्र (कपट) करते हैं(11)
(11) रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और आपके सहाबा के साथ, और उनकी तकलीफ़ के दरपै रहते हैं और छुप छुप कर फ़साद -अंगेज़ी की तदबीरें करते हैं जैसे कि मक्का के काफ़िर.

इससे नहीं डतरे कि अल्लाह उन्हें ज़मीन में धंसा दे(12)
(12) जैसे क़ारून को धंसा दिया था.

या उन्हें वहाँ से अज़ाब आए जहां से उन्हें ख़बर न हो(13){45}
(13) चुनांचे ऐसा ही हुआ कि बद्र में हलाक किये गए जबकि वो यह नहीं समझते थे.

या उन्हें चलते फिरते(14)
(14) सफ़र और हज़र में, हर एक हाल में.

पकड़ ले कि थका नहीं सकते(15) {46}
(15) ख़ुदा को अज़ाब करने से.

या उन्हें नुकसान देते देते गिरफ़्तार करले कि बेशक तुम्हारा रब बहुत मेहरबान रहमत वाला है(16){47}
(16) कि हिल्म करता है और अज़ाब में जल्दी नहीं करता.

और क्या उन्होंने न देखा कि जो (17)
(17) सायादार.

चीज़ अल्लाह ने बनाई है उसकी परछाइयां दाएं और बाएं झुकती हैं(18)
(18) सुबह और शाम.

अल्लाह को सज्दा करती और उसके हुज़ूर ज़लील हैं(19){48}
(19) ख़्वार और आजिज़ और मुतीअ और मुसख़्खर.

और अल्लाह ही को सज्दा करते हैं जो कुछ आसमानों में हैं और जो कुछ ज़मीन में चलने वाला है(20)
(20) सज्दा दो तरह पर है, एक ताअत और इबादत का सज्दा जैसा कि मुसलमानों का सज्दा अल्लाह के लिये, दूसरा सज्दा एकाग्रता, फ़रमाँबरदारी व ख़ुज़ूअ का सज्दा, जैसा कि साया वग़ैरह का सज्दा. हर चीज़ का सज्दा उसकी हैसियत के हिसाब से है, मुसलमानों और फ़रिश्तों का सज्दा इबादत और ताअत का सज्दा है और उनके सिवा हर एक का सज्दा फ़रमाँबरदारी और ख़ुज़ूअ का सज्दा है.

और फ़रिश्ते और वो घमण्ड नहीं करते{49} अपने ऊपर अपने रब का ख़ौफ़ करते हैं और वही करते हैं जो उन्हें हुक्म हो(21){50}
(21) इस आयत से साबित हुआ कि फ़रिश्ते मुकल्लफ़ हैं और जब साबित कर दिया गया कि तमाम आसमान और ज़मीन की कायनात अल्लाह के हुज़ूर झुकने वाली और उसकी इबादत और ताअत करने वाली है और सब उसके ममलूक और उसी की क़ुदरत और ताक़त के मातहत हैं, तो शिर्क से मना फ़रमाया.

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