16 सूरए नहल -चौथा रूकू

16 सूरए नहल -चौथा रूकू


बेशक उनके अगलों ने(1)
(1) यानी पहली उम्मतों ने अपने नबियों के साथ.

धोखा किया था तो अल्लाह ने उनकी चुनाई को नींव से लिया तो ऊपर से उनपर छत गिर पड़ी और अज़ाब उनपर वहां से आया जहां कि उन्हें ख़बर न थी(2){26}
(2) यह एक मिसाल है कि पिछली उम्मतों ने अपने रसूल के साथ छलकपट करने के लिये कुछ योजनाएं बनाई थीं. अल्लाह तआला ने उन्हें ख़ुद उन्हीं के मन्सूबों में हलाक किया  उनका हाल ऐसा हुआ जैसे किसी क़ौम ने कोई बलन्द इमारत बनाई फिर वह इमारत उनपर गिर पड़ी और वो हलाक हो गए. इसी तरह काफ़िर अपनी मक्कारियों से ख़ुद बर्बाद हुए. मुफ़स्सिरों ने यह भी ज़िक्र किया है कि इस आयत में अगले छलकपट करने वालों से नमरूद बिन कनआन मुराद है जा हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के ज़माने में ज़मीन का सबसे बड़ा बादशाह था. उसने बाबुल में बहुत ऊंची एक इमारत बनाई थी जिसकी ऊंचाई पांच हज़ार गज़ थी और उसका छल यह था कि उसने यह ऊंची इमारत अपने ख़याल में आसमान पर पहुंचने और आसमान वालो से लड़ने के लिये बनाई थी. अल्लाह तआला ने हवा चलाई और वह इमारत उनपर गिर पड़ी और वो लोग हलाक हो गए.

फिर क़यामत के दिन उन्हें रूस्वा करेगा और फ़रमाएगा कहां हैं मेरे वो शरीक(3)
(3)  जो तुम ने घड़ लिये थे और-

जिन में तुम झगड़ते थे (4)
(4)  मुसलमानों से-

इल्म वाले(5)
(5)  यानी उन उम्मतों के नबी और उलमा जो उन्हें दुनिया में ईमान की दावत देते और नसीहत करते थे और ये लोग उनकी बात न मानते थे.

कहेंगे आज सारी रूस्वाई और  बुराई(6)
(6) यानी अज़ाब.

काफ़िरों पर हैं{27} वो कि फ़रिश्ते उनकी जान निकालते हैं इस हाल पर कि वो अपना बुरा कर रहे थे(7)
(7) यानी कुफ़्र में जकड़े हुए थे.

अब सुलह डालेंगे(8)
(8) और मरते वक़्त अपने कुफ़्र से मुकर जाएंगे और कहेंगे-

कि हम तो कुछ बुराई न करते थे(9)
(9) इसपर फ़रिश्ते कहेंगे-

हाँ क्यों नहीं बेशक अल्लाह ख़ूब जानता है जो तुम्हारे कौतूक थे(10){28}
(10) लिहाज़ा यह इन्कार तुम्हें मुफ़ीद नहीं.

अब जहन्नम के दरवाज़ों में जाओ कि हमेशा उसमें रहो, तो क्या ही बुरा ठिकाना घमण्डियों का{29} और  डरवालों (11)
(11) यानी ईमानदारों.

से कहा गया तुम्हारे रब ने क्या उतारा, बोले ख़ूबी(12)
(12) यानी क़ुरआन शरीफ़ जो ख़ूबियों का जमा करने वाला और अच्छाईयों और बरकतों का स्त्रोत और दीन और दुनिया के खुले और छुपे कमालात का सरचश्मा है. अरब के क़बीले हज के दिनों में हज़रत नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के हाल की तहक़ीक़ के लिये मक्कए मुकर्रमा को एलची भेजते थे. ये एलची जब मक्कए मुकर्रमा पहुंचते और शहर के किनारे रास्तों पर उन्हें काफ़िरों के कारिन्दे मिलते, (जैसा कि पहले जिक्र हो चुका है) उनसे ये एलची नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का हाल पूछते तो वो बहकाने पर ही तैनात होते थे, उनमें से कोई हुज़ूर को जादूगर कहता, कोई तांत्रिक,कोई शायर, कोई झूटा, कोई पागल और इसके साथ यह भी कह देते कि तुम उनसे न मिलना यही तुम्हारे लिये बेहतर है. इसपर एलची कहते कि अगर हम मक्कए मुकर्रमा पहुंच कर बग़ैर उनसे मिले अपनी क़ौम की तरफ़ वापस हो तो हम बुरे एलची होंगे और ऐसा करना एलची के कर्तव्यों की अवहेलना और क़ौम की ख़यानत होगी. हमें जांच पड़ताल के लिये भेजा गया है. हमारा फ़र्ज़ है कि हम उनके अपनों और परायों सब से उनके हाल की तहक़ीक़ करें और जो कुछ मालूम हो उसमें कमी बेशी किये बिना क़ौम को सूचित करें. इस ख़याल से वो लोग मक्कए मुकर्रमा में दाख़िल हो कर सहाबए किराम से भी मिलते थे और उनसे आपके हाल की पूछताछ करते थे. सहाबए किराम उन्हें तमाम हाल बताते थे और नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के हालात और कमालात और क़ुरआन शरीफ़ के मज़ामीन से सूचित करते थे. उनका जिक्र इस आयत में फ़रमाया गया.

जिन्होंने इस दुनिया में भलाई की(13)
(13) यानी ईमान लाए और नेक कर्म किये.

उनके लिये भलाई हैं(14)
(14) यानि हयाते तैय्यिबह है और फ़त्ह व विजय व रिज़्क में बहुतात वग़ैरह नेअमतें.

और  बेशक पिछला घर सबसे बेहतर, और  ज़रूर(15)
(15) आख़िरत की दुनिया.

क्या ही अच्छा घर परहेज़गारों का{30} बसने के बाग़ जिनमें जाएंगे उनके नीचे नेहरें बहती उन्हें वहां मिलेगा जो चाहें(16)
(16) और यह बात जन्नत के सिवा किसी को कहीं भी हासिल नहीं.

अल्लाह ऐसा ही सिला देता है परहेज़गारों को{31} वो जिनकी जान निकालते हैं फ़रिश्ते सुथरेपन में(17)
(17) कि वो शिर्क और कुफ़्र से पाक होते हैं और उनकी कहनी व करनी और आचार व संस्कार और आदतें पवित्र और पाकीज़ा होती हैं. फ़रमाँबरदारी साथ होती है, हराम और वर्जित के दाग़ों से उनके कर्म का दामन मैला नहीं होता. रूह निकाले जाने के वक़्त उनको जन्नत और रिज़्वान और रहमत व करामत की ख़ुशख़बरी दी जाती है. इस हालत में मौत उन्हें ख़ुशगवार मालूम होती है और जान फ़रहत और सुरूर के साथ जिस्म से निकलती है और फ़रिश्ते इज़्ज़त के साथ उसे निकालते हैं. (खाजिन)

यह कहते हुए कि सलामती हो तुम पर(18)
(18) रिवायत है कि मौत के वक़्त फ़रिश्ता ईमान वाले के पास आकर कहता है ऐ अल्लाह के दोस्त, तुझ पर सलाम और अल्लाह तआला तुझ पर सलाम फ़रमाता है और आख़िरत में उनसे कहा जाएगा…

जन्नत में जाओ बदला अपने किये का{32} काहे के इन्तिज़ार में हैं(19)
(19) काफ़िर क्यों ईमान नहीं लाते, किस चीज़ के इन्तिज़ार में हैं.

मगर इसके कि फ़रिश्ते उनपर आएं(20)
(20) उनकी रूहे निकालने..

या तुम्हारे रब का अज़ाब आएं(21)
(21) दुनिया में या क़यामत के दिन.

उनसे अगलों ने भी ऐसा ही किया (22)
(22) यानी पहली उम्मतों ने भी कि कुफ़्र और झुटलाने पर अड़े रहे.

और  अल्लाह ने उनपर कुछ ज़ुल्म न किया हां वो ख़ुद ही (23)
(23) कुफ़्र अपना कर.

अपनी जानों पर ज़ुल्म करते थे{33} तो उनकी बुरी कमाईयां उनपर पड़ीं(24)
(24) और उन्होंने अपने बुरे कर्मों की सज़ा पाई.

और  उन्हें घेर लिया उसने (25)
(25) अज़ाब.
जिस पर हंसते थे {34}

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