सूरए हिज्र -छटा रूकू

सूरए   हिज्र -छटा रूकू



और बेशक हिज्र वालों ने रसूलों को झुटलाया(1){80}
(1) हिज्र एक घाटी है, मदीना और शाम के बीच, जिसमें क़ौमे समूद रहती थी. उन्होंने अपने नबी हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम को झुटलाया और एक नबी को झुटलाना सारे नबियों का झुटलाना है, क्योंकि हर रसूल सारे नबियों पर ईमान लाने की दावत देता है.

 और हमने उनको अपनी निशानियां दीं(2)
(2) कि पत्थर से ऊंटनी पैदा की, जो बहुत से चमत्कारों पर आधारित थी, जैसे कि उसका बहुत बड़ा शरीर होना और पैदा होते ही बच्चा जनना और कसरत से दूध देना कि सारी क़ौमे समूद को काफ़ी हो, वग़ैरह. यह सब हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम के चमत्कार और क़ौमे समूद के लिये हमारी निशानियाँ थीं.

तो वो उनसे मुंह फेरे रहे(3){81}
(3) और ईमान न लाए.

 और वो पहाड़ों में घर तराशते थे बेख़ौफ़(4){82}
(4) कि उन्हें उसके गिरने और उसमें नक़ब लगाए जाने का डर था, और वो समझते थे कि यह घर तबाह नहीं हो सकता, उनपर कोई आफ़त नहीं आ सकती.

 तो उन्हें सुबह होते चिंघाड़ ने आ लिया (5){83}
(5) और वो अज़ाब में गिरफ़्तार हुए.

तो उनकी कमाई कुछ उनके काम न आई(6){84}
(6) और उनके मालमत्ता और उनके मज़बूत मकान उन्हें अज़ाब से न बचा सके.

और हमने आसमान और ज़मीन जो कुछ उनके बीच है बेकार न बनाया बेशक क़यामत आने वाली है(7)
(7) और हर एक को उसके कर्मों की जज़ा मिलेगी.

तो तुम अच्छी तरह दरगुज़र करो(8){85}
(8) ऐ मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, और अपनी क़ौम की तक़लीफ़ों और यातनाओं पर सब्र करो यह हुक्म क़िताल की आयत से स्थगित हो गया.

बेशक तुम्हारा रब ही बहुत पैदा करने वाला जानने वाला है(9){86}
(9) उसी ने सब को पैदा किया और वह अपनी सृष्टि के तमाम हाल जानता है.

और बेशक हमने तुमको सात आयतें दीं जो दोहराई जाती हैं(10)
(10) नमाज़ की रकअतों में, यानी हर रकअत में पढ़ी जाती हैं और इन सात आयतों से सूरए फ़ातिहा मुराद है. जैसा कि बुख़ारी और मुस्लिम की हदीसों में आया.

और अज़मत(श्रेष्ठता) वाला क़ुरआन{87} अपनी आंख उठाकर उस चीज़ को न देखो जो हमने उनके कुछ जोड़ों को बरतने को दी (11)
(11) मानी ये हैं कि ऐ नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, हमने आपको ऐसी नेअमते अता फ़रमाई जिनके सामने दुनिया की नेअमतें हक़ीर हैं, तो आप दुनिया की माया से बेनियाज़ रहे, जो यहूदियों और इसाइयों वग़ैरह मुख़्तलिफ़ क़िस्म के काफ़िरों को दी गई. हदीस शरीफ़ में है, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि हम में से नहीं जो क़ुरआन की बदौलत हर चीज़ से बेनियाज़ न हो गया. यानी क़ुरआन ऐसी नेअमत है जिसके सामने दुनिया की नेअमतें कुछ भी नहीं.

और उनका कुछ ग़म न खाओ(12)
(12) कि वो ईमान न लाए.

और मुसलमानों को अपने रहमत के परों में ले लो(13){88}
(13) और उन्हें अपने करम से नवाज़ों.

और फ़रमाओ कि मैं ही हूँ साफ़ डर सुनाने वाला (इस अज़ाब से) {89} जैसा हमने बांटने वालों पर उतारा {90}जिन्होंने कलामे इलाही को तिक्के बोटी कर लिया(14){91}
(14) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि बांटने वालों से यहूदी और ईसाई मुराद है. चूंकि वो क़ुरआने पाक के कुछ हिस्से पर ईमान लाए जो उनके ख़्याल में उनकी किताबों के अनुसार था, और कुछ से इन्कार कर दिया. क़तादा और इब्ने साइब ने कहा कि बांटने वालों से क़ुरैश के काफ़िर मुराद है जिनमें कुछ क़ुरआन को जादू, कुछ ज्योतिष और कुछ मन घडन्त क़िस्से कहते थे. इस तरह उन्होंने क़ुरआन शरीफ़ के हक़ में अपने क़ौल बाँट रखे थे. एक क़ौल यह है कि बाँटने वालों से वो बारह लोग मुराद है. जिन्हें काफ़िरों ने मक्कए मुकर्रमा के रास्तों पर तैनात किया था. हज के ज़माने में हर हर रास्ते पर उनका एक एक व्यक्ति बैठ जाता था और वह अपने आने वालों को बहकाने और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से नफ़रत दिलाने के लिये एक एक बात मुक़र्रर कर लेता था. कोई आने वालों से यह कहता था कि उनकी बातों में न आना कि वह जादूगर है, कोई कहता कि वह झूटे हैं, कोई कहता कि वह पागल है, कोई कहता कि वह तांत्रिक है, कोई कहता वह शायर है. यह सुनकर लोग जब ख़ानए काबा के दरवाज़े पर आते वहाँ वलीद बिन मुग़ीरा बैठा रहता था. उससे नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का हाल पूछते और कहते कि हमने मक्कए मुकर्रमा आते हुए शहर के किनारे उनके बारे में ऐसा सुना. वह कह देता ठीक ही सुना. इस तरह लोगो को बहकाते और गुमराह करते. उन लोगो को अल्लाह तआला ने हलाक किया.

तो तुम्हारे रब की क़सम हम ज़रूर उन सब से पूछेंगे(15){92}
(15) क़यामत के दिन.

जो कुछ वो करते थे(16){93}
(16)  और जो कुछ वो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और क़ुरआन की निस्बत कहते थे.

तो साफ़ कह दो जिस बात का तुम्हें हुक्म है(17)
(17) इस आयत में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को रिसालत की तबलीग़ और इस्लाम की दावत के इज़हार का हुक्म दिया गया.अब्दुल्लाह बिन उबैद का क़ौल है कि इस आयत के उतरने के वक्त तक इस्लाम की दावत ऐलान के साथ नहीं की जाती थी.

और मुश्रिकों से मुंह फेर लो(18){94}
(18)  यानी अपना दीन ज़ाहिर करने पर मुश्रिकों की मलामत करने की परवाह न करो और उनकी तरफ़ तवज्जह न दो और उनके मज़ाक उड़ाने का ग़म न करो.

बेशक उन हंसने वालों पर हम तुम्हें किफ़ायत करते हैं (19){95}
(19) कुरैश के काफ़िरों के पांच सरदार आस बिन वाइल सहमी, असवद बिन मुत्तलिब, असवद बिन अब्दे यग़ूस और हारिस बिन क़ैस और इन सबका अफ़सर वलीद बिन मुग़ीरा मख़ज़ूमी, ये लोग नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को बहुत कष्ट देते थे और आपके साथ ठठ्ठा करते थे. असवद बिन मुत्तलिब के लिये सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने दुआ की थी कि या रब उसको अन्धा कर दे. एक दिन सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मस्जिदे हराम में तशरीफ़ फ़रमा थे. ये पाँचों आए और उन्होंने हमेशा की तरह तअने देना और मज़ाक उड़ाना शुरू किया और तवाफ़ में लग गए. उसी हाल में हज़रत जिब्रीले अमीन हुज़ूर की ख़िदमत में पहुंचे और उन्हों नेवलीद बिन मुग़ीरा की पिंडली की तरफ़, आस के तलवे की तरफ़, असवद बिन मुत्तलिब की आँखों की तरफ़, असवद बिन अब्दे यग़ूस के पेट की तरफ़ और हारिस बिन क़ैस के सर की तरफ़ इशारा किया और कहा, मैं इनका शर दफ़ा करूंगा. चुनांचे थोड़े ही अर्से में ये हलाक हो गए. वलीद बिन मुग़ीरा तीर बेचने वाली की दुकान के पास से गुज़रा उसके तहबन्द में एक तीर चुभा मगर उसने घमण्ड से उसको निकालने के लिये सर नीचा न किया. इससे उसकी पिंडली में ज़ख़्म आया और उसी में मर गया. आस इब्ने वाईल के पाँव में काँटा लगा और नज़र न आया. उससे पाँव सूज गया और वह भी मर गया. असवद बिन मुत्तलिब की आँखों में ऐसा दर्द हुआ कि दीवानों की तरह सर दीवार में मारता था उसी में मर गया यह कहता हुआ मरा कि मुझे मुहम्मद ने क़त्ल किया. और असवद बिन अब्दे यग़ूस के बदन में पानी कम हो गया. कल्बी की रिवायत है कि उसको लू लगी और उसका मुंह इतना काला हो गया कि घर वालों ने न पहचाना और निकाल दिया. इसी हाल में यह कहता हुआ मर गया कि मुझको मुहम्मद के रब ने क़त्ल किया. और हारिस बिन क़ैस की नाक से ख़ून और पीप जारी हुआ उसी में हलाक हो गया. उन्हीं के हक़ में यह आयत उतरी.(ख़ाज़िन)

जो अल्लाह के साथ दूसरा मअबूद ठहराते हैं तो अब जान जाएंगे (20){96}
(20) अपना अन्त.

और बेशक हमें मालूम है कि उन की बातों से तुम दिल तंग होते हो(21){97}
(21) और उनके तअनों और मज़ाक और शिर्क और कुफ़्र की बातों से आपको मलाल होता है और दुख पहुंचता है.

तो अपने रब को सराहते हुए उसकी पाकी बोलो और सज्दे वालों में हो (22){98}
(22) कि ख़ुदा परस्तों के लिये तस्बीह और इबादत में मश्ग़ूल होना ग़म का बेहतरीन इलाज है. हदीस शरीफ़ में है कि जब सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को कोई अहम वाक़िआ पेश आता तो नमाज़ में मश्ग़ूल हो जाते.
और मरते दम तक अपने रब की इबादत में रहो{99}

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