सूरए – तीसरा रूकू

सूरए   – तीसरा रूकू



और बेशक हमने आदमी को (1)
(1) यानी हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को सूखी.

बजती हुई मिट्टी से बनाया जो अस्ल में एक सियाह गारा थी(2){26}
(2) अल्लाह तआला ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के पैदा करने का इरादा फ़रमाया तो दस्ते क़ुदरत ने ज़मीन से एक मुट्ठी ख़ाक ली. उसको पानी में ख़मीर किया, जब वह गारा सियाह हो गया और उसमें बू पैदा हुई, तो उसमें इन्सानी सूरत बनाई. फिर वह सूख कर ख़ुश्क हो गया, तो जब हवा उसमें जाती तो वह बजता और उसमें आवाज़ पैदा होती. जब सूरज की गर्मी से वह पक्का हो गया तो उसमें रूह फूंकी और वह इन्सान हो गया.

और जिन्न को उससे पहले बनाया बेधुंए की आग से(3){27}
(3) जो अपनी गर्मी और लताफ़त से मसामों में दाख़िल हो जाती है .

और याद करो जब तुम्हारे रब ने फ़रिश्तों से फ़रमाया कि मैं आदमी को बनाने वाला हूँ बजती मिट्टी से जो बदबूदार सियाह गारे से है{28} तो जब मैं उसे ठीक कर लूं और उसमें अपनी तरफ़ की ख़ास इज़्ज़त वाली रूह फूंक दूं(4)
(4) और उसको ज़िन्दगी अता फ़रमाई.

तो उसके (5)
(5) . . . के आदर और सम्मान.

लिये सिजदे में गिर पड़ना{29} तो जितने फ़रिश्ते थे सब के सब सिजदे में गिरे {30} सिवा इबलीस के, उसने सज्दा वालों का साथ  न माना(6){31}
(6)  और हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को सज्दा न किया तो अल्लाह तआला ने.

फ़रमाया ऐ इबलीस तुझे क्या हुआ कि सज्दा करने वालों से अलग रहा{32} बोला मुझे ज़ेबा (मुनासिब) नहीं कि बशर को सज्दा करूं जिसे तूने बजती मिट्टी से बनाया जो सियाह बूदार गारे से थी{33} फ़रमाया तू जन्नत से निकल जा कि तू मरदूद है{34} और बेशक क़यामत तक तुझपर लअनत है(7) {35}
(7) कि आसमान और ज़मीन वाले तुमपर लअनत करेंगे और जब क़यामत का दिन आएगा तो उस लअनत के साथ हमेशा के अज़ाब में जकड़ दिया जाएगा जिससे कभी रिहाई न होगी. यह सुनकर शैतान.

बोला ऐ मेरे रब तु मुझे मुहलत दे उस दिन तक कि वो उठाए जाएं(8){36}
(8) यानी क़यामत के दिन तक. इससे शैतान का मतलब यह था कि कभी न मरे, क्योंकि क़यामत के बाद कोई न मरेगा और क़यामत तक की उसने मोहलत मांग ही ली. लेकिन उसकी दुआ को अल्लाह तआला ने इस तरह क़ुबूल किया कि.

फ़रमाया तू उनमें है जिनको मुहलत है{37}उस मालूम वक़्त के दिन तक (9){38}
(9)जिसमें सारी सृष्टि मर जाएगी और वह नफ़खए ऊला है, तो शैतान के मुर्दा रहने की मुद्दत नफ़ख़ए ऊला यानी सूर के पहली बार फूंके जाने से दूसरी बार फूंके जाने तक, चालीस बरस है और उसको इस क़द्र मोहलत देना, उसके सम्मान के लिए नहीं, बल्कि उसकी बला, शक़ावत और अज़ाब की ज़ियादती के लिये है. यह सुनकर.

बोला ऐ रब मेरे क़सम इसकी कि तूने मुझे गुमराह किया मैं उन्हें ज़मीन में भुलावे दूंगा(10)
(10) यानी दुनिया में गुनाहों की रग़बत दिलाऊंगा.

और ज़रूर मैं उन सब को (11)
(11) दिलों में वसवसा डालकर.

बेराह करूंगा{39} मगर जो उनमें तेरे चुने हुए बन्दे हैं(12){40}
(12) जिन्हें तूने अपनी तौहीद और इबादत के लिये बरगुज़ीदा फ़रमा लिया उसपर शैतान का वसवसा और उसका बहकावा न चलेगा.

फ़रमाया यह रास्ता सीधा मेरी तरफ आता है{41} बेशक मेरे(13)
(13) ईमानदार.

बन्दों पर तेरा कुछ क़ाबू नहीं सिवा उन गुमराहों के जो तेरा साथ दें(14){42}
(14) यानी जो काफ़िर कि तेरे अनुयायी और फ़रमाँबरदार हो जाएं और तेरे अनुकरण का इरादा कर लें.

और बेशक जहन्नम उन सबका वादा है(15){43}
(15) इब्लीस का भी और उसका अनुकरण करने वालों का भी.

उसके सात दरवाज़े हैं(16)
(16) यानी सात तबके. इब्ने जुरैह का क़ौल है कि दोज़ख़ के सात दर्जे हैं- जहन्नम, लज़ा, हुतमा, सईर, सक़र, जहीम, हाविया.

हर दरवाज़े के लिये उनमें से एक हिस्सा बटा हुआ है(17){44}
(17) यानी शैतान का अनुकरण करने वाले भी सात हिस्सों में बटे हैं उनमें से हर एक के लिये जहन्नम का एक दर्जा सुरक्षित है.

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