सूरए – चौथा रूकू

सूरए   – चौथा रूकू

बेशक डर वाले बाग़ों और चश्मों में हैं(1){45}
(1) उनसे कहा जाएगा कि.

उनमें दाख़िल हो सलामती के साथ अमान में(2){46}
(2) यानी जन्नत में दाख़िल हो, अम्न व सलामती के साथ. न यहाँ से निकाले जाओ न मौत आये न कोई आफ़त रूनुमा हो. न कोई ख़ौफ़ न परेशानी.

और हमने उनके सीनों में जो कुछ (3)
(3) दुनिया में.

कीने थे सब खींच लिये(4)
(4) और उनके अन्त:करण को इर्ष्या, हसद दुश्मनी और कटुता वग़ैरह बुरी ख़सलतों से पाक कर दिया वो…..

आपस में भाई हैं (5)
(5) एक दूसरे के साथ महब्बत करने वाले. हज़रत अली मुर्तजा़ रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि मुझे उम्मीद है कि मैं और उस्मान और तलहा और जुबैर उन्हीं में से हैं, यानी हमारे सीनो से दुश्मनी और कटुता हसद व इर्ष्या निकाल दी गई है, हम आपस में ख़ालिस महब्बत रखने वाले हैं. इसमें राफ़ज़ियों का रद है.

तख़्तों पर रू बरू बैठे {47} न उन्हें उसमें कुछ तक़लीफ़ पहुंचे न वो उसमें से निकाले जाएं {48} ख़बर दो(6)
(6) ऐ मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम.

मेरे बन्दों को कि बेशक मैं ही हूँ बख़्शने वाला मेहरबान {49} और मेरा ही अज़ाब दर्दनाक अज़ाब है{50} और उन्हें अहवाल सुनाओ इब्राहीम के मेहमानों का(7){51}
(7) जिन्हें अल्लाह तआला ने इसलिये भेजा था कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को बेटे की ख़ुशख़बरी दें और हज़रत लूत अलैहिस्सलाम की क़ौम को हलाक करें. ये मेहमान हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम थे, कई फ़रिश्तों के साथ.

जब वो उसके पास आए तो बोले सलाम(8)
(8) यानी फ़रिश्तों ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को सलाम किया और आपका आदर सत्कार किया तो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने उनसे.

कहा हमें तुम से डर मालूम होता है(9){52}
(9) इसलिये कि बे इजाज़त और बे वक़्त आए और खाना नहीं खाया.

उन्होंने कहा डरिये नहीं हम आपको एक इल्म वाले लड़के की बशारत (ख़ुशख़बरी)देते हैं(10){53}
(10) यानी हज़रत इस्हाक़ अलैहिस्सलाम की, इस पर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने.

कहा क्या इसपर मुझे बशारत देते हो कि मुझे बुढ़ापा पहुंच गया अब काहे पर बशारत देते हो  (11){54}
(11) यानी ऐसे बुढ़ापे में औलाद होना अजीब बात है, किस तरह औलाद होगी, क्या हमें फिर से जवान किया जाएगा या इसी हालत में बेटा अता फ़रमाया जाएगा, फ़रिश्तों ने….

कहा हमने आपको सच्ची बशारत दी है(12)
(12) अल्लाह का हुक्म इसपर जारी हो चुका कि आपके बेटा हो और उसकी सन्तान बहुत फैले.

आप नाउम्मीद न हों{55} कहा अपने रब की रहमत से कौन नाउम्मीद हो मगर वही जो गुमराह  हुए(13){56}
(13) यानी मैं उसकी रहमत से ना उम्मीद नहीं, क्योंकि रहमत से निराश काफ़िर होते हैं. हाँ उसकी सुन्नत, जो दुनिया में जारी है उससे यह बात अजीब मालूम हुई. हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने फ़रिश्तों से..

कहा फिर तुम्हारा क्या काम है ऐ फ़रिश्तों (14){57}
(14) यानी इस बशारत के सिवा और क्या काम है जिसके  लिये तुम भेजे गये हो.

बोले हम एक मुजरिम क़ौम की तरफ़ भेजे गए हैं(15){58}
(15) यानी क़ौमे लूत की तरफ़, कि हम उन्हें हलाक करें.

मगर लूत के घर वाले, उन सबको हम बचालेंगे(16){59}
(16) क्योंकि वो ईमानदार है.

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