सूरए इब्राहीम-पांचवाँ रूकू

सूरए इब्राहीम-पांचवाँ रूकू

क्या तुमने उन्हें न देखा जिन्होंने अल्लाह की नेअमत नाशुक्री से बदल दी(1)
(1) बुख़ारी शरीफ़ की हदीस में है कि उन लोगों से मुराद मक्का के काफ़िर हैं और वह नेअमत जिसकी शुक्रगुज़ारी उन्होंने न की वह अल्लाह के हबीब हैं सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की अल्लाह तआला ने उनके वुजूद से इस उम्मत को नवाज़ा और उनकी ज़ियारत का सौभाग्य दिया. लाज़िम था कि इस महान नेअमत का शुक्र लाते और उनका अनुकरण करके और ज़्यादा मेहरबानी के हक़दार बनते. इसके बदले उन्होंने नाशुक्री की और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का इन्कार किया और अपनी क़ौम को, जो दीन में उनके सहमत थे, हलाकत के मुंह में पहुंचाया.

और अपनी क़ौम को तबाही के घर ला उतारा {28} वो जो दोज़ख़ है उसके अन्दर जाएंगे और  क्या ही बुरी ठहरने की जगह {29} और  अल्लाह के लिये बराबर वाले ठहराए(2)
(2) यानी बुतों को उसका शरीक किया.

कि उसकी राह से बहकावें, तुम फ़रमाओ(3)
(3) ऐ मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) इन काफ़िरों से, कि थोड़े दिन दुनिया कि ख़्वाहिशों का…

कुछ बरत लो कि तुम्हारा अंजाम आग है(4){30}
(4) आख़िरत में.

मेरे उन बन्दो से फ़रमाओ जो ईमान लाए कि नमाज़ क़ायम रखें और  हमारे दिये में से कुछ हमारी राह में छुपे और ज़ाहिर ख़र्च करें उस दिन के आने से पहले जिसमें न सौदागरी होगी(5)
(5) कि ख़रीद फ़रोख़्त यानी क्रय विक्रय यानी माली मुआवज़े और फ़िदिये ही से कुछ नफ़ा उठाया जा सके.

न याराना(6){31}
(6) कि उस से नफ़ा उठाया जाए बल्कि बहुत से दोस्त एक दूसरे के दुश्मन हो जाएंगे. इस आयत में नफ़्सानी और तबई दोस्ती की नफ़ी है और ईमानी दोस्ती जो अल्लाह की महब्बत के कारण से हो वह बाक़ी रहेगी जैसा कि सुरए ज़ुख़रफ़ में फ़रमाया. “अल अख़िल्लाओ यौमइज़िम वअदुहुम लिबअदिन अदुव्वन इल्लल मुत्तक़ीन” (यानी गहरे दोस्त उस दिन एक दूसरे के दु्श्मन होंगे मगर परहेज़गार . सूरए ज़ुख़रफ़, आयत 67)

अल्लाह है जिसने आसमान और  ज़मीन बनाए और  आसमान से पानी उतारा तो उससे कुछ फल तुम्हारे खाने को पैदा किये और  तुम्हारे लिये किश्ती को मुसख़्ख़र (वशीभूत) किया कि उसके हुक्म से दरिया में चले (7)
(7) और इससे तुम फ़ायदे उठाओ.

(8) कि उनसे काम लो.

(9) न थकें न रूकें, तुम उनसे नफ़ा उठाते हो.
और तुम्हारे लिये नदियाँ मुसख़्ख़र की(10){32}
(10) आराम और काम के लिये.

और तुम्हारे लिये सूरज और चांद मुसख़्ख़र किए जो बराबर चल रहे हैं(11)
(11) कि कुफ़्र और गुनाह करके अपने आप पर ज़ुल्म करता है और अपने रब की नेअमत और उसके एहसान का हक़ नहीं मानता. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि इन्सान से यहाँ अबूजहल मुराद है.ज़ुजाज का क़ौल है कि इन्सान इस्मे-जिन्स है, यहाँ इससे काफ़िर मुराद है.

और तुम्हारे लिए रात और दिन मुसख़्ख़र किए(12){33}
(12)

और तुम्हें बहुत कुछ मुंह मांगा दिया और अगर अल्लाह की नेअमतें गिनो तो शुमार न कर सकोगे, बेशक आदमी बड़ा ज़ालिम बड़ा नाशुक्रा है(13){34}
(13)

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