सूरए – इब्राहीम -दूसरा रूकू

सूरए   – इब्राहीम -दूसरा रूकू



और याद करो जब तुम्हारे रब ने सुना दिया कि अगर एहसान मानोगे तो मैं तुम्हें और दूंगा(1)
(1) इस आयत से मालूम हुआ कि शुक्र से नेअमत ज़्यादा होती है. शुक्र की अस्ल यह है कि आदमी नेअमत का तसव्वुर और उसका इज़हार करे. शुक्र की हक़ीक़त यह है कि देने वाले की नेअमत का उसकी तअज़ीम के साथ ऐतिराफ़ करे और नफ़्स को उसका ख़ूगर बनाए. यहाँ एक बारीकी है वह यह कि बन्दा जब अल्लाह तआला की नेअमतों और उसके तरह तरह के फ़ज़्ल व करम और ऐहसान का अध्ययन करता है तो उसके शुक्र में लग जाता है. इससे नेअमतें ज़्यादा होती हैं और बन्दे के दिल में अल्लाह तआला की महब्बत बढ़ती चली जाती है. यह मक़ाम बहुत बरतर है और इससे ऊंचा मक़ाम यह है कि नेअमत देने वाले की महब्बत यहाँ तक ग़ालिब हो कि दिल को नेअमतों की तरफ़ खिंचाव बाक़ी न रहे. यह मकाम सिद्दीकों का है. अल्लाह तआला अपने फ़ज़्ल से हमें शुक्र की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए.

और अगर नाशुक्री करो तो मेरा अज़ाब सख़्त है {7} और मूसा ने कहा अगर तुम और ज़मीन में जितने हैं सब काफ़िर हो जाओ(2)
(2) तो तुम ही नुक़सान पाओगे और तुम ही नेअमतों से मेहरूम रहोगे.

तो बेशक अल्लाह बेपर्वाह सब ख़ूबियों वाला है{8}क्या तुम्हें उनकी ख़बरें न आई जो तुम से पहले थीं नूह की क़ौम और आद और समूद और जो उनके बाद हुए, उन्हें अल्लाह ही जाने(3)
(3) कितने थे.

उनके पास उसके रसूल रौशन दलीलें लेकर आए(4)
(4) और उन्होंने चमत्कार दिखाए.

तो वो अपने हाथ(5)
(5) अत्यन्त क्रोध से.

अपने मुंह की तरफ़ ले गए(6)
(6) हज़रत इब्ने मसऊद रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि वो ग़ुस्से में आकर अपने हाथ काटने लगे. हज़रत इब्ने अब्बास ने फ़रमाया कि उन्होंने किताबुल्लाह सुनकर हैरत से अपने मुंह पर हाथ रखे. ग़रज यह कोई न कोई इन्कार की अदा थी.

और बोले हम इन्कारी हें उसके जो तुम्हारे हाथ भेजा गया और जिस राह (7)
(7) यानी तौहीद और ईमान.

की तरफ़ हमें बुलाते हो इसमें हमें वह शक है कि बात खुलने नहीं देता{9}उनके रसूलों ने कहा क्या अल्लाह में शक है(8)
(8) क्या उसकी तौहीद में हिचकिचाहट है. यह कैसे हो सकता है. उसकी दलीलें तो अत्यन्त ज़ाहिर हैं.

आसमान और ज़मीन का बनाने वाला, तुम्हें बुलाता है(9)
(9) अपनी ताअत और ईमान की तरफ़.

कि तुम्हारे कुछ गुनाह बख़्शे(10)
(10) जब तुम ईमान ले आओ, इसलिये कि इस्लाम लाने के बाद पहले के  गुनाह बख़्श दिये जाते हैं सिवाए बन्दो के हुक़ूक़ के, और इसी लिये कुछ गुनाह फ़रमाया.

और मौत के निश्चित वक़्त तक तुम्हारी ज़िन्दग़ी बेअज़ाब काट दे, बोले तुम तो हमीं जैसे आदमी हो(11)
(11) ज़ाहिर में हमें अपने जैसे मालूम होते हो फिर कैसे माना जाए कि हम तो नबी न हुए और तुम्हें यह फ़ज़ीलत मिल गई.

तुम चाहते हों कि हमें उससे अलग रखो जो हमारे बाप दादा पूजते थे(12)
(12) यानी बुत परस्ती से.

अब कोई रौशन सनद (प्रमाण) हमारे पास ले आओ(13){10}
(13) जिससे तुम्हारे दावे की सच्चाई साबित हो. यह कलाम उनका दुश्मनी और सरकशी से था और हालांकि नबी आयतें ला चुके थे, चमत्कार दिखा चुके थे, फिर भी उन्होंने नई सनद मांगी और पेश किये हुए चमत्कार को शून्य क़रार दिया.

उनके रसूलों ने उनसे कहा (14)
(14)अच्छा यही मानो.

हम हैं तो तुम्हारी तरह इन्सान मगर अल्लाह अपने बन्दों में जिस पर चाहे एहसान फ़रमाता है(15)  
(15)और नबुव्वत और रिसालत के साथ बुज़ुर्गी देता है और इस महान उपाधि के साथ नवाज़ता है.

और हमारा काम नहीं कि हम तुम्हारे पास कुछ सनद ले आएं मगर अल्लाह के हुक्म से और मुसलमानों को अल्लाह ही पर भरोसा चाहिये(16) {11}
(16)  वही दुश्मनों का शर दफ़ा करता है और उससे महफ़ूज़ रखता है.

और हमें क्या हुआ कि अल्लाह पर भरोसा न करें(17)
(17) हमसे ऐसा हो ही नहीं सकता क्योंकि हम जानते हैं कि जो कुछ अल्लाह ने लिख दिया है वही होगा. हमें उसपर पूरा भरोसा और भरपूर ऐतिमाद है. अबू तुराब रदियल्लाहो अन्हो का क़ौल है कि तवक्क़ुल बदन को बन्दगी में डालना, दिल को अल्लाह के साथ जोड़े रखना, अता पर शुक्र, बला पर सब्र का नाम है.

उसने तो हमारी राहें हमें दिखा दीं (18)
(18) और हिदायत व निजात के तरीक़े हम पर खोल दिये. हम जानते हैं कि सारे काम उसकी क़ुदरत और इख़्तियार में हैं.
और तुम जो हमें सता रहे हो हम ज़रूर इस पर सब्र करेंगे और भरोसा करने वालों को अल्लाह ही पर भरोसा चाहिये{12}

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