सूरए इब्राहीम-चौथा रूकू

सूरए इब्राहीम-चौथा रूकू

और शैतान कहेगा जब फ़ैसला हो चुकेगा(1)
(1) और हिसाब से फ़ारिग़ हो जाएंगे. जन्नती जन्नत का और दोज़ख़ी दोज़ख़ का हुक्म पाकर जन्नत और दोज़ख़ में दाख़िल हो जाएंगे. दोज़ख़ी शैतान पर मलामत करेंगे और उसको बुरा कहेंगे कि बदनसीब तूने हमें गुमराह करके इस मुसीबत में डाला तो वह जवाब देगा कि.

बेशक अल्लाह ने तुमको सच्चा वादा दिया था(2)
(2) कि मरने के बाद फिर उठना है और आख़िरत में नेकियों और बदियों का बदला मिलेगा. अल्लाह का वादा सच्चा हुआ.

और मैं ने जो तुमको वादा दिया था(3)
(3) कि न मरने के बाद उठना, न जज़ा, न जन्नत, न दोज़ख़.

वह मैं ने तुम से झूटा किया और मेरा तुम पर कुछ क़ाबू न था(4)
(4) न मैं ने तुम्हें अपने अनुकरण पर मजबूर किया था, या यह कि मैं ने अपने वादे पर तुम्हारे सामने कोई तर्क और प्रमाण पेश नहीं किया था.

मगर यही कि मैंने तुमको (5)
(5) वसवसे डालकर गुमराही की तरफ़.

बुलाया तुमने मेरी मान ली(6)
(6) और बग़ैर तर्क और प्रमाण के तुम मेरे बहकाए में आगए जब कि अल्लाह तआला ने तुमसे वादा फ़रमाया था कि शैतान के बहकावे में न आना. और उसके रसूल उसकी तरफ़ से दलीलें लेकर तुम्हारे पास आए और उन्होंने तर्क पेश किये और प्रमाण क़ायम किये तो तुमपर ख़ुद लाज़िम था कि तुम उनका अनुकरण करते और उनकी रौशन दलीलों और खुले चमत्कार से मुंह न फेरते और मेरी बात न मानते और मेरी तरफ़ इल्तिफ़ात न करते, मगर तुमने ऐसा न किया.

तो अब मुझपर इल्ज़ाम न रखो (7)
(7) क्योंकि मैं दुश्मन हूँ और मेरी दुश्मनी ज़ाहिर है और दुश्मन से भले की आशा रखना ही मूखर्ता है तो…..

ख़ुद अपने ऊपर इल्ज़ाम रखो न मैं तुम्हारी फ़रियाद को पहुंच सकूं न तुम मेरी फ़रियाद को पहुंच सको, वह जो पहले तुमने मुझे शरीक ठहराया था (8)
(8) अल्लाह का उसकी इबादत में.(ख़ाज़िन)

मैं उससे सख़्त बेज़ार हूँ बेशक ज़ालिमों के लिये दर्दनाक अज़ाब है{22}और वो जो ईमान लाए और अच्छे काम किये, वो बाग़ों में दाख़िल किये जाएंगे जिनके नीचे नहरें बहतीं , हमेशा उनमें रहें अपने रब के हुक्म से, उसमें उनके मिलते वक़्त का इकराम (सत्कार) सलाम है(9){23}
(9) अल्लाह तआला की तरफ़ से और फ़रिश्तों की तरफ़ से और आपस में एक दूसरे की तरफ़ से.

क्या तुमने न देखा अल्लाह ने कैसी मिसाल बयान फ़रमाई पाक़ीज़ा बात की(10)
(10) यानी कलिमए तौहीद की.

जैसे पाक़ीज़ा दरख़्त जिसकी जड़ क़ायम और शाख़ें आसमान में {24} हर वक़्त अपना फल देता है अपने रब के हुक्म से(11)
(11) ऐसे ही कलिमए ईमान है कि उसकी जड़ मूमिन के दिल की ज़मीन में साबित और मज़बूत होती है और उसकी शाख़ें यानी अमल आसमान में पहुंचते हैं और उसके फल यानी बरकत और सवाब हर वक़्त हासिल होते हैं. हदीस शरीफ में है, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने सहाबए किराम से फ़रमाया, वह दरख़्त बताओ जो मूमिन की तरह है, उसके पत्ते नहीं गिरते और हर वक़्त फल देता है (यानी जिस तरह मूमिन के अमल अकारत नहीं होते) और उसकी बरकतें हर वक़्त हासिल रहती हैं. सहाबा ने सोचा कि ऐसा कौन सा दरख़्त है जिसके पत्ते न गिरते हों और उसका फल हर वक़्त मौजूद रहता हो, चुनांचे जंगल के दरख़्तों के नाम लिये. जब ऐसा कोई दरख़्त ख़याल में न आया तो हुज़ूर से दरियाफ़्त किया. फ़रमाया, वह खजूर का दरख़्त है. हज़रत इब्ने उमर रदियल्लाहो अन्हो ने अपने वालिद हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो से अर्ज़ किया कि जब हुज़ूर ने दरियाफ़्त फ़रमाया था तो मेरे दिल में आया था कि खजूर का दरख़्त है लेकिन बड़े बड़े सहाबा तशरीफ़ फ़रमा थे, मैं छोटा था इसलिये मैं अदब से खामोश रहा. हज़रत उमर ने फ़रमाया अगर तुम बता देते तो मुझे बड़ी ख़ुशी होती.

और अल्लाह लोगों के लिये मिसालें बयान फ़रमाता है कि कहीं वो समझें(12){25}
(12) और ईमान लाएं, क्योंकि मिसालों से मानी अच्छी तरह दिल में बैठ जाते हैं.

और गन्दी बात(13)
(13) यानी कुफ़्री कलाम.

की मिसाल जैसे एक गन्दा पेड़ (14)
(14) इन्द्रायन की तरह का जिसका मज़ा कड़वा, बू नागवार या लहसन की तरह बदबूदार.

कि ज़मीन के ऊपर काट दिया गया अब उसे कोई क़ियाम (स्थिरता) नहीं(15){26}
(15) क्योंकि जड़ उसकी ज़मीन में साबित और मज़बूत नहीं, शाख़ें उसकी बलन्द नहीं होती. यही हाल है कुफ़्री कलाम का कि उसकी कोई अस्ल साबित नहीं और कोई तर्क और प्रमाण नहीं रखता. जिससे मज़बूती हो, न उसमें भलाई और बरकत कि वह क़ुबूलियत की ऊंचाई पर पहुंच सके.

अल्लाह साबित रखता है ईमान वालों को हक़ बात पर(16)
(16) यानी ईमान का कलिमा.

दुनिया की ज़िन्दगी में(17)
(17) कि वो परेशानी और मुसीबत के वक़्तों में भी साबिर और अडिग रहते हैं और सच्चाई की राह और दीन से नहीं हटते यहाँ तक कि उनकी ज़िन्दगी का अन्त ईमान पर होता है.

और आख़िरत में(18)
(18) यानी क़ब्र में कि आख़िरत की मंज़िलों की पहली मंज़िल है. जब मुन्कर -नकीर आकर उनसे पूछते हैं कि तुम्हारा रब कौन है, तुम्हारा दीन क्या है, और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तरफ़ इशारा करके दरियाफ़्त करते हैं कि इनकी निस्बत तू क्या कहता है. तो मूमिन इस मंज़िल में अल्लाह के फ़ज़्ल से जमा रहता है कह देता है कि मेरा रब अल्लाह है, मेरा दीन इस्लाम है और यह मेरे नबी हैं मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम, अल्लाह के बन्दे और उसके रसूल. फिर उसकी क़ब्र चौड़ी कर दी जाती है और उसमें जन्नत की हवाएं और ख़ुश्बुएं आती हैं और वह रौशन कर दी जाती है और आसमान से पुकार होती है कि मेरे बन्दे ने सच कहा.

और अल्लाह ज़ालिमों को गुमराह करता है(19)
(19) वो क़ब्र में मुन्कर-नकीर को सही जवाब नहीं दे सकते और हर सवाल के जवाब में यही कहते है हाय हाय मैं नहीं जानता. आसमान से पुकार होती है मेरा बन्दा झूटा है इसके लिये आग का फ़र्श बिछाओ, दोज़ख़ का लिबास पहनाओ, दोज़ख़ की तरफ़ दरवाज़ा खोल दो, उसको दोज़ख़ की गर्मी और दोज़ख़ की लपट पहुंचती है और क़ब्र इतनी तंग हो जाती है कि एक तरफ़ की पसलियाँ दूसरी तरफ़ आ जाती हैं. अज़ाब करने वाले फ़रिश्ते उसपर मुक़र्रकर दिये जाते हैं जो उसे लोहे के गदाओ से मारते हैं. (अल्लाह हमें क़ब्र के अज़ाब से मेहफ़ूज़ रखे और ईमान में मज़बूत रखे- आमीन)

और अल्लाह जो चाहे करे{27}

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