सूरए – रअद चौथा रूकू

सूरए   – रअद  चौथा रूकू

और क़ाफ़िर कहते उनपर कोई निशानी उनके रब की तरफ़ से क्यों न उतरी, तुम फ़रमाओ बेशक अल्लाह जिसे चाहे गुमराह करता है(1)
(1)कि वह आयाते और चमत्कार उतरने के बाद भी यह कहता रहता है कि कोई निशानी क्यों नहीं उतरी, कोई चमत्कार क्यों नहीं आया! अनेक चमत्कारों के  बावजूद गुमराह रहता है.

और अपनी राह उसे देता है जो उसकी तरफ़ रूजू लाए {27} वो जो ईमान लाए और उनके दिल अल्लाह की याद से चैन पाते हैं सुन लो अल्लाह की याद ही में दिलों का चैन है(2){28}  
(2)उसकी रहमत और फ़ज़्ल और उसके एहसान और करम याद करके बेकरार दिलों को क़रार और इत्मीनान हासिल होता है. अगरचे उसके इन्साफ़ और प्रकोप की याद दिलों को डरा देती है जैसा कि दूसरी आयत में फ़रमाया “इन्नमल मूमिनूनल्लज़ीना इज़ा ज़ुकिरल्लाहो वजिलत क़ुलूबुहुम ” (यानी ईमान वाले वही हैं कि जब अल्लाह याद किया जाए, उनके दिल डर जाएं- सूरए अन्फ़ाल , आयत 2) हज़रत इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा ने इस आयत की तफ़सीर में फ़रमाया कि मुसलमान जब अल्लाह का नाम लेकर क़सम खात है दूसरे मुसलमान उसपर यक़ीन कर लेते हैं और उनके दिलों को इत्मीनान हो जाता है.

वो जो ईमान लाए और अच्छे काम किये उनको ख़ुशी है और अच्छा अंजाम(3){29}
(3) तूबा बशारत है राहत  व नेअमत और ख़ुशी और खुशहाली की. सईद बिन जुबेर रदियल्लाहो अन्हो ने कहा कि तूबा हबशी ज़बान में जन्नत का नाम है. हज़रत अबू हुरैरा और दूसरे सहाबा से रिवायत है कि तूबा जन्नत के एक दरख़्त का नाम है जिसका साया हर जन्नत में पहुंचेगा, यह दरख़्त जन्नते अदन में है और इसकी असली जड़ सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के बदल्द मकान में इसकी शाखें जन्नत के हर घर हर महल में.इसमें  स्याही को छोड़कर हर किस्म के रंग खुशनुमाईयाँ हैं हर तरह के फल और मेवे इसमें फलते हैं, इसकी जड़ से काफ़ुर और  सलसबील की नहरें जारी हैं.

इसी तरह हमने तुमको इस उम्मत में भेजा जिससे पहले उम्मतें हो गुज़री(4)
(4)तो तुम्हारी उम्मत सबसे पिछली उम्मत है और तुम नबियो के सिलसिले को ख़त्म करने वाले हो, तुम्हें बड़ी शान से नबुव्वत अता की.

कि तुम उन्हें पढ़कर सुनाओ (5)
(5)वह महान किताब.

 जो हमने तुम्हारी तरफ़ वही (देववाणी) की और वो रहमान के इन्कारी हो रहे हैं(6)
(6) क़तादा और मक़ातिल वग़ैरह का क़ौल है कि आयत सुलह हुदैबियह में उतरी जिसका संक्षिप्त वाक़िआ यह है कि सुहैल बिन अम्र जब सुलह के लिए आया और सुलहनामा लिखने पर सहमति हो गयी तो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हज़रत अली मुर्तज़ा रदियल्लाहो अन्हो से फ़रमाया लिखो “बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम” काफ़िरों ने इसमें झगड़ा किया और कहा कि आप हमारे तरीक़े के अनुसार “बिस्मिकल्लाहुम्मा” लिखवाइये. . इसके बारे में आयत में इरशाद होता है कि वह रहमान के इन्कारी हो रहे हैं.

तुम फ़रमाओ वह मेरा रब है उसके सिवा किसी की बन्दगी नहीं मैं ने उसी पर भरोसा किया और उसी की तरफ़ मेरी रूजू है {30}  और अगर कोई ऐसा क़ुरआन आता जिससे पहाड़ टल जाते (7)
(7)अपनी जगह से.

या ज़मीन फट जाती या मुर्दे बातें करते जब भी ये काफ़िर न मानते(8)
(8) क़ुरैश के काफ़िरों  ने सैयद आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहा था कि अगर आप चाहें कि  हम आपकी नबुव्वत मानें और आपका अनुकरण करें तो आप कुरआन पढ़कर इसकी तासीर से मक्का के पहाड़ हटा दीजिए ताकि हमें खेतयाँ करने के लिए विस्तृत मैदान मिल जाएं और ज़मीन फाड़कर चश्मे जारी कीजिये ताकि हम खेतों और बाग़ों को उनसे सींच सकें और कुसई  बिन क्लाब वग़ैरह हमारे मरे हुए बाप दादा को ज़िन्दा कर दीजिए वह हमसे कह जाएं कि आप नबी हैं. इसके जवाब में आयत उतरी और बता दिया गया कि हीले हवाले करने वाले किसी हाल में भी ईमान लाने वाले नहीं.

बल्कि सब काम अल्लाह ही के इख़्तियार में हैं (9)
(9) तो ईमान वही लाएगा जिसको अल्लाह चाहे और तौफ़ीक़ दे. उसके सिवा और कोई ईमान लाने  वाला नहीं अगरचे उन्हें वही निशान दिखा दिए जाएं जो वो तलब करें.

तो क्या मुसलमान इससे नाउम्मीद न हुए (10)
(10)यानी काफ़िरों के ईमान लाने से चाहे उन्हें कितनी ही निशानियाँ दिखला दी जाएं और क्या मुसलमानों को इसका यक़ीनी इल्म नहीं.

कि अल्लाह चाहता तो सब आदमियों को हिदायत कर देता (11)
(11)बगैर किसी निशानी के, लेकिन वह जो चाहता है  और वही हिक़मत है. यह जवाब है उन मुसलमानों का जिन्होंने काफ़िरों के नई नई निशानियाँ तलब करने पर यह चाहा था कि जो काफ़िर भी कोई निशानी तलब करे वही उसको दिखादी जाए, इसमें उन्हें बता दिया गया कि जब ज़बरदस्त निशान आ चुके और शक और वहम की सारी हदें बंद कर दी गईं, दीन की सच्चाई चमकते दिन से ज़्यादा ज़ाहिर हो चुकी, इन खुले प्रमाणों के बावुजूद लोग मुकर गए सच्चाई को न माना, जाहिर हो गया कि वह दुश्मनी पर तुले हैं  और दुश्मन किसी दलील से भी नहीं माना नहीं करता. तो मुसलमानों को अब उनसे सच्चाई स्वीकार करने की क्या उम्मीद, क्या अब तक उनकी दुश्मनी देखकर और खुली और ज़ाहीर से निशानियों से उनके मुंह फेर लेने को देखकर भी उनसे सच्चाई के क़ुबूल करने की उम्मीद की जा सकती है. अलबत्ता अब उनके ईमान लाने और मान जाने की यही सूरत है कि अल्लाह तआला उन्हें मजबूर करे और उनका इख़्तियार छीन ले. इस तरह की हिदायत चाहता तो तमाम आदमियों को हिदायत फ़रमा देता और कोई काफ़िर न रहता. मगर आज़माइश और मुसीबतों से गुज़रने की हिकमत का यह तक़ाज़ा नहीं.

और क़ाफिरों को हमेशा उनके किये की सख़्त धमक पहुंचती रहेगी(12)
(12)यानी वो इस झुटलाने और दुश्मनी के कारण तरह तरह के हादसों और मुसीबतों और आफ़तों और बलाओं में जकड़े रहेंगे, कभी क़हत में, कभी लुटने में, कभी मारे जाने में, कभी क़ैद में.

या उनके घरों के नज़दीक उतरेगी(13)
(13) और उनकी बेचैनी और परेशानी का कारण होगा और उन तक मुसीबतों के नुक़सान पहुंचेंगे.

यहां तक कि अल्लाह का वादा आए (14)
(14) अल्लाह की तरफ से फ़त्ह और मदद आए और रसूल करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और उनका दीन ग़ालिब हो और मक्कए मुकर्रमा फ़त्ह किया जाए. कुछ मफ़स्सिरो ने कहा कि इस वादे से रोज़ क़यामत का दिन मुराद है जिसमें कर्मो का बदला दिया जाएगा.
बेशक अल्लाह वादा ख़िलाफ़ी नहीं करता (15){31}
(15)इसके बाद अल्लाह तआला रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली फ़रमाता है कि इस क़िस्म के बेहूदा सवाल हंसी ठट्ठे से आप दुखी न हों क्योंकि हादियों को हमेशा ऐसे वाक़िआत पेश आया ही करते हैं. चुनांचे इरशाद फ़रमाता है .

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