सूरए – रअद छटा रूकू

सूरए   – रअद  छटा रूकू


और बेशक हमने तुम से पहले रसूल भेजे और उनके लिये बीबियाँ(1)
(1)काफ़िरों ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर यह ऐब लगाया कि वह निकाह करते हैं और नबी होते तो दुनिया तर्क कर देते, बीबी बच्चो से कुछ वास्ता नहीं रखते.  इस पर यह आयत उतरी और उन्हें बताया गया कि बीबी बच्चे होना नबुव्वत के विरुद्ध नहीं हैं लिहाज़ा यह एतिराज़ बेजा है और पहले जो रसूल आ चुके हैं वह भी निकाह  करते थे, उनके भी बीबियां और बच्चे थे.

और बच्चे किये किसी रसूल का काम नहीं कि कोई निशानी ले आए मगर अल्लाह के हुक्म से हर वादे की एक लिखत है(2){38}
(2)उससे  पहले और बाद में नहीं हो सकता चाहे वह अज़ाब का वादा हो या कोई और.

अल्लाह जो चाहे मिटाता और साबित करता है(3)
(3)सईद बिन जुबैर और क़तादा ने इस आयत की तफ़सीर में कहा कि अल्लाह जिन अहकाम को चाहता है मन्सूख़ या स्थगित फ़रमाता है जिन्हें चाहता है बाकी रखता है. इन्हीं इब्ने जुबैर का एक क़ौल यह है कि बन्दों के गुनाहों में से अल्लाह जो चाहता है माफ़ फ़रमा कर मिटा देता है और जो चाहता है साबित रखता है. अकरमह का क़ौल है कि अल्लाह तआला तौबह से जिस गुनाह को चाहता है मिटाता है और उसकी जगह नेकियाँ क़ायम फ़रमाता है. इसकी तफ़सीर में और भी बहुत क़ौल हैं.

और अस्ल लिखा हुआ उसी के पास है(4){39}
(4)जिसको उसने आदिकाल में लिखा. यह अल्लाह का इल्म है उम्मुल किताब से लौहे मेहफ़ूज़ मुराद है जिसमें सारे जगत और सृष्टि में होने वाले सारे वाक़िआत और घटनाओं और सारी चीज़ो का हाल दर्ज़ हैं और इसमें हेरफेर या परिवर्तन नहीं हो सकता.

और अगर हम तुम्हें दिखा दें कोई वादा (5)
(5)अज़ाब का.

जो उन्हें दिया जाता है या पहले ही(6)
(6)हम तुम्हें.

अपने पास बुलाएं तो हर हाल में तुम पर तो सिर्फ़ पहुंचाना है और हिसाब लेना(7)
(7)और कर्मों का बदला देना.

हमारा जि़म्मा(8){40}
(8)तो आप काफ़िरों के इन्कार करने से रन्जीदा और दुखी न हों और अज़ाब की जल्दी न करें.

क्या उन्हें नहीं समझता कि हम हर तरफ़ से उनकी आबादी घटाते आ रहे हैं(9)
(9)और जमीनें शिर्क की वुसअत और फैलाव दम बदम  कर रहे हैं और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के लिए काफ़िरों के आस पास की ज़मीने एक के बाद एक फ़त्ह होती चली जाती है.और उनके लश्कर को विजयी करता है और उनके दीन को ग़ल्बा देता है.

और अल्लाह हुक्म फ़रमाता है उसका हुक्म पीछे डालने वाला कोई नहीं (10)
(10)उसका हुक्म लागू है किसी की मजाल नहीं कि इसमें क्यों  और क्या ,या फेर बदल कर सके. जब वह इस्लाम को ग़ल्बा देना चाहे और कुफ़्र को पस्त करना चाहे तो किसकी मज़ाल और ताक़त कि उसके हुक्म में दख़्ल दे सके.

और उसे हिसाब लेते देर नहीं लगती{41}और उनसे अगले (11)
(11)यानी गुजरी हुई उम्मतों के काफ़िर अपने नबियों के साथ.

धोख़ा कर चुके हैं तो सारी छुपवाँ तदबीर का मालिक तो अल्लाह ही है(12)
(12)फिर बगैर उसकी मर्ज़ी के किसी की क्या चल सकती है और जब हक़ीक़त यह है तो मख़लूक़ का क्या डर.

जानता है जो कुछ कोई जान कमाए (13)
(13)हर एक की कोशिश अल्लाह तआला को मालूम है, उसके नज़दीक उनका बदला भी निर्धारित है.

और अब जाना चाहते हैं काफ़िर किसे मिलता है पिछला घर(14){42}
(14)यानी काफ़िर बहुत जल्द जान लेंगे कि आख़िरत की राहत ईमान वालों के लिए है और वहाँ की ज़िल्लत और ख़्वारी क़ाफ़िरों के लिए है.

और काफ़िर कहते हैं तुम रसूल नहीं, तुम फ़रमाओ अल्लाह गवाह काफ़ी है मुझ में और तुम में(15)
(15)जिसने मेरे हाथों में खुले चमत्कार और मज़बूत निशानियाँ  ज़ाहिर फ़रमा कर मेरे नबी होने की गवाही दी.

और वह जिसे किताब का इल्म है(16){43}
(16)चाहे वह उलेमा यहूद से तौरात का जानने वाला हो या इसाईयों में से इंजील का आलिम, वह सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की रिसालत को अपनी किताबों में देखकर जानता है इन उलमा से अक्सर आपकी नबुव्वत की गवाही देते हैं.

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