सूरए यूसुफ़ – पहला रूकू

सूरए  यूसुफ़ – पहला रूकू

सूरए यूसुफ, मक्का में उतरी, इसमें 111 आयतें और 12 रूकू हैं.

पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए यूसुफ़ मक्की है. इसमें बारह रूकू हैं, 111 आयतें, एक हज़ार छ सौ कलिमे और सात हज़ार एक सौ छियासठ अक्षर है. यहूदी उलमा ने अरब के शरीफ़ों से कहा था कि मुहम्मद(सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) से दरियाफ़्त करो कि हज़रत यअक़ूब की औलाद शाम प्रदेश से मिस्र में किस तरह पहुंची और उनके वहाँ जाकर आबाद होने का क्या कारण हुआ और हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का वाक़िआ क्या है. इसपर ये मुबारक सूरत उतरी.

ये रौशन किताब की आयतें हैं(2){1}
(2) जिसका चमत्कार और कमाल और अल्लाह की तरफ़ से होना साफ़ है और इल्म वालों के नज़दीक संदेह से परे है. इसमें हलाल व हराम, शरीअत की हदें और अहकाम साफ़ बयान फ़रमाए गए हैं. एक क़ौल यह है कि इसमें पहलों के हालात रौशन तौर पर दर्ज हैं और सच झूट को अलग अलग कर दिया गया है.

बेशक हमने इसे अरबी क़ुरआन उतारा कि तुम समझो {2} हम तुम्हें सबसे अच्छा बयान सुनाते हैं (3)
(3) जो बहुत से अजायब और अनोखी बातों और हिकमतों और इबारतों पर आधारित है. उसमे दीन व दुनिया के बहुत फ़ायदे और सुल्तानों और रिआया और उलमा के हालात और औरतों की विशेषताओं और दुश्मनों की तकलीफ़ों पर सब्र और उनपर काबू पाने के बाद उनसे तजावुज़ करने का बढ़िया बयान है, जिससे सुनने वाले में सद्चरित्र और पाकीज़ा आदतें पैदा होती है. बेहरूल हक़ायक़ के लेखक ने कहा कि इस बयान का अहसन होना इस कारण से है कि यह क़िस्सा इन्सान के हालात के साथ भरपूर मुशाबिहत रखता है.अगर यूसुफ़ से दिल को, और यअक़ूब से रूह को, और राहील से नफ़्स को, यूसुफ़ के भाईयों से मज़बूत हवास को ताबीर किया जाए और सारे किस्से को इन्सानों के हालात से मुताबिक़त दी जाए, चुनांचे उन्होंने वह मुताबिक़त बयान भी की है जो यहाँ तवालत के डर से दर्ज नहीं की जा

इसलिये कि हमने तुम्हारी तरफ़ इस क़ुरआन की वही (देववाणी) भेजी, अगरचे बेशक इससे पहले तुम्हें ख़बर न थी {3} याद करो जब यूसुफ़ ने अपने बाप(4)
(4) हज़रत यअक़ूब इब्ने इस्हाक़ इब्ने इब्राहीम अलैहिस्सलाम.

से कहा ऐ मेरे बाप मैंने ग्यारह तारे और सूरज और चांद देखे उन्हें अपने लिये सिजदा करते देखा(5){4}
(5) हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने ख़्वाब देखा कि आसमान से ग्यारह सितारे उतरे और उनके साथ सूरज और चांद भी हैं उन सब ने आप को सज्दा किया. यह ख़्वाब जुमुए की रात को देखा, यह रात शबे-क़द्र थी. सितारों की ताबीर आपके ग्यारह भाई हैं और सूरज आपके वालिद और चाँद आपकी वालिदा या ख़ाला. आपकी वालिदा का नाम राहिल है. सदी का क़ौल है कि चूंकि राहील का इन्तिक़ाल हो चुका था इसलिये क़मर से आपकी ख़ाला मुराद है. सज्दा करने से तवाज़ों करना और फ़रमाँबरदार होना मुराद है. एक कौल यह है कि हक़ीक़त में सज्दा ही मुराद है, क्योंकि उस ज़माने में सलाम की तरह ताज़ीम का सज्दा था. हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की उम्र शरीफ़ उस वक़्त बारह साल थी और सात और सत्तरह के कौल भी आए हैं. हज़रत यअक़ूब अलैहिस्सलाम को हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम से बहुत ही ज़्यादा महब्बत थी इसलिये उनके साथ उनके भाई हसद करते थे. हज़रत यअक़ूब अलैहिस्सलाम इसपर बाख़बर थे इसलिये जब हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने यह ख़्वाब देखा तो हज़रत यअक़ूब अलैहिस्सलाम ने.

कहा ऐ मेरे बच्चे अपना ख़्वाब अपने भाइयों से न कहना(6)
(6) क्योंकि वो इसकी ताबीर को समझ लेंगे. हज़रत यअक़ूब अलैहिस्सलाम जानते थे कि अल्लाह तआला हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को नबुव्वत के लिये बुज़ुर्गी अता करेगा और दोनों जगत की नेअमतें और महानता इनायत करेगा, इस लिये आपको भाइयों के हसद का डर हुआ और आपने फ़रमाया.

कि वो तेरे साथ कोई चाल चलेंगे (7)
(7) और तुम्हारी हलाकत की कोई तदबीर सोचेंगे.

बेशक शैतान आदमी का खुला दुश्मन है(8){5}
(8) उनको दुश्मनी और हसद पर उभारेगा. इसमें ईमा है कि हज़रत यूसुफ़ के भाई अगर उनके लिये कष्ट और तक़लीफ़ देने के प्रयास करेंगे, तो इसका कारण शैतान का बहकावा होगा. (ख़ाज़िन)  बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस में है, रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, अच्छा ख़्वाब अल्लाह की तरफ़ से है. चाहिये कि उसको अपने प्यारे से बयान किया जाए और बुरा ख़्वाब शैतान की तरफ़ से है. जब कोई देखने वाला वह ख़्वाब देखे तो चाहिये कि अपनी बाईं तरफ़ तीन बार थुकथुकाए और यह पढे “अऊज़ो बिल्लाहे मिनश शैतानिर रजीम वमिन शर्र हाज़िहिर रूया”.

और इसी तरह तुझे तेरा रब चुन लेगा(9)
(9) “इज्तिबा” यानी चुन लेना, यानी अल्लाह तआला का किसी बन्दे को बुज़ुर्गी अता करना, इसके मानी ये हैं कि किसी बन्दे को अल्लाह अपने फ़ैज़ के साथ मख़सूस करे जिससे उसको तरह तरह के चमत्कार और कमालात बिना परिश्रम और कोशिश के हासिल हों. यह दर्जा नबियों के साथ ख़ास है और उनकी बदौलत उनके ख़ास क़रीबी नेकों, शहीदों और अच्छाई करने वालों को भी ये नेअमत अता की जाती है.

और तुझे बातों का अंजाम निकालना सिखाएगा(10)
(10) इल्म और हिकमत अता करेगा और पिछली किताबों और नबियों की हदीसों के राज़ खोलेगा. मुफ़स्सिरों ने इस से ख़्वाब की ताबीर मुराद ली है. हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ख़्वाब की ताबीर के बड़े माहिर थे.

और तुझ पर अपनी नेमत पूरी करेगा और याक़ूब के घर वालों पर (11)
(11) नबुव्वत अता फ़रमाकर, जो ऊंची उपाधियों से है, और सृष्टि की सारी उपाधियाँ इससे कम है और सल्तनतें देकर, दीन और दुनिया की नेअमतों से मालामाल करके.

जिस तरह तेरे पहले दोनों बाप दादा इब्राहीम और इसहाक़ पर पूरी की (12) बेशक तेरा रब इल्म व हिकमत वाला है{6}
(12) कि उन्हें नबुव्वत अता फ़रमाई. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि इस नेअमत से मुराद यह है कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को नमरूद की आग से छुटकारा दिया और अपना ख़लील यानी दोस्त बनाया और हज़रत इस्हाक़ अलैहिस्सलाम को हज़रत यअक़ूब और बेटे अता किये.

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