सूरए यूसुफ़ – सातवाँ रूकू

सूरए यूसुफ़ – सातवाँ रूकू


और बादशाह बोला कि उन्हें मेरे पास ले आओ,तो जब उसके पास एलची आया(1)
(1) और उसने हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में बादशाह का संदेश अर्ज़ किया तो आपने…

कहा अपने रब {बादशाह} के पास पलट जा फिर उससे पूछ(2)
(2) यानी उससे दरख़्वास्त कर कि वह पूछे, तफ़्तीश करें.

क्या हाल है उन औरतों का जिन्होंने अपने हाथ काटे थे बेशक मेरा रब उनका धोखा जानता है(3){50}
(3) यह आपने इसलिये फ़रमाया ताकि बादशाह के सामने आपकी बेगुनाही मालूम हो जाए और यह उसको मालूम हो कि यह लम्बी क़ैद बे वजह हुई ताकि आयन्दा हासिदों को डंक मारने का मौक़ा न मिले. इससे मालूम हुआ कि तोहमत या लांछन दूर करने की कोशिश करना ज़रूरी है. अब क़ासिद हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के पास से यह पयाम लेकर बादशाह की ख़िदमत में पहुंचा. बादशाह ने सुनकर औरतों को जमा किया और उनके साथ अज़ीज़ की औरत को भी.

(4) जुलैख़ा.

बादशाह ने कहा ऐ औरतों तुम्हारा काम था जब तुमने यूसुफ़ का दिल लुभाना चाहा बोलीं अल्लाह को पाकी है हमने उनमें कोई बदी न पाई अज़ीज़ की औरत बोली अब असली बात खुल गई मैं ने उनका जी लुभाना चाहा था और वो बेशक सच्चे हैं(5){51}
(5) बादशाह ने हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के पास पयाम भेजा कि औरतों ने आपकी पाकी बयान की और अज़ीज़ की औरत ने अपने गुनाह का इक़रार कर लिया इसपर हज़रत.

पारा बारह समाप्त

सूरए यूसुफ़ – सातवाँ रूकू (जारी)

यूसुफ़ ने कहा यह मैं ने इसलिये किया कि अज़ीज़ को मालूम हो जाए कि मैं ने पीठ पीछे उसकी ख़यानत (विशवास घात) न की और अल्लाह दग़ाबाज़ों का मक्र नहीं चलने देता{52}

तेरहवां पारा – वमा- उबर्रिओ
{सूरए यूसुफ़ जारी}

और मैं अपने नफ़्स (मन) को बेक़ुसूर नहीं बताता(6)

(6) ज़ुलैखा के इक़रार और ऐतिराफ़ के बाद हज़रत हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने जो यह फ़रमाया था कि मैंने अपनी बेगुनाही का इज़हार इसलिये चाहा था ताकि अज़ीज़ को यह मालूम हो जाए कि मैं ने उसकी ग़ैर हाज़िरी में उसकी ख़यानत नहीं की है और उसकी बीबी की इज़्ज़त ख़राब करने से दूर रहा हूँ और जो इल्ज़ाम मुझपर लगाए गए हैं, मैं उनसे पाक हूँ. इसके बाद आपका ख़्याले मुबारक इस तरफ़ गया कि इसमें अपनी तरफ़ पाकी की निस्बत और अपनी नेकी का बयान है, ऐसा न हो कि इसमें घमण्ड और अहंकार की भावना भी आए. इसी लिये अल्लाह तआला की बारगाह में विनम्रता से अर्ज़ किया कि मैं अपने नफ़्स को बेक़ुसूर नहीं मानता, मुझे अपनी बेगुनाही पर घमण्ड नहीं है और मैं गुनाह से बचने को अपने नफ़्स की ख़ूबी क़रार नहीं देता. नफ़्स की जिन्स का यह हाल है कि.

बेशक नफ़्स तो बुराई का बड़ा हुक्म देने वाला है मगर जिसपर मेरा रब रहम करे(7)
(7) यानी अपने जिस ख़ास बन्दे को अपने करम से मासूम करे तो उसका बुराइया से बचना अल्लाह के फ़ज़्ल और रहमत  से है और गुनाहों से मेहफ़ूज़ रखना उसी की मेहरबानी है.

बेशक मेरा रब बख़्शने वाला मेहरबान है(8){53}
(8) जब बादशाह को हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के इल्म और आपकी अमानत का हाल मालूम हुआ और वह आपके अच्छे सब्र और अच्छे अदब, क़ैद खाने वालों के साथ एहसान, मेहनतों और तकलीफ़ों के बावुज़ूद साबित क़दम रहने पर सूचित हुआ तो उसके दिल में आपका बहुत ही ज़्यादा अक़ीदा पैदा हुआ.

और बादशाह बोला उन्हें मेरे पास ले आओ कि मैं उन्हें ख़ास अपने लिये चुन लूं(9)
(9) और अपना ख़ास बना लूँ. चुनांचे उसने प्रतिष्ठित लोगों की एक जमाअत, बहतरीन सवारियोँ और शाही साज़ों सामान और उमदा लिबास लेकर क़ैद खाने भेजी ताकि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को अत्यन्त आदर और सत्कार के साथ शाही महल में लाएं. उन लोगों ने हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में हाज़िर होकर बादशाह का संदेश अर्ज़ किया. आपने क़ुबूल फ़रमाया और कै़द खाने से निकलते वक़्त क़ैदियों के लिये दुआ फ़रमाई. जब क़ैद ख़ाने से बाहर तशरीफ़ लाए तो उसके दरवाज़े पर लिखा कि यह बला का घर, ज़िन्दों की क़ब्र और दुश्मनों की बदगोई  है और सच्चों के इम्तिहान की जगह है. फिर ग़ुस्ल फ़रमाया और पोशाक पहन कर शाही महल की तरफ़ रवाना हुए. जब क़िले के दरवाज़े पर पहुंचे तो फ़रमाया मेरा रब मुझे काफ़ी है, उसकी पनाह बड़ी और उसकी तारीफ़ महान. उसके सिवा कोई मअबूद नहीं. फिर क़िले में दाख़िल हुए. बादशाह के सामने पहुंचे तो यह दुआ की कि ऐ मेरे रब, मैं तेरे फ़ज़्ल से इसकी भलाई तलब करता हूँ और इसकी और दूसरों की बुराई से तेरी पनाह चाहता हूँ. जब बादशाह से नज़र मिली तो आपने अरबी में सलाम फ़रमाया. बादशाह ने दरियाफ़्त किया, यह क्या ज़बान है. फ़रमाया, यह मेरे चचा हज़रत इस्माईल की ज़बान है. फिर आपने उसको इब्रानी में दुआ दी उसने पूछा, यह कौन ज़बान है. फ़रमाया यह मेरे अब्बा की ज़बान है. बादशाह ये दोनों ज़बानें न समझ सका, जबकि वह सत्तर ज़बानें जानता था. फिर उसने जिस ज़बान में हज़रत से बात की, आपने उसी ज़बान मं उसको जवाब दिया.उस वक़्त आपकी उम्र शरीफ़ तीस साल की थी. इस उम्र में इल्म का यह चमत्कार देखकर बादशाह बहुत हैरान हुआ आैर  उसने आप को अपने बराबर जगह दी.

फिर जब उससे बात की कहा बेशक आज आप हमारे यहाँ मुअज़्ज़ज़(सम्मानित) मोतमिद(विश्वस्त) है (10){54}
(10)  बादशाह ने दरख़्वास्त की कि हज़रत उसके ख़्वाब की ताबीर अपनी मुबारक ज़बान से सुना दें. हज़रत ने उस ख़्वाब की पूरी तफ़सील भी सुना दी, जिस जिस तौर से कि उसने देखा था. जबकि आपसे यह ख़्वाब पहले संक्षेप में बयान किया गया था. इससे बादशाह को बहुत आशचर्य हुआ. कहने लगा कि आपने मेरा ख़्वाब हु बहू बयान फ़रमा दिया. ख़्वाब तो अजीब था ही मगर आपका इस तरह बयान फ़रमा देना उससे भी ज़्यादा अजीब है, अब ताबीर इरशाद हो जाए, आपने ताबीर बयान फ़रमाने के बाद इरशाद फ़रमाया कि अब लाज़िम है कि ग़ल्ले जमा किए जाएं और इन ख़ुशहाली के सालों में कसरत से खेती कराई जाए और ग़ल्ले बालों के समेत सुरक्षित किये जाएं और जनता की पैदावार में से पांचवा हिस्स   लिया जाए, इसमें जो जमा होगा वह मिस्र और आसपास के प्रदेशों के रहने वालों के लिए काफी होगा और फिर ख़ल्के ख़ुदा  हर हर तरह  से तेरे पास ग़ल्ला खरीदने आएगी और तेरे यहाँ इतने खज़ाने और माल भंडार जमा होंगे जो तुझ से पहिलों के लिए जमा न हुए. बादशाह ने कहा यह इन्तिज़ाम कौन करेगा.

यूसुफ़ ने कहा मुझे ज़मीन के ख़जानों पर करदे, बेशक मैं हिफाज़त वाला इल्म वाला हूँ(11){55}
(11) यानी अपनी सल्तनत के सारे खजाने मेरे सुपुर्द कर दे, बादशाह  ने कहा, आप से ज़्यादा इसका  मुस्तहिक़ और कौन हो सकता है.उसने उसको मंजूर कर लिया. हदीस के मसाइल में सरदारी की तलब को मना फ़रमाया गया इसके मानी यह है कि जब मुल्क में योग्य और सक्षम लोग हों और अल्लाह के आदेशों का क़ायम रखना किसी एक शख़्स के साथ ख़ास न हो, उस वक़्त सरदारी तलब करना मकरूह है. लेकिन जब एक ही शख़्स योग्य और सक्षम हो तो उसको अल्लाह के अहकाम क़ायम करने के लिये इमारत यानी सरदारी तलब करना जायज़ बल्कि वाजिब है. हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम इसी हाल में थे. आप जानते थे कि सख़्त दुष्काल पड़ने वाले हैं जिसमें इन्सान को राहत और आसायश पहुंचाने का यही रास्ता है कि हुकूमत की बाग डोर को आप अपने हाथ में लें. इसलिये आपने सरदारी तलब फ़रमाई ज़ालिम बादशाह की तरफ़ से ओहदे क़ुबूल करना इन्साफ़ क़ायम करने के नियत से जायज़ है. अगर दीन के अहकाम का ज़ारी करना काफ़िर या फ़ासिक़ बादशाह की मदद के बिना   सम्भव न हो तो ऐसी सूरत में उससे सहायता लेना जायज़ है. अपनी ख़ूबियों का बयान घमण्ड और अहंकार के लिये नाज़ायज़ है. लेकिन दूसरों को नफ़ा पहुंचाने या ख़ल्क़ के अधिकारों की हिफ़ाज़त करने के लिये अगर इज़हार की जरूरत पेश आए तो मना नही. इसी लिये हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने बादशाह से फ़रमाया कि मैं हिफ़ाज़त और इल्म वाला हूँ.

और यूं ही हमने यूसुफ़ को उस मुल्क पर कुदरत बख़्शी, उसमें जहाँ चाहे रहे(12)
(12) सब उनके इस्तेमाल के तहत है. सरदारी तलब  करने के एक साल बाद राजा ने हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम को बुलाकर आपकी ताज की और तलवार और मुहर आपके सामने पेश की और आपको सोने के तख़्त पर बिठाया जिसमें जवाहिर जड़े हुए थे और अपना मुल्क आपके हाथ में दिया कि़तफ़ीर (अज़ीज़े मिस्र) को गदी से उतारकर आपको उसकी जगह रखा.सारे खज़ाने आपके मातहत कर दिये और ख़ुद आपकी रियाया की तरह हो गया की आपकी राय में दख़्ल न देता और आपके हर हुक्म को मानता.उसी ज़माने में अज़ीज़े मिस्र का इन्तिक़ाल  हो गया. बादशाह ने उसके मरने के बाद ज़ुलैखा का निकाह हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम के साथ कर दिया, जब यूसुफ  अलैहिस्सलाम ज़ुलैखा के पास पहुंचे और उससे फ़रमाया. क्या यह उससे बेहतर नहीं है जो तू चाहती थी.ज़ुलैखा ने अर्ज़ किया ऐ सिद्दीक़, मुझे मलामत न कीजिये. में ख़ुबसूरत थी, नौजवान न थी, ऐश में थी और अज़ीज़े मिस्र औरतों से ताल्लुक़ ही न रखता था.  आप को अल्लाह तआला ने हुस्न व जमाल अता किया है, मेरा दिल इख़्तियार से बाहर हो गया. अल्लाह तआला ने आपको महफ़ूज़ रखा है, आप महफ़ूज ही रहे. हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम ने ज़ुलैखा को अनछुई पाया और उससे आपके दो बेटे हुए. इफ़रासीम और मयसा और मिस्र में हुकूमत मजबूत हुई, आपने इन्साफ़ की बुनियादें कायम कीं. हर औरत और मर्द के दिल में आपकी मोहब्बत पैदा हुई और आपने दुष्काल के दिनों के लिये ग़ल्ले के भंडार जमा करने का तदबीर फ़रमाई . इसके लिए बड़े बड़े आलीशान भंडार ख़ाने बनवाये  और बहुत ज़्यादा जख़ीरे जमा किए, जब ख़ुशहाली के साल गुज़र गए और क़हत आैर सूखा का ज़माना आया तो आपने बादशाह आैर उसके ख़ादिमों के लिए रोज़ाना सिर्फ़ एक वक़्त का खाना मुक़र्रर फ़रमा दिया, एक रोज़  दोपहर के वक़्त बादशाह ने हज़रत से भूख की शिकायत की.आपने  फ़रमाया,  यह क़हत आैर दुश्काल की शुरुआत है पहले साल में लोगों के पास जो जख़ीरे थे सब ख़त्म हो गए, बाजार खाली हो गया.मिस्र वाले हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम से जिन्स खरीदने लगे और उनके सारे दिरहम दिनार आपके पास आ गए. दूसरे साल जेवर और जवाहीरात से ग़ल्ला  खरीदा और तमाम आपके पास आ गए. लोगों के पास जेवर और जवाहरात की किस्म से कोई चीज़ न रही. तीसरे साल चौपाए और जानवर देकर ग़ल्ले खरीदे और मुल्क में कोई किसी जानवर का मालिक न रहा. चौथे साल में ग़ल्ले के लिए तमाम गुलाम और दासियाँ बेच डालें. पांचवें साल सारी ज़मीनें और अमला और जागीरें बेचकर हज़रत से ग़ल्ला खरीदा और ये सारी चीजें हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम के पास पहुंच गई. छठे साल जब कुछ न रहा तो उन्होंने अपनी औलाद बेची इस तरह ग़ल्ले खरीद कर वक़्त गुज़ारा.सातवें साल वो लोग खुद बिक गए और गुलाम बन गए और मिस्र में कोई आज़ाद मर्द व औरी बाकी न रहा, जो मर्द था, वह हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम का गुलाम था, जो औरत थी वह आपकी दासी थी.लोगों की ज़बान पर था कि हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम की सी अज़मत व जलाल कभी किसी बादशाहराजा को हासिल नही हुआ. हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम ने बादशाह से कहा, तू ने देखा अल्लाह का मुझ पर कैसा करम है, उसने मुझ पर ऐसा अज़ीम एहसान फ़रमाया है.अब उनके हक़ में तेरी क्या राय है? बादशाह ने कहा जो हज़रत की राय,हम आपके फ़रमाबरदार हैं. आपने फ़रमाया में अल्लाह को गवाह करता हूँ और तुझ को गवाह करता हूं कि मैंने सारे मिस्र वासियों को आज़ाद कर दिया और उनके तमाम माल और  जागीरें वापस कर दीं. उस ज़माने में हज़रत ने कभी पेट भर खाना नहीं खाया. आपसे अर्ज़ किया गया कि इतने ज़बरदस्त खज़ानों के मालिक होकर  आप भूखे रहते हैं. फ़रमाया इस डर से कि पेट भर जाए तो कहीं भूखों को न भूल जाऊँ, सुब्हानल्लाह, क्या पाकीज़ा संस्कार हैं. मुफ़स्सिरीन फ़रमाते हैं कि मिस्र के सारे औरत और मर्द को हज़रत युसुफ़ अलैहिस्सलाम के खरीदे हुए गुलाम और दासियां बनाने में अल्लाह तआला की यह हिकमत थी कि किसी यह कहने का मौका न हो कि हज़रत युसुफ़ अलैहिस्सलाम गुलाम की शान में आए थे और मिस्र के एक व्यक्ति के खरीदे हुए हैं बल्कि सब मिस्री उनके खरीदे और आज़ाद किए हुए गुलाम हो. और हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम ने जो उस हालत में सब्र क्या यह उसका यह इनाम दिया गया.

हम अपनी रहमत (13)
(13) यानी मुल्क और दौलत या नबुव्वत.

जिसे चाहे पहुंचाएं और हम नेकों का नेग ज़ाया (नष्ट) नहीं करते{56} और बेशक आख़िरत का सवाब उनके लिये बेहतर जो ईमान लाए और परहेज़गार रहे(14){57}
(14) इससे साबित हुआ कि हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम के लिए आख़िरत का अज्र व सवाब उससे बहुत अफ़ज़ल व आला है, जो अल्लाह तआला ने उन्हें दुनिया में अता फ़रमाया. इब्ने ऐनिया ने कहा कि मूमिन अपनी नेकियों का फल दुनिया और आखिरत दोनों में पाता है और काफ़िर जो कुछ पाता है दुनिया ही में पाता है, आख़िरत में उसको कोई हिस्सा नहीं. मफ़स्सिरो ने बयान किया है कि जब दुष्काल और क़हत की तीव्रता बढ़ी और बला आम हो गई, तमाम प्रदेश सूखे की सख़्त मुसीबत में जकड़ गए और हर दिशा से लोग ग़ल्ला खरीदने के लिए मिस्र पहुंचने लगे, हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम किसी को एक ऊँट के बोझ से अधिक ज़्यादा ग़ल्ला नहीं देते थे ताकि बराबरी रहे और सब की मुसीबत दूर हो.क़हत  की जैसी मुसीबत मिस्र और सारे प्रदेश में आई ऐसी ही कनाआन में भी आई, उस वक़्त हज़रत यअकू़ब अलैहिस्सलाम ने बिन यामिन के सिवा अपने दसों बेटों को ग़ल्ला खरीदने मिस्र भेजा.

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