सूरए यूसुफ़ – चौथा रूकू

सूरए यूसुफ़ – चौथा रूकू
और शहर में कुछ औरतें बोली(1)
(1)  यानी मिस्र के शरीफ़ और प्रतिष्ठित लोगों की औरतें.

अज़ीज़ की बीवी अपने नौज़वान का दिल लुभाती है बेशक उनकी महब्बत दिल में पैर गई है हम तो उसे खुल्लमखुल्ला ख़ुद-रफ़्ता  पाते हैं(2){30}
(2) इस इश्क़ में उसको अपनी इज़्ज़त और पर्दे और शर्म का लिहाज़ भी न रहा.

तो जब ज़ुलैख़ा ने उनका चर्चा सुना तो उन औरतों को बुला भेजा(3)
(3) यानी जब उसने सुना कि मिस्र के शरीफ़ों की औरतें उसको हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की महब्बत पर मलामत करती हैं तो उसने चाहा कि वह अपना उज़्र उन्हें ज़ाहिर कर दे. इसलिये उसने उनकी दावत की और मिस्र के शरीफ़ों की चालीस औरतों को बुलाया. उनमें वो सब भी थीं जिन्होंने उसको बुरा भला कहा था. ज़ुलैख़ा ने उन औरतों को बहुत इज़्ज़त और सम्मान के साथ मेहमान बनाया.

और उनके लिये मसनदें तैयार की(4)
(4) अत्यन्त शान्दार जिनपर वो बहुत इज़्ज़त और आराम से तकिये लगा कर बैठीं और दस्तर ख़्वान बिछाए गए और किस्म किस्म के ख़ाने और मेवे चुने गए.

और उनमें हर एक को छुरी दी(5)
(5) ताकि खाने के लिये उससे गोश्त काटें और मेवे तराशें.

और यूसुफ़ (6)
(6) ….को उमदा लिबास पहना कर.

से कहा इनपर निकल आओ (7)
(7) पहले तो आप ने इन्कार किया लेकिन जब ज़्यादा ज़ोर डाला गया तो उसकी मुख़लिफ़त और दुश्मनी के अन्देशे से आप को आना ही पड़ा.

जब औरतों ने यूसुफ़ को देखा उसकी बड़ाई बोलने लगीं(8)
(8) क्योंकि उन्होंने इस सौंदर्य के साथ नबुव्वत और रिसालत के नूर और विनम्रता की निशानियों और शाहाना हैबत और इक़्तिदार और माया मोह और दुनिया की सुंदर चीज़ों की तरफ़ से बेनियाज़ी की शान देखी तो आशचर्य चकित रह गई और आपकी महानता और देहशत दिलों में भ्रर गई और आपकी ख़ुबसूरती ने ऐसा असर किया कि वह औरतें अपना आप भूल गई.

और अपने हाथ काट लिये(9)
(9) नींबू की बजाय. और दिल हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के साथ ऐसे मश्ग़ूल हुए कि हाथ काटने की तक़लीफ़ का ज़रा एहसास न हुआ.

और बोली अल्लाह को पाकी है ये तो आदमी जिन्स से नहीं(10)
(10) कि ऐसा सौंदर्य आदमी में देखा ही नहीं गया और उसके साथ नफ़्स की यह पाकी कि मिस्र के ऊंचे ख़ानदानों की ख़ूबसूरत औरतें अच्छे लिबासों और सिंगार तथा सजधज के साथ सामने मौजूद है और आप किसी की तरफ़ नज़र नहीं फ़रमाते और बिल्कुल रूख़ नहीं करते.

मगर कोई इज़्ज़त वाला फ़रिश्ता {31} ज़ुलैख़ा ने कहा तो ये है वो जिनपर तुम मुझे ताना देती थीं(11)
(11) अब तुमने देख लिया और तुम्हें मालूम हो गया कि मेरी दीवानगी कुछ आश्चर्य की और मलामत करने वाली बात नहीं है.

और बेशक मैंने इनका जी लुभाना चाहा तो इन्होंने अपने आपको बचाया(12)
(12) और किसी तरह मेरी तरफ़ न झुके. इसपर मिस्री औरतों ने हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम से कहा कि आप ज़ुलैख़ा का कहना मान लीजिये. ज़ुलैख़ा बोली.

और बेशक अगर वह यह काम न करेंगे जो मैं उनसे कहती हूँ तो ज़रूर क़ैद में पड़ेंगे और वो ज़रूर ज़िल्लत उठाएंगे(13){32}
(13) और चोरों और क़ातिलों और नाफ़रमानों के साथ जेल में रहेंगे क्योंकि उन्होंने मेरा दिल लिया और मेरी नाफ़रमानी की और वियोग की तलवार से मेरा ख़ून बहाया, तो यूसुफ़ को भी ख़ुशगवार ख़ाना पीना और आराम की नींद सोना नहीं मिलेगा, जैसा मैं जुदाई की तकलीफ़ों में मुसीबतें झेलती और सदमों में परेशानी के साथ वक़्त काटती हूँ. यह भी तो कुछ तकलीफ़ उठाएं. मेरे साथ मखमल में शाहाना बिस्तर पर ऐश गवारा नहीं तो क़ैद ख़ाने के चुभने वाले बोरिये पर नंगे बदन को दुखाना गवारा करें. हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम यह सुनकर मजलिस से उठ गए और मिस्री औरतें मलामत करने के बहाने से बाहर आई और एक एक ने आपसे अपनी इच्छाओ मुरादों का इज़हार किया. आपको उनकी बातें बहुत बुरी लगीं तो बारगाहे इलाही में. (ख़ाज़िन व मदारिक व हुसैनी)

यूसुफ़ ने अर्ज़ की ऐ मेरे रब मुझे क़ैद ख़ाना ज़्यादा पसन्द है इस काम से जिसकी तरफ़ ये मुझे बुलाती हैं और तू मुझसे इनका मक्र(छल-कपट) न फेरेगा(14)
(14) और अपनी इस्मत की पनाह में न लेगा.

तो मैं इनकी तरफ़ माइल (आकर्षित) होऊंगा और नादान बनूंगा{33} तो उसके रब ने उसकी सुन ली और उससे औरतों का मक्र(कपट)फेर दिया, बेशक वही सुनता जानता है(15){34}
(15) जब हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम से उम्मीद पूरी होने की कोई सूरत न देखी तो मिस्री  औरतों ने ज़ुलैख़ा से कहा कि अब यही मुनासिब मालूम होता है कि दो तीन दिन तक यूसुफ़ को क़ैद ख़ाने में रखा जाए ताकि वहाँ की सख़्तियाँ देखकर उन्हें नेअमत और राहत की क़द्र हो और वह तेरी दरख़्वास्त क़ुबूल करें. ज़ुलैख़ा ने इस राय को माना  और अज़ीज़ से कहा कि मैं इस इब्री ग़ुलाम की वजह से बदनाम हो गई हूँ. और मेरी तबीअत उससे नफ़रत करने लगी है. मुनासिब यह है कि उनको क़ैद किया जाए ताकि लोग समझ लें कि वह ख़तावार हैं और मैं मलामत से बरी हूँ. यह बात अज़ीज़ की समझ में आ गई.

फिर सब कुछ निशानियां देख दिखाकर पिछली मत उन्हें यही आई कि ज़रूर एक मुद्दत तक उसे क़ैद ख़ाने में डालें(16){35}
(16) चुनांचे उन्होंने ऐसा किया और आपको क़ैद ख़ाने में भेज दिया.

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One Response

  1. आदरणीय आदाब
    चिकागो के दीवान बाजार इकरा पुस्तक भंडार कुरान शारीफ ग्रंथ लाई जिसका अनुवाद हिंदी तजुर्मा में लाई और पढ़ का सुनाया तो इकरा पुस्तक वाले बहुत प्रसन्न हुए
    धन्यवाद के साथ गुड्डो दादी चिकागो से

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