सूरए हूद – आठवाँ रूकू

सूरए  हूद – आठवाँ रूकू

और  (1)
मदयन की तरफ़ उनके हमक़ौम शुऐब को (2)
कहा ऐ मेरी क़ौम अल्लाह को पूजों उसके सिवा तुम्हारा कोई मअबूद नहीं(3)
और नाप और तौल में कमी न करो बेशक मैं तुम्हें आसूदा हाल (ख़ुशहाल) देखता हूँ (4)
और मुझे तुमपर घेर लेने वाले दिन के अज़ाब का डर है(5){84}
और ऐ मेरी क़ौम नाप और तोल इन्साफ़ के साथ पूरी करो और लोगों को उनकी चीज़ें घटा कर न दो और ज़मीन में फ़साद मचाते न फिरो{85} अल्लाह का दिया जो बच रहे वह तुम्हारे लिये बेहतर है अगर तुम्हें यक़ीन हो(6)
और मैं कुछ तुमपर निगहबान नहीं(7){76}
बोले ऐ शुएब क्या तुम्हारी नमाज़ तुम्हें यह हुक्म देती है कि हम अपने बाप दादा के ख़ुदाओ को छोड़ दें(8)
या अपने माल में जो चाहे न करें(9)
हाँ जी तुम्हीं बड़े अक्लमन्द नेक चलन हो {87}
ऐ मेरी क़ौम भला बताओ तो अगर मैं अपने रब की तरफ़ से एक रौशन दलील पर हूँ (10)
और उसने मुझे अपने पास से अच्छी रोज़ी दी(11)
और में नहीं चाहता हूँ कि जिस बात से तुम्हें मना करता हूँ आप उसके ख़िलाफ़ करने लगूं (12)
मैं जहां तक बने संवारना ही चाहता हूँ, और  मेरी तौफ़ीक़ अल्लाह ही की तरफ़ से है, मैं ने उसी पर भरोसा किया और उसी की तरफ़ रूजू होता हूँ {88} और  ऐ मेरी क़ौम तुम्हें मेरी ज़िद यह न कमवा दे कि तूम पर पड़े जो पड़ा न था नूह की क़ौम या हूद की क़ौम या सालेह की क़ौम पर, और लूत की क़ौम तो कुछ तुम से दूर नहीं(13){89}
और  अपने रब से माफ़ी चाहो फिर उसकी तरफ़ रूजू लाओ, बेशक मेरा रब मेहरबान महब्बत वाला है(90) बोले ऐ शुएब हमारी समझ में नहीं आतीं तुम्हारी बहुत सी बातें और बेशक हम तुम्हें अपने में कमज़ोर देखते हैं(14)
और अगर तुम्हारा कुम्बा न होता(15)
तो हमने तुम्हें पथराव कर दिया होता और कुछ हमारी निगाह में तुम्हें इज़्ज़त नहीं {91}  कहा, ऐ मेरी क़ौम क्या तुमपर मेरे कुम्बे का दबाव अल्लाह से ज़्यादा है (16)
और उसे तुमने अपनी पीठ के पीछे डाल रखा (17)
बेशक जो कुछ तुम करते हो सब मेरे रब के बस में है{92} और ऐ क़ौम तुम अपनी जगह अपना काम किये जाओ मैं अपना काम करता हूँ, अब जाना चाहते हो किस पर आता है वह अज़ाब कि उसे रूस्वा करेगा और कौन झूटा है (18)
और  इन्तिज़ार करो (19)
मैं भी तुम्हारे साथ इन्तिज़ार में हूँ{93} और  जब (20)
हमारा हुक्म आया हमने शुऐब और उसके साथ के मुसलमानों को अपनी रहमत फ़रमाकर बचा लिया और  ज़ालिमों को चिंघाड़ ने आ लिया (21)
तो सुबह अपने घरों में घुटनों के बल पड़े रहे {94}
गोया कभी वहाँ बसे ही न थे, अरे दूर हों मदयन जैसे दूर हुए समूद (22){95}

तफ़सीर
सूरए हूद  – आठवाँ रूकू

(1) हमने भेजा मदयन शहर के निवासियों की तरफ़.

(2) आपने अपनी क़ौम से.

(3) पहले तो आपने तौहीद और इबादत की हिदायत फ़रमाई कि वो सारे कामों में सब से अहम है. उसके बाद जिन बुरी आदतों में वो जकड़े हुए थे उनसे मना फ़रमाया और इरशाद किया.

(4) ऐसे हाल में आदमी को चाहिये कि नेअमत की शुक्र गुज़ारी करे और दूसरों को अपने माल से फ़ायदा पहुंचाए,न कि उनके अधिकारों में कमी करें. ऐसी हालत में इस ख़यानत की आदत से डर है कि कहीं इस नेअमत से मेहरूम न कर दिये जाओ.

(5) कि जिससे किसी को रिहाई मयस्सर न हो और सब के सब हलाक हो जाएं. यह भी हो सकता है कि उस दिन के अज़ाब से आख़िरत का अज़ाब मुराद हो.

(6) यानी हराम माल छोड़ने के बाद हलाल जितना भी बचे वही तुम्हारे लिये बेहतर हे. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि पूरा तौलने और नापने के बाद जो बचे वह बेहतर है.

(7) कि तुम्हारे कर्मों पर पकड़ धकड़ करूं. उलमा ने फ़रमाया कि कुछ नबियों को जंग की इजाज़त थी, जेसे हज़रत मूसा, हज़रत दाऊद, हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम. कुछ वो थे जिन्हें लड़ने का हुक्म न था. हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम उन्हीं में से हैं. सारा दिन नसीहत फ़रमाते, उपदेश देते और सारी रात नमाज़ में गुज़ारते. क़ौम आप से कहती कि इस नमाज़ से आप को क्या फ़ायदा. आप फ़रमाते, नमाज़ अच्छाईयों का हुक्म देती है, बुराइयों से रोकती है. तो इसपर वो हंसी में यह कहते जो अगली आयत में आया है.

(8) मूर्ति पूजा न करें.

(9) मतलब यह था कि हम अपने माल के मालिक हैं, चाहे कम नापें चाहे कम तौलें.

(10) सूझबूझ और हिदायत पर.

(11) यानी नबुव्वत और रिसालत या हलाल माल और हिदायत व मअरिफ़त, तो यह कैसे हो सकता है कि मैं तुम्हें बुत परस्ती और गुनाहों से मना न करूं, क्योंकि नबी इसीलिये भेजे जाते हैं.

(12) इमाम फ़ख़रूद्दीन राज़ी अलैहिर्रहमत ने फ़रमाया कि क़ौम ने हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम के हिल्म और हिदायत वाला होने को स्वीकार किया था और उनका यह कलाम हंसी में न था, बल्कि मक़सद यह था कि आप हिल्म और महान बुद्विमत्ता के बावुज़ूद हमको अपने माल का अपनी मर्ज़ी के अनुसार  इस्तेमाल करने से क्यों रोकते हैं. इसका जवाब जो हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया उसका हासिल यह है कि जब तुम मेरी सूझ बूझ को मानते हो तो तुम्हें यह समझ लेना चाहिये कि मैं ने अपने लिये जो बात पसन्द की है वह वही होगी जो सब के लिये बेहतर हो, और वह ख़ुदा की तौहीद को मानना और नाप तौल में ख़यानत से दूर रहना है. मैं इसका पाबन्दी से आमिल हूँ तो तुम्हें समझ लेना चाहिये कि यही तरीक़ा बेहतर है.

(13) उन्हें कुछ ज़्यादा ज़माना नहीं गुज़रा है न कुछ दूर के रहने वाले थे तो उनके हाल से सबक़ पकड़ो.

(14) कि अगर हम आपके साथ कुछ ज़ियादती करें तो आपमें बचाव की ताक़त नहीं.

(15) जो दीन में हमारा साथी है और जिसको हम अज़ीज़ रखते हैं.

(16) कि अल्लाह के लिये  तो तुम मेरे क़त्ल से बाज़ न रहे और मेरे परिवार की वजह से बाज़ रहे और तुमने अल्लाह के नबी का तो ऐहतिराम न  किया और परिवार का सम्मान किया.

(17) और उसके हुक्म की कुछ परवाह न की.

(18) अपने दावों में. यानी तुम्हें जल्द मालूम हो जाएगा कि मैं सच्चाई पर हूँ या तुम, और  अल्लाह के अज़ाब से शक़ी की शक़ावत ज़ाहिर हो जाएगी.

(19)  आक़िबते-अम्र और अन्जामे-कार का.

(20) उनके अज़ाब और हलाक के लिये.

(21) हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम ने भयानक आवाज़ में कहा “मूतू जमीअन” यानी सब मर जाओ. इस आवाज़ की दहशत से उनके दम निकल गए और सब मर गए.

(22) अल्लाह की रहमत से, हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि कभी दो उम्मतें एक ही अज़ाब में नहीं जकड़ी गई. सिवाय हज़रत शुऐब और हज़रत सालेह अलैहुमस्सलाम की उम्मतों के. लेकिन हज़रत सालेह की क़ौम को उनके नीचे से भयानक आवाज़ ने हलाक किया और हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम की क़ौम को ऊपर से.

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सूरए हूद – नवाँ रूकू

सूरए  हूद – नवाँ रूकू

बेशक हमने मूसा को अपनी आयतों  (1)
और साफ़ ग़लबे के साथ {96}फ़िरऔन और उसके दरबारियों की तरफ़ भेजा तो वो फ़िरऔन के कहने पर चले (2)
और फ़िरऔन का काम रास्ती का न था(3){97}
अपनी क़ौम के आगे होगा क़यामत के दिन तो उन्हें दोज़ख़ में ला उतारेगा(4)
और वह क्या ही बुरा घाट उतरने का{98} और उनके पीछे पड़ी इस जगत में लअनत और क़यामत के दिन(5)
क्या ही बुरा इनाम जो उन्हें मिला{99} ये बस्तियों (6)
की ख़बरें हें कि हम तुम्हें सुनाते हैं (7)
इनमें कोई खड़ी है (8)
और कोई कट गई (9){100}
और हमने उनपर ज़ुल्म न किया बल्कि ख़ुद उन्होंने (10)
अपना बुरा किया तो उनके मअबूद जिन्हें(11)
अल्लाह के सिवा पूजते थे उनके कुछ काम न आए (12)
जब तुम्हारे रब का हुक्म आया और उनसे (13)
उन्हें हलाक के सिवा कुछ न बढ़ा {101}  और ऐसी ही पकड़ है तेरे रब की जब बस्तियों को पकड़ता है उनके ज़ुल्म  पर बेशक उसकी पकड़ दर्दनाक करीं हैं (14) {102} 
बेशक इसमें निशानी (15)
है उसके लिये जो आख़िरत के अज़ाब से डरे, वह दिन है जिसमें सब लोग (16)
इकट्ठे होंगे और वह दिन हाज़िरी का है (17){103}
और हम उसे (18)
पीछे नहीं हटाते मगर एक गिनी हुई मुद्दत के लिये (19){104}
जब वह दिन आएगा कोई ख़ुदा के हुकुम बिना बात न करेगा(20)
तो उन में कोई बदबख़्त है और कोई ख़ुशनसीब {105} तो वह जो बदबख़्त है वो तो दोज़ख़ में हैं वो उसमें गधे की तरह रेकेंगे{106} वो उसमें रहेंगे जब तक आसमान व ज़मीन रहें मगर जितना तुम्हारे रब ने चाहा (22)
बेशक तुम्हारा रब जो चाहे करे {107} और वह ख़ुशनसीब हुए वो जन्नत में हैं हमेशा उसमें रहेंगे. जब तक आसमान व ज़मीन रहें मगर जितना तुम्हारे रब ने चाहा (23)
यह बख़्शिश है कभी ख़त्म न होगी {108}  तो ऐ सुनने वाले धोखे में न पड़ उससे जिसे ये काफ़िर पूजते है(24)
ये वैसा ही पूजते है जैसा पहले इनके बाप दादा पूजते थे (25)
और बेशक हम उनका हिस्सा उन्हें पूरा फेर देंगे जिसमें कमी न होगी {109}

तफ़सीर
सूरए हूद – नवा रूकू

(1) और कुफ़्र में जकड़ गए और मूसा अलैहिस्सलाम पर ईमान न लाए.

(2) वह खुली गुमराही में था, क्योंकि बशर होने के बावुज़ूद ख़ुदाई का दावा करता था और खुल्लमखुल्ला ऐसे अत्याचार करता था जिसका शैतानी काम होना ज़ाहिर और यक़ीनी था. वह कहाँ और ख़ुदाई कहाँ. और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के साथ हिदायत और सच्चाई थी. आपकी सच्चाई की दलीलों, खुली आयतों और चमत्कारों को वो लोग देख चुके थे, फिर भी उन्होंने आपके अनुकरण से मुंह फेरा और ऐसे गुमराह का अनुकरण किया. तो जब वह दुनिया में कुफ़्र और गुमराही में अपनी क़ौम का पेशवा था. ऐसे ही जहन्नम में उनका इमाम होगा और.

(4) जैसा कि उन्हें नील नदी में ला डाला था.

(5) यानी दुनिया में भी मलऊन और आख़िरत में भी लअनत में जकड़े.

(6) यानी गुज़री हुई उम्मतें.

(7) कि तुम अपनी उम्मतों को उनकी ,ख़बरें दो ताकि वो सबक़ पकड़े. उन बस्तियों की हालत खेतियों की तरह है कि.

(8) उसके मकानों की दीवारें मौजूद हैं. खंडहर पाए जाते हैं. निशान बाक़ी है जैसे कि आद व समूद के इलाके.

(9) यानी कटी हुई  खेती की तरह बिल्कुल बेनामों निशान हो गई और उसका कोई चिन्ह बाक़ी न रहा जैसे कि नूह अलैहिस्सलाम की क़ौम के इलाक़े.

(10) कुफ़्र और गुमराही से.

(11) जिहालत और गुमराही से.

(12) और एक कण अज़ाब दूर न कर सके.

(13) बुतों और झूटे मअबूदों.

(14) तो हर अत्याचारी को चाहिये कि इन वाक़िआत से सबक़ सीखे और तौबह में जल्दी करें.

(15) सबक़ और नसीहत.

(16) अगले पिछले हिसाब के लिये.

(17) जिसमें आसमान वाले और ज़मीन वाले सब हाज़िर होंगे.

(18) यानी क़यामत के दिन.

(19) यानी जो मुद्दत हमने दुनिया के बाक़ी रहने की निश्चित की है उसके ख़त्म होने तक.

(20) तमाम सृष्टि साकित अर्थात ख़ामोश होगी. क़यामत का दिन बहुत लम्बा होगा. इसमें अहवाल अलग अलग होंगे. कुछ हालतों में हैबत की सख्ती से किसी को अल्लाह की आज्ञा के बिना बात ज़बान पर लाने की क़ुदरत न होगी. और कुछ हालतों में आज्ञा दी जाएगी कि लोग कलाम करेंगे और कुछ हालतों में हौल और दहशत कम होगी. उस वक़्त लोग अपने मामलों में झगड़ेंगे और अपने मुक़दमे पेश करेंगे.

(21) शफ़ीक़ बल्ख़ी रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया, ख़ुशनसीबी या सआदत की पाँच निशानियाँ हैं (1) दिल की नर्मी (2) रोने की कसरत (3)  दुनिया से नफ़रत (4) उम्मीदों का छोटा होना  (5) लज्जा या हया और बदबख़्ती यानी दुर्भाग्य की निशानियाँ भी पाँच है (1) दिल की सख़्ती (2)आंख की खुश्की (3) दुनिया की रग़बत(4) बड़ी बड़ी उम्मीदें (5) बेहयाई

(22) इतना और ज़्यादा रहेंगे, और इस ज़ियादती का कोई अन्त नहीं. तो मानी ये हुए कि हमेशा रहेंगे, कभी इससे रिहाई न पांएगे. (तफ़सीरे जलालैन)

(23) इतना और ज़्यादा रहेंगे और इस ज़ियादती की कोई हद नहीं. इसे हमेशागी मुराद है. चुनांचे इरशाद फ़रमाता है.

(24) बेशक यह उस बुत परस्ती पर अज़ाब दिये जाएंगे जैसे कि पहली उम्मतें अज़ाब में जकड़ी गई.

(25) और तुम्हें मालूम हो चुका कि उनका अंजाम क्या होगा.

सूरए हूद – दसवाँ रूकू

सूरए  हूद – दसवाँ रूकू

और बेशक हमने मूसा को किताब दी(1)
तो उसमें फुट पड़ गई(2)
अगर तुम्हारे रब की एक बात(3)
पहले न हो चुकी होती तो जभी उनका फ़ैसला कर दिया जाता(4)
और बेशक वो उसक तरफ़ से (5)
धोखा डालने वाले शक में हैं(6){110}
और बेशक जितने हैं (7)
एक एक को तुम्हारा रब उसका अमल पूरा भर देगा, उसे उन कामों की ख़बर है(8)(111)
तो क़ायम रहो(9)
जैसा तुम्हें हुक्म है और जो तुम्हारे साथ रूजू लाया है (10)
और ऐ लोगो सरगोशी (कानाफूसी) न करो, बेशक वह तुम्हारे काम देख रहा है {112}  और ज़ालिमों की तरफ़ न झुको कि तुम्हें आग छुएगी(11)
और अल्लाह के सिवा तुम्हारा कोई हिमायती नहीं (12)
फिर मदद न पाओगे {113} और नमाज़ क़ायम रखो दिन के दोनों किनारों(13)
और कुछ रात के हिस्से में (14)
बेशक नेकियाँ बुराइयों को मिटा देती हैं (15)
यह नसीहत है नसीहत मानने वालों को {114} और सब्र करो कि अल्लाह नेकों का नेग नष्ट नहीं करता {115}  तो क्यों न हुए तुम से अगली संगतों में (16)
ऐसे जिन में भलाई का कुछ हिस्सा लगा रहा होता कि ज़मीन में फ़साद से रोकते (17)
हाँ उनमें थोड़े थे वही जिनको हमने निजात दी(18)
और ज़ालिम उसी ऐश के पीछे पड़े रहे जो उन्हें दिया गया (19)
और वो गुनहगार थे {116} और तुम्हारा रब ऐसा नहीं कि बस्तियों को बे वजह हलाक कर दे और उनके लोग अच्छे हों {117}  और अगर तुम्हारा रब चाहता तो सब आदमियों को एक ही उम्मत कर देता (20)
और वो हमेशा इख़्तिलाफ़ में रहेंगे (21){118}
मगर जिन पर तुम्हारे रब ने रहम किया (22)
और लोग उसी लिये बनाए हैं (23)
और तुम्हारे रब की बात पूरी हो चुकी कि बेशक ज़रूर जहन्नम भर दूंगा जिन्नों और आदमियों को मिला कर (24) {119}
और सब कुछ हम तुम्हें रसूलों की ख़बरें सुनाते हैं जिस से तुम्हारा दिल ठहराएं (25)
और उस सूरत में तुम्हारे पास हक़ आया (26)
और मुसलमानों को पन्द (उपदेश) व नसीहत (27) {120}
और काफ़िरों से फ़रमाओ तुम अपनी जगह काम किये जाओ(28)
हम अपना काम करते हैं (29){121}
और राह देखो, हम भी राह देखते हैं (30){122}
और  अल्लाह ही के लिये हैं आसमानों और ज़मीन के ग़ैब (31)
और उसी की तरफ़ सब कामों की रूजू है तो उसकी बन्दगी करो और उसपर भरोसा रखो, और तुम्हारा रब तुम्हारे कामों से गाफ़िल नहीं {123}

तफ़सीर
सूरए हूद – दसवाँ रूकू

(1) यानी तौरात.

(2) कुछ उसपर ईमान लाए  और कुछ ने कुफ़्र किया.

(3) कि उनके हिसाब में जल्दी न फ़रमाएगा. मख़लूक के हिसाब और बदले का दिन क़यामत का दिन है.

(4) और दुनिया ही में अज़ाब में जकड़े जाते.

(5) यानी आपकी उम्मत के काफ़िर क़ुरआने करीम की तरफ़ से.

(6) जिसने उनकी अक़्लों को हैरान कर दिया.

(7) तमाम ख़ल्क़, तस्दीक़ करने वाले हों या झुटलाने वाले, क़यामत के दिन.

(8) उसपर कुछ छुपा हुआ नहीं. इसमें नेकियों और तस्दीक़ करने वालों के लिये तो ख़ुशख़बरी है कि वो नेक का बदला पाएंगे और काफ़िरों और झुटलाने वालों के लिये फटकार है कि वो अपने कर्मों की सज़ा में गिरफ़्तार होंगे.

(9) अपने रब के हुक्म और उसके दीन की दावत पर.

(10) और उसने तुम्हारा दीन क़ुबूल किया है. वो दीन और फ़रमाँबरदारी पर क़ायम रहे. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है, सुफ़ियान बिन अब्दुल्लाह सक़फ़ी ने रसूले करीम सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से अर्ज़ किया कि मुझे दीन में एक ऐसी बात बता दीजिये कि फिर किसी से पूछने की हाजत न रहे. फ़रमाया “आमन्तो बिल्लाह” कह और क़ायम रह.

(11) किसी की तरफ़ झुकना उसके साथ मेल महब्बत रखने को कहते है. अबुल आलिया ने कहा कि मानी ये हैं कि ज़ालिमों के कर्मों से राज़ी न हो. सदी ने कहा उनके साथ उठना बैठना न रखो. क़तादा ने कहा मुश्रिकों से न मिलो. इससे मालूम हुआ कि ख़ुदा के नाफ़रमानों के साथ यानी काफ़िरों, बेदीनों और गुमराहों के साथ मेल जोल रिश्तेदारी सहयोग और महब्बत उनकी हाँ में हाँ मिलाना, उनकी ख़ुशामद में रहना वर्जित है.

(12) कि तुम्हें उसके अज़ाब से बचा सके. यह हाल तो उनका है जो ज़ालिमों से मेल जोल और महब्बत रखें और इसीसे उनके  हाल का अन्दाज़ा लगाया जा सकता है जो ख़ुद ज़ालिम हैं.

(13) दिन के दो किनारों से सुबह शाम मुराद हैं. ज़वाल से पहले का वक़्त सुबह में और बाद का शाम में दाख़िल है. सुब्ह की नमाज़ फ़ज्र और शाम की नमाज़ ज़ौहर और अस्र है.

(14) और रात के हिस्सों की नमाज़ें मग़रिब और इशा है.

(15) नेकियों से मुराद या यही पंजगाना नमाज़ें हैं जो आयत में बयान हुई या मुतलक़ ताअतें या ” सुब्हानल्लाहे वल हम्दु लिल्लाहे वला इलाहा इल्लल्लाहो वल्लाहो अक़बर” पढ़ना. आयत से मालूम हुआ कि नेकियाँ छोटे मोटे गुनाहों के लिये कफ़्फ़ारा होती है चाहे वो नेकियाँ नमाज़ हो या सदक़ा या ज़िक्र या इस्तग़फ़ार या कुछ और. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है कि पाँचों नमाज़ें और जुमुआ दूसरे जुमुए तक और एक रिवायत में है कि एक रमज़ान से दूसरे रमज़ान तक, ये सब क़फ़्फ़ारा हैं उन गुनाहों के लिये जो इनके बीच हों जब कि आदमी बड़े गुनाहों से बचे. एक शख़्स ने किसी औरत को देखा और उससे कोई ख़फ़ीफ़ यानी मामूली सी हरकत बेहिजाबी की सरज़द हुई उसपर वह शर्मिन्दा हुआ और रसूले करीम सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर होकर अपना हाल अर्ज़ किया इसपर यह आयत उतरी. उस शख़्स ने अर्ज़ किया कि छोटे गुनाहों के लिये नेकियों का कफ़्फ़ारा होना क्या ख़ास मेरे लिये है. फ़रमाया, नहीं सब के लिये.

(16) यानी पहली उम्मतों में जो हलाक की गई.

(17) मानी ये है कि उन उम्मतों में ऐसे नेकी वाले नहीं हुए जो लोगों को ज़मीन में फ़साद करने से रोकते और गुनाहों से मना करते, इसीलिये हमने उन्हें हलाक कर दिया.

(18)  वो नबियों पर ईमान लाए और उनके अहकाम पर फ़रमाँबरदार रहे और लागों को फ़साद से रोकते रहे.

(19)  और नेअमतों, लज़ीज़ चीज़ों और ख़्वाहिशात और वासनाओं के आदी हो गए और कुफ़्र व गुमराही में डूबे रहे.

(20) तो सब एक दीन पर होते.

(21)  कोई किसी दीन पर कोई किसी पर.

(22) वो सच्चे दीन पर सहमत रहेंगे और उसमें इख़्तिलाफ़ न करेंगे.

(23) यानी इख़्तिलाफ़ वाले इख़्तिलाफ़ के लिये और रहमत वाले सहमति के लिये.

(24) क्योंकि उसको इल्म है कि बातिल के इख़्तियार करने वाले बहुत होंगे.

(25) और नबियों के हाल और उनकी उम्मतों के सुलूक देखकर आपको अपनी क़ौम की तकलीफ़ का बर्दाश्त करना और उस पर सब्र फ़रमाना आसान हो.

(26) और नबियों और उनकी उम्मतों के तज़किरे वाक़ए के अनुसार बयान हुए जो दूसरी किताबों और दूसरे लोगों को हासिल नहीं यानी जो  वाक़िआत बयान फ़रमाए गए वो हक़ भी है.

(27) ….भी कि गुज़री हुई उम्मतों के हालात और उनके अंजाम से सबक़ पकड़े.

(28) बहुत जल्द उसका नतीज़ा पा जाओगे.

(29) जिसका हमें हमारे रब ने हुक्म दिया.

(30) तुम्हारे अंजामेकार यानी अन्त की.

(31) उससे कुछ छुपा नहीं सकता.