सूरए हूद

11 सूरए  हूद

सूरए हूद मक्का में उतरी, इसमें 123 आयतें और दस रूकू हैं.

पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान, रहमत वाला(1)

यह एक किताब है जिसकी आयतें हिकमत (बोध) भरी हैं (2)
फिर तफ़सील की गईं(3)
हिकमत वाले ख़बरदार की तरफ़ से {1} कि बन्दगी न करो मगर अल्लाह की, बेशक मैं तुम्हारे लिये उसकी तरफ़ से डर और ख़ुशी सुनाने वाला हूँ {2} और यह कि अपने रब से माफ़ी मांगो फिर उसकी तरफ़ तौबह करो, तुम्हें बहुत अच्छा बरतना देगा(4)
एक ठहराए वादे तक और हर फ़ज़ीलत (प्रतिष्ठा) वाले को(5)
उसका फ़ज़्ल (अनुकम्पा) पहुंचाएगा(6)
और अगर मुंह फेरो तो तुमपर बड़े दिन (7)
के अज़ाब का ख़ौफ़ करता हूँ {3} तुम्हें अल्लाह ही की तरफ़ फिरना है (8)
और वह हर चीज़ पर क़ादिर {शक्तिमान} है(9){4}
सुनो वो अपने सीने दोहरे करते हैं कि अल्लाह से पर्दा करें  (10)
सुनो जिस वक़्त वो अपने कपड़ों से सारा बदन ढांप लेते हैं उस वक़्त भी अल्लाह उनका छुपा और ज़ाहिर सब कुछ जानता है, बेशक वह दिलों की बात जानने वाला है{5}
पारा 12
सूरए हूद पहला रूकू जारी
और ज़मीन पर चलने वाला कोई (11)
ऐसा नहीं जिसका रिज़्क़ (रोज़ी) अल्लाह के करम के ज़िम्मे पर न हो  (12)
और जानता है कि कहाँ ठहरेगा (13)
और कहाँ सुपुर्द होगा(14)
सब कुछ एक साफ़ बयान करने वाली किताब (15)
में है{6} और वही है जिसने आसमानों और ज़मीन को छ दिन में बनाया और उसका अर्श पानी पर था(16)
कि तुम्हें आज़माए(17)
तुम में किस का काम अच्छा है और अगर तुम फ़रमाओ कि बेशक तुम मरने के बाद उठाए जाओगे तो काफ़िर ज़रूर कहेंगे कि यह (18)
तो नहीं मगर खुला जादू(19){7}
और अगर हम उनसे अज़ाब (20)
कुछ गिनती की मुद्दत तक हटा दें तो ज़रूर कहेंगे किस चीज़ ने रोका है (21)
सुन लो जिस दिन उनपर आएगा उनसे फेरा न जाएगा और उन्हें घेरेगा वही अज़ाब जिसकी हंसी उड़ाते थे(8)

तफ़सीर
सूरए हूद – पहला रूकू

(1) सूरए हूद मक्की है. हसन व अकरमह वग़ैरह मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि आयत “व अक़िमिस्सलाता तरफ़यिन्नहारे” के सिवा बाक़ी सारी सूरत मक्की हैं. मक़ातिल ने कहा कि आयत “फ़लअल्लका तारिकुन” और “उलाइका यूमिनूना बिही” और “इन्नल हसनाते युज़हिब्नस सैय्यिआते” के अलावा सारी सूरत मक्की है. इसमें दस रूकू, 123 आयतें, एक हज़ार छ सौ कलिमे और नौ हज़ार पांच सौ सड़सठ अक्षर हैं. हदीस में है सहाबा ने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, हुज़ूर पर बुढ़ापे के आसार दिखने लगे. फ़रमाया, मुझे सूरए हूद, सूरए वाक़िआ, सूरए अम्मा यतसाअलून और सूरए इज़श -शम्से कुव्विरत ने बूढा कर दिया (तिरमिज़ी). सम्भवत: यह इस वजह से फ़रमाया कि इन सूरतों में क़यामत और मरने के बाद उठाए जाने और हिसाब किताब होने और जन्नत व दोज़ख़ का बयान है.

(2) जैसा कि दूसरी आयत में इरशाद हुआ “तिल्का आयातुल किताबिल हकीम” (यह हिकमत वाली किताब की आयतें हैं- 10:1 ) कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया “उहकिमत” (हिकमत से भरी) के मानी ये हैं कि उनकी नज़्म मोहकम और उस्तुवार की गई. इस सूरत में मानी ये होंगे कि इस में कोई ख़ामी राह पा ही नहीं सकती. वह बिनाए मोहकम है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि कोई किताब इनकी नासिख़ नहीं, जैसा कि ये दूसरी किताबों और शरीअतों की नासिख़ हैं.

(3) और सूरत सूरत और आयत आयत अलग अलग ज़िक्र की गई या अलग अलग उतारी गई या अक़ीदे,अहकाम, नसीहतें, क़िस्से और ग़ैबी ख़बरें इन में तफ़सील और विस्तार से बयान फ़रमाई गई.

(4) लम्बी उम्र और भरपूर राहत वे ऐश और बहुत सा रिज़्क़. इससे मालूम हुआ कि सच्चे दिल से तौबह व इस्तग़फ़ार करना उम्र लम्बी होने और आजिविका में विस्तार होने के लिये बेहतरीन अमल है.

(5) जिसने दुनिया में अच्छे कर्म किये हो उसकी फ़रमाँबरदारियाँ और नेकियाँ ज़्यादा हों.

(6) उसको जन्नत में कर्मों के हिसाब से दर्जे अता फ़रमाएगा. कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा आयत के मानी यह हैं कि जिसने अल्लाह के लिये अमल किया, अल्लाह तआला आयन्दा के लिये उसे नेक कर्म और फ़रमाँबरदारी की तौफ़ीक देता है.

(7) यानी क़यामत के दिन.

(8)  आख़िरत में वहाँ नेकियों का इनाम और बुराइयों की सज़ा मिलेगी.

(9) दुनिया में रोज़ी देने पर भी. मौत देने पर भी, मौत के बाद ज़िन्दा करने और सवाब व अज़ाब पर भी.

(10) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया, यह आयत अख़नस बिन शरीक़ के बारे में उतरी. यह बहुत मीठा बोलने वाला व्यक्ति था. रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सामने आता तो बहुत ख़ुशामद की बातें करता और दिल में दुश्मनी छुपाए रखता. इसपर यह आयत उतरी. मानी ये हैं कि वो अपने सीनों में दुश्मनी छुपाए रखते हैं जैसे कपड़े की तह में कोई चीज़ छुपाई जाती है. एक क़ौल यह है कि कुछ दोहरी प्रवृति वालों की आदत थी कि जब रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का सामना होता तो सीना और पीठ झुकाते और सर नीचा करते, चेहरा छुपा लेते ताकि उन्हें हुज़ूर देख न पाएं. इसपर यह आयत उतरी. बुख़ारी ने इन लोगों में एक हदीस रिवायत की कि मुसलमान पेशाब पाख़ाने और हमबिस्तरी के वक़्त अपने बदन खोलने से शरमाते थे. उनके हक़ में यह आयत उतरी कि अल्लाह से बन्दे का कोई हाल छुपा ही नहीं है लिहाज़ा चाहिये कि वह शरीअत की इजाज़तों पर अमल करता रहे.

पारा ग्याराह समाप्त

(11) जानदार हो.

(12) यानी वह अपनी कृपा से हर जानदार की आजीविका की देखभाल करता है.

(13) यानी उसके रहने की जगह को जानता है.

(14) सुपुर्द होने की जगह से, या दफ़्न होने का स्थान मुराद है, या मकान या मौत या क़ब्र.

(15) यानी लौहे महफ़ूज़.

(16) यानी अर्श के नीचे पानी के सिवा और कोई मख़लूक़ न थी. इससे यह भी मालूम हुआ कि अर्श और पानी आसमानों और ज़मीनों की पैदायश से पहले पैदा फ़रमाए गए.

(17) यानी आसमान व ज़मीन और उनके बीच सृष्टि को पैदा किया, जिसमें तुम्हारे फ़ायदे और मसलिहत हैं ताकि तुम्हें आज़माइश में डाले और ज़ाहिर हो कि कौन शुक्र गुज़ार तक़वा वाला फ़रमाग्बरदार है और..

(18) यानी क़ुरआन शरीफ़ जिस में मरने के बाद उठाए जाने का बयान है यह.

(19) यानी झूट और धोख़ा.

(20) जिसका वादा किया है.

(21) वह अज़ाब क्यों नहीं उतरता, क्या देर है. काफ़िरों का यह जल्दी करना झुटलाने और हंसी बनाने के तौर पर है.

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