सूरए हूद – तीसरा रूकू

सूरए  हूद – तीसरा रूकू

और बेशक हमने नूह को उसकी क़ौम की तरफ़ भेजा(1)
कि मैं तुम्हारे लिये साफ़ डर सुनाने वाला हूँ {25} कि अल्लाह के सिवा किसी को न पूजो बेशक मैं तुमपर एक मुसीबत वाले दिन के अज़ाब से डरता हूँ(2){26}
तो उसकी क़ौम के सरदार जो काफ़िर हुए थे बोले हम तो तुम्हें अपने ही जैसा आदमी देखते हैं (3)
और हम नहीं देखते कि तुम्हारी पैरवी (अनुकरण) किसी ने की हो मगर हमारे कमीनों (4)
सरसरी नज़र से (5)
और हम तुम में अपने ऊपर कोई बड़ाई नहीं पाते(6)
बल्कि हम तुम्हें (7)
झूटा ख़याल करते हैं {27} बोला ऐ मेरी क़ौम भला बताओ तो अगर मैं अपने रब की तरफ़ से दलील पर हूँ (8)
और उसने मुझे अपने पास से रहमत बख़्शी (9)
तो तुम उससे अंधे रहे, क्या हम उसे तुम्हारे गले चपेट दें और तुम बेज़ार हो (10){28}
और ऐ क़ौम मैं तुमसे कुछ इसपर (11)
माल नहीं मांगता (12)
मेरा अज़्र तो अल्लाह ही पर है और मैं मुसलमानों को दूर करने वाला नहीं (13)
बेशक वो अपने रब से मिलने वाले हैं (14)
लेकिन मैं तुमको निरे जाहिल लोग पाता हूँ (15){29}
और ऐ क़ौम मुझे अल्लाह से कौन बचा लेगा अगर मैं उन्हें दूर करूंगा, तो क्या तुम्हें ध्यान नहीं {30} और मैं तुम से नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़जाने हैं और न यह कि मैं ग़ैब (अज्ञात) जान लेता हूँ और न यह कहता हूँ कि मैं फ़रिश्ता हूँ (16)
और मैं उन्हें नहीं कहता जिनको तुम्हारी निगाहें हक़ीर (तुच्छ) समझती हैं कि हरगिज़ उन्हें अल्लाह कोई भलाई न देगा, अल्लाह ख़ूब जानता है जो उनके दिलों में है (17)
ऐसा करूं (18)
तो ज़रूर मैं ज़ालिमों में से हूँ (19){31}
बोले ऐ नूह हम से झगड़े और बहुत ही झगड़े तो लेआओ जिसका (20)
हमें वादा दे रहे हो अगर तुम सच्चे हो {32} बोला वह तो अल्लाह तुमपर लाएगा अगर चाहे और तुम थका न सकोगे (21){33}
और तुम्हें मेरी नसीहत नफ़ा न देगी अगर मैं तुम्हारा भला चाहूँ जबकि अल्लाह तुम्हारी गुमराही चाहे, वह तुम्हारा रब है और उसी की तरफ़ फिरोगे(22){34}
क्या ये कहते हैं कि इन्होंने उसे अपने जी से बना लिया (23)
तुम फ़रमाओ अगर मैं ने बना लिया होगा तो मेरा गुनाह मुझ पर है (24)
और मैं तुम्हारे गुनाह से अलग हूँ {35}

तफ़सीर
सूरए  हूद – तीसरा रूकू

(1) उन्होंने क़ौम से फ़रमाया.

(2) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि हज़रत नूह अलैहिस्सलाम चालीस साल के बाद नबी बनाए गए और नौ सौ पचास साल अपनी क़ौम को दावत फ़रमाते रहे और तूफ़ान के बाद साठ बरस दुनिया में रहे़, तो आपकी उम्र एक हज़ार पचास साल की हुई. इसके अलावा उम्र शरीफ़ के बारे में और भी क़ौल हैं (ख़ाज़िन)

(3) इस गुमराही में बहुत सी उम्मतें पड़ कर. इस्लाम में भी बहुत से बदनसीब सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को बशर कहते हैं और हमसरी और बराबरी का फ़ासिद ख़याल रखते हैं. अल्लाह तआला उन्हें गुमराही से बचाए.

(4) कमीनों से मुराद उनकी, वो लोग थे जो उनकी नज़र में छोटे पेशे रखते थे. हक़ीक़त यह है कि उनका यह क़ौल ख़ालिस जिहालत था, क्योंकि इन्सान का मर्तबा दीन के पालन और रसूल की फ़रमाँबरदारी से है. माल, मन्सब और पेशे को इसमें दख़ल नहीं. दीनदार, नेक सीरत, पेशावर को हिक़ारत से देखना और तुच्छ समझना जिहालत का काम है.

(5) यानी बग़ैर ग़ौरों फ़िक्र के.

(6) माल और रियासत में, उनका यह क़ौल भी जिहालत भरा था, क्योंकि अल्लाह के नज़दीक बन्दे के लिये ईमान और फ़रमाँबरदारी बुज़ु्र्गी का कारण है, न कि माल और रियासत.

(7) नबुव्वत के दावे में और तुम्हारे मानने वालों को इसकी तस्दीक़ में.

(8) जो मेरे दावे की सच्चाई पर गवाह हो.

(9) यानी नबुव्वत अता की.

(10)  और हुज्जत या तर्क को नापसन्द रखते हो.

(11) यानी तबलीग़े रिसालत पर.

(12) कि तुमपर इसका अदा करना बोझ हो.

(13) यह हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने उनकी उस बात के जवाब में फ़रमाया था जो लोग कहते थे कि ऐ नूह, नीचे लोगों को अपनी बैठक से निकाल दीजिये, ताकि हमें आपकी मजलिस में बैठने से शर्म न आए.

(14) और उसके क़ुर्ब से फ़ायज़ होंगे तो मैं उन्हें कैसे निकाल दूँ.

(15) ईमानदारों को नीच कहते हो और उनकी क़द्र नहीं करते और नहीं जानते कि तुम से बेहतर है.

(16) हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की क़ौम ने आपकी नबुव्वत में तीन संदेह किये थे. एक शुबह तो यह कि “मा नरा लकुम अलैना मिन फ़दलिन” कि हम तुम में अपने ऊपर कोई बड़ाई नहीं पाते. यानी तुम माल दौलत में हमसे ज़्यादा नहीं हो. इसके जवाब में हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया “ला अक़ूलो लकुम इन्दी ख़ज़ाइनुल्लाह” यानी मैं तुमसे नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं. तो तुम्हारा यह ऐतिराज़ बिल्कुल बे बुनियाद है. मैंने कभी माल की फ़ज़ीलत नहीं जताई और दुनिया की दौलत की तुम को आशा नहीं दिलाई और अपनी दावत को माल के साथ नहीं जोड़ा. फिर तुम यह कैसे कह सकते हो कि हम तुम में कोई माली फ़ज़ीलत नहीं पाते. और तुम्हारा यह ऐतिराज़ बिल्कुल बेहूदा है. दूसरा शुबह क़ौमे नूह ने यह किया था “मा नराकत तबअका इल्लल लज़ीना हुम अराज़िलुना बादियर राये” यानी हम नहीं देखते कि तुम्हारी किसी ने पैरवी की हो मगर हमारे कमीनों ने. सरसरी नज़र से मतलब यह था कि वो भी सिर्फ़ ज़ाहिर में मूमिन हैं, बातिन में नहीं. इसके जवाब में हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने यह फ़रमाया कि मैं नहीं कहता कि मैं ग़ैब जानता हूँ तो मेरे अहकाम ग़ैब पर आधारित हैं ताकि तुम्हें यह ऐतिराज़ करने का मौक़ा होता. जब मैंने यह कहा ही नहीं  तो ऐतिराज़ बे महल है और शरीअत में ज़ाहिर का ऐतिबार है. लिहाज़ा तुम्हारा ऐतिराज़ बिल्कुल बेजा है . साथ ही “ला अअलमुल ग़ैबा” फ़रमाने में क़ौम पर एक लतीफ़ तअरीज़ भी है कि किसी के बातिन पर हुक्म लगाना उसका काम है जो ग़ैब का इल्म रखता हो. मैंने तो इसका दावा नहीं किया, जबकि मैं नबी हूँ. तुम किस तरह कहते हो कि वो दिल से ईमान नहीं लाए. तीसरा संदेह इस क़ौम का यह था कि “मा नराका इल्ला बशरम मिस्लुना” यानी हम तुम्हें अपने ही जैसा आदमी देखते हैं. इसके जवाब में फ़रमाया कि मैं ने अपनी दावत को अपने फ़रिश्ते होने पर आधारित नहीं किया था कि तुम्हें यह ऐतिराज़ का मौक़ा मिलता कि जताते तो थे वह अपने आप को फ़रिश्ता और थे बशर. लिहाज़ा तुम्हारा यह ऐतिराज़ भी झूटा है.

(17) नेकी या बुराई, सच्ची वफ़ादारी या दोहरी प्रवृति.

(18) यानी अगर मैं उनके ज़ाहिरी ईमान को झुटलाकर उनके बातिन पर इल्ज़ाम लगाऊं और उन्हें निकाल दूँ.

(19) और अल्लाह का शुक्र है कि मैं ज़ालिमों में से हरगिज़ नहीं हूँ तो ऐसा कभी न करूंगा.

(20) अज़ाब.

(21) उसको अज़ाब करने से, यानी न उस अज़ाब को रोक सकोगे और न उससे बच सकोगे.

(22) आख़िरत में वही तुम्हारे अअमाल का बदला देगा.

(23) और इस तरह ख़ुदा के कलाम और उसे मानने से बचते हैं और उसके रसूल पर लांछन लगाते हैं और उनकी तरफ़ झूट बांधते हैं जिनकी सच्चाई खुले प्रमाणों और मज़बूत तर्कों से साबित हो चुकी है. लिहाज़ा अब उसने.

(24) ज़रूर इसका वबाल आएगा लेकिन अल्लाह के करम से मैं सच्चा हूँ तो तुम समझ लो कि तुम्हारे झुटलाने और इन्कार का वबाल तुम पर पड़ेगा.

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: