सूरए हूद

11 सूरए  हूद

सूरए हूद मक्का में उतरी, इसमें 123 आयतें और दस रूकू हैं.

पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान, रहमत वाला(1)

यह एक किताब है जिसकी आयतें हिकमत (बोध) भरी हैं (2)
फिर तफ़सील की गईं(3)
हिकमत वाले ख़बरदार की तरफ़ से {1} कि बन्दगी न करो मगर अल्लाह की, बेशक मैं तुम्हारे लिये उसकी तरफ़ से डर और ख़ुशी सुनाने वाला हूँ {2} और यह कि अपने रब से माफ़ी मांगो फिर उसकी तरफ़ तौबह करो, तुम्हें बहुत अच्छा बरतना देगा(4)
एक ठहराए वादे तक और हर फ़ज़ीलत (प्रतिष्ठा) वाले को(5)
उसका फ़ज़्ल (अनुकम्पा) पहुंचाएगा(6)
और अगर मुंह फेरो तो तुमपर बड़े दिन (7)
के अज़ाब का ख़ौफ़ करता हूँ {3} तुम्हें अल्लाह ही की तरफ़ फिरना है (8)
और वह हर चीज़ पर क़ादिर {शक्तिमान} है(9){4}
सुनो वो अपने सीने दोहरे करते हैं कि अल्लाह से पर्दा करें  (10)
सुनो जिस वक़्त वो अपने कपड़ों से सारा बदन ढांप लेते हैं उस वक़्त भी अल्लाह उनका छुपा और ज़ाहिर सब कुछ जानता है, बेशक वह दिलों की बात जानने वाला है{5}
पारा 12
सूरए हूद पहला रूकू जारी
और ज़मीन पर चलने वाला कोई (11)
ऐसा नहीं जिसका रिज़्क़ (रोज़ी) अल्लाह के करम के ज़िम्मे पर न हो  (12)
और जानता है कि कहाँ ठहरेगा (13)
और कहाँ सुपुर्द होगा(14)
सब कुछ एक साफ़ बयान करने वाली किताब (15)
में है{6} और वही है जिसने आसमानों और ज़मीन को छ दिन में बनाया और उसका अर्श पानी पर था(16)
कि तुम्हें आज़माए(17)
तुम में किस का काम अच्छा है और अगर तुम फ़रमाओ कि बेशक तुम मरने के बाद उठाए जाओगे तो काफ़िर ज़रूर कहेंगे कि यह (18)
तो नहीं मगर खुला जादू(19){7}
और अगर हम उनसे अज़ाब (20)
कुछ गिनती की मुद्दत तक हटा दें तो ज़रूर कहेंगे किस चीज़ ने रोका है (21)
सुन लो जिस दिन उनपर आएगा उनसे फेरा न जाएगा और उन्हें घेरेगा वही अज़ाब जिसकी हंसी उड़ाते थे(8)

तफ़सीर
सूरए हूद – पहला रूकू

(1) सूरए हूद मक्की है. हसन व अकरमह वग़ैरह मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि आयत “व अक़िमिस्सलाता तरफ़यिन्नहारे” के सिवा बाक़ी सारी सूरत मक्की हैं. मक़ातिल ने कहा कि आयत “फ़लअल्लका तारिकुन” और “उलाइका यूमिनूना बिही” और “इन्नल हसनाते युज़हिब्नस सैय्यिआते” के अलावा सारी सूरत मक्की है. इसमें दस रूकू, 123 आयतें, एक हज़ार छ सौ कलिमे और नौ हज़ार पांच सौ सड़सठ अक्षर हैं. हदीस में है सहाबा ने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, हुज़ूर पर बुढ़ापे के आसार दिखने लगे. फ़रमाया, मुझे सूरए हूद, सूरए वाक़िआ, सूरए अम्मा यतसाअलून और सूरए इज़श -शम्से कुव्विरत ने बूढा कर दिया (तिरमिज़ी). सम्भवत: यह इस वजह से फ़रमाया कि इन सूरतों में क़यामत और मरने के बाद उठाए जाने और हिसाब किताब होने और जन्नत व दोज़ख़ का बयान है.

(2) जैसा कि दूसरी आयत में इरशाद हुआ “तिल्का आयातुल किताबिल हकीम” (यह हिकमत वाली किताब की आयतें हैं- 10:1 ) कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया “उहकिमत” (हिकमत से भरी) के मानी ये हैं कि उनकी नज़्म मोहकम और उस्तुवार की गई. इस सूरत में मानी ये होंगे कि इस में कोई ख़ामी राह पा ही नहीं सकती. वह बिनाए मोहकम है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि कोई किताब इनकी नासिख़ नहीं, जैसा कि ये दूसरी किताबों और शरीअतों की नासिख़ हैं.

(3) और सूरत सूरत और आयत आयत अलग अलग ज़िक्र की गई या अलग अलग उतारी गई या अक़ीदे,अहकाम, नसीहतें, क़िस्से और ग़ैबी ख़बरें इन में तफ़सील और विस्तार से बयान फ़रमाई गई.

(4) लम्बी उम्र और भरपूर राहत वे ऐश और बहुत सा रिज़्क़. इससे मालूम हुआ कि सच्चे दिल से तौबह व इस्तग़फ़ार करना उम्र लम्बी होने और आजिविका में विस्तार होने के लिये बेहतरीन अमल है.

(5) जिसने दुनिया में अच्छे कर्म किये हो उसकी फ़रमाँबरदारियाँ और नेकियाँ ज़्यादा हों.

(6) उसको जन्नत में कर्मों के हिसाब से दर्जे अता फ़रमाएगा. कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा आयत के मानी यह हैं कि जिसने अल्लाह के लिये अमल किया, अल्लाह तआला आयन्दा के लिये उसे नेक कर्म और फ़रमाँबरदारी की तौफ़ीक देता है.

(7) यानी क़यामत के दिन.

(8)  आख़िरत में वहाँ नेकियों का इनाम और बुराइयों की सज़ा मिलेगी.

(9) दुनिया में रोज़ी देने पर भी. मौत देने पर भी, मौत के बाद ज़िन्दा करने और सवाब व अज़ाब पर भी.

(10) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया, यह आयत अख़नस बिन शरीक़ के बारे में उतरी. यह बहुत मीठा बोलने वाला व्यक्ति था. रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सामने आता तो बहुत ख़ुशामद की बातें करता और दिल में दुश्मनी छुपाए रखता. इसपर यह आयत उतरी. मानी ये हैं कि वो अपने सीनों में दुश्मनी छुपाए रखते हैं जैसे कपड़े की तह में कोई चीज़ छुपाई जाती है. एक क़ौल यह है कि कुछ दोहरी प्रवृति वालों की आदत थी कि जब रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का सामना होता तो सीना और पीठ झुकाते और सर नीचा करते, चेहरा छुपा लेते ताकि उन्हें हुज़ूर देख न पाएं. इसपर यह आयत उतरी. बुख़ारी ने इन लोगों में एक हदीस रिवायत की कि मुसलमान पेशाब पाख़ाने और हमबिस्तरी के वक़्त अपने बदन खोलने से शरमाते थे. उनके हक़ में यह आयत उतरी कि अल्लाह से बन्दे का कोई हाल छुपा ही नहीं है लिहाज़ा चाहिये कि वह शरीअत की इजाज़तों पर अमल करता रहे.

पारा ग्याराह समाप्त

(11) जानदार हो.

(12) यानी वह अपनी कृपा से हर जानदार की आजीविका की देखभाल करता है.

(13) यानी उसके रहने की जगह को जानता है.

(14) सुपुर्द होने की जगह से, या दफ़्न होने का स्थान मुराद है, या मकान या मौत या क़ब्र.

(15) यानी लौहे महफ़ूज़.

(16) यानी अर्श के नीचे पानी के सिवा और कोई मख़लूक़ न थी. इससे यह भी मालूम हुआ कि अर्श और पानी आसमानों और ज़मीनों की पैदायश से पहले पैदा फ़रमाए गए.

(17) यानी आसमान व ज़मीन और उनके बीच सृष्टि को पैदा किया, जिसमें तुम्हारे फ़ायदे और मसलिहत हैं ताकि तुम्हें आज़माइश में डाले और ज़ाहिर हो कि कौन शुक्र गुज़ार तक़वा वाला फ़रमाग्बरदार है और..

(18) यानी क़ुरआन शरीफ़ जिस में मरने के बाद उठाए जाने का बयान है यह.

(19) यानी झूट और धोख़ा.

(20) जिसका वादा किया है.

(21) वह अज़ाब क्यों नहीं उतरता, क्या देर है. काफ़िरों का यह जल्दी करना झुटलाने और हंसी बनाने के तौर पर है.

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सूरए हूद – दूसरा रूकू

सूरए  हूद – दूसरा रूकू


और अगर हम आदमी को अपनी किसी रहमत का मज़ा दें (1)
फिर उसे उससे छीन लें, ज़रूर वह बड़ा ना उम्मीद नाशुक्रा है(2) {9}
और अगर हम उसे नेमत का मज़ा दें उस मुसीबत के बाद जो उसे पहुंची तो ज़रूर कहेगा कि बुराइयाँ मुझसे दूर हुई,बेशक वह ख़ुश होने वाला बड़ाई मारने वाला है(3){10}
मगर जिन्होंने  सब्र किया और अच्छे काम किये(4)
उनके लिये बख़्शिश और बड़ा सवाब है {11} तो क्या जो वही (देववाणी) तुम्हारी तरफ़ होती है उसमें से कुछ तुम छोड़ दोगे और उसपर दिलतंग होगे(5)
इस बिना पर कि वो कहते हैं उनके साथ कोई ख़ज़ाना क्यों नहीं उतरा या उनके साथ कोई फ़रिश्ता आता,तुम तो डर सुनाने वाले हो(6)
और अल्लाह हर चीज़ पर मुहाफ़िज़ (रक्षक) है (7){12}
क्या ये कहते है कि इन्होंने इसे जी से बना लिया, तुम फ़रमाओ कि तुम ऐसी बनाई हुई दस सूरतें ले आओ(8)
और अल्लाह के सिवा जो मिल सके(9)
सबको बुला लो अगर तुम सच्चे हो(10){13}
तो ऐ मुसलमानों और वो तुम्हारी इस बात का जवाब न दे सकें तो समझ लो कि वह अल्लाह के इल्म ही से उतरा है और यह कि उसके सिवा कोई सच्चा मअबूद नहीं,तो क्या अब तुम मानोगे(11){14}
जो दुनिया की ज़िन्दगी और आरायश चाहता हो(12)
हम उसमें उनका पूरा फल दे देंगे(13)
और उसमें कमी न देंगे{15} ये हैं वो जिनके लिये आख़िरत में कुछ नहीं मगर आग और अकारत गया जो कुछ वहां करते थे और नाबूद हुए जो उनके कर्म थे (14){16}
तो क्या वो जो अपने रब की तरफ़ से रौशन दलील पर हो(15)
और उस पर अल्लाह की तरफ़ से गवाह आए(16)
और इस से पहले मूसा की किताब (17)
पेशवा और रहमत, वो उसपर (18)
ईमान लाते हैं और जो उसका इन्कारी हो सारे गिरोहों में (19)
तो आग उसका वादा है, तो ऐ सुनने वाले तुझे कुछ इस में शक न हो, बेशक वह हक़ है तेरे रब की तरफ़ से लेकिन बहुत आदमी ईमान नहीं रखते {17} और उससे बढ़कर ज़ालिम कौन जो अल्लाह पर झूट बांधे(20)
वो अपने रब के हुज़ूर पेश किये जाएंगे(21)
और गवाह कहेंगे ये हैं जिन्होंने अपने रब पर झूट बोला था, अरे ज़ालिमों पर ख़ुदा की लअनत(22){18}
जो अल्लाह की राह से रोकते हैं और उसमें कजी चाहते हैं और वही आख़िरत के इन्कारी हैं {19} वो थकाने वाले नहीं ज़मीन में (23)
और न अल्लाह से अलग उनके कोई हिमायती (24)
उन्हें अज़ाब पर अज़ाब होगा (25)
वो न सुन सकते थे और न देखते (26){20}
वही हैं जिन्होंने अपनी जानें घाटे में डालीं और उनसे खोई उनसे खोई गई जो बातें जोड़ते थे{21}चाहे अनचाहे वही आख़िरत में सबसे ज़्यादा नुकसान में हैं (27){22}
बेशक जो ईमान लाए और अच्छे काम किये और अपने रब की तरफ़ रूजू लाए वो जन्नत वाले हैं वो उसमें हमेशा रहेंगे {23} दोनो फ़रीक (पक्षों) (28)
का हाल ऐसा है जैसे एक अंधा और बहरा और दूसरा देखता और सुनता (29)
क्या उन दोनो का हाल एक सा है (30)
तो क्या तुम ध्यान नहीं करते{24}

तफ़सीर
सूरए  हूद – दूसरा रूकू

(1) स्वास्थ्य और अम्न का या आजिविका के विस्तार और धन का.

(2) कि दोबारा इस नेअमत के पाने से मायूस हो जाता है और अल्लाह के फ़ज़्ल से अपनी आशा तोड़ लेता है और सब्र व रज़ा पर जमा नहीं रहता और पिछली नेअमत की नाशुक्री करता है.

(3)  शुक्र गुज़ार होने और नेअमत का हक़ अदा करने के बजाय.

(4) मुसीबत पर साबिर और नेअमत पर शाकिर रहे.

(5) तिरमिज़ी ने कहा कि इस्तिफ़हाम नकार के अर्थ में है यानी आपकी तरफ़ जो वही होती है वह सब आप उन्हें पहुंचाएं और दिल तंग न हो. यह तबलीग़ों रिसालत की ताकीद है, हालांकि अल्लाह तआला जानता है कि उसके रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अपनी नबुव्वत का हक़ अदा करने में कमी करने वाले नहीं हैं और उसने उनको इससे मअसूम फ़रमाया है. इस ताकीद में रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली भी है और काफ़िरों की मायूसी भी. उनका हंसी उड़ाना नबुव्वत और तबलीग़ के काम में अड़चन नहीं हो सकता. अब्दुल्लाह बिन उमैय्या मख़ज़ूमी ने रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहा था कि अगर आप सच्चे रसूल हैं और आपका ख़ुदा हर चीज़ पर क़ादिर है तो उसने आप पर ख़ज़ाना क्यों नहीं उतारा या आपके साथ कोई फ़रिश्ता क्यों नहीं भेजा जो आपकी रिसालत की गवाही देता. इसपर यह आयत उतरी.

(6) तुम्हें क्या परवाह, अगर काफ़िर न मानें और हंसी बनाएं.

(7) मक्के के काफ़िर क़ुरआन शरीफ़ की निस्बत.

(8) क्योंकि इन्सान अगर ऐसा कलाम बना सकता है तो इस जैसा बनाना तुम्हारी क्षमता से बाहर न होगा. तुम अरब हो, अच्छी और साफ़ ज़बान वाले हो, कोशिश करो.

(9) अपनी मदद के लिये.

(10) इसमें कि यह कलाम इन्सान का बनाया हुआ है.

(11) और यक़ीन रखोगे कि यह अल्लाह की तरफ़ से है यानी कु़रआन का चमत्कार और कमाल देख लेने के बाद ईमान और इस्लाम पर जमे रहो.

(12) और अपनी कायरता से आख़िरत पर नज़र न रखता हो.

(13) और जो कर्म उन्होंने दुनिया की चाह के लिये किये हैं उनका बदला सेहत व दौलत, रिज़्क़ में विस्तार और औलाद में बहुतात वग़ैरह से दुनिया ही में पूरा कर देंगे.

(14) ज़िहाक ने कहा कि यह आयत मुश्रिकों के बारे में है कि अगर वो दूसरों के काम आएं या मोहताज़ों को दे या किसी परेशान हाल की मदद करें या इस तरह कि कोई और नेकी करें तो अल्लाह तआला रिज़्क़ में विस्तार वगैरह से उनके कर्मों का बदला दुनिया ही में दे देता है और आख़िरत में उनके लिये कोई हिस्सा नहीं. एक क़ौल यह है कि यह आयत मुनाफ़िक़ों के बारे में उतरी जो आख़िरत के सवाब पर तो विश्वास नहीं रखते थे और जिहादों में ग़नीमत का माल हासिल करने के लिये शामिल होते थे.

(15) वह उसकी मिस्ल हो सकता है जो दुनिया की ज़िन्दगी और उसकी आरायश चाहता हो ऐसा नहीं. इन दोनों में बहुत बड़ा अन्तर है. रौशन दलील से वह अक़्ली दलील मुराद है जो इस्लाम की सच्चाई को प्रमाणित करे और उस व्यक्ति से जो अपने रब की तरफ़ से रौशन दलील पर हो, वो यहूदी मुराद हें जो इस्लाम लाए जैसे कि हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम.

(16) और उसकी सेहत की गवाही दे. यह गवाह क़ुरआन शरीफ़ है.

(17) यानी तौरात.

(18) यानी क़ुरआन पर.

(19) चाहे कोई भी हों. हदीस शरीफ़ में है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, उसकी क़सम जिसके दस्ते क़ुदरत में मुहम्मद की जान है, इस उम्मत में जो कोई भी है यहूदी हो या नसरानी, जिसको भी मेरी ख़बर पहुंचे और वह मेरे दीन पर ईमान लाए बिना मर जाए, वह ज़रूर जहन्नमी है.

(20) और उसके लिये शरीक और औलाद बताए. इस आयत से साबित होता है कि अल्लाह तआला पर झूट बोलना जुल्म है.

(21) क़यामत के दिन, और उनसे कर्म पूछे जाएंगे और नबियों और फ़रिश्तों की उनपर गवाही ली जाएगी.

(22) बुखारी और मुस्लिम की हदीस में है कि क़यामत के दिन काफ़िरों और दोग़ली प्रवृति वालों को सारी सृष्टि के सामने कहा जाएगा कि वो हैं जिन्होंने अपने रब पर झूठ बोला, ज़ालिमों पर ख़ुदा की लअनत. इस तरह वो सारी सृष्टि के सामने रूस्वा किये जाएंगे.

(23) अल्लाह को, अगर वह उनपर अज़ाब करना चाहे, क्योंकि वो उसके क़ब्ज़े और उसकी मिल्क में है, न उससे भाग सकते है न बच सकते हैं.

(24) कि उनकी मदद करें और उन्हें इसके अज़ाब से बचाएं.

(25) क्योंकि उन्होंने लोगों को ख़ुदा की राह से रोका और मरने के बाद उठने का इन्कार किया.

(26) क़तादा ने कहा कि वो सत्य सुनने से बहरे हो गए,तो कोई ख़ैर की बात सुनकर नफ़ा नहीं उड़ाते और न वह क़ुदरत की निशानियाँ देखकर फ़ायदा उठाते हैं.

(27) कि उन्होंने जन्नत की जगह जहन्नम को इख़्तियार किया.

(28) यानी काफ़िर और मूमिन.

(29) काफ़िर उसकी तरह है जो न देखे न सुने,यह दूषित है. और मूमिन उसकी तरह है जो देखता भी है और सुनता है. वह सम्पूर्ण है. सत्य और असत्य की पहचान रखता है.

(30) हरगिज़ नहीं.

सूरए हूद – तीसरा रूकू

सूरए  हूद – तीसरा रूकू

और बेशक हमने नूह को उसकी क़ौम की तरफ़ भेजा(1)
कि मैं तुम्हारे लिये साफ़ डर सुनाने वाला हूँ {25} कि अल्लाह के सिवा किसी को न पूजो बेशक मैं तुमपर एक मुसीबत वाले दिन के अज़ाब से डरता हूँ(2){26}
तो उसकी क़ौम के सरदार जो काफ़िर हुए थे बोले हम तो तुम्हें अपने ही जैसा आदमी देखते हैं (3)
और हम नहीं देखते कि तुम्हारी पैरवी (अनुकरण) किसी ने की हो मगर हमारे कमीनों (4)
सरसरी नज़र से (5)
और हम तुम में अपने ऊपर कोई बड़ाई नहीं पाते(6)
बल्कि हम तुम्हें (7)
झूटा ख़याल करते हैं {27} बोला ऐ मेरी क़ौम भला बताओ तो अगर मैं अपने रब की तरफ़ से दलील पर हूँ (8)
और उसने मुझे अपने पास से रहमत बख़्शी (9)
तो तुम उससे अंधे रहे, क्या हम उसे तुम्हारे गले चपेट दें और तुम बेज़ार हो (10){28}
और ऐ क़ौम मैं तुमसे कुछ इसपर (11)
माल नहीं मांगता (12)
मेरा अज़्र तो अल्लाह ही पर है और मैं मुसलमानों को दूर करने वाला नहीं (13)
बेशक वो अपने रब से मिलने वाले हैं (14)
लेकिन मैं तुमको निरे जाहिल लोग पाता हूँ (15){29}
और ऐ क़ौम मुझे अल्लाह से कौन बचा लेगा अगर मैं उन्हें दूर करूंगा, तो क्या तुम्हें ध्यान नहीं {30} और मैं तुम से नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़जाने हैं और न यह कि मैं ग़ैब (अज्ञात) जान लेता हूँ और न यह कहता हूँ कि मैं फ़रिश्ता हूँ (16)
और मैं उन्हें नहीं कहता जिनको तुम्हारी निगाहें हक़ीर (तुच्छ) समझती हैं कि हरगिज़ उन्हें अल्लाह कोई भलाई न देगा, अल्लाह ख़ूब जानता है जो उनके दिलों में है (17)
ऐसा करूं (18)
तो ज़रूर मैं ज़ालिमों में से हूँ (19){31}
बोले ऐ नूह हम से झगड़े और बहुत ही झगड़े तो लेआओ जिसका (20)
हमें वादा दे रहे हो अगर तुम सच्चे हो {32} बोला वह तो अल्लाह तुमपर लाएगा अगर चाहे और तुम थका न सकोगे (21){33}
और तुम्हें मेरी नसीहत नफ़ा न देगी अगर मैं तुम्हारा भला चाहूँ जबकि अल्लाह तुम्हारी गुमराही चाहे, वह तुम्हारा रब है और उसी की तरफ़ फिरोगे(22){34}
क्या ये कहते हैं कि इन्होंने उसे अपने जी से बना लिया (23)
तुम फ़रमाओ अगर मैं ने बना लिया होगा तो मेरा गुनाह मुझ पर है (24)
और मैं तुम्हारे गुनाह से अलग हूँ {35}

तफ़सीर
सूरए  हूद – तीसरा रूकू

(1) उन्होंने क़ौम से फ़रमाया.

(2) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि हज़रत नूह अलैहिस्सलाम चालीस साल के बाद नबी बनाए गए और नौ सौ पचास साल अपनी क़ौम को दावत फ़रमाते रहे और तूफ़ान के बाद साठ बरस दुनिया में रहे़, तो आपकी उम्र एक हज़ार पचास साल की हुई. इसके अलावा उम्र शरीफ़ के बारे में और भी क़ौल हैं (ख़ाज़िन)

(3) इस गुमराही में बहुत सी उम्मतें पड़ कर. इस्लाम में भी बहुत से बदनसीब सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को बशर कहते हैं और हमसरी और बराबरी का फ़ासिद ख़याल रखते हैं. अल्लाह तआला उन्हें गुमराही से बचाए.

(4) कमीनों से मुराद उनकी, वो लोग थे जो उनकी नज़र में छोटे पेशे रखते थे. हक़ीक़त यह है कि उनका यह क़ौल ख़ालिस जिहालत था, क्योंकि इन्सान का मर्तबा दीन के पालन और रसूल की फ़रमाँबरदारी से है. माल, मन्सब और पेशे को इसमें दख़ल नहीं. दीनदार, नेक सीरत, पेशावर को हिक़ारत से देखना और तुच्छ समझना जिहालत का काम है.

(5) यानी बग़ैर ग़ौरों फ़िक्र के.

(6) माल और रियासत में, उनका यह क़ौल भी जिहालत भरा था, क्योंकि अल्लाह के नज़दीक बन्दे के लिये ईमान और फ़रमाँबरदारी बुज़ु्र्गी का कारण है, न कि माल और रियासत.

(7) नबुव्वत के दावे में और तुम्हारे मानने वालों को इसकी तस्दीक़ में.

(8) जो मेरे दावे की सच्चाई पर गवाह हो.

(9) यानी नबुव्वत अता की.

(10)  और हुज्जत या तर्क को नापसन्द रखते हो.

(11) यानी तबलीग़े रिसालत पर.

(12) कि तुमपर इसका अदा करना बोझ हो.

(13) यह हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने उनकी उस बात के जवाब में फ़रमाया था जो लोग कहते थे कि ऐ नूह, नीचे लोगों को अपनी बैठक से निकाल दीजिये, ताकि हमें आपकी मजलिस में बैठने से शर्म न आए.

(14) और उसके क़ुर्ब से फ़ायज़ होंगे तो मैं उन्हें कैसे निकाल दूँ.

(15) ईमानदारों को नीच कहते हो और उनकी क़द्र नहीं करते और नहीं जानते कि तुम से बेहतर है.

(16) हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की क़ौम ने आपकी नबुव्वत में तीन संदेह किये थे. एक शुबह तो यह कि “मा नरा लकुम अलैना मिन फ़दलिन” कि हम तुम में अपने ऊपर कोई बड़ाई नहीं पाते. यानी तुम माल दौलत में हमसे ज़्यादा नहीं हो. इसके जवाब में हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया “ला अक़ूलो लकुम इन्दी ख़ज़ाइनुल्लाह” यानी मैं तुमसे नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं. तो तुम्हारा यह ऐतिराज़ बिल्कुल बे बुनियाद है. मैंने कभी माल की फ़ज़ीलत नहीं जताई और दुनिया की दौलत की तुम को आशा नहीं दिलाई और अपनी दावत को माल के साथ नहीं जोड़ा. फिर तुम यह कैसे कह सकते हो कि हम तुम में कोई माली फ़ज़ीलत नहीं पाते. और तुम्हारा यह ऐतिराज़ बिल्कुल बेहूदा है. दूसरा शुबह क़ौमे नूह ने यह किया था “मा नराकत तबअका इल्लल लज़ीना हुम अराज़िलुना बादियर राये” यानी हम नहीं देखते कि तुम्हारी किसी ने पैरवी की हो मगर हमारे कमीनों ने. सरसरी नज़र से मतलब यह था कि वो भी सिर्फ़ ज़ाहिर में मूमिन हैं, बातिन में नहीं. इसके जवाब में हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने यह फ़रमाया कि मैं नहीं कहता कि मैं ग़ैब जानता हूँ तो मेरे अहकाम ग़ैब पर आधारित हैं ताकि तुम्हें यह ऐतिराज़ करने का मौक़ा होता. जब मैंने यह कहा ही नहीं  तो ऐतिराज़ बे महल है और शरीअत में ज़ाहिर का ऐतिबार है. लिहाज़ा तुम्हारा ऐतिराज़ बिल्कुल बेजा है . साथ ही “ला अअलमुल ग़ैबा” फ़रमाने में क़ौम पर एक लतीफ़ तअरीज़ भी है कि किसी के बातिन पर हुक्म लगाना उसका काम है जो ग़ैब का इल्म रखता हो. मैंने तो इसका दावा नहीं किया, जबकि मैं नबी हूँ. तुम किस तरह कहते हो कि वो दिल से ईमान नहीं लाए. तीसरा संदेह इस क़ौम का यह था कि “मा नराका इल्ला बशरम मिस्लुना” यानी हम तुम्हें अपने ही जैसा आदमी देखते हैं. इसके जवाब में फ़रमाया कि मैं ने अपनी दावत को अपने फ़रिश्ते होने पर आधारित नहीं किया था कि तुम्हें यह ऐतिराज़ का मौक़ा मिलता कि जताते तो थे वह अपने आप को फ़रिश्ता और थे बशर. लिहाज़ा तुम्हारा यह ऐतिराज़ भी झूटा है.

(17) नेकी या बुराई, सच्ची वफ़ादारी या दोहरी प्रवृति.

(18) यानी अगर मैं उनके ज़ाहिरी ईमान को झुटलाकर उनके बातिन पर इल्ज़ाम लगाऊं और उन्हें निकाल दूँ.

(19) और अल्लाह का शुक्र है कि मैं ज़ालिमों में से हरगिज़ नहीं हूँ तो ऐसा कभी न करूंगा.

(20) अज़ाब.

(21) उसको अज़ाब करने से, यानी न उस अज़ाब को रोक सकोगे और न उससे बच सकोगे.

(22) आख़िरत में वही तुम्हारे अअमाल का बदला देगा.

(23) और इस तरह ख़ुदा के कलाम और उसे मानने से बचते हैं और उसके रसूल पर लांछन लगाते हैं और उनकी तरफ़ झूट बांधते हैं जिनकी सच्चाई खुले प्रमाणों और मज़बूत तर्कों से साबित हो चुकी है. लिहाज़ा अब उसने.

(24) ज़रूर इसका वबाल आएगा लेकिन अल्लाह के करम से मैं सच्चा हूँ तो तुम समझ लो कि तुम्हारे झुटलाने और इन्कार का वबाल तुम पर पड़ेगा.