सूरए हूद – सातवाँ रूकू

सूरए  हूद – सातवाँ रूकू

और बेशक हमारे फ़रिश्ते इब्राहीम के पास (1)
ख़ुशख़बरी लेकर आए, बोले सलाम(2)
कहा सलाम फिर कुछ देर न की कि एक बछड़ा भुना ले आए(3){69}
फिर जब देखा कि उनके हाथ खाने की तरफ़ नहीं पहुंचते उनको ऊपरी समझा और जी ही जी में उनसे डरने लगा, बोले डरिये नहीं हम लूत क़ौम की तरफ़ (4)
भेजे गए हैं {70} और  उसकी बीबी(5)
खड़ी थी वह हंसने लगी तो हमने उसे(6)
इसहाक़ की ख़ुशख़बरी दी और  इसहाक़ के पीछे(7)
यअक़ूब की(8) {71}
बोली हाय ख़राबी क्या मेरे बच्चा होगा और  मैं बूढी हूँ (9)
और ये हैं मेरे शौहर बूढे(10)
बेशक यह तो अचंभे की बात है{72} फ़रिश्ते बोले क्या अल्लाह के काम का अचंभा करती हो अल्लाह की रहमत और  उसकी बरकतें तुमपर इस घर वालो, बेशक(11)
वही है सब ख़ूबियों वाला इज़्ज़त वाला {73} फिर जब इब्राहीम का डर कम हुआ और उसे ख़ुशख़बरी मिली हम से लूत क़ौम के बारे में झगड़ने लगा (12){74}
बेशक इब्राहीम तहम्मुल वाला बहुत आहें करने वाला रूजू लाने वाला है (13){75}
ऐ इब्राहीम इस ख़याल में न पड़ बेशक तेरे रब का हुक्म आ चुका, और  बेशक उनपर अज़ाब आने वाला है कि फेरा न जाएगा {76} और  जब लूत के पास हमारे फ़रिश्ते आए(14)
उसे उनका ग़म हुआ और  उनके कारण दिल तंग हुआ और  बोला यह बड़ी सख़्ती का दिन है (15) {77}
और उसके पास उसकी क़ौम दौड़ती आई और उन्हें आगे ही से बुरे कामों की आदत पड़ी थी (16)
कहा ऐ क़ौम यह मेरी क़ौम की बेटियाँ हैं ये तुम्हारे लिये सुथरी हैं तो अल्लाह से डरो (17)
और मुझे मेरे मेहमानों में रूस्वा न करो, क्या तुम में एक आदमी भी नेक चलन नहीं{78} बोले तुम्हें मालूम है कि तुम्हारी क़ौम की बेटियों में हमारा कोई हक़ नहीं (18)
और  तुम ज़रूर जानते हो जो हमारी ख़्वाहिश है {79} बोले ऐ काश मुझे तुम्हारे मुक़ाबिल ज़ोर होता या किसी मज़बूत पाए की पनाह लेता (19) {80}
फ़रिश्ते बोले ऐ लूत हम तुम्हारे रब के भेजे हुए है (20)
वो तुम तक नहीं पहुंच सकते(21)
तो अपने घरवालों को रातों रात ले जाओ और तुममें कोई पीठ फेर कर न देखे(22)
सिवाए तुम्हारी औरत के उसे भी वही पहुंचना है जो उन्हें पहुंचेगा,(23)
बेशक उनका वादा सुबह के वक़्त है (24)
क्या सुबह क़रीब नहीं{81} फिर जब हमारा हुक्म आया हमने उस बस्ती के ऊपर उसका नीचा कर दिया(25)
और उसपर कंकर के पत्थर लगातार बरसाए{82} जो निशान किये हुए तेरे रब के पास हैं(26)
और वो पत्थर कुछ ज़ालिमों से दूर नहीं (27){83}

तफ़सीर
सूरए हूद – सातवाँ रूकू

(1) सादा -रूप नौजवानों की सुंदर शक्लों में हज़रत इस्हाक़ और हज़रत यअक़ूब अलैहिस्सलाम की पैदाइश की.

(2) हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने.

(3) मुफ़स्सिरों ने कहा है कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम बहुत ही मेहमान नवाज़ थे. बगैर मेहमान के खाना न खाते. उस वक़्त ऐसा इत्तिफ़ाक़ हुआ कि पन्द्रह रोज़ से कोई मेहमान न आया था. आप इस ग़म में थे. इन मेहमानों को देखते ही आपने उनके लिये खाना लाने में जल्दी फ़रमाई. चूंकि आप के यहाँ गायें बहुत थीं इसलिये बछड़े का भुना हुआ गोश्त सामने लाया गया. इससे मालूम हुआ कि गाय का गोश्त हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के दस्तरख़्वान पर ज़्यादा आता था और आप उसको पसन्द फ़रमाते थे. गाय का गोश्त ख़ाने वाले अगर सुन्नते इब्राहीम अलैहिस्सलाम अदा करने की नियत करे तो ज़्यादा सवाब पाएं.

(4) अज़ाब करने के लिये.

(5) हज़रत सारा पर्दे के पीछे.

(6) उसके बेटे.

(7) हज़रत इस्हाक़ के बेटे.

(8) हज़रत सारा को ख़ुशख़बरी देने की वजह यह थी कि औलाद की ख़ुशी औरतों को मर्दों से ज़्यादा होती है.और  यह कारण भी था कि हज़रत सारा के कोई औलाद न थी और इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बेटे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम मौजूद थे. इस ख़ुशख़बरी के साथ साथ एक ख़ुशख़बरी यह भी थी कि हज़रत सारा की उम्र इतनी लम्बी होगी कि वो पोते को भी देखेगी.

(9) मेरी उम्र नब्बे से ऊपर हो चुकी है.

(10) जिनकी उम्र एक सौ बीस साल की हो गई है.

(11) फ़रिश्तों के कलाम के माने ये हैं कि तुम्हारे लिये क्या आश्चर्य की बात है, तुम इस घर से हो जो चमत्कारों और अल्लाह तआला की रहमतों और बरकतों का केन्द्र बना हुआ है. इस आयत से साबित हुआ कि बीबियाँ एहले बैत में शामिल है.

(12) यानी कलाम और सवाल करने लगा और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का मुजादिला यह था कि आप ने फ़रिश्तों से फ़रमाया कि क़ौमे लूत की बस्तियों में अगर पचास ईमानदार हों तो भी उन्हें हलाक करोगे. फ़रिश्तों ने कहा, नहीं. फ़रमाया अगर चालीस हों, उन्होंने कहा जब भी नहीं, आपने फ़रमाया, और तीस हों. उन्होंने कहा, जब भी नहीं. आप इस तरह फ़रमाते रहे. यहाँ तक कि आपने फ़रमाया, अगर एक मुसलमान मर्द मौजूद हो तब हलाक कर दोगे, उन्होंने कहा, नहीं तो आपने फ़रमाया, इस में लूत अलैहिस्सलाम हैं. इसपर फ़रिश्तों ने कहा, हमें मालूम है जो वहाँ हैं. हम हज़रत लूत अलैहिस्सलाम को और उनके घर वालों को बचाएंगे सिवाए उनकी औरत के. हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का मक़सद यह था कि आप अज़ाब में देर चाहते थे ताकि इस बस्ती वालों को कुफ़्र और  गुनाह से बाज़ आने के लिये एक फ़ुर्सत और  मिल जाए. चुनांचे हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की विशेषता में इरशाद होता है.

(13) इन विशेषताओ से आपकी रिक़्कतें क़ल्ब और आपकी राफ़त व रहमत मालूम होती है. जो इस बहस का कारण हुई. फ़रिश्तों ने कहा.

(14) हसीन सूरतों में, और  हज़रत लूत अलैहिस्स्लाम ने उनकी हैअत और जमाल को देखा तो क़ौम की ख़बासत और बदअमली का ख़याल करके.

(15) रिवायत है कि फ़रिश्तों को अल्लाह का हुक्म यह था कि वो क़ौमे लूत को उस वक़्त तक हलाक न करें जब तक कि हज़रत लूत अलैहिस्सलाम ख़ुद इस क़ौम की बद अमली पर चार बार गवाही न दें. चुनांचे जब ये फ़रिश्ते हज़रत लूत अलैहिस्सलाम से मिले तो आपने उनसे फ़रमाया क्या तुम्हें इस बस्ती वालों का हाल मालूम न था.फ़रिश्तों ने कहा, इनका क्या हाल है. आपने फ़रमाया मैं गवाही देता हूँ कि अमल के ऐतिबार से धरती के ऊपर यह बदतरीन बस्ती है. यह बात आपने चार बार फ़रमाई. हज़रत लूत अलैहिस्सलाम की औरत जो काफ़िरा थी, निकली और उसने अपनी क़ौम को जाकर ख़बर कर दी कि हज़रत लूत अलैहिस्सलाम के यहाँ ऐसे ख़ूबसूरत मेहमान आए हैं जिनकी तरह का अब तक कोई शख़्स नज़र नहीं आया.

(16) और कुछ शर्मों-हया बाक़ी न रही थी. हज़रत लूत अलैहिस्सलाम ने.

(17) और अपनी बीबियों से तअल्लुक रखो  कि ये तुम्हारे लिये हलाल है. हज़रत लूत अलैहिस्सलाम ने उनकी औरतों को जो क़ौम की बेटियाँ थीं बुज़र्गाना शफ़क़त से अपनी बेटियाँ फ़रमाया ताकि इस हुस्ने इख़्लाक़ से वो फ़ायदा उठाएं और  हमिय्यत सीखें.

(18) यानी हमें उनकी रग़बत नहीं.

(19) यानी मुझे अगर तुम्हारे मुक़ाबले की ताक़त होती या ऐसा क़बीला रखता जो मेरी मदद करता तो तुम से मुक़ाबला और लड़ाई करता. हज़रत लूत अलैहिस्सलाम ने अपने मकान का द्वार बन्द कर लिया था और  अन्दर से यह बातचीत फ़रमा रहे थे. क़ौम ने चाहा की दीवार तोड़ दे. फरिश्तों ने आपका दुख और बेचैनी देखी तो.

(20)तुम्हारा पाया मज़बूत है. हम इन लोगों को अज़ाब करने के लिये आए हैं. तुम द्वार खोल दो और हमें और उन्हें छोड़ दो.

(21) और तुम्हें कोई तक़लीफ़ या नुक़सान नहीं पहुंचा सकते. हज़रत जिब्रील ने दरवाज़ा खोल दिया. क़ौम के लोग मकान में घुस आए. हज़रत जिब्रील ने अल्लाह के हुक्म से अपना बाज़ू उनके मुंह पर मारा सब अंधे हो गए और हज़रत लूत अलैहिस्सलाम के मकान से निकल भागे उन्हें रास्ता नज़र न आता था यह कहते जाते थे हाय हाय लूत के घर में बड़े जादूगर है उन्होंने हमें जादू कर दिया.फ़रिश्तों ने हज़रत लूत अलैहिस्सलाम से कहा.

(22) इस तरह आपके घर के सारे लोग चले गये.

(23) हज़रत लूत अलैहिस्सलाम ने कहा यह अजाब कब होगा, हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम ने कहा.

(24)हज़रत लूत अलैहिस्सलाम ने कहा, मैं तो इससे जल्दी चाहता हूँ हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम ने कहा.

(25) यानी उलट दिया, इस तरह कि हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम ने ज़मीन के जिस टुकड़े पर क़ौमे लूत के शहर थे, उसके नीचे अपना बाज़ू डाला और उन पाँचों शहरों को, जिनमें सबसे बड़ा सदूम था, और उनमें चार लाख आदमी बस्ते थे, इतना ऊंचा उठाया कि वहाँ के कुत्तों और मुर्गों की आवाज़ें आसमान पर पहुंचने लगीं और इस आहिस्तगी से उठाया कि किसी बर्तन का पानी न गिरा और कोई सोने वाला न जागा. फिर उस बलन्दी से उस ज़मीन के टुकड़े को औंधा करके पलटा.

(26) उन पत्थरों पर ऐसा निशान था जिन से वो दूसरों से मुमताज़ यानी छिके हुए थे. क़तादा ने कहा कि उनपर लाल लकीरें थी. हसन व सदी का क़ौल है कि उनपर मोहरें लगी हुई थीं और एक क़ौल यह है कि जिस पत्थर से जिस शख़्स की हलाकत मंज़ूर थी, उसका नाम उस पत्थर पर लिखा था.

(27) यानी मक्का वालों से.

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