सूरए हूद – पाँचवा रूकू

सूरए  हूद – पाँचवा रूकू

और आद की तरफ़ उनके हम क़ौम हूद को(1)
कहा ऐ मेरी क़ौम अल्लाह को पूजो(2)
उसके सिवा तुम्हारा कोई मअबूद नहीं तुम तो निरे मुफ़तरी (झूठे) हो (3){50}
ऐ क़ौम में उसपर तुमसे कुछ उजरत नहीं मांगता,मेरी मज़दूरी तो उसीके ज़िम्मे है जिसने मुझे पैदा किया(4)
तो क्या तुम्हें अक़्ल नहीं(5){51}
और ऐ मेरी क़ौम अपने रब से माफ़ी चाहो(6)
फिर उसकी तरफ़ रूजू लाओ तुमपर ज़ौर का पानी भेजेगा और तुममें जितनी शक्ति है उससे और ज़्यादा देगा(7)
और ज़ुर्म करते हुए रूगदीनी(विरोध) न करो(8){52}
बोले ऐ हूद तुम कोई दलील लेकर हमारे पास न आए(9)
और हम ख़ाली तुम्हारे कहने से अपने ख़ुदाओ को छोड़ने के नहीं न तुम्हारी बात पर यक़ीन लाएं{53} हम तो यही कहते हैं कि हमारे किसी ख़ुदा की तुम्हें बुरी झपट पहुंची(10)
कहा मैं अल्लाह को गवाह करता हूँ और तुम सब गवाह हो जाओ कि मैं बेज़ार हूँ उन सब से जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा उसका शरीक ठहराते हो{54} तुम सब मिलकर मेरा बुरा चाहो (11)
फिर मुझे मुहलत न दो (12){55}
मैंने अल्लाह पर भरोसा किया जो मेरा रब है और तुम्हारा रब, कोई चलने वाला नहीं(13)
जिसकी चोटी उसकी क़ुदरत के क़ब्ज़े में न हो(14)
बेशक मेरा रब सीधे रास्ते पर मिलता है{56} फिर अगर तुम मुंह फेरो तो मैं तुम्हें पहुंचा चुका जो तुम्हारी तरफ़ लेकर भेजा गया(15)
और मेरा रब तुम्हारी जगह औरों को ले आएगा(16)
और तुम उसका कुछ न बिगाड़ सकोगे(17)
बेशक मेरा रब हर चीज़ पर निगहबान है (18){57}
और जब हमारा हुक्म आया हमने हूद और उसके साथ के मुसलमानों को(19)
अपनी रहमत फ़रमाकर बचा लिया(20)
और उन्हें(21)
सख़्त अज़ाब से निजात दी{58} और ये आद हैं (22)
कि अपने रब की आयतों से इन्कारी हुए और उसके रसूलों की नाफ़रमानी की और हर बड़े सरकश(नाफ़रमान) हटधर्म के कहने पर चले{59} और उनके पीछे लगी इस दुनिया में लअनत  और क़यामत के दिन, सुन लो बेशक आद अपने रब से इन्कारी हुए, अरे दूर हों आद हूद की क़ौम {60}

तफ़सीर
सूरए हूद – पाँचवा रूकू

(1) नबी बनाकर भेजा. हज़रत हूद अलैहिस्सलाम को “अख़” नसब के ऐतिबार से कहा गया है इसीलिये आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा रहमुतल्लाह अलैह ने इस शब्द का अनुवाद हम क़ौम किया.

(2) उसकी तौहीद को मानते रहो. उसके साथ किसी को शरीक न करो.

(3) जो बुतों को ख़ुदा का शरीक बताते हो.

(4) जितने रसूल तशरीफ़ लाए सबने अपनी क़ौमों से यही फ़रमाया और नसीहत ख़ालिस वही है जो किसी लालच से न हो.

(5) इतना समझ सको कि जो केवल बेग़रज़ नसीहत करता है वह यक़ीनन शुभचिंतक और सच्चा है. बातिल वाला जो किसी को गुमराह करता है, ज़रूर किसी न किसी मतलब और किसी न किसी उद्देश्य से करता है. इससे सच झूठ में आसानी से पहचान की जा सकती है.

(6) ईमान लाकर, जब आद क़ौम ने हज़रत हूद अलैहिस्सलाम की दावत क़ुबूल न की तो अल्लाह तआला ने उनके कुफ़्र के कारण तीन साल तक बारिश बन्द कर दी और बहुत सख़्त दुष्काल नमूदार हुआ और उनकी औरतों को बांझ कर दिया. जब ये लोग बहुत परेशान हुए तो हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने वादा फ़रमाया कि अगर वो अल्लाह पर ईमान लाएं और उसके रसूल की तस्दीक़ करे और उनके समक्ष तौबह व इस्तग़फ़ार करें तो अल्लाह तआला बारिश भेजेगा और उनकी ज़मीनों को हरा भरा करके ताज़ा ज़िन्दगी अता फ़रमाएगा और क़ुव्वत और औलाद देगा. हज़रत इमाम हसन रदियल्लाहो अन्हो एक बार अमीरे मुआविया के पास तशरीफ़ ले गए तो आप से अमीर मुआविया के एक नौकर ने कहा कि मैं मालदार आदमी हूँ मगर मेरे कोई औलाद नहीं हे मुझे कोई ऐसी चीज़ बताइये जिससे अल्लाह मुझे औलाद दे. आपने फ़रमाया कि रोज़ाना इस्तग़फ़ार पढ़ा करो. उसने इस्तग़फ़ार की यहाँ तक कसरत की कि रोज़ाना सात सौ बार इस्तग़फ़ार पढ़ने लगा. इसकी बरकत से उस शख़्स के दस बेटे हुए. यह ख़बर हज़रत मुआविया को हुई तो उन्होंने उस शख़्स से फ़रमाया कि तूने हज़रत इमाम से यह क्यों न दरियाफ़्त किया कि यह अमल हुज़ूर ने कहाँ से हासिल फ़रमाया. दूसरी बार जब उस शख्स की हाज़िरी इमाम की ख़िदमत में हुई तो उसने यह दरियाफ़्त किया. इमाम ने फ़रमाया कि तू ने हज़रत हूद का क़ौल नहीं सुना जो उन्होंने फ़रमाया “यज़िदकुम क़ुव्वतन इला क़ुव्वतिकुम” और हज़रत नूह अलैहिस्सलाम का यह इरशाद “युमदिदकुम बि अमवालिंव व बनीन”. रिज़्क में कसरत और औलाद पाने के लिये इस्तग़फ़ार का बहुतात के साथ पढ़ना क़ुरआनी अमल है.

(7) माल और औलाद के साथ.

(8) मेरी दावत से.

(9) जो तुम्हारे दावे की सच्चाई का प्रमाण है. और यह बात उन्होंने बिल्कुल ग़लत और झूट कही थी. हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने उन्हें जो चमत्कार दिखाए थे उन सबसे इन्कार कर बैठे.

(10) यानी तुम जो बुत को बुरा कहते हो, इसलिये उन्होंने तुम्हें दीवाना कर दिया. मतलब यह है कि अब जो कुछ कहते हो यह दीवानगी की बातें है.

(11) यानी तुम और वो जिन्हें तुम मअबूद समझते हो, सब मिलकर मुझे नुक़सान पहुंचाने की कोशिश करो.

(12) मुझे तुम्हारी और तुम्हारे मअबूदों की और तुम्हारी मक्कारियों की कुछ परवाह नहीं है और मुझे तुम्हारी शानो शौकत और क़ुव्वत से कुछ डर नहीं. जिन को तुम मअबुद कहते हो, वो पत्थर बेजान हैं, न किसी को नफ़ा पहुंचा सकते हैं न नुक़सान. उनकी क्या हक़ीक़त कि वो मुझे दीवाना बना सकते. यह हज़रत हूद अलैहिस्सलाम का चमत्कार है कि आपने एक जबरदस्त और ताकतवर क़ौम से, जो आपके ख़ून की प्यासी और जान की दुश्मन थी, इस तरह के कलिमात फ़रमाए और कुछ भी ख़ौफ़ न किया और वह क़ौम अत्यन्त दुश्मनी के बावुजूद आपको तकलीफ़ न पहुंचा सकी.

(13) इसी में बनी आदम और हेवान सब आ गए.

(14) यानी वह सबका मालिक है और सब पर ग़ालिब और क़ुदरत वाला और क्षमता वाला है.

(15) और हुज्जत साबित हो चुकी.

(16) यानी अगर तुमने ईमान से मुंह फेरा और जो अहकाम मैं तुम्हारी तरफ़ लाया हूँ उन्हें क़ुबूल न किया तो अल्लाह तुम्हें हलाक कर देगा और तुम्हारे साथ तुम्हारे बजाय एक दूसरी क़ौम को तुम्हारे इलाक़ों और तुम्हारे मालों का मालिक बना देगा, जो उसकी तौहीद में अक़ीदा रखते हों और उसकी इबादत करें.

(17) क्योंकि वह इससे पाक है कि उसे कोई तकलीफ़ पहुंचे लिहाज़ा तुम्हारे मुंह फेरने का जो नुक़सान है वह तुम्हीं को पहुंचेगा. अज़ाब का हुक्म लागू हुआ.

(18) और किसी की कहनी करनी उससे छुपी नहीं. जब क़ौमे हूद ने नसीहत क़ुबूल न की तो अल्लाह तआला की तरफ़ से उनके अज़ाब का हुक्म लागू हुआ.

(19) जिनकी संख्या चार हज़ार थी.

(20) और क़ौमे आद को हवा के अज़ाब से हलाक कर दिया.

(21) यानी जैसे मुसलमानों को दुनिया के अज़ाब से बचाया ऐसे ही आखिरत के.

(22) यह सम्बोधन है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की उम्मत को और “तिल्का” इशारा है क़ौमे आद की क़ब्रों और उनके मकानों वग़ैरह की तरफ़. मक़सद यह है कि ज़मीन में चलो उन्हें देखो और सबक़ पकड़ो.

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