सूरए हूद – छटा रूकू

सूरए  हूद – छटा रूकू

और समूद की तरफ़ उनके हम क़ौम सालेह को(1)
कहा ऐ मेरी क़ौम अल्लाह को पूजो(2)
उसके सिवा तुम्हारा कोई मअबूद नही(3)
उसने तुम्हें ज़मीन से पैदा किया(4)
और उसमें तुम्हें बसाया(5)
तो उससे माफ़ी चाहो फिर उसकी तरफ़ रूजू लाओ, बेशक मेरा रब क़रीब है दुआ  सुनने वाला {61} बोले ऐ सालेह इससे पहले तो तुम हम में होनहार मालूम होते थे (6)
क्या तुम हमें इससे मना करते हो कि अपने बाप दादा के मअबूदों को पूजें और बेशक जिस बात की तरफ़ हमें बुलाते हो हम उससे एक बड़े धोखा डालने वाले शक में हैं {62} बोला ऐ मेरी क़ौम भला बताओ तो अगर मैं अपने रब की तरफ़ से रौशन दलील पर हूँ और उसने मुझे अपने पास से रहमत बख़्शी (7)
तो मुझे उससे कौन बचाएगा और मैं उसकी नाफ़रमानी करूं(8)
तो तुम मुझे सिवा नुक़सान के कुछ न बढ़ाओगे(9){63}
और मेरी क़ौम यह अल्लाह का नाक़ा{ऊंटनी}है तुम्हारे लिये निशानी तो इसे छोड़ दो कि अल्लाह की ज़मीन में खाए और इसे बुरी तरह हाथ न लगाना कि तुमको नज़दीक अज़ाब पहुंचेगा(10){64}
तो उन्होंने(11)
उसकी कूंचे काटीं तो सालेह ने कहा अपने घरों में तीन दिन और बरत लो(12)
यह वादा है कि झूटा न होगा(13){65}
फिर जब हमारा हुक्म आया हमने सालेह और उसके साथ के मुसलमानों को अपनी रहमत फ़रमाकर (14)
बचा लिया और उस दिन की रूसवाई से, बेशक तुम्हारा रब क़वी {शक्तिशाली} इज़्ज़त वाला है {66}
और ज़ालिमों को चिंघाड़ ने आ लिया(15)
तो सुबह अपने घरों में घुटनों के बल पड़े रह गए {67} मानो कभी यहाँ बसे ही न थे, सुन लो बेशक समूद अपने रब से इन्कारी हुए, अरे लअनत हो समूद पर {68}

तफ़सीर
सूरए हूद – छटा रूकू

(1) भेजा तो हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम ने उन से.

(2) और उसकी वहदानियत को मानो.

(3) सिर्फ़ वही इबादत के लायक़ है, क्योंकि

(4) तुम्हारे दादा हज़रत  आदम अलैहिस्सलाम को इससे पैदा करके और तुम्हारी नस्ल की अस्ल नुत्फ़ों के माद्दों को इससे बनाकर.

(5) और ज़मीन को तुमसे आबाद किया. ज़िहाक ने “इस्तअमरकुम” के मानी ये बयान किये हैं कि तुम्हें लम्बी उम्रें दीं यहाँ तक कि उनकी उम्रें तीन सौ बरस से लेकर हज़ार बरस तक की हुई.

(6) और हम उम्मीद करते थे कि तुम हमारे सरदार बनोगे क्योंकि आप कमज़ोरों की मदद करते थे. फ़क़ीरों पर सख़ावत फ़रमाते थे. जब आपने तौहीद की दावत दी और बुतों की बुराईयाँ बयान कीं तो क़ौम की उम्मीदें आपसे कट गई और कहने लगे.

(7) हिकमत  और नबुव्वत अता की.

(8) रिसालत की तबलीग़ और बुत परस्ती से रोकने में.

(9) यानी मुझे तुम्हारे घाटे का अनुभव और ज़्यादा होगा.

(10) क़ौमे समूद ने हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम से चमत्कार तलब किया था (जिसका बयान सूरए अअराफ़ में हो चुका है) आपने अल्लाह तआला से दुआ की तो अल्लाह के हुक्म से पत्थर से ऊंटनी पैदा हुई. यह ऊंटनी उनके लिये निशानी और चमत्कार था. इस आयत में उस ऊंटनी के बारे में अहकाम इरशाद फ़रमाए गए कि उसे ज़मीन में चरने दो और कोई तकलीफ़ न पहुंचाओ. वरना दुनिया ही में अज़ाब में जकड़े जाओगे और मोहलत न पाओगे.

(11) अल्लाह के हुक्म का विरोध किया और बुधवार के.

(12) यानी जुमुए तक जो कुछ दुनिया का ऐश करना है कर लो. शनिवार को तुम पर अज़ाब आएगा पहले रोज़ तुम्हारे चेहरे पीले हो जाएंगे, दूसरे रोज़ सुर्ख़ और तीसरे रोज़, यानी जुमुए को कोले, और सनीचर को अज़ाब नाज़िल हो जाएगा.

(13) चुनांचे ऐसा ही हुआ.

(14) इन बलाओ से.

(15) यानी भयानक आवाज़ ने जिसकी हैबत से उनके दिल फट गए और वो सब के सब मर गए.

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