सूरए यूनुस – तीसरा रूकू

सूरए यूनुस – तीसरा रूकू

और जब कि हम आदमियों को रहमत का मज़ा देते हैं किसी तकलीफ़ के बाद जो उन्हें पहुंची थी जभी वो हमारी आयतों के साथ दाव चलते हैं (1)
तुम फ़रमा दो अल्लाह की ख़ुफ़िया तदबीर सबसे जल्द हो जाती है(2)
बेशक हमारे फ़रिश्ते तुम्हारे मक्र (कपट) लिख रहे हैं(3){21}
वही है कि तुम्हें ख़ुश्की और तरी में चलाता है(4)
यहां तक कि जब
तुम किश्ती में हो और वो अच्छी हवा से उन्हें लेकर चलें और उसपर ख़ुश हुए (6)
उनपर आंधी का झौंका आया और हर तरफ़ लहरों ने उन्हें आ लिया और समझ लिये कि हम घिर गए उस वक़्त अल्लाह को पुकारते हैं निरे उसके बन्दे होकर कि अगर तू इससे हमें बचा लेगा तो हम ज़रूर शुक्र अदा करने वालों में होंगे (7){22}
फिर अल्लाह जब उन्हें बचा लेता है जभी वो ज़मीन में नाहक़ ज़ियादती करने लगते हैं (8)
ऐ लोगो तुम्हारी ज़ियादती तुम्हारी ही जानों का वबाल हैं दुनिया के जीते जी बरत लो फिर तुम्हें हमारी तरफ़ फिरना है उस वक़्त हम तुम्हें जता देंगे जो तुम्हारे कौतुक थे (9){23}
दुनिया की ज़िन्दगी की कहावत तो ऐसी ही है जैसे वह पानी कि हमने आसमान से उतारा तो उसके कारण ज़मीन से उगने वाली चीज़ें सब घनी होकर निकालीं जो कुछ आदमी और चौपाए खाते हैं(10)
यहाँ तक कि जब ज़मीन ने अपना सिंगार ले लिया (11)
और ख़ूब सज गई और उसके मालिक समझे कि यह हमारे बस में आ गई (12)
हमारा हुक्म उसपर आया रात में या दिन में (13)
तो हमने उसे कर दिया काटी हुई मानो कल थी ही नहीं (14)
हम यूंही आयतें तफ़सील (विस्तार) से बयान करते हैं ग़ौर करने वालों के लिये (15){24}
और अल्लाह सलामती के घर की तरफ़ पुकारता है (16)
और जिसे चाहे सीधी राह चलाता है(17){25}
भलाई वालों के लिये भलाई है और इस से भी अधिक (18)
और उनके मुंह पर न चढ़ेगी सियाही और ख़्वारी (19)
वही जन्नत वाले हैं, वो उसमें हमेशा रहेंगे {26} और जिन्होंने बुराइयाँ कमाई (20)
तो बुराई का बदला उसी जैसा (21)
और उनपर ज़िल्लत चढ़ेगी, उन्हें अल्लाह से बचाने वाला कोई न होगा, मानो उनके चेहरों पर अंधेरी रात के टुकड़े चढ़ा दिये हैं (22)
वही दोज़ख़ वाले हैं वो उसमें हमेशा रहेंगे{27} और जिस दिन हम उन सब को उठाएंगे (23)
फिर मुश्रिकों से फ़रमाएंगे अपनी जगह रहो तुम और तुम्हारे शरीक (24)
तो हम उन्हें मुसलमानों से जुदा कर देंगे और उनके शरीक उनसे कहेंगे तुम हमें कब पूजते थे(25){28}
तो अल्लाह गवाह काफ़ी है हम में और तुम में कि हमें तुम्हारे पूजने की ख़बर भी न थी{29} यहाँ पर हर जान जांच लेगी जो आगे भेजा(26)
और अल्लाह की तरफ़ फेरे जाएंगे जो उनका सच्चा मौला है और उनकी सारी बनावटें (27)
उनसे गुम हो जाएंगी.(28){30}

तफ़सीर
सूरए यूनुस – तीसरा रूकू

(1) मक्का वालों पर अल्लाह तआला ने दुष्काल डाल दिया जिसकी मुसीबत में वो सात बरस गिरफ़्तार रहे यहाँ तक कि हलाकत के क़रीब पहुंचे. फिर उसने रहम फ़रमाया, बारिश हुई, ज़मीनों पर हिरयाली छाई. तो अगरचे इस तकलीफ़ और राहत दोनों में क़ुदरत की निशानियाँ थीं और तकलीफ़ के बाद राहत बड़ी महान नेअमत थी, इसपर शुक्र लाज़िम था, मगर बजाय इसके उन्होंने नसीहत न मानी और फ़साद व कुफ़्र की तरफ़ पलटें.

(2) और उसका अज़ाब देर नहीं करता.

(3) और तुम्हारी छुपवाँ तदबीरें कर्मों का लेखा जोखा रखने वाले फ़रिश्तों पर भी छुपी हुई नहीं हैं तों जानने वाले ख़बर रखने वाले अल्लाह से कैसे छुप सकती हैं.

(4) और तुम्हें दूरियाँ तय करने की क़ुदरत देता है. ख़ुश्की में तुम पैदल और सवार मंज़िलें तय करते हो और नदियों में, किश्तियों और जहाजों से सफ़र करते हो. वह तुम्हें ख़ुश्की और तरी दोनों में घूमने फिरने के साधन अता फ़रमाता है.

(5) यानी किश्तियाँ.

(6) कि हवा अनुकूल है, अचानक.

(7) तेरी नेअमतों के, तुझपर ईमान लाकर और ख़ास तेरी इबादत करके.

(8) और वादे के ख़िलाफ़ करके कुफ़्र और गुनाहों में जकड़े जाते हैं.

(9) और उनका तुम्हें बदला देंगे.

(10) ग़ल्ले और फल और हरियाली.

(11) ख़ूब फूली, हरी भरी और तरो ताज़ा हुई.

(12) कि खेतियाँ तैयार हो गई, फल पक गए, ऐसे वक़्त.

(13) यानी अचानक हमारा अज़ाब आया, चाहे बिजली गिरने की शक्ल में या ओले बरसने या आंधी चलने की सूरत में.

(14) यह उन लोगों के हाल की एक मिसाल है जो दुनिया के चाहने वाले हैं और आख़िरत की उन्हें कुछ परवाह नहीं. इसमें बहुत अच्छे तरीक़े पर समझाया गया है कि दुनियावी ज़िन्दगानी उम्मीदों का हरा बाग़ है, इसमें उम्र खोकर जब आदमी उस हद पर पहुंचता है जहाँ उसको मुराद मिलने का इत्मीनान हो और वह कामयाबी के नशे में मस्त हो, अचानक उसको मौत पहुंचती है और वह सारी लज़्ज़तों और नेअमतों से मेहरूम हो जाता है. क़तादा  ने कहा कि दुनिया का तलबगार जब बिल्कुल बेफ़िक्र होता है, उस वक़्त उसपर अल्लाह का अज़ाब आता है और उसका सारा सामान जिससे उसकी उम्मीदें जुड़ी थीं, नष्ट हो जाता है.

(15) ताकि वो नफ़ा हासिल करें और शक तथा वहम के अंधेरों से छुटकारा पाएं और नश्वर दुनिया की नापायदारी से बाख़बर हों.

(16) दुनिया की नापायदारी बयान फ़रमाने के बाद हमेशगी की दुनिया की तरफ़ दावत दी. क़तादा ने कहा कि दारे. सलाम जन्नत है. यह अल्लाह की भरपूर रहमत और मेहरबानी है कि अपने बन्दों को जन्नत की दावत दी.

(17) सीधी राह दीने इस्लाम है. बुख़ारी की हदीस में है, नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में फ़रिश्ते हाज़िर हुए, आप ख़्वाब में थे. उनमें से कुछ ने कहा कि आप ख़्वाब में है और कुछ ने कहा कि आँखें ख़्वाब में है, दिल बेदार है. कुछ कहने लगे कि इनकी कोई मिसाल तो बयान करो, तो उन्होंने कहा, जिस तरह किसी शख़्स ने एक मकान बनाया और उसमें तरह तरह की नेअमतें उपलब्ध कीं और एक बुलाने वाले को भेजा कि लोगों को बुलाए. जिसने उस बुलाने वाले की फ़रमाँबरदारी की, उस मकान में दाख़िल हुआ और उन नेअमतों को खाया पिया और जिसने बुलाने वाले की आवाज़ न मानी, वह मकान में दाख़िल न हो सका न कुछ खा सका. फिर वो कहने लगे कि इस मिसाल पर गहराई से ग़ौर करो कि समझ में आए. मकान जन्नत है, बुलाने वाले मुहम्मद हैं, जिसने उनकी फ़रमाँबरदारी की, उसने अल्लाह की फ़रमाँबरदारी की.

(18) भलाई वालों से अल्लाह के फ़रमाँबरदार बन्दे, ईमान वाले मुराद हैं. और यह जो फ़रमाया कि उनके लिये भलाई है, इस भलाई से जन्नत मुराद है. और “इससे भी ज़्यादा”का मतलब है, अल्लाह का दीदार, मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है कि जन्नतियों के जन्नत में दाख़िल होने के बाद अल्लाह तआला फ़रमाएगा, क्या तुम चाहते हो कि तुमपर और ज़्यादा इनायत करूं. वो अर्ज़ करेंगे या रब, क्या तुने हमारे चेहरे सफ़ेद नहीं किये, क्या तूने हमें जन्नत में दाख़िल नहीं फ़रमाया़ क्या तूने हमें दोज़ख़ से निजात नहीं दी. हुज़ूर ने फ़रमाया, फिर पर्दा उठा दिया जाएगा तो अल्लाह का दीदार उन्हें हर नेअमत से ज़्यादा प्यारा होगा. सही हदीस की किताबों में बहुत सी रिवायतें यह साबित करती हैं कि आयत में “इससे भी ज़्यादा” से अल्लाह का दीदार मुराद है.

(19) कि यह बात जहन्नम वालों के लिये है.

(20) यानी कुफ़्र और गुनाह में जकड़ गए.

(21) ऐसा नहीं कि जैसे नेकियों का सवाब दस गुना और सात सौ गुना किया जाता है ऐसे ही बदियों का अज़ाब भी बढ़ा दिया जाए, बल्कि जितनी बदी होगी उतना ही अज़ाब किया जाएगा.

(22) यह हाल होगा उनकी रूसियाही का, ख़ुदा की पनाह.

(23) और तमाम सृष्टि को हिसाब के मैदान में जमा करेंगे,

(24) यानी वो बुत जिन्हें तुम पूजते थे.

(25) क़यामत के दिन एक घड़ी ऐसी सख़्ती की होगी कि बुत अपने पुजारियों की पूजा का इनकार कर देंगे और अल्लाह की क़सम खाकर कहेंगे कि हम न सुनते थे, न देखते थे, न जानते थे, न समझते थे कि तुम हमें पूजते हो. इसपर बुत परस्त कहेंगे कि अल्लाह की क़सम हम तुम्हीं को पूजते थे तो बुत कहेंगे.

(26) यानी उस मैदान में सब को मालूम हो जाएगा कि उन्होंने पहले जो कर्म किये थे वो कैसे थे. अच्छे या बुरे, नफ़ा वाले या घाटे वाले.

(27) बुतों को ख़ुदा का शरीक बताना और मअबूद ठहराना.

(28) और झूठी और बेहक़ीक़त साबित होंगी.

सूरए यूनुस – चौथा रूकू

सूरए यूनुस – चौथा रूकू

तुम फ़रमाओ तुम्हें कौन रोज़ी देता है आसमान और ज़मीन से(1)
या कौन मालिक है कान और आँखों का (2)
और कौन निकालता है ज़िन्दा को मुर्दे से और निकालता है मुर्दा को ज़िन्दा से(3)
और कौन तमाम कामों की तदबीर (युक्ति) करता है तो अब कहेंगे कि अल्लाह (4)
तो तुम फ़रमाओ तो क्यों नहीं डरते(5){31}
तो यह अल्लाह है तुम्हारा सच्चा रब (6)
फिर हक़ के बाद क्या है मगर गुमराही (7)
फिर कहाँ फिरे जाते हो {32} यूंही साबित हो चुकी है तेरे रब की बात फ़ासिक़ों (दुराचारियों) (8)
पर तो वो ईमान नहीं लाएंगे{33} तुम फ़रमाओ तुम्हारे शरीकों में (9)
कोई ऐसा है कि पहले बनाए फिर फ़ना (विनाश) के बाद दोबारा बनाए (10)
तुम फ़रमाओ अल्लाह पहले बनाता है फिर फ़ना के बाद दोबारा बनाएगा तो कहाँ औंधे जाते हो(11{34}
तुम फ़रमाओ तुम्हारे शरीकों में कोई ऐसा है कि हक़ की राह दिखाए (12)
तुम फ़रमाओ कि अल्लाह हक़ की राह दिखाता है, तो क्या जो हक़ की राह दिखाए उसके हुक्म पर चलना चाहिये या उसके जो ख़ुद ही राह न पाए जब तक राह न दिखाया जाए (13)
तो तुम्हें क्या हुआ कैसा हुक्म लगाते हो {35} और(14)
उनमें अक्सर तो नहीं चलते मगर गुमान पर (15)
बेशक गुमान हक़ का कुछ काम नहीं देता, बेशक अल्लाह उनके कामों को जानता है {36} और क़ुरआन की यह शान नहीं कि कोई अपनी तरफ़ से बनाले बे अल्लाह के उतारे(16)
हाँ वह अगली किताबों की तस्दीक़ {पुष्टि} है (17)
और लौह में जो कुछ लिखा है सबकी तफ़सील है इसमें कुछ शक नहीं है जगत के रब की तरफ़ से है{37} क्या ये कहते हैं (18)
कि उन्होंने इसे बना लिया है, तुम फ़रमाओ (19)
तो इस जैसी कोई एक सूरत ले आओ और अल्लाह को छोड़कर जो मिल सकें सबको बुला लाओ(20)
अगर तुम सच्चे हो {38} बल्कि उसे झुटलाया जिसके इल्म पर क़ाबू न पाया(21)
और अभी उन्होंने इसका अंजाम नहीं देखा, (22)
ऐसे ही उनसे अगलों ने झुटलाया था (23)
तो देखो ज़ालिमों का कैसा अंजाम हुआ(24){39}
और उनमें (25)
कोई इस (26)
पर ईमान लाता है और उनमें कोई इस पर ईमान नहीं लाता है, और तुम्हारा रब फ़सादियों को ख़ूब जानता है(27){40}

तफ़सीर
सूरए यूनुस – चौथा रूकू

(1) आसमान से मेंह बरसाकर और ज़मीन में हरियाली उगाकर.

(2) और ये हवास या इन्द्रियाँ तुम्हे किसने दिये है, किसने ये चमत्कार तुम्हें प्रदान किये हैं, कौन इन्हें मुद्दतों सुरक्षित रखता है.

(3) इन्सान को वीर्य से और वीर्य को इन्सान से, चिड़िया को अन्डे से और अन्डे को चिड़िया से. मूमिन को काफ़िर से और  काफ़िर को मूमिन से. आलिम को जाहिल से और जाहिल को आलिम से.

(4) और उसकी सम्पूर्ण क़ुदरत का ऐतिराफ़ करेंगे और इसके सिवा कुछ चारा न होगा.

(5) उसके अज़ाब से, और क्यों बुतों को पूजते और उनको मअबूद बनाते हो जबकि वो कुछ क़ुदरत नहीं रखते.

(6) जिसकी ऐसी भरपूर क़ुदरत है.

(7) यानी जब ऐसी खुली दलीलें और साफ़ प्रमाणों से साबित हो गया कि इबादत के लायक़ सिर्फ़ अल्लाह है, तो उसके अलावा सब बातिल और गुमराही, और जब तुमने उसकी क़ुदरत को पहचान लिया और उसकी क्षमता का ऐतिराफ़ कर लिया तो.

(8) जो कुफ़्र में पक्के हो गए. रब की बात से मुराद है अल्लाह की तरफ़ से जो लिख दिया गया. या अल्लाह तआला का इरशाद “लअम लअन्ना जहन्नमा.”… (मैं तुम सबसे जहन्नम भर दूंगा – सूरए अअराफ़, आयत 18)

(9) जिन्हें ऐ मुश्रिकों, तुम मअबूद ठहराते हो.

(10) इसका जवाब ज़ाहिर है कि कोई ऐसा नहीं क्यों कि मुश्रिक भी यह जानते हैं कि पैदा करने वाला अल्लाह ही है, लिहाज़ा ऐ मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम.

(11) और ऐसी रौशन दलीलें क़ायम होने के बाद सीधे रास्तें से मुंह फेरते हो.

(12) तर्क और दलीलें क़ायम करके, रसूल भेजकर, किताबें उतारकर,  समझ वालों को अक़्ल और नज़र अता फ़रमा कर. इसका खुला जवाब यह है कि कोई नहीं, तो ऐ हबीब.

(13) जैसे कि तुम्हारे बुत हैं किसी जगह जा नहीं सकते जब तक कि कोई उठा ले जाने वाला उन्हें उठाकर न ले जाए. और न किसी चीज़ की हक़ीक़त को समझें और न सच्चाई की राह को पहचानें, बग़ैर इसके कि अल्लाह तआला उन्हें ज़िन्दगी, अक़्ल और नज़र दे. तो जब उनकी मजबूरी का यह आलम है तो वो दूसरों को क्या राह बता सकेंगे. ऐसों को मअबूद बनाना, फ़रमाँबरदारी करना कितना ग़लत और बेहूदा है.

(14) मुश्रिक लोग.

(15) जिसकी उनके पास कोई दलील नहीं, न उसके ठीक होने का इरादा और यक़ीन. शक में पड़े हुए हैं और यह ख़याल करते हैं कि पहले लोग भी बुत पूजते थे, उन्होंने कुछ तो समझा होगा.

(16) मक्का के काफ़िरों ने यह वहम किया था कि क़ुरआन शरीफ़ सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ख़ुद बना लिया है. इस आयत में उनका यह वहम दूर फ़रमाया गया कि क़ुरआने करीम ऐसी किताब ही नहीं जिसकी निस्बत शक हो सके. इसकी मिसाल बनाने से सारी सृष्टि लाचार है तो यक़ीनन वह अल्लाह की उतारी हुई किताब है.

(17) तौरात और इंजील वग़ैरह की.

(18) काफ़िर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की निस्बत.

(19)अगर तुम्हारा यह ख़याल है तो तुम भी अरब हो, ज़बान और अदब, फ़साहत और बलाग़त के दावेदार हो, दुनिया में कोई इन्सान ऐसा नहीं हैं जिसके कलाम के मुक़ाबिल कलाम बनाने को तुम असम्भव समझते हो. अगर तुम्हारे ख़याल में यह इन्सान का कलाम है.

(20 )और उनसे मदद लो और सब मिलकर क़ुरआन जेसी एक सूरत तो बनाओ.

(21) यानी क़ुरआन शरीफ़ को समझने और जानने के बग़ैर उन्होंने इसे झुटलाया और यह निरी जिहालत है कि किसी चीज़ को जाने बग़ैर उसका इन्कार किया जाए. क़ुरआन शरीफ़ में ऐसे उलूम शामिल होना, जिसे इल्म और अक़्ल वाले न छू सकें, इस किताब की महानता और बुज़ुर्गी ज़ाहिर करता है. तो ऐसी उत्तम उलूम वाली किताब को मानना चाहिये था न कि इसका इन्कार करना.

(22) यानी उस अज़ाब को जिसकी क़ुरआन शरीफ़ में चुनौतियाँ हैं.

(23)दुश्मन से अपने रसूलों को, बग़ैर इसके कि उनके चमत्कार और निशानियाँ देखकर सोच समझ से काम लेते.

(24) और पहली उम्मतें अपने नबियों को झुटलाकर कैसे कैसे अज़ाबों में जकड़ी गई तो ऐ हबीब सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, आप को झुटलाने वालों को डरना चाहिये.

(25)मक्का वाले.

(26) नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम या क़ुरआन शरीफ़

(27) जो दुश्मनी से ईमान नहीं लाते और कुफ़्र पर अड़े रहते हैं.

सूरए यूनुस – पाँचवां रूकू

सूरए यूनुस – पाँचवां रूकू

और अगर वो तुम्हें झुटलाएं (1)
तो फ़रमा दो कि मेरे लिये मेरी करनी और तुम्हारे लिये तुम्हारी करनी (2)
तुम्हें मेरे काम से इलाक़ा नहीं और मुझे तुम्हारे काम से तअल्लुक़ नहीं (3){41}
और उनमें कोई वो हैं जो तुम्हारी तरफ़ कान लगाते हैं(4)
तो क्या तुम बहरों को सुना दोगे अगरचे उन्हें अक़ल न हो (5){42}
और उनमें कोई तुम्हारी तरफ़ तकता है(6)
क्या तुम अंधों को राह दिखा दोगे अगरचे वो न सूझें{43} बेशक अल्लाह लोगों पर कुछ ज़ुल्म नहीं करता(7)
हाँ लोग ही अपनी जानों पर ज़ुल्म करते हैं (8){44}
और जिस दिन उन्हें उठाएगा(9)
मानों दुनिया में न रहे थे मगर उस दिन की एक घड़ी (10)
आपस में पहचान करेंगे(11)
कि पूरे घाटे में रहे वो जिन्होंने अल्लाह से मिलने को झूटलाया और हिदायत पर न थे(12){45}
और अगर हम तुम्हें दिखा दें कुछ (13)
उसमें से जो उन्हें वादा दे रहे हैं (14)
या तुम्हें पहले ही अपने पास बुला ले(15)
हर हाल में उन्हें हमारी तरफ़ पलट कर आना है फिर अल्लाह गवाह है (16)
उनके कामों पर {46} और हर उम्मत में एक रसूल हुआ (17)
जब उसका रसूल उनके पास आता(18)
उनपर इन्साफ़ का फ़ैसला कर दिया जाता (19)
और उनपर ज़ुल्म न होता {47} और कहते हैं यह वादा कब आएगा अगर तुम सच्चे हो (20){48}
तुम फ़रमाओ मैं अपनी जान के बुरे भले का (ज़ाती) इख़्तियार नहीं रखता मगर जो अल्लाह चाहे(21)
हर गिरोह का एक वादा है(22)
जब उनका वादा आएगा तो एक घड़ी न पीछे हटे न आगे बढ़े {49} तुम फरमाओ भला बताओ तो अगर उसका अज़ाब और(23)
तुमपर रात को आए (24)
या दिन को (25)
तो उसमें वह कौन सी चीज़ है कि मुजरिमों को जिसकी जल्दी है {50} तो क्या जब(26)
हो पड़ेगा उस वक़्त उसका यक़ीन करेंगे(27)
क्यों अब मानते हो पहले तो (28)
इसकी जल्दी मचा रहे थे {51} फिर ज़ालिमों से कहा जाएगा हमेशा का अज़ाब चखो तुम्हें कुछ और बदला न मिलेगा मगर वही जो कमाते थे (29){52}
और तुमसे पूछते हैं क्या वह (30) हक़ है, तुम फ़रमाओ, हाँ मेरे रब की क़सम बेशक वह ज़रूर हक़ है और तुम कुछ थका न सकोगे(31){53}

तफ़सीर
सूरए यूनुस – पाँचवां रूकू

(1) ऐ मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, और उनकी राह पर आने और सच्चाई और हिदायत क़ुबूल करने की उम्मीद टूट जाए.

(2) हर एक अपने अमल का बदला पाएगा.

(3) किसी के अमल पर दूसरे की पकड़ न होगी. जो पकड़ा जाएगा अपने कर्मों पर पकड़ा जाएगा. यह फ़रमान चेतावनी के तौर पर है कि तुम नसीहत नहीं मानते और हिदायत क़ुबूल नहीं करते तो इसका वबाल ख़ुद तुमपर होगा, किसी दूसरे को इससे नुक़सान नहीं.

(4) और आपसे क़ुरआन शरीफ़ और दीन के अहकाम सुनते हैं और दुश्मनी की वजह से दिल में जगह नहीं देते और क़ुबूल नहीं करते, तो यह सुनना बेकार है, वो हिदायत से नफ़ा न पाने में बेहरों की तरह हैं.

(5) और वो न हवास से काम लें न अक़्ल से.

(6) और सच्चाई की दलीलों और नबुव्वत की निशानियों को देखता है, लेकिन तस्दीक़ नहीं करता और इस देखने से नतीजा नहीं निकलता, फ़ायदा नहीं उठाता, दिल की नज़र से मेहरूम और बातिन यानी अन्दर का अन्धा है.

(7) बल्कि उन्हें हिदायत और राह पाने के सारे सामान अता फ़रमाता है और रौशन दलीलें क़ायम फ़रमाता है.

(8) कि इन दलीलों में ग़ौर नहीं करते और सच्चाई साफ़ स्पष्ट हो जाने के बावुजूद ख़ुद गुमराही में गिरफ़्तार होते हैं.

(9) क़ब्रों से, हिसाब के मैदान में हाज़िर करने के लिये, तो उस दिन की हैबत और वहशत से यह हाल होगा कि वो दुनिया में रहने की मुद्दत को बहुत थोड़ा समझेंगे और यह ख़याल करेंगे कि….

(10) और इसकी वजह यह है कि चूंकि काफ़िरों ने दुनिया की चाह में उम्रें नष्ट कर दीं और अल्लाह की फ़रमाँबरदारी, जो आज काम आती, बजा न लाए तो उनकी ज़िन्दगी का वक़्त उनके काम न आया. इसलिये वो उसे बहुत ही कम समझेंगे.

(11) क़ब्रों से निकलते वक़्त तो एक दूसरे को पहचानेंगे जैसा दुनिया में पहचानते थे, फिर क़यामत के दिन की हौल और दहशतनाक मन्ज़र देखकर यह पहचान बाक़ी न रहेगी. एक क़ौल यह है कि क़यामत के दिन पल पल हाल बदलेंगे. कभी ऐसा हाल होगा कि एक दूसरे को पहचानेंगे, कभी ऐसा कि न पहचानेंगे और जब पहचानेंगे तो कहेंगे.

(12) जो उन्हें घाटे से बचाती.

(13)अज़ाब.

(14) दुनिया ही में आपके ज़मानए हयात में, तो वह मुलाहिज़ा कीजिये.

(15) तो आख़िरत में आपको उनका अज़ाब दिखाएंगे.  इस आयत से साबित हुआ कि अल्लाह तआला अपने रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को काफ़िरों के बहुत से अज़ाब और उनकी ज़िल्लत और रूसवाइयाँ आपकी दुनियावी ज़िन्दगी ही में दिखाएगा. चुनांचे बद्र वग़ैरह में दिखाई गई और जो अज़ाब काफ़िरों के लिये कुफ़्र और झुटलाने के कारण आख़िरत में मुक़र्रर फ़रमाता है वह आख़िरत में दिखाएगा.

(16) ख़बर वाला है, अज़ाब देने वाला है.

(17) जो उन्हें सच्चाई की तरफ़ बुलाता और फ़रमाबँरदारी और ईमान का हुक्म करता.

(18) और अल्लाह के आदेशों की तबलीग़ या प्रचार करता, तो कुछ लोग ईमान लाते और कुछ झुटलाते और कुछ इन्कारी हो जाते हो.

(19) कि रसूल को और उनपर ईमान लाने वाले को निजात दी जाती और झुटलाने वालों को अज़ाब से हलाक कर दिया जाता. आयत की तफ़सीर में दूसरा क़ौल यह है कि इस में आख़िरत का बयान है और मानी ये हैं कि क़यामत के दिन हर उम्मत के लिये एक रसूल होगा जिसकी तरफ़ वह मन्सूब होगी. जब वह रसूल हिसाब के मैदान में आएगा और मूमिन व काफ़िर पर शहदात देगा तब उनमें फ़ैसला किया जायगा कि ईमान वालों को निजात होगी और काफ़िर अज़ाब में जकड़े जायेंगे.

(20) जब आयत “इम्मा नूरियन्नका” में अज़ाब की चेतावनी दी गई तो काफ़िरों ने सरकशी से यह कहा कि ऐ मुहम्मद, जिस अज़ाब का आप वादा देते हैं वह कब आएगा. उसमें क्या देर है. उस अज़ाब को जल्द लाइये. इसपर यह आयत उतरी.

(21) यानी दुश्मनों पर अज़ाब उतरना और दोस्तों की मदद करना और उन्हें ग़ल्बा देना, यह सब अल्लाह की मर्ज़ी है और अल्लाह की मर्ज़ी में.

(22) उसके हलाक और अज़ाब का एक समय निर्धारित है, लौहे मेहफ़ूज़ में लिखा हुआ है.

(23) जिसकी तुम जल्दी करते हो.

(24) जब तुम ग़ाफ़िल पड़े सोते हो.

(25) जब तुम रोज़ी रोटी के कामों में मश्ग़ूल हो.

(26) वह अज़ाब तुम पर नाज़िल.

(27) उस वक़्त का यक़ीन कुछ फ़ायदा न देगा और कहा जाएगा.

(28) झुटलाने और मज़ाक़ उड़ाने के तौर पर.

(29) यानी दुनिया में जो अमल करते थे और नबियों को झुटलाने और कुफ़्र में लगे रहते थे उसी का बदला.

(30) उठाए जाने और अज़ाब, जिसके नाज़िल होने की आपने हमें ख़बर दी.

(31) यानी वह अज़ाब तुम्हें ज़रूर पहुंचेगा.

सूरए यूनुस – छटा रूकू

सूरए यूनुस – छटा रूकू

और अगर हर ज़ालिम जान ज़मीन में जो कुछ है(1)
सब की मालिक होती ज़रूर अपनी जान छूड़ाने में देती(2)
और दिल में चुपके चुपके पशेमान हुए जब अज़ाब देखा और उनमें इन्साफ़ से फ़ैसला कर दिया गया और उनपर ज़ुल्म न होगा{54} सुन लो बेशक अल्लाह ही का है जो कुछ आसमानों में है और ज़मीन में (3)
सुन लो बेशक अल्लाह का वादा सच्चा है मगर उनमें अक्सर को ख़बर नहीं {55} वह जिलाता और मारता है और उसी की तरफ़ फिरोगे{56} ऐ लोगो तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से नसीहत आई (4)
और दिलों की सेहत और हिदायत और रहमत ईमान वालों के लिये {57} तुम फ़रमाओ अल्लाह ही के फ़ज़्ल (अनुकम्पा) और उसी की रहमत और उसी पर चाहिये कि ख़ुशी करें(5)
वह उनके सब धन दौलत से बेहतर है {58} तुम फ़रमाओ भला बताओ तो वह जो अल्लाह ने तुम्हारे लिये रिज़्क़ (जीविका) उतारा उसमें तुम ने अपनी तरफ़ से हराम व हलाल ठहरा लिया (6)
तुम फ़रमाओ क्या अल्लाह ने इसकी तुम्हें इजाज़त दी या अल्लाह पर झूट बांधते हो (7){59}
और क्या गुमान है उनका जो अल्लाह पर झूट बांधते हैं कि क़यामत में उनका क्या हाल होगा, बेशक अल्लाह लोगों पर फ़ज़्ल करता है (8)
मगर अक्सर लोग शुक्र नहीं करते{60}

तफ़सीर
सूरए यूनुस – छटा रूकू

(1) माल मत्ता, ख़ज़ाना और दफ़ीना.

(2) और क़यामत के दिन उसको रिहाई के लिये फ़िदिया कर डालती. मगर यह फ़िदिया क़ुबूल नहीं और तमाम दुनिया की दौलत ख़र्च करके भी रिहाई सम्भव नहीं. जब क़यामत में यह मंज़र पेश आया और क़ाफ़िरों की उम्मीदें टूटीं.

(3) तो काफ़िर किसी चीज़ का मालिक ही नहीं बल्कि वह ख़ुद भी अल्लाह का ममलूक है, उसका फ़िदिया देना सम्भव ही नहीं,

(4) इस आयत मे क़ुरआन शरीफ़ के आने और इसमें मौज़ूद नसीहतों, शिफ़ा, हिदायत और रहमत का बयान है कि यह किताब इन बड़े फ़ायदों से ओतप्रोत है. नसीहत के मानी है वह चीज़ जो इन्सान को उसकी पसन्द की चीज़ की तरफ़ बुलाए और ख़तरे से बचाए. ख़लील ने कहा कि यह नेकी की नसीहत करना है जिससे दिल में नर्मी पैदा हो. शिफ़ा से मुराद यह है कि क़ुरआन शरीफ़ दिल के अन्दर की बीमारियों को दूर करता है. दिल की ये बीमारियाँ दुराचार, ग़लत अक़ीदे और मौत की तरफ़ ले जाने वाली जिहालत हैं. क़ुरआने पाक इन तमाम रोगों को दूर करता है. क़ुरआने करीम की विशेषता में हिदायत भी फ़रमाया, क्योंकि वह गुमराही से बचाता और सच्चाई की राह दिखाता है और ईमान वालों के लिये रहमत, इसलिये फ़रमाया कि वह इससे फ़ायदा उठाते हैं.

(5) किसी प्यारी और मेहबूब चीज़ के पाने से दिल को जो लज़्ज़त हासिल होती है उसको फ़रह कहते हैं. मानी ये हैं कि ईमान वालों को अल्लाह के फ़ज़्ल और रहमत पर ख़ुश होना चाहिये कि उसने उन्हें नसीहतों, और दिलों की अच्छाई और ईमान के साथ दिल की राहत और सुकून अता फ़रमाए. हज़रत इब्ने अब्बास व हसन व क़तादा ने कहा कि अल्लाह के फ़ज़्ल से इस्लाम और उसकी रहमत से क़ुरआन मुराद है. एक क़ौल यह है कि फ़ज़्लुल्लाह से क़ुरआन और रहमत से हदीसें मुराद हैं.

(6) इस आयत से साबित हुआ कि किसी चीज़ को अपनी तरफ़ से हलाल या हराम करना मना और ख़ुदा पर झूट जोड़ना है. आजकल बहुत लोग इसमें जकड़े हुए हैं. ममनूआत यानी वर्जित चीज़ों को हलाल कहते हैं और जिन चीज़ों के इस्तमाल की अल्लाह व रसूल न इजाज़त दी है, उसको हराम. कुछ सूद को हलाल करने पर अड़े हैं, कुछ तस्वीरों को, कुछ खेल तमाशों को, कुछ औरतों की बेक़ैदियों और बेपर्दगीयों को, कुछ भूख हड़ताल को, जो आत्म हत्या है, हलाल समझते हैं. और कुछ लोग हलाल चीज़ों को हराम ठहराने पर तुले हुए हैं, जैसे मीलाद की महफ़िल को, फ़ातिहा को, ग्यारहवीं को और ईसाले सवाब के दूसरे तरीक़ों को, कुछ मीलाद शरीफ़ और फ़ातिहा व तोशा की शीरीनी और तबर्रूक को, जो सब हलाल और पाक चीज़ें हैं, नाजायज़ और वर्जित बताते हैं.

(8) कि रसूल भेजता है, किताबें नाज़िल फ़रमाता है, और हलाल व हराम से बाख़बर फ़रमाता है.

सूरए यूनुस – सातवाँ रूकू

सूरए यूनुस – सातवाँ रूकू

और तुम किसी काम में हो(1)
और उसकी तरफ़ से कुछ क़ुरआन पढ़ो और तुम लोग(2)
कोई काम करो हम तुमपर गवाह होते हैं जब तुम उसको शुरू करते हो, और तुम्हारे रब से ज़र्रा भर कोई चीज़ ग़ायब नहीं ज़मीन में न आसमान में और न उससे छोटी और न उससे बड़ी कोई नहीं जो एक रौशन किताब में न हो (3){61}
सुन लो बेशक अल्लाह के वलियों पर न कुछ डर है न कुछ ग़म (4){62}
उन्हें ख़ुशख़बरी है दुनिया की ज़िन्दगी में (5)
और आख़िरत में, अल्लाह की बातें बदल नहीं सकती(6)
यही बड़ी कामयाबी है {64} और तुम उनकी बातों का ग़म न करो(7)
बेशक इज़्ज़त सारी अल्लाह ही के लिये है(8)
वही सुनता जानता है {65} सुन लो बेशक अल्लाह ही के मुल्क हैं जितने आसमानों में हैं और जितने ज़मीनों में (9)
और काहे के पीछे जा रहे हैं (10)
वो जो अल्लाह के सिवा शरीक पुकार रहे हैं, वो तो पीछे नहीं जाते मगर गुमान के और वो तो नहीं मगर अटकलें दौड़ाते(11){66}
वही है जिसने तुम्हारे लिये रात बनाई कि उसमें चैन पाओ और दिन बनाया तुम्हारी आँखें खोलता (13)
बेशक उसमें निशानियां हैं सुनने वालों के लिये (14){67}
बोले अल्लाह ने अपने लिये औलाद बनाई (15)
पाकी उसको, वही बेनियाज़ है, उसी का है जो कुछ आसमानों में और जो कुछ ज़मीन में(16)
तुम्हारे पास इसकी कोई भी सनद नहीं, क्या अल्लाह पर वह बात बताते हो जिसका तुम्हें इल्म नहीं {68} तुम फ़रमाओ वो जो अल्लाह पर झूट बांधते हैं उनका भला न होगा {69} दुनिया में कुछ बरत लेना है फिर उन्हें हमारी तरफ़ वापस आना फिर हम उन्हें सख़्त अज़ाब चखाएंगे बदला उनके कुफ़्र का{70}

सूरए यूनुस – सातवाँ रूकू

(1) ऐ हबीबे अकरम सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम.

(2) ऐ मुसलमानों.

(3) “किताबे मुबीन” यानी रौशन किताब से लोहे मेहफ़ूज़ मुराद है.

(4) “वली” की अस्ल विला से है जो क़ुर्ब और नुसरत के मानी में हैं. अल्लाह का वली वह है जो फ़र्ज़ों से अल्लाह का क़ुर्ब हासिल करें और अल्लाह की फ़रमाँबरदारी में लगा रहे और उसका दिल अल्लाह के जलाल के नूर को पहचानने में डूबा हो जब देखे, अल्लाह की क़ुदरत की दलीलों को देखे और जब सुने अल्लाह की आयतें ही सुने, और जब बोले तो अपने रब की प्रशंसा और तअरीफ़ ही के साथ बोले, और जब हरकत करे अल्लाह की आज्ञा के पालन में ही हरकत करे, और जब कोशिश करे उसी काम में कोशिश करे जो अल्लाह के क़रीब पहुंचने का ज़रिया हो. अल्लाह के ज़िक्र से न थके और दिल की आँख से ख़ुदा के सिवा ग़ैर को न देखे. यह विशेषता वलियों की है. बन्दा जब इस हाल पर पहुंचता है तो अल्लाह उसका वली और सहायक और मददगार होता है. मुतकल्लिमीन कहते हैं, वली वह है जो प्रमाण पर आधारित सही अक़ीदे रखता हो और शरीअत के मुताबिक़ नेक कर्म करता हो. कुछ आरिफ़ीन ने फ़रमाया कि विलायत नाम है अल्लाह के क़ुर्ब और अल्लाह के साथ मश्ग़ूल रहने का. जब बन्दा इस मक़ाम पर पहुंचता है तो उसको किसी चीज़ का डर नहीं रहता और न किसी चीज़ से मेहरूम होने का ग़म होता है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि वली वह है जिसे देखने से अल्लाह याद आए. सही तबरी की हदीस में भी है. इब्ने ज़ैद ने कहा कि वली वही है जिसमें वह सिफ़त और गुण हो जो इस आयत में बयान किया गया है. “अल्लज़ीना आमनू वकानू यत्तक़ून” यानी ईमान और तक़वा दोनो का संगम हो. कुछ उलमा ने फ़रमाया, वली वो है जो ख़ालिस अल्लाह के लिये महब्बत करें. वलियों की यह विशेषता कई हदीसों में आई है. कुछ बुज़ुर्गों ने फ़रमाया, वली वो हैं जो फ़रमाँबरदारी से अल्लाह के क़ुर्ब की तलब करते हैं और अल्लाह तआला करामत और बुज़ुर्गी से उनके काम बनाता है, या वो जिन की हिदायत के प्रमाण के साथ अल्लाह कफ़ील हो और वो उसकी बन्दगी का हक़ अदा करने और उसकी सृष्टि पर रहम करने के लिये वक़्फ हो गए. ये अर्थ और इबारतें अगरचे विभिन्न हैं लेकिन उनमें विरोधाभास कुछ भी नहीं है क्योंकि हर एक इबारत में वली की एक एक विशेषता बयान कर दी गई है जिसे अल्लाह का क़ुर्ब हासिल होता है. ये तमाम विशेषताएं और गुण उसमें होते हैं. विलायत के दर्जों और मरतबों में हर एक अपने दर्जें के हिसाब से बुज़ुर्गी और महानता रखता है.

(5) इस ख़ुशख़बरी से या तो वह मुराद है जो परहेज़गार ईमानदारों को क़ुरआन शरीफ़ में जा बजा दी गई है या बेहतरीन ख़्वाब मुराद हैं जो मूमिन देखता है या उसके लिये देखा जाता है जैसा कि बहुत सी हदीसों में आया है और इसका कारण यह है कि वली का दिल और उसकी आत्मा दोनों अल्लाह के ज़िक्र में डूबे रहते हैं. तो ख़्वाब के वक़्त अल्लाह के ज़िक्र के सिवा उसके दिल में कुछ नहीं होता. इसलिये वली जब ख़्वाब देखता है तो उसका ख़्वाब सच्चा और अल्लाह तआला की तरफ़ से उसके हक़ में ख़ुशख़बरी होती है. कुछ मुफ़स्सिरों ने इस ख़ुशख़बरी से दुनिया की नेकनामी भी मुराद ली है. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से अर्ज़ किया गया, उस शख़्स के लिये क्या इरशाद फ़रमाते हैं जो नेक कर्म करता है और लोग उसकी तारीफ़ करते हैं. फ़रमाया यह मूमिन के लिये ख़ुशख़बरी है. उलमा फ़रमाते हैं कि यह ख़ुशख़बरी अल्लाह की रज़ा और  अल्लाह के महब्बत फ़रमाने और सृष्टि के दिल में महब्बत डाल देने की दलील है, जैसा कि हदीस में आया है कि उसको ज़मीन में मक़बूल कर दिया जाता है. क़तादा ने कहा कि फ़रिश्ते मौत के समय अल्लाह तआला की तरफ़ से ख़ुशख़बरी देते हैं. अता का क़ौल है कि दुनिया की ख़ुशख़बरी तो वह है जो फ़रिश्ते मौत के समय सुनाते हैं और आख़िरत की ख़ुशख़बरी वह है जो मूमिन को जान निकलने के बाद सुनाई जाती है कि उससे अल्लाह राज़ी है.

(6) उसके वादे ख़िलाफ़ नहीं हो सकते जो उसने अपनी किताब में और अपने रसूलों की ज़बान से अपने वलियों और अपने फ़रमाँबरदार बन्दों से फ़रमाए.

(7) इसमें सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली फ़रमाई गई कि काफ़िर बदनसीब, जो आपको झुटलाते है और आपके ख़िलाफ़ बुरे बुरे मशवरे करते हैं, उसका कुछ ग़म न फ़रमाएं.

(8) वह जिसे चाहे इज़्ज़त दे और जिसे चाहे ज़लील करे. ऐ सैयदुल अम्बिया, वह आपका नासिर और मददगार है. उसने आपको और आपके सदक़े मे आपके फ़रमाँबरदारों को इज़्ज़त दी, जैसा कि दूसरी आयत में फ़रमाया कि अल्लाह के लिये इज़्ज़त है और उसके रसूल के लिये और ईमान वालों के लिये.

(9) सब उसके ममलूक अर्थात ग़ुलाम हैं. उसके तहत क़ुदरत और अधिकार, और जो ग़ुलाम है वह रब नहीं हो सकता. इसलिये अल्लाह के सिवा हर एक को पूजना ग़लत है. यह तौहीद की एक ऊमदा दलील है.

(10) यानी किस दलील का अनुकरण करते हैं. मुराद यह है कि उनके पास कोई दलील नहीं.

(11) और बेदलील केवल ग़लत गुमान से अपने बातिल और झूठे मअबूदों को ख़ुदा का शरीक ठहराते हैं, इसके बाद अल्लाह तआला अपनी क़ुदरत और नेअमत का इज़हार फ़रमाता है.

(12) और आराम करके दिन की थकन दूर करो.

(13) रौशन, ताकि तुम अपनी ज़रूरतों और रोज़ी रोटी के सामान पूरे कर सको.

(14) जो सुनें और समझें कि जिसने इन चीज़ों को पैदा किया, वही मअबूद है. उसका कोई शरीक नहीं. इसके बाद मुश्रिकों का एक कथन ज़िक्र फ़रमाता है.

(15) काफ़िरों का यह कलिमा अत्यन्त बुरा और इन्तिहा दर्जे की आज्ञानता का है. अल्लाह तआला इसका रद फ़रमाता है.

(16) यहाँ मुश्रिकों के इस कथन के तीन रद फ़रमाए, पहला रद तो कलिमए सुब्हानहू में है जिसमें बताया गया कि उसकी ज़ात बेटे या औलाद से पाक है कि वाहिदे हक़ीक़ी है, दूसरा रद हुवल ग़निय्यों फ़रमाने में है कि वह तमाम सृष्टि से बेनियाज़ है, तो औलाद उसके लिये कैसे हो सकती है. औलाद तो या कमज़ोर चाहते है जो उससे क़ुव्वत हासिल करें या फ़क़ीर चाहता है जो उससे मदद ले या ज़लील चाहता है जो उसके ज़रीये इज़्ज़त हासिल करे. ग़रज़ जो चाहता है वह हाजत रखता है. तो जो ग़नी हो या ग़ैर मोहताज़ हो उसके लिये औलाद किस तरह हो सकती है. इसके अलावा बेटा वालिद का एक हिस्सा होता है, तो वालिद होना, मिश्रित होना ज़रूरी, और मिश्रित होना संभव होने को, और हर संभव ग़ैर का मोहताज़ है, तो हादिस हुआ, लिहाज़ा मुहाल हुआ कि ग़नी क़दीम के बेटा हो, तीसरा रद लूह मा फ़िस्समावाते वमा फ़िल अर्दे मे है कि सारी सृष्टि उसकी ममलूक है और ममलूक होना बेटा होने के साथ नहीं जमा होता, लिहाज़ा उनमें से कोई उसकी औलाद नहीं हो सकती.