सूरए यूनुस – सातवाँ रूकू

सूरए यूनुस – सातवाँ रूकू

और तुम किसी काम में हो(1)
और उसकी तरफ़ से कुछ क़ुरआन पढ़ो और तुम लोग(2)
कोई काम करो हम तुमपर गवाह होते हैं जब तुम उसको शुरू करते हो, और तुम्हारे रब से ज़र्रा भर कोई चीज़ ग़ायब नहीं ज़मीन में न आसमान में और न उससे छोटी और न उससे बड़ी कोई नहीं जो एक रौशन किताब में न हो (3){61}
सुन लो बेशक अल्लाह के वलियों पर न कुछ डर है न कुछ ग़म (4){62}
उन्हें ख़ुशख़बरी है दुनिया की ज़िन्दगी में (5)
और आख़िरत में, अल्लाह की बातें बदल नहीं सकती(6)
यही बड़ी कामयाबी है {64} और तुम उनकी बातों का ग़म न करो(7)
बेशक इज़्ज़त सारी अल्लाह ही के लिये है(8)
वही सुनता जानता है {65} सुन लो बेशक अल्लाह ही के मुल्क हैं जितने आसमानों में हैं और जितने ज़मीनों में (9)
और काहे के पीछे जा रहे हैं (10)
वो जो अल्लाह के सिवा शरीक पुकार रहे हैं, वो तो पीछे नहीं जाते मगर गुमान के और वो तो नहीं मगर अटकलें दौड़ाते(11){66}
वही है जिसने तुम्हारे लिये रात बनाई कि उसमें चैन पाओ और दिन बनाया तुम्हारी आँखें खोलता (13)
बेशक उसमें निशानियां हैं सुनने वालों के लिये (14){67}
बोले अल्लाह ने अपने लिये औलाद बनाई (15)
पाकी उसको, वही बेनियाज़ है, उसी का है जो कुछ आसमानों में और जो कुछ ज़मीन में(16)
तुम्हारे पास इसकी कोई भी सनद नहीं, क्या अल्लाह पर वह बात बताते हो जिसका तुम्हें इल्म नहीं {68} तुम फ़रमाओ वो जो अल्लाह पर झूट बांधते हैं उनका भला न होगा {69} दुनिया में कुछ बरत लेना है फिर उन्हें हमारी तरफ़ वापस आना फिर हम उन्हें सख़्त अज़ाब चखाएंगे बदला उनके कुफ़्र का{70}

सूरए यूनुस – सातवाँ रूकू

(1) ऐ हबीबे अकरम सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम.

(2) ऐ मुसलमानों.

(3) “किताबे मुबीन” यानी रौशन किताब से लोहे मेहफ़ूज़ मुराद है.

(4) “वली” की अस्ल विला से है जो क़ुर्ब और नुसरत के मानी में हैं. अल्लाह का वली वह है जो फ़र्ज़ों से अल्लाह का क़ुर्ब हासिल करें और अल्लाह की फ़रमाँबरदारी में लगा रहे और उसका दिल अल्लाह के जलाल के नूर को पहचानने में डूबा हो जब देखे, अल्लाह की क़ुदरत की दलीलों को देखे और जब सुने अल्लाह की आयतें ही सुने, और जब बोले तो अपने रब की प्रशंसा और तअरीफ़ ही के साथ बोले, और जब हरकत करे अल्लाह की आज्ञा के पालन में ही हरकत करे, और जब कोशिश करे उसी काम में कोशिश करे जो अल्लाह के क़रीब पहुंचने का ज़रिया हो. अल्लाह के ज़िक्र से न थके और दिल की आँख से ख़ुदा के सिवा ग़ैर को न देखे. यह विशेषता वलियों की है. बन्दा जब इस हाल पर पहुंचता है तो अल्लाह उसका वली और सहायक और मददगार होता है. मुतकल्लिमीन कहते हैं, वली वह है जो प्रमाण पर आधारित सही अक़ीदे रखता हो और शरीअत के मुताबिक़ नेक कर्म करता हो. कुछ आरिफ़ीन ने फ़रमाया कि विलायत नाम है अल्लाह के क़ुर्ब और अल्लाह के साथ मश्ग़ूल रहने का. जब बन्दा इस मक़ाम पर पहुंचता है तो उसको किसी चीज़ का डर नहीं रहता और न किसी चीज़ से मेहरूम होने का ग़म होता है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि वली वह है जिसे देखने से अल्लाह याद आए. सही तबरी की हदीस में भी है. इब्ने ज़ैद ने कहा कि वली वही है जिसमें वह सिफ़त और गुण हो जो इस आयत में बयान किया गया है. “अल्लज़ीना आमनू वकानू यत्तक़ून” यानी ईमान और तक़वा दोनो का संगम हो. कुछ उलमा ने फ़रमाया, वली वो है जो ख़ालिस अल्लाह के लिये महब्बत करें. वलियों की यह विशेषता कई हदीसों में आई है. कुछ बुज़ुर्गों ने फ़रमाया, वली वो हैं जो फ़रमाँबरदारी से अल्लाह के क़ुर्ब की तलब करते हैं और अल्लाह तआला करामत और बुज़ुर्गी से उनके काम बनाता है, या वो जिन की हिदायत के प्रमाण के साथ अल्लाह कफ़ील हो और वो उसकी बन्दगी का हक़ अदा करने और उसकी सृष्टि पर रहम करने के लिये वक़्फ हो गए. ये अर्थ और इबारतें अगरचे विभिन्न हैं लेकिन उनमें विरोधाभास कुछ भी नहीं है क्योंकि हर एक इबारत में वली की एक एक विशेषता बयान कर दी गई है जिसे अल्लाह का क़ुर्ब हासिल होता है. ये तमाम विशेषताएं और गुण उसमें होते हैं. विलायत के दर्जों और मरतबों में हर एक अपने दर्जें के हिसाब से बुज़ुर्गी और महानता रखता है.

(5) इस ख़ुशख़बरी से या तो वह मुराद है जो परहेज़गार ईमानदारों को क़ुरआन शरीफ़ में जा बजा दी गई है या बेहतरीन ख़्वाब मुराद हैं जो मूमिन देखता है या उसके लिये देखा जाता है जैसा कि बहुत सी हदीसों में आया है और इसका कारण यह है कि वली का दिल और उसकी आत्मा दोनों अल्लाह के ज़िक्र में डूबे रहते हैं. तो ख़्वाब के वक़्त अल्लाह के ज़िक्र के सिवा उसके दिल में कुछ नहीं होता. इसलिये वली जब ख़्वाब देखता है तो उसका ख़्वाब सच्चा और अल्लाह तआला की तरफ़ से उसके हक़ में ख़ुशख़बरी होती है. कुछ मुफ़स्सिरों ने इस ख़ुशख़बरी से दुनिया की नेकनामी भी मुराद ली है. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से अर्ज़ किया गया, उस शख़्स के लिये क्या इरशाद फ़रमाते हैं जो नेक कर्म करता है और लोग उसकी तारीफ़ करते हैं. फ़रमाया यह मूमिन के लिये ख़ुशख़बरी है. उलमा फ़रमाते हैं कि यह ख़ुशख़बरी अल्लाह की रज़ा और  अल्लाह के महब्बत फ़रमाने और सृष्टि के दिल में महब्बत डाल देने की दलील है, जैसा कि हदीस में आया है कि उसको ज़मीन में मक़बूल कर दिया जाता है. क़तादा ने कहा कि फ़रिश्ते मौत के समय अल्लाह तआला की तरफ़ से ख़ुशख़बरी देते हैं. अता का क़ौल है कि दुनिया की ख़ुशख़बरी तो वह है जो फ़रिश्ते मौत के समय सुनाते हैं और आख़िरत की ख़ुशख़बरी वह है जो मूमिन को जान निकलने के बाद सुनाई जाती है कि उससे अल्लाह राज़ी है.

(6) उसके वादे ख़िलाफ़ नहीं हो सकते जो उसने अपनी किताब में और अपने रसूलों की ज़बान से अपने वलियों और अपने फ़रमाँबरदार बन्दों से फ़रमाए.

(7) इसमें सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली फ़रमाई गई कि काफ़िर बदनसीब, जो आपको झुटलाते है और आपके ख़िलाफ़ बुरे बुरे मशवरे करते हैं, उसका कुछ ग़म न फ़रमाएं.

(8) वह जिसे चाहे इज़्ज़त दे और जिसे चाहे ज़लील करे. ऐ सैयदुल अम्बिया, वह आपका नासिर और मददगार है. उसने आपको और आपके सदक़े मे आपके फ़रमाँबरदारों को इज़्ज़त दी, जैसा कि दूसरी आयत में फ़रमाया कि अल्लाह के लिये इज़्ज़त है और उसके रसूल के लिये और ईमान वालों के लिये.

(9) सब उसके ममलूक अर्थात ग़ुलाम हैं. उसके तहत क़ुदरत और अधिकार, और जो ग़ुलाम है वह रब नहीं हो सकता. इसलिये अल्लाह के सिवा हर एक को पूजना ग़लत है. यह तौहीद की एक ऊमदा दलील है.

(10) यानी किस दलील का अनुकरण करते हैं. मुराद यह है कि उनके पास कोई दलील नहीं.

(11) और बेदलील केवल ग़लत गुमान से अपने बातिल और झूठे मअबूदों को ख़ुदा का शरीक ठहराते हैं, इसके बाद अल्लाह तआला अपनी क़ुदरत और नेअमत का इज़हार फ़रमाता है.

(12) और आराम करके दिन की थकन दूर करो.

(13) रौशन, ताकि तुम अपनी ज़रूरतों और रोज़ी रोटी के सामान पूरे कर सको.

(14) जो सुनें और समझें कि जिसने इन चीज़ों को पैदा किया, वही मअबूद है. उसका कोई शरीक नहीं. इसके बाद मुश्रिकों का एक कथन ज़िक्र फ़रमाता है.

(15) काफ़िरों का यह कलिमा अत्यन्त बुरा और इन्तिहा दर्जे की आज्ञानता का है. अल्लाह तआला इसका रद फ़रमाता है.

(16) यहाँ मुश्रिकों के इस कथन के तीन रद फ़रमाए, पहला रद तो कलिमए सुब्हानहू में है जिसमें बताया गया कि उसकी ज़ात बेटे या औलाद से पाक है कि वाहिदे हक़ीक़ी है, दूसरा रद हुवल ग़निय्यों फ़रमाने में है कि वह तमाम सृष्टि से बेनियाज़ है, तो औलाद उसके लिये कैसे हो सकती है. औलाद तो या कमज़ोर चाहते है जो उससे क़ुव्वत हासिल करें या फ़क़ीर चाहता है जो उससे मदद ले या ज़लील चाहता है जो उसके ज़रीये इज़्ज़त हासिल करे. ग़रज़ जो चाहता है वह हाजत रखता है. तो जो ग़नी हो या ग़ैर मोहताज़ हो उसके लिये औलाद किस तरह हो सकती है. इसके अलावा बेटा वालिद का एक हिस्सा होता है, तो वालिद होना, मिश्रित होना ज़रूरी, और मिश्रित होना संभव होने को, और हर संभव ग़ैर का मोहताज़ है, तो हादिस हुआ, लिहाज़ा मुहाल हुआ कि ग़नी क़दीम के बेटा हो, तीसरा रद लूह मा फ़िस्समावाते वमा फ़िल अर्दे मे है कि सारी सृष्टि उसकी ममलूक है और ममलूक होना बेटा होने के साथ नहीं जमा होता, लिहाज़ा उनमें से कोई उसकी औलाद नहीं हो सकती.

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