सूरए यूनुस – पाँचवां रूकू

सूरए यूनुस – पाँचवां रूकू

और अगर वो तुम्हें झुटलाएं (1)
तो फ़रमा दो कि मेरे लिये मेरी करनी और तुम्हारे लिये तुम्हारी करनी (2)
तुम्हें मेरे काम से इलाक़ा नहीं और मुझे तुम्हारे काम से तअल्लुक़ नहीं (3){41}
और उनमें कोई वो हैं जो तुम्हारी तरफ़ कान लगाते हैं(4)
तो क्या तुम बहरों को सुना दोगे अगरचे उन्हें अक़ल न हो (5){42}
और उनमें कोई तुम्हारी तरफ़ तकता है(6)
क्या तुम अंधों को राह दिखा दोगे अगरचे वो न सूझें{43} बेशक अल्लाह लोगों पर कुछ ज़ुल्म नहीं करता(7)
हाँ लोग ही अपनी जानों पर ज़ुल्म करते हैं (8){44}
और जिस दिन उन्हें उठाएगा(9)
मानों दुनिया में न रहे थे मगर उस दिन की एक घड़ी (10)
आपस में पहचान करेंगे(11)
कि पूरे घाटे में रहे वो जिन्होंने अल्लाह से मिलने को झूटलाया और हिदायत पर न थे(12){45}
और अगर हम तुम्हें दिखा दें कुछ (13)
उसमें से जो उन्हें वादा दे रहे हैं (14)
या तुम्हें पहले ही अपने पास बुला ले(15)
हर हाल में उन्हें हमारी तरफ़ पलट कर आना है फिर अल्लाह गवाह है (16)
उनके कामों पर {46} और हर उम्मत में एक रसूल हुआ (17)
जब उसका रसूल उनके पास आता(18)
उनपर इन्साफ़ का फ़ैसला कर दिया जाता (19)
और उनपर ज़ुल्म न होता {47} और कहते हैं यह वादा कब आएगा अगर तुम सच्चे हो (20){48}
तुम फ़रमाओ मैं अपनी जान के बुरे भले का (ज़ाती) इख़्तियार नहीं रखता मगर जो अल्लाह चाहे(21)
हर गिरोह का एक वादा है(22)
जब उनका वादा आएगा तो एक घड़ी न पीछे हटे न आगे बढ़े {49} तुम फरमाओ भला बताओ तो अगर उसका अज़ाब और(23)
तुमपर रात को आए (24)
या दिन को (25)
तो उसमें वह कौन सी चीज़ है कि मुजरिमों को जिसकी जल्दी है {50} तो क्या जब(26)
हो पड़ेगा उस वक़्त उसका यक़ीन करेंगे(27)
क्यों अब मानते हो पहले तो (28)
इसकी जल्दी मचा रहे थे {51} फिर ज़ालिमों से कहा जाएगा हमेशा का अज़ाब चखो तुम्हें कुछ और बदला न मिलेगा मगर वही जो कमाते थे (29){52}
और तुमसे पूछते हैं क्या वह (30) हक़ है, तुम फ़रमाओ, हाँ मेरे रब की क़सम बेशक वह ज़रूर हक़ है और तुम कुछ थका न सकोगे(31){53}

तफ़सीर
सूरए यूनुस – पाँचवां रूकू

(1) ऐ मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, और उनकी राह पर आने और सच्चाई और हिदायत क़ुबूल करने की उम्मीद टूट जाए.

(2) हर एक अपने अमल का बदला पाएगा.

(3) किसी के अमल पर दूसरे की पकड़ न होगी. जो पकड़ा जाएगा अपने कर्मों पर पकड़ा जाएगा. यह फ़रमान चेतावनी के तौर पर है कि तुम नसीहत नहीं मानते और हिदायत क़ुबूल नहीं करते तो इसका वबाल ख़ुद तुमपर होगा, किसी दूसरे को इससे नुक़सान नहीं.

(4) और आपसे क़ुरआन शरीफ़ और दीन के अहकाम सुनते हैं और दुश्मनी की वजह से दिल में जगह नहीं देते और क़ुबूल नहीं करते, तो यह सुनना बेकार है, वो हिदायत से नफ़ा न पाने में बेहरों की तरह हैं.

(5) और वो न हवास से काम लें न अक़्ल से.

(6) और सच्चाई की दलीलों और नबुव्वत की निशानियों को देखता है, लेकिन तस्दीक़ नहीं करता और इस देखने से नतीजा नहीं निकलता, फ़ायदा नहीं उठाता, दिल की नज़र से मेहरूम और बातिन यानी अन्दर का अन्धा है.

(7) बल्कि उन्हें हिदायत और राह पाने के सारे सामान अता फ़रमाता है और रौशन दलीलें क़ायम फ़रमाता है.

(8) कि इन दलीलों में ग़ौर नहीं करते और सच्चाई साफ़ स्पष्ट हो जाने के बावुजूद ख़ुद गुमराही में गिरफ़्तार होते हैं.

(9) क़ब्रों से, हिसाब के मैदान में हाज़िर करने के लिये, तो उस दिन की हैबत और वहशत से यह हाल होगा कि वो दुनिया में रहने की मुद्दत को बहुत थोड़ा समझेंगे और यह ख़याल करेंगे कि….

(10) और इसकी वजह यह है कि चूंकि काफ़िरों ने दुनिया की चाह में उम्रें नष्ट कर दीं और अल्लाह की फ़रमाँबरदारी, जो आज काम आती, बजा न लाए तो उनकी ज़िन्दगी का वक़्त उनके काम न आया. इसलिये वो उसे बहुत ही कम समझेंगे.

(11) क़ब्रों से निकलते वक़्त तो एक दूसरे को पहचानेंगे जैसा दुनिया में पहचानते थे, फिर क़यामत के दिन की हौल और दहशतनाक मन्ज़र देखकर यह पहचान बाक़ी न रहेगी. एक क़ौल यह है कि क़यामत के दिन पल पल हाल बदलेंगे. कभी ऐसा हाल होगा कि एक दूसरे को पहचानेंगे, कभी ऐसा कि न पहचानेंगे और जब पहचानेंगे तो कहेंगे.

(12) जो उन्हें घाटे से बचाती.

(13)अज़ाब.

(14) दुनिया ही में आपके ज़मानए हयात में, तो वह मुलाहिज़ा कीजिये.

(15) तो आख़िरत में आपको उनका अज़ाब दिखाएंगे.  इस आयत से साबित हुआ कि अल्लाह तआला अपने रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को काफ़िरों के बहुत से अज़ाब और उनकी ज़िल्लत और रूसवाइयाँ आपकी दुनियावी ज़िन्दगी ही में दिखाएगा. चुनांचे बद्र वग़ैरह में दिखाई गई और जो अज़ाब काफ़िरों के लिये कुफ़्र और झुटलाने के कारण आख़िरत में मुक़र्रर फ़रमाता है वह आख़िरत में दिखाएगा.

(16) ख़बर वाला है, अज़ाब देने वाला है.

(17) जो उन्हें सच्चाई की तरफ़ बुलाता और फ़रमाबँरदारी और ईमान का हुक्म करता.

(18) और अल्लाह के आदेशों की तबलीग़ या प्रचार करता, तो कुछ लोग ईमान लाते और कुछ झुटलाते और कुछ इन्कारी हो जाते हो.

(19) कि रसूल को और उनपर ईमान लाने वाले को निजात दी जाती और झुटलाने वालों को अज़ाब से हलाक कर दिया जाता. आयत की तफ़सीर में दूसरा क़ौल यह है कि इस में आख़िरत का बयान है और मानी ये हैं कि क़यामत के दिन हर उम्मत के लिये एक रसूल होगा जिसकी तरफ़ वह मन्सूब होगी. जब वह रसूल हिसाब के मैदान में आएगा और मूमिन व काफ़िर पर शहदात देगा तब उनमें फ़ैसला किया जायगा कि ईमान वालों को निजात होगी और काफ़िर अज़ाब में जकड़े जायेंगे.

(20) जब आयत “इम्मा नूरियन्नका” में अज़ाब की चेतावनी दी गई तो काफ़िरों ने सरकशी से यह कहा कि ऐ मुहम्मद, जिस अज़ाब का आप वादा देते हैं वह कब आएगा. उसमें क्या देर है. उस अज़ाब को जल्द लाइये. इसपर यह आयत उतरी.

(21) यानी दुश्मनों पर अज़ाब उतरना और दोस्तों की मदद करना और उन्हें ग़ल्बा देना, यह सब अल्लाह की मर्ज़ी है और अल्लाह की मर्ज़ी में.

(22) उसके हलाक और अज़ाब का एक समय निर्धारित है, लौहे मेहफ़ूज़ में लिखा हुआ है.

(23) जिसकी तुम जल्दी करते हो.

(24) जब तुम ग़ाफ़िल पड़े सोते हो.

(25) जब तुम रोज़ी रोटी के कामों में मश्ग़ूल हो.

(26) वह अज़ाब तुम पर नाज़िल.

(27) उस वक़्त का यक़ीन कुछ फ़ायदा न देगा और कहा जाएगा.

(28) झुटलाने और मज़ाक़ उड़ाने के तौर पर.

(29) यानी दुनिया में जो अमल करते थे और नबियों को झुटलाने और कुफ़्र में लगे रहते थे उसी का बदला.

(30) उठाए जाने और अज़ाब, जिसके नाज़िल होने की आपने हमें ख़बर दी.

(31) यानी वह अज़ाब तुम्हें ज़रूर पहुंचेगा.

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