सूरए यूनुस – दूसरा रूकू

सूरए यूनुस – दूसरा रूकू

और अगर अल्लाह लोगों पर बुराई ऐसी जल्द भेजता जैसी वह भलाई की जल्दी करते हैं तो उनका वादा पूरा हो चुका होता(1)
तो हम छोड़ते उन्हें जो हमसे मिलने की उम्मीद नहीं रखते कि अपनी सरकशी (विद्रोह) में भटका करें(2){11}
और जब आदमी को(3)
तकलीफ़ पहुंचती है हमें पुकारता है लेटे और बैठे और खड़े (4)
फिर जब हम उसकी तकलीफ़ दूर कर देते हैं चल देता है(5)
गोया कभी किसी तकलीफ़ के पहुंचने पर हमें पुकारा ही न था, यूंही भले कर दिखाए है हद से बढ़ने वाले को(6)
उनके काम(7){12}
और बेशक हमने तुमसे पहली संगतें(8)
हलाक फ़रमादीं जब वो हद से बढ़े(9)
और उनके रसूल उनके पास रौशन दलीलें लेकर आए(10)
और वो ऐसे थे ही नहीं कि ईमान लाते, हम यूंही बदला देते हैं मुजरिमों को {13} फिर हमने उनके बाद तुम्हें ज़मीन में जानशीन किया कि देखें तुम कैसे काम करते हो(11){14}
और जब उनपर हमारी रौशन आयतें (12)
पढ़ी जाती हैं तो वो कहने लगते हैं जिन्हें हमसे मिलने की उम्मीद नहीं(13)
कि इसके सिवा और क़ुरआन ले आइये(14)
या इसी को बदल दीजिये (15)
तुम फ़रमाओ मुझे नहीं पहुंचता कि मैं इसे अपनी तरफ़ से बदल दूं, मैं तो उसी का ताबे (अधीन) हूँ जो मेरी तरफ़ वही (देववाणी) होती है (16)
मैं अपने रब की नाफ़रमानी करूं(17)
तो मुझे बड़े दिन के अज़ाब का डर है(18){15}
तुम फ़रमाओ अगर अल्लाह चाहता तो मैं इसे तुमपर न पढ़ता न वह तुमको उससे ख़बरदार करता(19)
तो मैं इससे पहले तुम में अपनी एक उम्र गुज़ार चुका हुँ (20)
तो क्या तुम्हें अक़ल नहीं (21){16}
तो उससे बढ़कर ज़ालिम कौन जो अल्लाह पर झूट बांधे(22)
या उसकी आयतें झुटलाए, बेशक मुजरिमों का भला न होगा {17}और अल्लाह के सिवा ऐसी चीज़ (23)
को पूजते हैं जो उनका कुछ भला न करे और कहते हैं कि यह अल्लाह के यहाँ हमारे सिफ़ारिशी हैं(24)
तुम फ़रमाओ क्या अल्लाह को वह बात बताते हो जो उसके इल्म में न आसमानों में है न ज़मीन में(25)
उसे पाकी और बरतरी है उनके शिर्क से {18} और लोग एक ही उम्मत थे (26)
फिर मुख़्तलिफ़ हुए और अगर तेरे रब की तरफ़ से एक बात पहले न हो चुकी होती (27)
तो यहीं उनके इख़्तिलाफ़ों का उनपर फ़ैसला हो गया होता(28){19}
और कहते हैं उनपर उनके रब की तरफ़ से कोई निशानी क्यों नहीं उतरी(29)
तुम फ़रमाओ ग़ैब तो अल्लाह के लिये है अब रास्ता देखों, मैं भी तुम्हारे साथ राह देख रहा हूँ{20}

तफ़सीर
सूरए यूनुस – दूसरा रूकू    

(1) यानी अगर अल्लाह तआला लोगों की बद . दुआएं, जैसे कि वो ग़ज़ब के वक़्त अपने लिये अपने बाल बच्चों और माल के लिये करते हैं, और कहते हैं हम हलाक हो जाएं, ख़ुदा हमें ग़ारत करे, बर्बाद करें और ऐसे ही कलिमें अपनी औलाद और रिश्तेदारों के लिये कह गुज़रते हैं, जिसे हिन्दी में कोसना कहते हैं, अगर वह दुआ ऐसी जल्दी क़ुबूल करली जाती जैसी जल्दी वो अच्छाई की दुआओ के क़ुबूल होने में चाहते हैं, तो उन लोगों का अन्त हो चुका होता और वो कब के हलाक हो गए होते, लेकिन अल्लाह तआला अपने करम से भलाई की दुआ क़ुबूल फ़रमाने में जल्दी करता है, बद-दुआ के क़ुबूल में नहीं, नज़र बिन हारिस ने कहा था या रब, यह दीने इस्लाम अगर तेरे नज़दीक सच्चा है तो हमारे ऊपर आसमान से पत्थर बरसा. इसपर यह आयत उतरी और बताया गया कि अगर अल्लाह तआला काफ़िरों के अज़ाब में जल्दी फ़रमाता, जैसा कि उनके लिये माल और औलाद वग़ैरह दुनिया की भलाई देने में जल्दी फ़रमाई, तो वो सब हलाक हो चुके होते.

(2) और हम उन्हें मोहलत देते हैं और उनके अज़ाब में जल्दी नहीं करते.

(3) यहाँ आदमी से काफ़िर मुराद हैं.

(4) हर हाल में, और जब तक उसकी तकलीफ़ दूर न हो, दुआ में मश़्गूल रहता है.

(5) अपने पहले तरीक़े पर, और वही कुफ़्र की राह अपनाता है और तकलीफ़ के वक़्त को भूल जाता है.

(6) यानी काफ़िरों को.

(7) मक़सद यह है कि इन्सान बला के वक़्त बहुत ही बेसब्रा है और राहत के वक़्त बहुत नाशुक्रा. जब तकलीफ़ पहुंचती है तो ख़ड़े लेटे बैठे हर हाल में दुआ करता है. जब अल्लाह तकलीफ़ दूर कर देता है तो शुक्र नहीं अदा करता और अपनी पहली हालत की तरफ़ लौट जाता है. यह हाल ग़ाफ़िल का है. अक़्ल वाले मूमिन का हाल इसके विपरीत है. वह मुसीबत और बला पर सब्र करता है, राहत और आसायश में शुक्र करता है. तकलीफ़ और राहत की सारी हालतों में अल्लाह के समक्ष गिड़गिड़ाता और दुआ करता है. एक मक़ाम इससे भी ऊंचा है, जो ईमान वालों में भी ख़ास बन्दों को हासिल है कि जब कोई मुसीबत और बला आती है, उस पर सब्र करते हैं. अल्लाह की मर्ज़ी पर दिल से राज़ी रहते हैं और हर हाल में शुक्र करते हैं.

(8) यानी उम्मतें हैं.

(9) और कुफ़्र में जकड़े गए.

(10) जो उनकी सच्चाई की बहुत साफ़ दलीलें थीं, उन्होंने न माना और नबियों की तसदीक़ न की.

(11) ताकि तुम्हारे साथ तुम्हारे कर्मों के हिसाब से मामला फ़रमाएं.

(12) जिनमें हमारी तौहीद और बुत परस्ती की बुराई और बुत परस्तों की सज़ा का बयान है.

(13)और आख़िरत पर ईमान नहीं रखते.

(14) जिसमें बुतों की बुराई न हो.

(15) काफ़िरों की एक जमाअत ने नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर होकर कहा कि अगर आप चाहते हैं कि हम आप पर ईमान ले आएं तो आप इस क़ुरआन के सिवा दूसरा क़ुरआन लाइये जिसमें लात, उज़्ज़ा और मनात वग़ैरह देवी देवताओ की बुराई और उनकी पूजा छोड़ने का हुक्म न हो और अगर अल्लाह ऐसा क़ुरआन न उतारे तो आप अपनी तरफ़ से बना लीजिये या उसी क़ुरआन को बदल कर हमारी मर्ज़ी के मुताबिक़ कर दीजिये तो हम आप पर ईमान ले आएंगे, उनका यह कलाम या तो मज़ाक उड़ाने के तौर पर था या उन्होंने तजुर्बें और इम्तिहान के लिये ऐसा कहा था कि अगर यह दूसरा क़ुरआन बना लाएं या इसको बदल दें तो साबित हो जाएगा कि क़ुरआन अल्लाह की तरफ़ से नहीं है. अल्लाह तआला ने अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को हुक्म दिया कि इसका यह जवाब दें जो आयत में बयान होता है.

(16) मैं इसमें कोई परिवर्तन, फेर बदल, कमी बेशी नहीं कर सकता. ये मेरा कलाम नहीं, अल्लाह का कलाम है.

(17) या उसकी किताब के आदेशों को बदलूं.

(18) और दूसरा क़ुरआन बनाना इन्सान की क्षमता ही से बाहर है और सृष्टि का इससे मजबूर होना ख़ूब ज़ाहिर हो चुका है.

(19) यानी इसकी तिलावत और पाठ केवल अल्लाह की मर्ज़ी से है.

(20) और चालीस साल तुम में रहा हूँ इस ज़माने में मैं तुम्हारे पास कुछ नहीं लाया और मैं ने तुम्हें कुछ नहीं सुनाया. तुमने मेरे हालात को ख़ूब देखा परखा है. मैं ने किसी से एक अक्षर नहीं, पढ़ा किसी किताब का अध्ययन नहीं किया. इसके बाद यह महान किताब लाया जिसके सामने हर एक कलाम तुच्छ और निरर्थक हो गया. इस किताब में नफ़ीस उलूम हैं, उसूल और अक़ीदे हैं, आदेश और संस्कार हैं, और सदव्यवहार की तालीम है, ग़ैबी ख़बरें हैं. इसकी फ़साहत व बलाग़त ने प्रदेश भर के बोलने वालों और भाषा शाख़ियों को गूंगा बहरा बना दिया है. हर समझ वाले के लिये यह बात सूरज से ज़्यादा रौशन हो गई है कि यह अल्लाह की तरफ़ से भेजी गई वही के बिना सम्भव ही नहीं,.

(21) कि इतना समझ सको कि यह क़ुरआन अल्लाह की तरफ़ से है, बन्दों की क़ुदरत नहीं कि इस जैसा बना सकें.

(22) उसके लिये शरीक बताए.

(23) बुत.

(24) यानी दुनिया के कामों में, क्योंकि आख़िरत और मरने के बाद उठने का तो वो अक़ीदा ही नहीं रखते.

(25) यानी उसका वुजूद ही नहीं, क्योंकि जो चीज़ मौजूद है, वह ज़रूर अल्लाह के इल्म में है.

(26) एक  दीने इस्लाम पर, जैसा कि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के ज़माने में क़ाबील के हाबील को क़त्ल करने के वक़्त आदम अलैहिस्सलाम और उनकी सन्तान एक ही दीन पर थे. इसके बाद उनमें मतभेद हुआ. एक क़ौल यह है कि नूह अलैहिस्सलाम तक एक दीन पर रहे फिर मतभेद हुआ तो नूह अलैहिस्सलाम भेजे गए. एक क़ौल यह है कि नूह अलैहिस्सलाम के किश्ती से उतरते वक़्त सब लोग एक ही दीन पर थे. एक क़ौल यह है कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के एहद से सब लोग एक दीन पर थे यहाँ तक कि अम्र बिन लहयी ने दीन बदला. इस सूरत में “अन्नास” से मुराद ख़ास अरब होंगे. एक क़ौल यह है कि लोग एक दीन पर थे यानी कुफ़्र पर. अल्लाह तआला ने नबियों को भेजा, तो कुछ उनमें से ईमान लाए. कुछ उलमा ने कहा कि मानी ये हैं कि लोग अपनी पैदायश में नेक प्रकृति पर थे फिर उन में मतभेद हुआ. हदीस शरीफ़ में है, हर बच्चा फ़ितरत पर पैदा होता है, फिर उसके माँ बाप उसको यहूदी बनाते हैं या ईसाई बनाते है या मजूसी बनाते हैं. हदीस में फ़ितरत से फ़ितरते इस्लाम मुराद है.

(27) और हर उम्मत के लिये एक मीआद निश्चित न कर दी गई होती या आमाल का बदला क़यामत तक उठाकर न रखा गया होता.

(28) अज़ाब उतरने से.

(29) एहले बातिल का तरीक़ा है कि जब उनके ख़िलाफ़ मज़बूत दलील क़ायम होती है और वो जवाब से लाचार हो जाते हैं, तो उस दलील का ज़िक्र इस तरह छोड़ देते हैं जैसे कि वह पेश ही नहीं हुई और यह कहा करते हैं कि दलील लाओ ताकि सुनने वाले इस भ्रम में पड़ जाएं कि उनके मुक़ाबले में अब तक कोई दलील ही क़ायम नहीं की गई है. इस तरह काफ़िरों ने हुज़ूर के चमत्कार विशेषत: क़ुरआन शरीफ़ जो सबसे बड़ा चमत्कार है, उसकी तरफ़ से आँखें बन्द करके यह कहना शुरू किया कि कोई निशानी क्यों नहीं उतरी.मानो कि चमत्कार उन्होंने देखे ही नहीं और क़ुरआने पाक को वो निशानी समझते ही नहीं. अल्लाह तआला ने अपने रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से फ़रमाया कि आप फ़रमा दीजिये कि ग़ैब तो अल्लाह के लिये है, अब रास्ता देखो, मैं भी तुम्हारे साथ राह देख रहा हूँ. तक़रीर का जवाब यह है कि खुली दलील इस पर क़ायम है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर क़ुरआने पाक का ज़ाहिर होना बहुत ही अज़ीमुश-शान चमत्कार है क्योंकि हुज़ूर उनमें पैदा हुए, उनके बीच पले बढ़े. तमाम ज़माने हुज़ूर के उनकी आँखों के सामने गुज़रे. वो ख़ूब जानते हैं कि आप ने न किसी किताब का अध्ययन किया न किसी उस्ताद की शागिर्दी की. यकबारगी क़ुरआन आप पर ज़ाहिर हुआ और ऐसी बेमिसाल आलातरीन किताब का ऐसी शान के साथ उतरना वही के बग़ैर सम्भव ही नहीं. यह क़ुरआन के खुले चमत्कार होने की दलील है. और जब ऐसी मज़बूत दलील क़ायम है तो नबुव्वत का इक़रार करने के लिये किसी दूसरी निशानी का तलब करना बिल्कुल ग़ैर ज़रूरी है. ऐसी हालत में  इस निशानी का उतारना या न उतारना अल्लाह तआला की मर्ज़ी पर है, चाहे करे चाहे न करे. तो यह काम ग़ैब हुआ और इसके लिये इन्तिज़ार लाज़िम आया कि अल्लाह क्या करता है. लेकिन वह ग़ैर ज़रूरी निशानी जो काफ़िरों ने तलब की है, उतारे या न उतारे. नबुव्वत साबित हो चुकी और रिसालत का सुबूत चमत्कारों से कमाल को पहुंच चुका.

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