सूरए यूनुस – तीसरा रूकू

सूरए यूनुस – तीसरा रूकू

और जब कि हम आदमियों को रहमत का मज़ा देते हैं किसी तकलीफ़ के बाद जो उन्हें पहुंची थी जभी वो हमारी आयतों के साथ दाव चलते हैं (1)
तुम फ़रमा दो अल्लाह की ख़ुफ़िया तदबीर सबसे जल्द हो जाती है(2)
बेशक हमारे फ़रिश्ते तुम्हारे मक्र (कपट) लिख रहे हैं(3){21}
वही है कि तुम्हें ख़ुश्की और तरी में चलाता है(4)
यहां तक कि जब
तुम किश्ती में हो और वो अच्छी हवा से उन्हें लेकर चलें और उसपर ख़ुश हुए (6)
उनपर आंधी का झौंका आया और हर तरफ़ लहरों ने उन्हें आ लिया और समझ लिये कि हम घिर गए उस वक़्त अल्लाह को पुकारते हैं निरे उसके बन्दे होकर कि अगर तू इससे हमें बचा लेगा तो हम ज़रूर शुक्र अदा करने वालों में होंगे (7){22}
फिर अल्लाह जब उन्हें बचा लेता है जभी वो ज़मीन में नाहक़ ज़ियादती करने लगते हैं (8)
ऐ लोगो तुम्हारी ज़ियादती तुम्हारी ही जानों का वबाल हैं दुनिया के जीते जी बरत लो फिर तुम्हें हमारी तरफ़ फिरना है उस वक़्त हम तुम्हें जता देंगे जो तुम्हारे कौतुक थे (9){23}
दुनिया की ज़िन्दगी की कहावत तो ऐसी ही है जैसे वह पानी कि हमने आसमान से उतारा तो उसके कारण ज़मीन से उगने वाली चीज़ें सब घनी होकर निकालीं जो कुछ आदमी और चौपाए खाते हैं(10)
यहाँ तक कि जब ज़मीन ने अपना सिंगार ले लिया (11)
और ख़ूब सज गई और उसके मालिक समझे कि यह हमारे बस में आ गई (12)
हमारा हुक्म उसपर आया रात में या दिन में (13)
तो हमने उसे कर दिया काटी हुई मानो कल थी ही नहीं (14)
हम यूंही आयतें तफ़सील (विस्तार) से बयान करते हैं ग़ौर करने वालों के लिये (15){24}
और अल्लाह सलामती के घर की तरफ़ पुकारता है (16)
और जिसे चाहे सीधी राह चलाता है(17){25}
भलाई वालों के लिये भलाई है और इस से भी अधिक (18)
और उनके मुंह पर न चढ़ेगी सियाही और ख़्वारी (19)
वही जन्नत वाले हैं, वो उसमें हमेशा रहेंगे {26} और जिन्होंने बुराइयाँ कमाई (20)
तो बुराई का बदला उसी जैसा (21)
और उनपर ज़िल्लत चढ़ेगी, उन्हें अल्लाह से बचाने वाला कोई न होगा, मानो उनके चेहरों पर अंधेरी रात के टुकड़े चढ़ा दिये हैं (22)
वही दोज़ख़ वाले हैं वो उसमें हमेशा रहेंगे{27} और जिस दिन हम उन सब को उठाएंगे (23)
फिर मुश्रिकों से फ़रमाएंगे अपनी जगह रहो तुम और तुम्हारे शरीक (24)
तो हम उन्हें मुसलमानों से जुदा कर देंगे और उनके शरीक उनसे कहेंगे तुम हमें कब पूजते थे(25){28}
तो अल्लाह गवाह काफ़ी है हम में और तुम में कि हमें तुम्हारे पूजने की ख़बर भी न थी{29} यहाँ पर हर जान जांच लेगी जो आगे भेजा(26)
और अल्लाह की तरफ़ फेरे जाएंगे जो उनका सच्चा मौला है और उनकी सारी बनावटें (27)
उनसे गुम हो जाएंगी.(28){30}

तफ़सीर
सूरए यूनुस – तीसरा रूकू

(1) मक्का वालों पर अल्लाह तआला ने दुष्काल डाल दिया जिसकी मुसीबत में वो सात बरस गिरफ़्तार रहे यहाँ तक कि हलाकत के क़रीब पहुंचे. फिर उसने रहम फ़रमाया, बारिश हुई, ज़मीनों पर हिरयाली छाई. तो अगरचे इस तकलीफ़ और राहत दोनों में क़ुदरत की निशानियाँ थीं और तकलीफ़ के बाद राहत बड़ी महान नेअमत थी, इसपर शुक्र लाज़िम था, मगर बजाय इसके उन्होंने नसीहत न मानी और फ़साद व कुफ़्र की तरफ़ पलटें.

(2) और उसका अज़ाब देर नहीं करता.

(3) और तुम्हारी छुपवाँ तदबीरें कर्मों का लेखा जोखा रखने वाले फ़रिश्तों पर भी छुपी हुई नहीं हैं तों जानने वाले ख़बर रखने वाले अल्लाह से कैसे छुप सकती हैं.

(4) और तुम्हें दूरियाँ तय करने की क़ुदरत देता है. ख़ुश्की में तुम पैदल और सवार मंज़िलें तय करते हो और नदियों में, किश्तियों और जहाजों से सफ़र करते हो. वह तुम्हें ख़ुश्की और तरी दोनों में घूमने फिरने के साधन अता फ़रमाता है.

(5) यानी किश्तियाँ.

(6) कि हवा अनुकूल है, अचानक.

(7) तेरी नेअमतों के, तुझपर ईमान लाकर और ख़ास तेरी इबादत करके.

(8) और वादे के ख़िलाफ़ करके कुफ़्र और गुनाहों में जकड़े जाते हैं.

(9) और उनका तुम्हें बदला देंगे.

(10) ग़ल्ले और फल और हरियाली.

(11) ख़ूब फूली, हरी भरी और तरो ताज़ा हुई.

(12) कि खेतियाँ तैयार हो गई, फल पक गए, ऐसे वक़्त.

(13) यानी अचानक हमारा अज़ाब आया, चाहे बिजली गिरने की शक्ल में या ओले बरसने या आंधी चलने की सूरत में.

(14) यह उन लोगों के हाल की एक मिसाल है जो दुनिया के चाहने वाले हैं और आख़िरत की उन्हें कुछ परवाह नहीं. इसमें बहुत अच्छे तरीक़े पर समझाया गया है कि दुनियावी ज़िन्दगानी उम्मीदों का हरा बाग़ है, इसमें उम्र खोकर जब आदमी उस हद पर पहुंचता है जहाँ उसको मुराद मिलने का इत्मीनान हो और वह कामयाबी के नशे में मस्त हो, अचानक उसको मौत पहुंचती है और वह सारी लज़्ज़तों और नेअमतों से मेहरूम हो जाता है. क़तादा  ने कहा कि दुनिया का तलबगार जब बिल्कुल बेफ़िक्र होता है, उस वक़्त उसपर अल्लाह का अज़ाब आता है और उसका सारा सामान जिससे उसकी उम्मीदें जुड़ी थीं, नष्ट हो जाता है.

(15) ताकि वो नफ़ा हासिल करें और शक तथा वहम के अंधेरों से छुटकारा पाएं और नश्वर दुनिया की नापायदारी से बाख़बर हों.

(16) दुनिया की नापायदारी बयान फ़रमाने के बाद हमेशगी की दुनिया की तरफ़ दावत दी. क़तादा ने कहा कि दारे. सलाम जन्नत है. यह अल्लाह की भरपूर रहमत और मेहरबानी है कि अपने बन्दों को जन्नत की दावत दी.

(17) सीधी राह दीने इस्लाम है. बुख़ारी की हदीस में है, नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में फ़रिश्ते हाज़िर हुए, आप ख़्वाब में थे. उनमें से कुछ ने कहा कि आप ख़्वाब में है और कुछ ने कहा कि आँखें ख़्वाब में है, दिल बेदार है. कुछ कहने लगे कि इनकी कोई मिसाल तो बयान करो, तो उन्होंने कहा, जिस तरह किसी शख़्स ने एक मकान बनाया और उसमें तरह तरह की नेअमतें उपलब्ध कीं और एक बुलाने वाले को भेजा कि लोगों को बुलाए. जिसने उस बुलाने वाले की फ़रमाँबरदारी की, उस मकान में दाख़िल हुआ और उन नेअमतों को खाया पिया और जिसने बुलाने वाले की आवाज़ न मानी, वह मकान में दाख़िल न हो सका न कुछ खा सका. फिर वो कहने लगे कि इस मिसाल पर गहराई से ग़ौर करो कि समझ में आए. मकान जन्नत है, बुलाने वाले मुहम्मद हैं, जिसने उनकी फ़रमाँबरदारी की, उसने अल्लाह की फ़रमाँबरदारी की.

(18) भलाई वालों से अल्लाह के फ़रमाँबरदार बन्दे, ईमान वाले मुराद हैं. और यह जो फ़रमाया कि उनके लिये भलाई है, इस भलाई से जन्नत मुराद है. और “इससे भी ज़्यादा”का मतलब है, अल्लाह का दीदार, मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है कि जन्नतियों के जन्नत में दाख़िल होने के बाद अल्लाह तआला फ़रमाएगा, क्या तुम चाहते हो कि तुमपर और ज़्यादा इनायत करूं. वो अर्ज़ करेंगे या रब, क्या तुने हमारे चेहरे सफ़ेद नहीं किये, क्या तूने हमें जन्नत में दाख़िल नहीं फ़रमाया़ क्या तूने हमें दोज़ख़ से निजात नहीं दी. हुज़ूर ने फ़रमाया, फिर पर्दा उठा दिया जाएगा तो अल्लाह का दीदार उन्हें हर नेअमत से ज़्यादा प्यारा होगा. सही हदीस की किताबों में बहुत सी रिवायतें यह साबित करती हैं कि आयत में “इससे भी ज़्यादा” से अल्लाह का दीदार मुराद है.

(19) कि यह बात जहन्नम वालों के लिये है.

(20) यानी कुफ़्र और गुनाह में जकड़ गए.

(21) ऐसा नहीं कि जैसे नेकियों का सवाब दस गुना और सात सौ गुना किया जाता है ऐसे ही बदियों का अज़ाब भी बढ़ा दिया जाए, बल्कि जितनी बदी होगी उतना ही अज़ाब किया जाएगा.

(22) यह हाल होगा उनकी रूसियाही का, ख़ुदा की पनाह.

(23) और तमाम सृष्टि को हिसाब के मैदान में जमा करेंगे,

(24) यानी वो बुत जिन्हें तुम पूजते थे.

(25) क़यामत के दिन एक घड़ी ऐसी सख़्ती की होगी कि बुत अपने पुजारियों की पूजा का इनकार कर देंगे और अल्लाह की क़सम खाकर कहेंगे कि हम न सुनते थे, न देखते थे, न जानते थे, न समझते थे कि तुम हमें पूजते हो. इसपर बुत परस्त कहेंगे कि अल्लाह की क़सम हम तुम्हीं को पूजते थे तो बुत कहेंगे.

(26) यानी उस मैदान में सब को मालूम हो जाएगा कि उन्होंने पहले जो कर्म किये थे वो कैसे थे. अच्छे या बुरे, नफ़ा वाले या घाटे वाले.

(27) बुतों को ख़ुदा का शरीक बताना और मअबूद ठहराना.

(28) और झूठी और बेहक़ीक़त साबित होंगी.

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