सूरए यूनुस – छटा रूकू

सूरए यूनुस – छटा रूकू

और अगर हर ज़ालिम जान ज़मीन में जो कुछ है(1)
सब की मालिक होती ज़रूर अपनी जान छूड़ाने में देती(2)
और दिल में चुपके चुपके पशेमान हुए जब अज़ाब देखा और उनमें इन्साफ़ से फ़ैसला कर दिया गया और उनपर ज़ुल्म न होगा{54} सुन लो बेशक अल्लाह ही का है जो कुछ आसमानों में है और ज़मीन में (3)
सुन लो बेशक अल्लाह का वादा सच्चा है मगर उनमें अक्सर को ख़बर नहीं {55} वह जिलाता और मारता है और उसी की तरफ़ फिरोगे{56} ऐ लोगो तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से नसीहत आई (4)
और दिलों की सेहत और हिदायत और रहमत ईमान वालों के लिये {57} तुम फ़रमाओ अल्लाह ही के फ़ज़्ल (अनुकम्पा) और उसी की रहमत और उसी पर चाहिये कि ख़ुशी करें(5)
वह उनके सब धन दौलत से बेहतर है {58} तुम फ़रमाओ भला बताओ तो वह जो अल्लाह ने तुम्हारे लिये रिज़्क़ (जीविका) उतारा उसमें तुम ने अपनी तरफ़ से हराम व हलाल ठहरा लिया (6)
तुम फ़रमाओ क्या अल्लाह ने इसकी तुम्हें इजाज़त दी या अल्लाह पर झूट बांधते हो (7){59}
और क्या गुमान है उनका जो अल्लाह पर झूट बांधते हैं कि क़यामत में उनका क्या हाल होगा, बेशक अल्लाह लोगों पर फ़ज़्ल करता है (8)
मगर अक्सर लोग शुक्र नहीं करते{60}

तफ़सीर
सूरए यूनुस – छटा रूकू

(1) माल मत्ता, ख़ज़ाना और दफ़ीना.

(2) और क़यामत के दिन उसको रिहाई के लिये फ़िदिया कर डालती. मगर यह फ़िदिया क़ुबूल नहीं और तमाम दुनिया की दौलत ख़र्च करके भी रिहाई सम्भव नहीं. जब क़यामत में यह मंज़र पेश आया और क़ाफ़िरों की उम्मीदें टूटीं.

(3) तो काफ़िर किसी चीज़ का मालिक ही नहीं बल्कि वह ख़ुद भी अल्लाह का ममलूक है, उसका फ़िदिया देना सम्भव ही नहीं,

(4) इस आयत मे क़ुरआन शरीफ़ के आने और इसमें मौज़ूद नसीहतों, शिफ़ा, हिदायत और रहमत का बयान है कि यह किताब इन बड़े फ़ायदों से ओतप्रोत है. नसीहत के मानी है वह चीज़ जो इन्सान को उसकी पसन्द की चीज़ की तरफ़ बुलाए और ख़तरे से बचाए. ख़लील ने कहा कि यह नेकी की नसीहत करना है जिससे दिल में नर्मी पैदा हो. शिफ़ा से मुराद यह है कि क़ुरआन शरीफ़ दिल के अन्दर की बीमारियों को दूर करता है. दिल की ये बीमारियाँ दुराचार, ग़लत अक़ीदे और मौत की तरफ़ ले जाने वाली जिहालत हैं. क़ुरआने पाक इन तमाम रोगों को दूर करता है. क़ुरआने करीम की विशेषता में हिदायत भी फ़रमाया, क्योंकि वह गुमराही से बचाता और सच्चाई की राह दिखाता है और ईमान वालों के लिये रहमत, इसलिये फ़रमाया कि वह इससे फ़ायदा उठाते हैं.

(5) किसी प्यारी और मेहबूब चीज़ के पाने से दिल को जो लज़्ज़त हासिल होती है उसको फ़रह कहते हैं. मानी ये हैं कि ईमान वालों को अल्लाह के फ़ज़्ल और रहमत पर ख़ुश होना चाहिये कि उसने उन्हें नसीहतों, और दिलों की अच्छाई और ईमान के साथ दिल की राहत और सुकून अता फ़रमाए. हज़रत इब्ने अब्बास व हसन व क़तादा ने कहा कि अल्लाह के फ़ज़्ल से इस्लाम और उसकी रहमत से क़ुरआन मुराद है. एक क़ौल यह है कि फ़ज़्लुल्लाह से क़ुरआन और रहमत से हदीसें मुराद हैं.

(6) इस आयत से साबित हुआ कि किसी चीज़ को अपनी तरफ़ से हलाल या हराम करना मना और ख़ुदा पर झूट जोड़ना है. आजकल बहुत लोग इसमें जकड़े हुए हैं. ममनूआत यानी वर्जित चीज़ों को हलाल कहते हैं और जिन चीज़ों के इस्तमाल की अल्लाह व रसूल न इजाज़त दी है, उसको हराम. कुछ सूद को हलाल करने पर अड़े हैं, कुछ तस्वीरों को, कुछ खेल तमाशों को, कुछ औरतों की बेक़ैदियों और बेपर्दगीयों को, कुछ भूख हड़ताल को, जो आत्म हत्या है, हलाल समझते हैं. और कुछ लोग हलाल चीज़ों को हराम ठहराने पर तुले हुए हैं, जैसे मीलाद की महफ़िल को, फ़ातिहा को, ग्यारहवीं को और ईसाले सवाब के दूसरे तरीक़ों को, कुछ मीलाद शरीफ़ और फ़ातिहा व तोशा की शीरीनी और तबर्रूक को, जो सब हलाल और पाक चीज़ें हैं, नाजायज़ और वर्जित बताते हैं.

(8) कि रसूल भेजता है, किताबें नाज़िल फ़रमाता है, और हलाल व हराम से बाख़बर फ़रमाता है.

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