सूरए तौबह – आठवाँ रूकू

सूरए तौबह – आठवाँ रूकू

ज़क़ात तो उन्हीं लोगों के लिये है(1)
मोहताज और निरे नादार और जो उसे तहसील (ग्रहण) करके लाएं और जिनके दिलों को इस्लाम से उलफ़त दी जाए और गर्दनें छुड़ाने में और कर्ज़दारों को और अल्लाह की राह में और मुसाफ़िर को, यह ठहराया हुआ है अल्लाह का और अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है {60} और उनमें कोई वो हैं कि उन ग़ैब की ख़बरें देने वाले को सताते हैं (2)
और कहते हैं वो तो कान हैं तुम फ़रमाओ तुम्हारे भले के लिये कान हैं अल्लाह पर ईमान लाते हैं और मुसलमानों की बात पर यक़ीन करते हैं (3)
और जो तुम में मुसलमान हैं उनके वास्ते रहमत हैं और जो रसूलुल्लाह को ईज़ा देते हैं उनके लिये दर्दनाक अज़ाब है{61} तुम्हारे सामने अल्लाह की क़सम खाते हैं (4)
कि तुम्हें राज़ी कर लें (5)
और अल्लाह व रसूल का हक़ ज़्यादा था कि उसे राज़ी करते अगर ईमान रखते थे {62} क्या उन्हें ख़बर नहीं कि जो ख़िलाफ़ करे अल्लाह और उसके रसूल का तो उसके लिए जहन्नम की आग है कि हमेशा उसमें रहेगा, यही बड़ी रूसवाई है {63} मुनाफ़िक़ डरते हैं कि इन (6)
पर कोई सूरत ऐसी उतरे जो (7)
उनके दिलों की छुपी (8)
जता दे, तुम फ़रमाओ हंसे जाओ, अल्लाह को ज़रूर ज़ाहिर करना है जिसका तुम्हें डर है {64} और ऐ मेहबूब अगर तुम उनसे पूछो तो कहेंगे कि हम तो यूंही हंसी खेल में थे, (9)
तुम फ़रमाओ क्या अल्लाह और उसकी आयतों और उसके रसूल से हंसते हो{65} बहाने न बनाओ तुम काफ़िर हो चुके मुसलमान होकर, (10)
अगर हम तुम में से किसी को माफ़ करें (11)
तो औरों को अज़ाब देंगे इसलिये कि वो मुजरिम थे(12){66}

तफ़सीर
सूरए तौबह – आठवाँ रूकू

(1) जब मुनाफ़िक़ों ने सदक़ात के बँटवारें में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर तअना कसा तो अल्लाह तआला ने इस आयत में बयान फ़रमा दिया कि सदक़ात के मुस्तहिक़ सिर्फ़ यही आठ क़िस्म के लोग हैं, इन्हीं पर सदक़े ख़र्च किये जाएंगे. इसके सिवा और कोई मुस्तहिक़ नहीं और रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को सदक़े के माल से कोई वास्ता ही नहीं. आप पर और आपकी औलाद पर सदक़ा हराम है तो तअना करने वालों को ऐतिराज़ का क्या मौक़ा. सदक़े से इस आयत में ज़कात मुराद है. ज़कात के मुस्तहिक़ आठ क़िस्म के लोग क़रार दिये गए हैं. इनमें से मुअल्लिफ़तुल क़ुलूब बिइजमाए सहाबा साक़ित हो गए क्योंकि जब अल्लाह तबारक व तआला ने इस्लाम को ग़लबा दिया तो अब इसकी हाजत न रही. यह इजमाअ ज़मानए सिद्दीक़ में मुनअक़िद हुआ. फ़क़ीर वह है जिसके पास अदना चीज़ हो और जबतक उसके पास एक वक़्त के लिये कुछ हो उसको सवाल हलाल नहीं. मिस्कीन वह है जिसके पास कुछ न हो, वह सवाल कर सकता है. आमिलीन वो लोग हैं जिन को इमाम ने सदक़े वसूल करने पर रखा हो. उन्हें इमाम इतना दे जो उनके और उनके सम्बन्धियों के लिये काफ़ी हो. अगर आमिल ग़नी हो तो भी उसको लेना जायज़ है. आमिल सैयद या हाशमी हो तो वह ज़कात में से न ले. गर्दनें छुड़ाने से मुराद यह है कि जिन ग़ुलामों को उनके मालिकों ने मकातिब कर दिया हो और एक मिक़दार माल की मुक़र्रर कर दी हो कि इस क़द्र वो अदा करें तो आज़ाद हैं, वो भी मुस्तहिक़ हैं. उनको आज़ाद कराने के लिये ज़कात का माल दिया जाए. क़र्ज़दार जो बग़ैर किसी गुनाह के क़र्ज़ में जकड़े गए हों और इतना माल न रखतों हों जिससे क़र्ज़ अदा करें तो उन्हें क़र्ज़ की अदायगी के लिये ज़कात के माल से मदद दी जाए. अल्लाह की राह में ख़र्च करने से बेसामान मुजाहिदो और नादार हाजियों पर ख़र्च करना मुराद है. इब्ने सबील से वो मुसाफ़िर मुराद हैं जिनके पास माल न हो. ज़कात देने वाले को यह भी जायज़ है कि वह इन तमाम क़िस्मों के लोगों को जक़ात दे, और यह भी जायज़ है कि इनमें से किसी एक ही क़िस्म को दे. ज़कात उन्हीं लोगों के साथ ख़ास की गई, तो उनके अलावा और दूसरे काम में ख़र्च न की जाएगी न मस्जिद की तामीर में, न मुर्दे के कफ़न में, न उसके क़र्ज़ की अदायगी में. ज़कात बनी हाशिम को और ग़नी और उनके ग़ुलामों को न दी जाए. और न आदमी अपनी बीबी और औलाद और ग़ुलामों को दे. (तफ़सीरे अहमदी व मदारिक)

(2) यानी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को. मुनाफ़िक़ लोग अपने जलसों में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की शान में बुरी बुरी बातें बका करते थे. उनमें से कुछ ने कहा कि अगर हुज़ूर को ख़बर हो गई तो हमारे हक़ में अच्छा न होगा. जुलास बिन सुवैद मुनाफ़िक़ ने कहा हम जो चाहें कहें, हुज़ूर के सामने मुकर जाएंगे और क़सम खालेंगे. वह तो कान है, उनसे जो कह दिया जाए, सुन कर मान लेते हैं. इस पर अल्लाह तआला ने यह आयत उतारी और यह फ़रमाया कि अगर वह सुनने वाले भी हैं तो ख़ैर और सलाह के, यानी अच्छी बातों के सुनने और मानने वाले हैं, शर और फ़साद के नहीं.

(3) न मुनाफ़िक़ों की बात पर.

(4) मुनाफ़िक़ इसलिये.

(5) मुनाफ़िक़ अपनी बैठकों में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को बुरा भला कहा करते थे और मुसलमानों के पास आकर उससे मुकर जाते थे और क़स्में खा खा कर अपनी सफ़ाई और बेगुनाही साबित करते थे. इस पर यह आयत उतरी और फ़रमाया गया कि मुसलमानों को राज़ी करने के लिये क़स्में खाने से ज़्यादा अहम अल्लाह और उसके रसूल को राज़ी करना था, अगर ईमान रखते थे तो ऐसी हरकतें क्यों कीं जो ख़ुदा और रसूल की नाराज़ी का कारण हों.

(6) मुसलमानों.

(7) मुनाफ़िक़ों.

(8) दिलों की छुपी चीज़ उनकी दोहरी प्रवृत्ति है और वह दुश्मनी जो वो मुसलमानों के साथ रखते थे और उसको छुपाया करते थे. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के चमत्कार देखने और आपकी ग़ैबी ख़बरें सुनने और उनको पूरा होते देखने के बाद मुनाफ़िक़ों को डर हुआ कि कहीं अल्लाह तआला कोई ऐसी सूरत नाज़िल न फ़रमाए जिससे उनकी पोल खुल जाए और उनकी रूस्वाई हो. इस आयत में इस का बयान है.

(9) ग़जवए तबूक में जाते हुए मुनाफ़िक़ों के तीन नफ़रों में से दो रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की निस्बत हंसी से कहते थे कि उनका ख़याल है कि रूम पर ग़ालिब आ जाएंगे. कितना दूर का ख़याल है. और एक नफ़र बोलता तो न था मगर इन बातों को सुनकर हंसता था. हुज़ूर ने उनको तलब फ़रमाकर इरशाद फ़रमाया कि तुम ऐसा ऐसा कह रहे थे. उन्होंने कहा हम रास्ता काटने के लिये हंसी खेल के तौर पर दिल लगी की बातें कर रहे थे. इस पर यह आयत उतरी और उनका यह बहाना क़ुबूल न किया गया और उनके लिये फ़रमाया गया जो आगे इरशाद होता है.

(10) इस आयत से साबित होता है कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की शान में गुस्ताख़ी और अपमान कुफ़्र है, जिस तरह भी हो, उसमें बहाना क़ुबूल नहीं.

(11) उसके तौबह कर लेने और सच्चे दिल से ईमान लाने से. मुहम्मद बिन इस्हाक़ का क़ौल है कि इससे वही शख़्स मुराद है जो हंसता था, मगर उसने अपनी ज़बान से कोई गुस्ताख़ी की बात न कही थी. जब यह आयत उतरी तो उसने तौबह की और सच्चे दिल से ईमान लाया और उसने दुआ की कि यारब मुझे अपनी राह में ऐसी मौत दे कि कोई यह कहने वाला न हो कि मैं ने ग़ुस्ल दिया, मैने कफ़न दिया, मैंने दफ़्न किया. चुनांचे ऐसा ही हुआ कि वह जंगे यमामा में शहीद हुए और उनका पता ही न चला, उनका नाम यहया बिन हमीर अशजई था और चूंकि उन्होंने हुज़ूर को बुरा कहने से ज़बान रोकी थी, इसलिये उन्हें तौबह और ईमान की तौफ़ीक़ मिली.

(12) और अपने जुर्म पर क़ायम रहे और तौबह न की.

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सूरए तौबह – नवाँ रूकू

सूरए तौबह – नवाँ रूकू

मुनाफ़िक़ मर्द (जिनके दिल में कुछ, ज़बान पर कुछ)  और मुनाफ़िक़ औरतें एक थेली के चट्टे बट्टे हैं (1),
और भलाई से मना करें (3)
और अपनी मुट्ठी बंद रखें (4)
वो अल्लाह को छोड़ बैठे (5)
तो अल्लाह ने उन्हें छोड़ दिया (6)
बेशक मुनाफ़िक़ वही पक्के बेहुक्म हैं {67} अल्लाह ने मुनाफ़िक़ मर्दों और मुनाफ़िक़ औरतों और काफ़िरों को जहन्नम की आग का वादा दिया है जिसमें हमेशा रहेंगे, वह उन्हें बस है, और अल्लाह की उनपर लानत है और उनके लिये क़ायम रहने वाला अज़ाब है {68} जैसे वो जो तुम से पहले थे तुमसे ज़ोर में बढ़कर थे और उनके माल और औलाद तुमसे ज़्यादा तो वो अपना हिस्सा (7)
बरत गए तो तुमने अपना हिस्सा बरता जैसे अगले अपना हिस्सा बरत गए और तुम बेहूदगी में पड़े जैसे वो पड़े थे(8)
उनके अमल अकारत गए दुनिया और आख़िरत में, और वही लोग घाटे में हैं(9){69}
क्या उन्हें (10)
अपने से अगलों की ख़बर न आई (11)
नूह की क़ौम (12)
और आद (13)
और समूद (14)
और इब्राहीम की क़ौम(15)
और मदयन (16)
वाले और वो बस्तियाँ कि उलट दी गई (17)
उनके रसूल रौशन दलीलें उनके पास लाए थे(18)
तो अल्लाह की शान न थी कि उनपर ज़ुल्म करता (19)
बल्कि वो ख़ुद ही अपनी जानों पर ज़ालिम थे (20){70}
और मुसलमान मर्द और मुसलमान औरतें एक दूसरे के रफ़ीक़ हैं(21)
भलाई का हुक्म दें (23)
और बुराई से मना करे और नमाज़ क़ायम रखे और ज़कात दें और अल्लाह व रसूल का हुक्म मानें, ये हैं जिनपर बहुत जल्द अल्लाह रहम करेगा, बेशक अल्लाह ग़ालिब हिकमत वाला है {71} अल्लाह ने मुसलमान मर्दों और मुसलमान औरतों को बाग़ों का वादा दिया है जिनके नीचे नहरें बहें उनमें हमेशा रहेंगे और पाकीज़ा मकानों का(23)
बसने के बाग़ों में, और अल्लाह की रज़ा सबसे बड़ी (24)
यही है, बड़ी मुराद पानी {72}

तफ़सीर
सूरए तौबह – नवाँ रूकू

(1) वो सब दोहरी प्रवृत्ति और बुरे अअमाल में एक से हैं, उनका हाल यह है कि.

(2) यानी कुफ़्र और गुनाह और रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को झुटलाने का. (ख़ाज़िन)

(3) यानी ईमान और रसूल की तस्दीक़ और उनकी फ़रमाँबरदारी से.

(4) ख़ुदा की राह में ख़र्च करने से.

(5) और उन्होंने उसकी इताअत और रज़ा तलबी न की.

(6) और सवाब व फ़ज़्ल से मेहरूम कर दिया.

(7) दुनिया की वासनाओं और लज़्ज़तों का.

(8) और तुमने बातिल का अनुकरण और अल्लाह व रसूल को झुटलाने और ईमान वालों के साथ मख़ौल करने में उनकी राह इख़्तियार की.

(9) उन्हीं क़ाफ़िरों की तरह, ऐ मुनाफ़िक़ो, तुम टोटे में हो और तुम्हारे कर्म व्यर्थ हैं.

(10) यानी मुनाफ़िक़ों को.

(11) गुज़री हुई उम्मतों का हाल मालूम न हुआ कि हमने उन्हें अपनी आज्ञा के विरोध और अपने रसूल की नाफ़रमानी पर किस तरह हलाक किया.

(12) जो तूफ़ान से हलाक की गई.

(13) जो हवा से हलाक किये गए.

(14) जो ज़लज़ले और भूकम्प से हलाक किये गए.

(15) जो नेअमतें छीन लिये जाने से हलाक की गई. और नमरूद मछर से हलाक किया गया.

(16) यानी हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम की क़ौम. जो रोज़ बादल के अज़ाब से हलाक की गई.

(17) और उलट पुलट कर डाली गई. वो लूत क़ौम की बस्तियाँ थीं. अल्लाह तआला ने उन छ: का ज़िक्र फ़रमाया, इसलिये कि शाम व इराक़ व यमन के प्रदेश जो अरब प्रदेश से बिलकुल क़रीब क़रीब हैं, उनमें उन हलाक की हुई क़ौमों के निशान बाक़ी हैं और अरब लोग उन जगहों पर अक्सर गुज़रते रहते हैं.

(18) उन लोगों ने तस्दीक़ करने की जगह अपने रसूलों को झुटलाया जैसा कि ऐ मुनाफ़िक़ों तुम कर रहे हो. डरो, कि उन्हीं की तरह अज़ाब में न जकड़ दिये जाओ.

(19) क्योंकि वह हिकमत वाला है, बग़ैर जुर्म के सज़ा नहीं फ़रमाता.

(20) कि कुफ़्र और नबियों को झुटलाकर अज़ाब के हक़दार बने.

(21) और आपस में दीनी महब्बत और सहयोग रखते हैं और एक दूसरे के मददगार और सहायक हैं.

(22) यानी अल्लाह व रसूल पर ईमान लाने और शरीअत का अनुकरण करने का.

(23) हसन रदियल्लाहो अन्हो से रिवायत है कि जन्नत में मोती और सुर्ख़ याक़ूत और ज़बरजद के महल ईमान वालों को दिये जाएंगे.

(24) और तमाम नेअमतों से बढ़कर और अल्लाह के चाहने वालों की सबसे बड़ी तमन्ना. अल्लाह तआला अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सदक़े में पूरी करे.

सूरए तौबह – दसवाँ रूकू

सूरए तौबह – दसवाँ रूकू

ऐ ग़ैब की ख़बरें देने वाले (नबी) जिहाद फ़रमाओ काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों पर (1)
और उनपर सख़्ती करो, और उनका ठिकाना दोज़ख़ है, और क्या ही बुरी जगह पलटने की {73} अल्लाह की क़सम खाते हैं कि उन्होंने न कहा (2)
और बेशक ज़रूर उन्होंने कुफ़्र की बात कही और इस्लाम में आकर काफ़िर हो गए और  वह चाहा था जो उन्हें न मिला (3)
और उन्हें क्या बुरा लगा यही ना कि अल्लाह व रसूल ने उन्हें अपने फ़ज़्ल से ग़नी कर दिया(4)
तो अगर वो तौबह करें तो उनका भला है और अगर मुंह फेरें (5)
तो अल्लाह उन्हें सख़्त अज़ाब करेगा दुनिया और आख़िरत में, और ज़मीन में कोई न उनका हिमायती होगा न मददगार (6) {74}
और उनमें कोई वो हैं जिन्होंने अल्लाह से एहद किया था कि अगर हमें अपने फ़ज़्ल से देगा तो हम ज़रूर ख़ैरात करेंगे और हम ज़रूर भले आदमी हो जाएंगे (7){75}
तो जब अल्लाह ने उन्हें अपने फ़ज़्ल से दिया उसमें कंजूसी करने लगे और मुंह फेर कर पलट गए {76} तो उसके पीछे अल्लाह ने उनके दिलों में निफ़ाक़ रख दिया उस दिन तक कि उससे मिलेंगे, बदला इसका कि उन्होंने अल्लाह से वादा झूटा किया और बदला इसका कि झूट बोलते थे (8){77}
क्या उन्हें ख़बर नहीं कि अल्लाह उनके दिल की छुपी और उनकी सरगोशी (खुसर फुसर, काना फूसी) को जानता है और यह कि अल्लाह सब ग़ैबों का बहुत जानने वाला है(9){78}{}
वो जो ऐब लगाते हैं उन मुसलमानों को कि दिल से ख़ैरात करते हैं (10)
और उनको जो नहीं पाते मगर अपनी मेहनत से (11)
तो उनसे हंसते हैं (12)
अल्लाह उनकी हंसी की सज़ा देगा और उनके लिये दर्दनाक अज़ाब है {79} तुम उनकी माफ़ी चाहो या न चाहो अगर तुम सत्तर बार उनकी माफ़ी चाहो तो अल्लाह हरगिज़ उन्हें नहीं बख़्शेगा, (13)
यह इसलिये कि वो अल्लाह और उसके रसूल से इन्कारी हुए और अल्लाह फ़ासिक़ों (व्यभिचारियों) को राह नहीं देता(14)
(80)

तफ़सीर
सूरए तौबह – दसवाँ रूकू

(1) काफ़िरों पर तो तलवार और जंग से और मुनाफ़िक़ों पर हुज्जत व तर्क क़ायम करके.

(2) इमाम बग़वी ने कलबी से नक़्ल किया कि यह आयत जुलास बिन सुवैद के बारे में उतरी. वाक़िआ यह था कि एक रोज़ सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने तबूक में ख़ुत्बा फ़रमाया उसमें मुनाफ़िक़ों का ज़िक्र किया और उनकी बदहाली और दुर्दशा का ज़िक्र फ़रमाया. यह सुनकर जुलास ने कहा कि अगर मुहम्मद सच्चे हैं तो हम लोग गधों से बदतर. जब हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मदीने वापस तशरीफ़ लाए तो आमिर बिन क़ैस ने हुज़ूर से जुलास का कहा बयान किया. जुलास ने इन्कार किया और कहा, या रसूलल्लाह, आमिर ने मुझ पर झूठ बोला. हुज़ूर ने दोनों को हुक्म फ़रमाया कि मिम्बर के पास क़सम खाएं. जुलास ने अस्त्र के बाद मिम्बर के पास खड़े होकर अल्लाह की क़सम खाई कि यह बात उसने नहीं कही और आमिर ने उस पर झूठ बोला. फिर आमिर ने खड़े होकर क़सम खाई कि बेशक यह अल्फ़ाज़ जुलास ने कहे और मैं ने उस पर झूठ नहीं बोला. फिर आमिर ने हाथ उठाकर अल्लाह के हुज़ूर में दुआ की, यारब अपने नबी पर सच्चे की तस्दीक़ फ़रमा. इन दोनों के जाने से पहले ही हज़रत जिब्रील यह आयत लेकर नाज़िल हुए. आयत में “फ़इयं यतूबू बिका ख़ैरूल्लहुम” सुनकर जुलास खड़े हो गए, अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह, सुनिये अल्लाह ने मुझे तौबह का मौक़ा दिया. आमिर बिन क़ैस ने जो कहा सच कहा. मैंने वह बात कही थी और अब मैं तौबह और इस्तग़फ़ार करता हूँ. हुज़ूर ने उनकी तौबह क़ुबूल फ़रमाई और वो अपनी तौबह पर जमे रहे.

(3) मुजाहिद ने कहा कि जुलास ने राज़ खुल जाने के डर से आमिर के क़त्ल का इरादा किया था. उसकी निस्बत अल्लाह तआला फ़रमाता है कि वह पूरा न हुआ.

(4) ऐसी हालत में उनपर शुक्र वाजिब था, न कि नाशुक्री.

(5) तौबह और ईमान से और कुफ़्र और दोग़ली प्रवृत्ति पर अड़े रहें.

(6) कि उन्हें अल्लाह के अज़ाब से बचा सके.

(7) सअलबा बिन हातिब ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से दरख़्वास्त की कि उसके लिये मालदार होने की दुआ फ़रमाएं. हुज़ूर ने फ़रमाया, ऐ सअल्बा, थोड़ा माल जिसका तू शुक्र अदा करे उस बहुत से बेहतर है, जिसका शुक्र अदा न कर सके. दोबारा फिर सअलबा ने हाज़िर होकर यही दरख़्वास्त की और कहा, उसी की क़सम जिस ने आप को सच्चा नबी बनाकर भेजा, अगर वह मुझे माल देगा तो मैं हर हक़ वाले का हक़ अदा करूंगा. हुज़ूर ने दुआ फ़रमाई. अल्लाह तआला ने उसकी बकरियों में बरकत फ़रमाई और इतनी बढ़ीं कि मदीने में उनकी गुन्जायश न हुई तो सअलबा उनको लेकर जंगल में चला गया और जुमा व जमाअत की हाज़िरी से भी मेहरूम हो गया. हुज़ूर ने उसका हाल पूछा तो सहाबा ने अर्ज़ किया कि उसका माल बहुत बढ़ गया है और अब जंगल में भी उसके माल की गुन्जायश न रही. हुज़ूर ने फ़रमाया कि सअलबा पर अफ़सोस. फिर हुज़ूर ने ज़कात वुसूल करने वाले भेजे. लोगों ने उन्हें अपने अपने सदक़े दिये. जब सअलबा से जाकर उन्होंने सदक़ा माँगा उसने कहा यह तो टैक्स हो गया, जाओ मैं सोच लूं. जब ये लोग रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में वापस आए तो हुज़ूर ने उनके कुछ अर्ज़ करने से पहले दो बार फ़रमाया सअलबा पर अफ़सोस. तब यह आयत उतरी. फिर जब सअलबा सदक़ा लेकर हाज़िर हुआ तो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला ने मुझे इसके क़ुबूल करने से मना फ़रमाया है. वह अपने सर पर ख़ाक डालकर वापस हुआ. फिर इस सदक़े को हज़रत अबूबक्र सिद्दीक की ख़िलाफ़त के दौर में उनकी ख़िदमत में लाया. उन्होंने भी उसे क़ुबूल न फ़रमाया. फिर सैयदना उमर रदियल्लाहो अन्हो के दौरे ख़िलाफ़त में उनकी ख़िदमत में लाया. उन्होंने भी क़ुबूल न किया. और हज़रत उस्मान रदियल्लाहो अन्हो की ख़िलाफ़त के ज़माने में ये शख़्स हलाक हो गया. (मदारिक)

(8) इमाम फ़ख़रूद्दीन राज़ी ने फ़रमाया कि इस आयत से साबित होता है कि एहद तोड़ना और वादा करके फिर जाना, इस सबसे दोग़ली प्रवृत्ति पैदा होती है. मुसलमान पर लाज़िम है कि इन बातों से दूर रहे और एहद पूरा करने और वादा वफ़ा करने में पूरी कोशिश करे. हदीस शरीफ़ में है कि मुनाफ़िक़ की तीन निशानियाँ हैं, जब बात करे झूट बोले, जब वादा करे खिलाफ़ करे, जब उसके पास अमानत रखी जाए, ख़यानत करे.

(9) उसपर कुछ छुपा हुआ नहीं. मुनाफ़िक़ों के दिलों की बात भी जानता है और वो जो आपस में एक दूसरे से कहें वह भी.

(10) जब सदक़े की आयत उतरी तो लोग सदक़ा लाए. उनमें कोई बहुत सारा सदक़ा लाया. उन्हें तो मुनाफ़िक़ों ने रियाकार कहा, और कोई एक साअ (साढ़े तीन सेर) लाए तो उन्हें कहा, अल्लाह को इसकी क्या परवाह. इस पर यह आयत उतरी. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि जब रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने लोगों को सदक़े की रग़बत दिलाई तो हज़रत अब्दुर रहमान बिन औफ़ चार हज़ार दिरहम लेकर आए और अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह, मेरा कुल माल आठ हज़ार दिरहम था. चार हज़ार तो यह ख़ुदा की राह में हाज़िर है और चार हज़ार मैंने घर वालों के लिये रोक लिये हैं. हुज़ूर ने फ़रमाया, अल्लाह उसमें भी बरकत फ़रमाएं. हुज़ूर की दुआ कर असर यह हुआ कि उनका माल बहुत बढ़ा, यहाँ तक कि जब उनकी वफ़ात हुई तो उन्होंने दो बीबियाँ छोड़ीं, उन्हें आठवाँ हिस्सा मिला, जिसकी मिक़दार एक लाख साठ हज़ार दिरहम थी.

(11) अबू अक़ील अन्सारी एक साअ खजूरें लेकर हाज़िर हुए और उन्होंने हुज़ूर की ख़िदमत में अर्ज़ किया कि मैंने आज रात की पानी खींचने की मज़दूरी की. उसकी उजरत दो साअ खजूरें मिलीं. एक साअ तो मैंने घर वालों के लिये छोड़ा और एक साअ अल्लाह की राह में हाज़िर है. हुज़ूर ने यह सदक़ा क़ुबूल फ़रमाया और इसकी क़द्र की.

(12) मुनाफ़िक़ और सदक़े की कमी पर शर्म दिलाते हैं.

(13) ऊपर की आयतें जब उतरीं और मुनाफ़िक़ों की दोहरी प्रवृत्ति खुल कर सामने आ गई और मुसलमानों पर उनका हाल खुल गया तो मुनाफ़िक़ सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुए और आपसे माफ़ी मांगने लगे. कहने लगे कि आप हमारे लिये इस्तग़फ़ार कीजिये. इस पर यह आयत उतरी और फ़रमाया गया कि अल्लाह तआला हरगिज़ उनकी मग़फ़िरत न फ़रमाएगा, चाहे आप कितना ही बढ़ा चढ़ाकर इस्तग़फ़ार करें.

(14) जो ईमान से बाहर हों, जब तक कि वो कुफ़्र पर रहें. (मदारिक)

सूरए तौबह – ग्यारहवाँ रूकू

सूरए तौबह – ग्यारहवाँ रूकू

पीछे रह जाने वाले इसपर ख़ुश हुए कि वो रसूल के पीछे बैठ रहे (1)
और उन्हें गवारा न हुआ कि अपने माल और जान से अल्लाह की राह में लड़ें और बोले इस गर्मी में न निकलों,तुम फ़रमाओ जहन्नम की आग सबसे सख़्त गर्म है किसी तरह उन्हें समझ होती (2){81}
तो उन्हें चाहिये कि थोड़ा हंसे और बहुत रोएं(3)
बदला उसका जो कमाते थे (4){82}
फिर ऐ मेहबूब (5)
अगर अल्लाह तुम्हें उनमें (6)
किसी गिरोह की तरफ़ वापस ले जाए और वो (7)
तुमसे जिहाद को निकलने की इजाज़त मांगे तो तुम फ़रमाना कि तुम कभी मेरे साथ न चलो और हरगिज़ मेरे साथ किसी दुश्मन से न लड़ो तुमने पहली बार बैठ रहना पसन्द किया तो बैठ रहो पीछे रह जाने वालों के साथ(8)
{83}
और उनमें से किसी की मैयत पर कभी नमाज़ न पढ़ना न पढ़ाना और न उसकी क़ब्र पर खड़े होना, बेशक अल्लाह और रसूल से इन्कारी हुए और फ़िस्क़ (दुराचार) ही में मर गए (2){84}
और उनके माल या औलाद पर अचंभा न करना, अल्लाह यही चाहता है कि उसे दुनिया में उनपर वबाल करे और कुफ़्र ही पर उनका दम निकल जाए{85} और जब कोई सूरत उतरे कि अल्लाह पर ईमान लाओ और उसके रसूल के हमराह जिहाद करो तो उनके मक़दूर (सामर्थ्य) वाले तुमसे रूख़सत माँगते हैं और कहते हैं हमें छोड़ दीजिये कि बैठ रहने वालों के साथ होलें {86} उन्हें पसन्द आया कि पीछे रहने वाली औरतों के साथ होजाएं और उनके दिलों पर मोहर कर दी गई (10)
तो वो कुछ नहीं समझते(11){87}
लेकिन रसूल और जो उनके साथ ईमान लाए उन्होंने अपने मालों जानों से जिहाद किया और उन्हीं के लिये भलाईयाँ हैं (12)
और यही मुराद को पहुंचे {88} अल्लाह ने उनके लिये तैयार कर रखी हैं बहिश्तें जिनके नीचे नहरें हमेशा उनमें रहेंगे, यही बड़ी मुराद मिलनी है{89}

तफ़सीर
सूरए तौबह -ग्यारहवाँ रूकू

(1) और ग़ज़वए तबुक में न गए.

(2) तो थोड़ी देर की गर्मी बरदाश्त करते और हमेशा की आग में जलने से अपने आपको बजाते.

(3) यानी दुनिया में ख़ुश होना और हंसना, जाहे कितनी ही लम्बी मुद्दत के लिये हो, मगर वह आख़िरत के रोने के मुक़ाबले में थोड़ा है, क्योंकि दुनिया मिटने वाली है और आख़िरत हमेशा के लिये क़ायम रहने वाली.

(4) यानी आख़िरत का रोना दुनिया में हंसने और बुरे काम करने का बदला है. हदीस शरीफ़ में है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि अगर तुम जानते वह जो मैं जानता हुँ तो थोड़ा हंसते, बहुत रोते.

(5) ग़ज़वए तबुक के बाद.

(6) पीछे रह जाने वाले.

(7) अगर वह मुनाफ़िक़ जो तबूक में जाने से बैठ रहा था.

(8) औरतें, बच्चों, बीमारों और अपाहिजों के. इससे साबित हुआ कि जिस व्यक्ति से छल कपट ज़ाहिर हो, उससे अलग रहना चाहिये और केवल इस्लाम का दावा करने वाला होने से मुसाहिबत और मुआफ़िक़त जायज़ नहीं होती. इसीलिये अल्लाह तआला ने अपने नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ मुनाफ़िक़ों के जिहाद में जाने को मना फ़रमा दिया. आजकल जो लोग कहते हैं कि हर कलिमा पढ़ने वाले को मिला लो और उसके साथ इत्तिहाद और मेल जोल करो, यह इस क़ुरआनी हुक्म के बिल्कुल ख़िलाफ़ हैं.

(9) इस आयत में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को मुनाफ़िक़ों के जनाज़े की नमाज़ और उनके दफ़्न में शिर्कत करने से मना फ़रमाया गया. इस आयत से साबित हुआ कि काफ़िर के जनाज़े की नमाज़ किसी हाल में जायज़ नहीं और काफ़िर की क़ब्र पर दफ़्न व ज़ियारत के लिये खड़ा होना भी मना है. और यह जो फ़रमाया और फ़िस्क़ ही में मर गए यहाँ फ़िस्क़ से कुफ़्र मुराद है. क़ुरआने करीम में एक और जगह भी फ़िस्क़ कुफ़्र के मानी में आया है, जैसे कि आयत “अफ़मन काना मूमिनन कमन काना फ़ासिक़न” (तो क्या जो ईमान वाला है वह उस जैसा हो जाएगा जो बेहुक्म है-सूरए सज्दा, आयत 18) में. फ़ासिक़ के जनाज़े की नमाज़ है, इसपर सहाबा और ताबईन की सहमति है, और इसपर उलमाए सालिहीन का अमल और यही अहले सुन्नत व जमाअत का मज़हब है. इस आयत में मुसलमानों के जनाज़े की नमाज़ का सुबूत भी मिलता है. और इसका फर्ज़े किफ़ाया होना हदीसे मशहूर से साबित होता है. जिस शख़्स के मूमिन या काफ़िर होने में शुबह हो,उसके जनाज़े की नमाज़ न पढ़ी जाए. जब कोई काफ़िर मर जाए और उसका सरपरस्त मुसलमान हो तो उसको चाहिये कि मसनून तरीक़े से ग़ुस्ल न दे बल्कि नजासत की तरह उसपर पानी बहा दे और न कफ़ने मसनून दे. बल्कि उतने कपड़े में लपेटे जिससे सतर छुप जाए और न सुन्नत तरीक़े पर दफ़्न करे, न सुन्नत तरीक़े पर क़ब्र बनाए, सिर्फ़ गढ़ा खोदे और दबा दे. अब्दुल्लाह बिन उबई बिन सलोल मुनाफ़िक़ों का सरदार था. जब वह मर गया तो उसके बेटे अब्दुल्लाह ने जो नेक मुसलमान, मुख़लिस सहाबी और कसरत से इबादत करने वाले थे, उन्होंने यह ख़्वाहिश की कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम उनके बाप अब्दुल्लाह बिन उबई बिन सलोल के कफ़न के लिये अपनी मुबारक क़मीज़ इनायत फ़रमा दें और उसकी नमाज़े जनाज़ा पढ़ा दें. हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो की राय उसके ख़िलाफ़ थी. लेकिन चूंकि उस वक़्त तक मुमानिअत नहीं हुई थी और हुज़ूर को मालूम था कि मेरा यह अमल एक हज़ार आदमियों के ईमान लाने का कारण होगा, इसलिये हुज़ूर ने अपनी क़मीज़ भी इनायत फ़रमाई और जनाज़े में शिर्कत भी की. कमीज़ देने की एक वजह यह थी कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के चचा हज़रत अब्बास, जो बद्र में क़ैदी होकर आए थे, तो अब्दुल्लाह बिन उबई ने अपना कुर्ता उन्हें पहनाया था. हुज़ूर को इसका बदला देना भी मंजूर था. इसपर यह आयत उतरी और इसके बाद फिर कभी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने किसी मुनाफ़िक़ के जनाज़े में शिर्कत न फ़रमाई और हुज़ूर की वह मसलिहत भी पूरी हुई. चुनांचे काफ़िरों ने देखा कि ऐसा सख़्त दुश्मन जब सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के कुर्तें से बरकत हासिल करना चाहता है तो उसके अक़ीदे में भी आप अल्लाह के हबीब और उसके सच्चे रसूल है, यह सोचकर हज़ार काफ़िर मुसलमान हो गए.

(10) उनके कुफ़्र और दोग़ली प्रवृति इख़्तियार करने के कारण.

(11) कि जिहाद में कैसी हलाकत और दिल की ख़राबी है.

(12) दोनो जहान की.

सूरए तौबह – बारहवाँ रूकू

सूरए तौबह – बारहवाँ रूकू

और बहाने बनाने वाले गंवार आए (1)
कि उन्हें रूख़सत दी जाए और बैठ रहे वो जिन्होंने अल्लाह व रसूल से झूट बोला था(2)
जल्द उनमें के काफ़िरों को दर्दनाक अज़ाब पहुंचेगा (3){90}
बूढ़ों पर कुछ हरज नहीं (4)
और न बीमारों पर(5)
और न उनपर जिन्हें ख़र्च की ताक़त न हो(6)
जबकि अल्लाह और रसूल के शुभ चिन्तक रहें(7)
नेकी वालों पर कोई राह नहीं (8)
और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है{91} और न उनपर जो तुम्हारे हुज़ूर हाज़िर हों कि तुम उन्हें सवारी अता फ़रमाओ (9)
तुमसे यह जवाब पाएं कि मेरे पास कोई चीज़ नहीं जिसपर तुम्हें सवार करूं इस पर यूं वापस जाएं कि उनकी आँखों से आँसू उबलते हों इस ग़म से कि ख़र्च की ताक़त न पाई {92} मुआख़ज़ा (जवाब तलबी) तो उनसे है जो तुमसे रूख़सत मांगते है और वो दौलतमंद हैं (10)
उन्हें पसन्द आया कि औरतों के साथ पीछे बैठ रहें और अल्लाह ने उनके दिलों पर मोहर करदी तो वो कुछ नहीं जानते{93}(11)

ग्यारहवां पारा – यअतज़िरून
(सूरए तौबह जारी)

तुमसे बहाने बनाएं (12)
जब तुम उनकी तरफ़ लौट कर जाओगे, तुम फ़रमाना, बहाने न बनाओ, हम हरगिज़ तुम्हारा यक़ीन न करेंगे, अल्लाह ने हमें तुम्हारी ख़बरें दे दी हैं, और अब अल्लाह व रसूल तुम्हारे काम देखेंगे(13)
फिर उसकी तरफ़ पलटकर जाओगे जो छुपे और ज़ाहिर सबको जानता है वह तुम्हें जता देगा जो कुछ तुम करते थे{94} अब तुम्हारे आगे अल्लाह की क़सम खाएंगे जब  (14)
तुम उनकी तरफ़ पलट कर जाओगे इसलिये कि तुम उनके ख़याल में न पड़ो (15)
तो हाँ तुम उनका ख़याल छोड़ों (16)
वो तो निरे पलीद हैं (17)
और उनका ठिकाना जहन्नम है, बदला उसका जो कमाते थे(18){95}
तुम्हारे आगे क़समें खाते हैं कि तुम उनसे राज़ी हो जाओ तो अगर तुम उनसे राज़ी हो जाओ (19)
तो बेशक अल्लाह तो फ़ासिक़ (दुराचारी) लोगों से राज़ी न होगा  (20){96}
गंवार (21)
कुफ़्र और निफ़ाक़ (दोग़लेपन) में ज़्यादा सख़्त हैं (22)
और इसी क़ाबिल कि अल्लाह ने जो हुक्म अपने रसूल पर उतारे उससे जाहिल रहें और अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है {97} और कुछ गंवार वो हैं कि जो अल्लाह की राह में ख़र्च करें तो उसे तावान समझें (23)
और तुमपर गर्दिशें आने के इन्तिज़ार में रहें (24)
उन्हीं पर है बुरी गर्दिश (आपत्ति) (25)
और अल्लाह सुनता जानता है {98} और कुछ गाँव वाले वो हैं जो अल्लाह और क़यामत पर यक़ीन रखते हैं (26)
और जो खर्च करें उसे अल्लाह की नज़दीकियों और रसूल से दुआएं लेने का ज़रीया समझें (27)हां हां वह उनके लिये क़रीब हो जाने का साधन है, अल्लाह जल्द उन्हें अपनी रहमत में दाख़िल करेगा, बेशक अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है{99}

तफ़सीर
सूरए तौबह – बारहवाँ रूकू

(1) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में जिहाद से रह जाने का बहाना करने. ज़ुहाक का क़ौल है कि यह आमिर बिन तुफ़ैल की जमाअत थी. उन्होंने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से अर्ज़ की कि या नबीयल्लाह, अगर हम आपके साथ जिहाद में जाएं तो क़बीलए तैय के अरब हमारी बीबियों बच्चों और जानवरों को लूट लेंगे. हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्ल्म ने फ़रमाया, मुझे अल्लाह ने तुम्हारे हाल से ख़बरदार किया है और वह मुझे तुमसे बे नियाज़ करेगा. अम्र बिन उला ने कहा कि उन लोगों ने झूटा बहाना बनाकर पेशा किया था.

(2) यह दूसरे गिरोह का हाल है जो बिना किसी विवशता के बैठ रहे. ये मुनाफ़िक़ थे. उन्होंने ईमान का झूठा दावा किया था.

(3) दुनिया में क़त्ल होने का, और आख़िरत में जहन्नम का.
(4) बातिल वालों का ज़िक्र फ़रमाने के बाद, सच्चे उज़्र वालों के बारे में फ़रमाया कि उनपर से जिहाद की अनिवार्यता उतर गई है, ये कौन लोग हैं, उनके कुछ तबक़े बयान फ़रमाए. पहले बूढ़े, फिर बूढ़े बच्चे औरतें, और वो शख़्स भी इन्हीं में दाख़िल है जो पैदायशी कमज़ोर, और नाकारा हो.

(5) यह दूसरा तबक़ा है जिसमें अन्धे, लंगड़े, अपाहिज भी दाख़िल हैं.

(6) जिहाद का सामान न कर सकें, ये लोग रह जाएं तो इनपर कोई गुनाह नहीं.

(7) उनकी फ़रमाँबरदारी करें और मुजाहिदों के घर वालों का ध्यान रखें.

(8) हिसाब और पकड़ की.

(9) रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सहाबा में से कुछ लोग जिहाद में जाने के लिये हाज़िर हुए. उन्होंने हुज़ूर से सवारी की दरख़्वास्त की. हुज़ूर ने फ़रमाया कि मेरे पास कुछ नहीं जिसपर मैं तुम्हें सवार करूं, तो वो रोते वापस हुए. उनके बारे में यह आयत उतरी.

(10) जिहाद में जाने की क़ुदरत रखते हैं इसके बावुजूद.

(11) कि जिहाद में क्या लाभ और पुण्य यानी सवाब है.

पारा दस समाप्त

सूरए तौबह – बारहवाँ रूकू (जारी)

(12) और झूट बहाना पेश करेगें, ये जिहाद से रह जाने वाले मुनाफ़िक़ तुम्हारे इस सफ़र से वापस होने के वक़्त.

(13) कि तुम दोहरी प्रवृत्ति से तौबह करते हो, या इसपर क़ायम रहते हो. कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा कि उन्होंने वादा किया था कि आगे चल कर वो मूमिनों की मदद करेंगे. हो सकता है कि उसी की निस्बत फ़रमाया गया हो कि अल्लाह व रसूल तुम्हारे काम देखेंगे कि तुम अपने इस एहद को भी वफ़ा करते हो या नहीं.

(14) अपने इस सफ़र से वापस होकर मदीनए तैय्यिबह में.

(15) और उनपर मलामत और क्रोध न करो.

(16) उनसे परहेज़ करो. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया मुराद यह है कि उनके साथ बैठना उनसे बोलना छोड़ दो. चुनांचे जब नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मदीना तशरीफ़ लाए तो हुज़ूर ने मुसलमानों  हुक्म दिया कि मुनाफ़िक़ों के पास न बैठे, उनसे बात चीत न करें, क्योंकि उनके बातिन ख़बीस और कर्म बुरे हैं. और मलामत व इताब से उनकी इस्लाह न होगी, इसलिये कि.

(17) और अपवित्रता के पाक करने का कोई तरीक़ा नहीं हैं.

(18) दुनिया में बुरा कर्म. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया यह आयत जद बिन क़ैस और मअतब बिन क़शीर और उनके साथियों के हक़ में नाज़िल हुई. ये अस्सी मुनाफ़िक़ थे. नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि उनके पास न बैठों, उनसे कलाम न करो. मक़ातिल ने कहा कि यह आयत अब्दुल्लाह बिन उबई के बारे उतरी. उसने नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सामने क़सम खाई थी कि अब कभी वह जिहाद में जाने में सुस्ती न करेगा और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से प्रार्थना की थी कि हुज़ूर उससे राज़ी हो जाएं. इसपर यह आयत और इसके बाद वाली आयत उतरी.

(19) और उनके उज्र और बहाने क़ुबूल कर लो इससे उन्हें कुछ नफ़ा न होगा, क्योंकि अगर तुम उनकी क़रमों का ऐतिबार भी कर लो.

(20) इसलिये कि वह उनके कुफ़्र और दोहरी प्रवृति को जानता है.

(21) जंगल के रहने वाले.

(22) क्योंकि वो इल्म की मजलिसों और उलमा की सोहबत से दूर रहते हैं.

(23) क्योंकि वो जो कुछ ख़र्च करते हैं, अल्लाह की ख़ुशी और सवाब हासिल करने के लिये तो करते नहीं, रियाकारी और मुसलमानों के ख़ौफ़ से ख़र्च करते हैं.

(24) और ये राह देखते हैं कि कब मुसलमानों का ज़ोर कम हो और कब वो मग़लूब और परास्त हों. उन्हें ख़बर नहीं कि अल्लाह को क्या मंजूर है. वह बतला दिया जाता है.

(25) और वही रंज और बला और बदहाली में जकड़े जाएंगे. यह आयत असद व ग़ितफ़ान व तमीम के क़बीलों के देहातियों के हक़ में उतरी. फिर अल्लाह तआला ने उनमें से जिनको छूट दी उनका ज़िक्र अगली आयत में है. (ख़ाजिन)

(26)मुजाहिद ने कहा कि ये लोग क़बीलए मज़ैनह में से बनी मक़रिन हैं. कल्बी ने कहा, वो असलम और ग़फ़्फ़ार और जुहैना के क़बीले हैं. बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस में है कि रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि क़ुरैश और अन्सार और जुहैना और मज़ैनह और असलम और शुजाअ और ग़फ़्फ़ार मवाली हैं, अल्लाह और रसूल के सिवा कोई उनका मौला नहीं.

(27) कि जब रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के हुज़ूर में सदक़ा लाएं तो हुज़ूर उनके लिये ख़ैर बरक़त व मग़फ़िरत की दुआ फ़रमाएं. यही रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का तरीक़ा था. यही फ़ातिहा की अस्ल है कि सदक़े के साथ दुआए मग़फ़िरत की जाती है. लिहाज़ा फ़ातिहा को बिदअत और ना रवा बताना क़ुरआन और हदीस के ख़िलाफ़ है.

सूरए तौबह – तेरहवाँ रूकू

सूरए तौबह – तेरहवाँ रूकू

और सब मे अगले पहले मुहाजिर (1)
और अन्सार (2)
और जो भलाई के साथ उनके पीछे चलने वाले हुए (3)
अल्लाह उनसे राज़ी(4)
और वो अल्लाह से राज़ी (5)
और उनके लिये तैयार कर रखे हैं बाग़ जिनके नीचे नहरें बहें हमेशा हमेशा उनमें रहें, यही बड़ी कामयाबी है {100}और तुम्हारे आस पास (6)
के कुछ गंवार मुनाफ़िक़ हैं, और कुछ मदीना वाले उनकी आदत हो गई है निफ़ाक़ (दोग़लापन), तुम उन्हें नहीं जानते, हम उन्हें जानते हैं (7)
जल्द हम उन्हें दोबारा(8)
अज़ाब करेंगे फिर बड़े अज़ाब की तरफ़ फेरे जाएंगे (9){101}
और कुछ और हैं जो अपने गुनाहों के मुक़िर (इक़रारी) हुए(10)
और मिलाया एक काम अच्छा (11)
और दूसरा बुरा (12),
क़रीब है कि अल्लाह उनकी तौबह क़ुबूल करे, बेशक अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है{102} ऐ मेहबूब उनके माल में से ज़कात निकलवाओ जिससे तुम उनहें सुथरा और पाकीज़ा कर दो और उनके हक़ में दुआए ख़ैर करो (13)
बेशक तुम्हारी दुआ उनके दिलों का चैन है और अल्लाह सुनता जानता है{103} क्या उन्हें ख़बर नहीं कि अल्लाह ही अपने बन्दों की तौबह क़ुबूल करता और सदक़े ख़ुद अपने दस्ते क़ुदरत में लेता है और यह कि अल्लाह ही तौबह क़ुबूल करने वाला मेहरबान है(14){104}
और तुम फ़रमाओ काम करो अब तुम्हारे काम देखेगा अल्लाह और उसके रसूल और मुसलमान, और जल्द उसकी तरफ़ पलटोगे जो छुपा और खुला सब जानता है तो वो तुम्हारे काम तुम्हें जताएगा {105} और कुछ(15)
मौक़फ़ रखे गए अल्लाह के हुक्म पर या उनपर अज़ाब करे या उनकी तौबह क़ुबूल करे (16)
और अल्लाह इल्म व हि कमत वाला है {106} और वो जिन्होंने मस्जिद बनाई(17)
नुक़सान पहुंचाने को (18)
और कुफ़्र के कारण (19)
और मुसलमानों में तफ़रिक़ा (20)
डालने को और उसके इन्तिज़ार में जो पहले से अल्लाह और उसके रसूल का विरोधी है (21)
और वो ज़रूर क़समें खाएंगे हमने तो भलाई ही चाही, और अल्लाह गवाह है कि वो बेशक झूटे हैं {107} उस मस्जिद में तुम कभी खड़े न होना (22)
बेशक वह मस्जिद कि पहले ही दिन से जिसकी बुनियाद परहेज़गारी पर रखी गई है(23)
वह इस क़ाबिल है कि तुम उसमें खड़े हो, उसमें वो लोग हैं कि ख़ूब सुथरा होना चाहते हैं(24)
और सुथरे अल्लाह को प्यारे हैं {108} तो क्या जिसने अपनी बुनियाद रखी अल्लाह के डर और उसकी रज़ा पर (25)
वह भला या वह जिसने अपनी नींव चुनी एक गिराऊ गढ़े के किनारे तो (26)
वह उसे लेकर जहन्नम की आग में है ढै पड़ा (27)
और अल्लाह ज़ालिमों को राह नहीं देता {109} वो तामीर जो चुनी हमेशा उनके दिलों में खटकती रहेगी (28)
मगर यह कि उनके दिल टुकड़े टुकड़े हो जाएं (29)
और अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है{110}

तफ़सीर
सूरए तौबह – तैरहवाँ रूकू

(1) वो लोग जिन्होंने दोनों क़िबलों की तरफ़ नमाज़ें पढ़ीं या बद्र वाले या बैअते रिज़वान वाले.

(2) बैअते अक़बए ऊला वाले, जो छ: सहाबा थे और बैअते अक़बए सानिया वाले, जो बारह थे. और बैअते अक़बए सालिसा वाले जो सत्तर सहाबा थे, ये हज़रात साबिक़ीन अन्सार कहलाते हैं (ख़ाज़िन)

(3) कहा गया है कि उनसे बाक़ी मुहाजिर और अन्सार मुराद हैं. तो अब तमाम सहाबा इसमें आगए और क़ौल यह है कि अनुयायी होने वालों से क़यामत तक के वो ईमानदार मुराद हैं जो ईमान व आज्ञा पालन और नेकी में अन्सार और मुहाजिरों की राह चलें.

(4) उसकी बारगाह में उनके नेक कर्म क़ुबूल.

(5) उसके सवाब और अता यानी इनाम से ख़ुश.

(6) यानी मदीनए तैय्यिबह के आस पास के प्रदेश.

(7) इसके मानी या तो ये हैं कि ऐसा जानना जिसका असर उन्हें मालूम हो, वह हमारा जानना है कि हम उन्हें अज़ाब करेंगे. या हुज़ूर से मुनाफ़िक़ों के हाल जानने की नफ़ी बऐतिबारे साबिक़ है और इसका इल्म बाद को अता हुआ जैसा कि दूसरी आयत में फ़रमाया, “वला तअरिफ़न्नहुम फ़ी लहनिल क़ौल” (और ज़रूर तुम उन्हें बात के उस्लूब में पहचान लोगे – सूरए मुहम्मद, आयत 30)(जुमल). कल्बी व सदी ने कहा कि नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने जुमुए के रोज़ ख़ुत्बे के लिये खड़े होकर नाम बनाम फ़रमाया, निकल ऐ फ़लाँ, तू मुनाफ़िक़ है, निकल ऐ फ़लाँ तू मुनाफ़िक़ है. तो मस्जिद से चन्द लोगों को रूस्वा करके निकाला इससे भी मालूम होता है कि हुज़ूर को इसके बाद मुनाफ़िक़ों के हाल का इल्म अता किया गया.

(8) एक बार तो दुनिया में रूस्वाई और क़त्ल के साथ और दूसरी बार क़ब्र में.

(9) यानी दोज़ख़ के अज़ाब की तरफ़, जिसमें हमेशा गिरफ़्तार रहेंगे.

(10) और उन्होंने दूसरों की तरह झूटे बहाने न किये और अपने किये पर शर्मिन्दा हुए. अक्सर मुफ़स्सिरों का कहना है कि यह आयत मदीनए तैय्यिबह के मुसलमानों की एक जमाअत के हक़ में नाज़िल हुई जो ग़जवए तबूक में हाज़िर न हुए थे. उसके बाद शर्मिन्दा हुए और तौबह की और कहा, अफ़सोस हम गुमराहियों के साथ या औरतों के साथ रह गए और रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और आपके सहाबा जिहाद में हैं. जब हुज़ूर अपने सफ़र से वापस हुए और मदीना के क़रीब पहुंचे तो उन लोगों ने क़सम खाई कि हम अपने आपको मस्जिद के सुतूनों से बाँध देंगे और हरगिज़ न खोलेंगे, यहाँ तक कि हुज़ूर ही खोलें. ये क़समें खाकर वो मस्जिदों के सुतूनों से बंध गए. जब हुज़ूर तशरीफ़ लाए और उन्हें देखा तो फ़रमाया, ये कौन हैं? अर्ज़ किया गया, ये वो लोग हैं जो जिहाद में हाज़िर होने से रह गए थे. इन्होंने अल्लाह से एहद किया है कि ये अपने आपको न खोलेंगे जब तक हुज़ूर उनसे राज़ी होकर ख़ुद उन्हें न खोलें. हुज़ूर ने फ़रमाया, और मैं अल्लाह की क़सम खाता हूँ कि मैं उन्हें न खोलूंगा, न उनकी माफ़ी क़ुबूल करूंगा जब तक कि मुझे अल्लाह की तरफ़ से  उनके खोलने का हुक्म न मिल जाए. तब यह आयत उतरी और रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उन्हें खोला तो उन्होंने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह, ये माल हमारे रह जाने के कारण हुए, इन्हें लीजिये  और सदक़ा कीजिये और हमें पाक कर दीजिये और हमारे लिये मग़फ़िरत की दुआ फ़रमाइये. हुज़ूर ने फ़रमाया, मुझे तुम्हारे माल लेने का हुक्म नहीं दिया गया. इसपर अगली आयत उतरी “खुज़ मिन अमवालिहिम”.

(11) यहाँ नेक कर्मों से या क़ुसूर का ऐतिराफ़ और तौबह मुराद है या इस पीछे रह जाने से पहले ग़ज़वात में नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ हाज़िर होना या फ़रमाँबरदारी और तक़वा के तमाम कर्म. इस सूरत में यह आयत सारे मुसलमानों के हक़ में होगी.

(12) इससे जिहाद से रह जाना मुराद है.

(13) आयत में जो सदक़ा आया है उसके मानी में मुफ़स्सिरों के कई क़ौल हैं. एक तो यह है कि वह ग़ैर वाजिब सदक़ा था जो कफ़्फ़ारे के तौर पर उन साहिबों ने दिया था जिनका ज़िक्र ऊपर की आयत में है. दूसरा क़ौल यह है कि इस सदक़े से मुराद वह ज़कात है जो उनके ज़िम्मे वाजिब थी, वो तायब हुए और उन्होंने ज़कात अदा करनी चाही तो अल्लाह तआला ने उसके लेने का हुक्म दिया. इमाम अबूबक्र राज़ी जस्सास ने इस क़ौल को तरजीह दी हे कि सदक़े से ज़कात मुराद है (खाज़िन) मदारिक में है कि सुन्नत यह है कि सदक़ा लेने वाला सदक़ा देने वाले के लिये दुआ करे और बुख़ारी व मुस्लिम में हज़रत अब्दुल्लाह बिन अबी औफ़ की हदीस है कि जब कोई नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के पास सदक़ा लाता, आप उसके हक़ में दुआ करते. मेरे बाप ने सदक़ा हाज़िर किया तो हुज़ूर ने दुआ फ़रमाई “अल्लाहुम्मा सल्ले अला अबी औफ़ा”. इस आयत से साबित हुआ कि फ़ातिहा में जो सदक़ा लेने वाले सदक़ा पाकर दुआ करते हैं, यह क़ुरआन और हदीस के मुताबिक है.

(14) इसमें तौबह करने वालों को बशारत दी गई कि उनकी तौबह और उनके सदक़ात मक़बूल हैं. कुछ मुफ़स्सिरो का क़ौल है कि जिन लोगों ने अब तक तौबह नहीं की, इस आयत में उन्हें तौबह और सदक़े की तरग़ीब दी गई.

(15) पीछे रह जाने वालों वालों से.

(16) ग़ज़वए तबूक से रह जाने वाले तीन क़िस्म के थे, एक मुनाफ़िक़,  जो दोहरी प्रवृति के आदी थे, दूसरे वो लोग जिन्होंने क़ुसूर के एतिराफ़ और तौबह में जल्दी की, जिनका ऊपर ज़िक्र हो चुका, तीसरे वो जिन्हों ने देरी की, जो रूके रहे और जल्दी तौबह न की. यही इस आयत से मुराद है.

(17) यह आयत मुनाफ़िक़ों की एक जमाअत के बारे मे उतरी जिन्होंने मस्जिदें क़ुबा को नुक़सान पहुंचाने और उसकी जमाअत बिखेरने के लिये इसके क़रीब एक मस्जिद बना ली थी. उसमें एक बड़ी चाल थी. वह यह कि अबू आमिर जो जिहालत के ज़माने में ईसाई पादरी हो गया था. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के मदीनए तैय्यिबह तशरीफ़ लाने पर हुज़ूर से कहने लगा, यह कौन सा दीन है जो आप लाए हैं. हुज़ूर ने फ़रमाया कि मैं मिल्लते हनीफ़िया, दीने इब्राहीम लाया हूँ. कहने लगा मैं उसी दीन पर हूँ हुज़ूर ने फ़रमाया नहीं. उसने कहा कि आपने इसमें कुछ और मिला दिया हे. हुज़ूर ने फ़रमाया कि नहीं, मैं ख़ालिस साफ़ मिल्लत लाया हूँ. अबू आमिर ने कहा, हम में से जो झूठा हो, अल्लाह उसको मुसाफ़िरत में तन्हा और बेकस करके हलाक करे. हुज़ूर ने आमीन फ़रमाया. लोगों ने उसका नाम अबू आमिर फ़ासिक़ रख दिया. उहद के दिन अबू आमिर फ़ासिक़ ने हुज़ूर से कहा कि जहाँ कहीं कोई क़ौम आपसे जंग करने वाली मिलेगी, मैं उसके साथ होकर आपसे जंग करूंगा. चुनांचे जंगे हुनैन तक उसका यही मामूल रहा और वह हुज़ूर के साथ मसरूफ़े जंग रहा. जब हवाज़िन को हार हुई  और मायूस होकर शाम प्रदेश की तरफ़ भागा तो उसने मुनाफ़िक़ों को ख़बर भेजी कि तुम से जो सामाने जंग हो सके, क़ुव्वत और हथियार, सब जमा करो और मेरे लिये एक मस्जिद बनाओ. मैं रूम के बादशाह के पास जाता हूँ वहाँ से रूम का लश्कर लेकर आऊंगा और  (सैयदे आलम) मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) और उनके सहाबा को निकालूंगा. यह ख़बर पाकर उन लोगों ने मस्जिदे ज़िरार बनाई थी और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से अर्ज़ किया था, यह मस्जिद हमने आसानी के लिये बनादी है कि जो लोग बूढ़े और कमज़ोर हैं तो इसमें फ़राग़त से नमाज़ पढ़ लिया करें. आप इसमें एक नमाज़ पढ़ दीजिये और बरक़त की दुआ फ़रमा दीजिये. हुज़ूर ने फ़रमाया कि अब तो मैं सफ़रे तबूक के लिये तैयारी कर रहा हुँ. वापसी में अल्लाह की मर्जी़ होगी तो वहाँ नमाज़ पढ़ लूंगा. जब नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ग़ज़वए तबूक से वापस होकर मदीनए शरीफ़ के क़रीब एक गाँव में ठहरे, तो मुनाफ़िक़ों ने आपसे दरख़्वास्त की कि उनकी मस्जिद में तशरीफ़ ले चलें. इसपर पर यह आयत उतरी और उनके ग़लत इरादों का इज़हार फ़रमाया गया. तब रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने कुछ सहाबा को हुक्म दिया कि इस मस्जिद को ढा दें और जला दें. चुनांचे ऐसा ही किया गया और अबू आमिर राहिब शाम प्रदेश में सफ़र की हालत में तन्हाई और बेकसी में हलाक हुआ.

(18) मस्जिदे क़ुबा वालों के.

(19) कि वहाँ ख़ुदा और रसूल के साथ कुफ़्र करें और दोहरी प्रवृत्ति को क़ुव्वत दें.

(20) जो मस्जिदे क़ुबा में नमाज़ के लिये जमा होते है.

(21) यानी अबू आमिर राहिब.

(22) इसमें सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को मस्जिदे ज़िरार में नमाज़ पढ़ने को मना किया गया. जो मस्जिद घमण्ड व दिखावा या अल्लाह की रज़ा के अलावा और किसी मक़सद के लिये या नापाक माल से बनाइ गई हो वह मस्जिद ज़िरार के साथ लाहिक़ है. (मदारिक)

(23) इससे मुराद मस्जिदे क़ुबा है, जिसकी बुनियाद रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने रखी और जब तक हुज़ूर  ने क़ुबा में क़याम फ़रमाया, उसमें नमाज़ पढ़ी, बुख़ारी शरीफ़ की हदीस में है कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हर हफ़्ते मस्जिदे क़ुबा में नमाज़ पढ़ने तशरीफ़ लाते थे. दूसरी हदीस में है कि मस्जिदे क़ुबा में नमाज़ पढ़ने का सवाब उमरे के बराबर है. मुफ़स्सिरों का एक क़ौल यह भी है कि इससे मस्जिदे नदीना मुराद है और इसमें भी हदीसें आई हैं. इन बातों में कुछ विरोधाभास नहीं, क्योंकि आयत का मस्जिदे क़ुबा के हक़ में नाज़िल होना इसको मुस्तलज़िम नहीं कि मस्जिदे मदीना में ये विशेषताएं न हो.

(24) तमाम नजासतों या गुनाहों से. यह आयत मस्जिदे क़ुबा वालों के हक़ में नाज़िल हुई. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उनसे फ़रमाया, ऐ गिरोहे अन्सार, अल्लाह तआला ने तुम्हारी तारीफ़ फ़रमाई, तुम वुज़ू और इस्तंजे के वक़्त क्या अमल करते हो, उन्होंने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह, हम बड़ा इस्तंजा तीन ढेलों से करते हैं. उसके बाद फिर पानी से पाकी करते हैं. नजासत अगर निकलने की जगह से बढ़ जाए तो पानी से इस्तंजा वाजिब है, वरना मुस्तहब. ढेलों से इस्तंजा सुन्नत है. नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने इसपर पाबन्दी फ़रमाई और कभी छोड़ा भी.

(25) जैसे कि मस्जिदे क़ुबा और मस्जिदे मदीना.

(26) जैसे कि मस्जिदे ज़िरार वाले.

(27) मुराद यह है कि जिस शख़्स ने अपने दीन की बुनियाद तक़वा और अल्लाह की रज़ा की मज़बूत सतह पर रखी, वह बेहतर है, न कि वह जिसने अपने दीन की नीव बातिल और दोहरी प्रवृति के गिराऊ गढे पर रखी.

(28) और उसके गिराए जाने का सदमा बाक़ी रहेगा.

(29) चाहे क़त्ल होकर या मरकर या क़ब्र में या जहन्नम में. मानी ये हैं कि उनके दिलों का ग़म व ग़ुस्सा मरते दम तक बाक़ी रहेगा और ये मानी भी हो सकते हैं कि जब तक उनके दिल अपने क़ुसूर की शर्मिन्दगी और अफ़सोस से टुकड़े टुकड़े न हों और वो सच्चे दिल से तौबह न कर लें, उस वक़्त तक वो इसी रंज और ग़म में रहेंगे. (मदारिक)

सूरए तौबह – चौदहवाँ रूकू

सूरए तौबह – चौदहवाँ रूकू

बेशक अल्लाह ने मुसलमानों से उनके माल और जान ख़रीद लिये हैं इस बदले पर कि उनके लिये जन्नत है(1)
अल्लाह की राह में लड़ें तो मारें (2)
और मरें (3)
उसके करम के ज़िम्मे सच्चा वादा तौरात और इंजील और क़ुरआन में (4)
और अल्लाह से ज़्यादा क़ौल (कथन) का पूरा कौन तो ख़ुशियां मनाओ अपने सौदे की जो तुमने उससे किया है, और यही बड़ी कामयाबी है {111} तौबह वाले (5)
इबादत वाले (6)
सराहने वाले (7)
रोज़े वाले, रूकू वाले, सज्दा वाले (8)
भलाई के बताने वाले और बुराई से रोकने वाले और अल्लाह की हदें निगाह रखने वाले(9)
और ख़ुशियाँ सुनाओ मुसलमानों को (10){112}
नबी और ईमान वालों को लायक़ नहीं कि मुश्रिकों की बख़्शिश चाहें अगरचे वो रिश्तेदार हों (11)
जबकि उन्हें खुल चुका कि वो दोज़ख़ी हैं (12){113}
और इब्राहीम का अपने बाप (13)
की बख़्शिश चाहना वह तो न था मगर एक वादे के कारण जो उससे कर चुका था (14)
फिर जब इब्राहीम को खुल गया कि वह अल्लाह का दुश्मन है उससे तिनका तोड़ दिया  (15)
बेशक इब्राहीम ज़रूर बहुत आहें करने वाला (16)
मुतहम्मिल  (सहनशील) है {114} और अल्लाह की शान नहीं कि किसी क़ौम को हिदायत बाद गुमराह फ़रमाए (17)
जब तक उन्हें साफ़ न बता दे कि किस चीज़ से उन्हें बचना है (18)
बेशक अल्लाह सब कुछ जानता है   {115} बेशक अल्लाह ही के लिये है आसमानों और ज़मीन की सल्तनत, जिलाता है और मारता है और अल्लाह के सिवा न तुम्हारा कोई वाली और न मददगार {116} बेशक अल्लाह की रहमतें मुतवज्जह हुई उन ग़ैब की ख़बरें बताने वाले और उन मुहाजिरीन और अन्सार पर जिन्होंने मुश्किल की घड़ी में उनका साथ दिया (19)
बाद इसके कि क़रीब था कि उनमें कुछ लोगों के दिल फिर जाएं (20)
फिर उनपर रहमत से मुतवज्जेह हुआ (21)
बेशक वह उनपर बहुत मेहरबान रहम वाला है {117} और उन तीन पर जो मौक़ूफ़ (रोके) रखे गए थे (22)
यहाँ तक कि जब ज़मीन इतनी वसी {विस्तृत} होकर उनपर तंग होगई (23)
और वो अपनी जान से तंग आए (24)
और उन्हें यक़ीन हुआ कि अल्लाह से पनाह नहीं मगर उसी के पास फिर (25)
उनकी तौबह क़ुबूल की कि तौबह किये हुए रहें, बेशक अल्लाह ही तौबह क़ुबूल करने वाला मेहरबान है {118}

तफ़सीर
सूरए तौबह – चौदहवाँ रूकू

(1) ख़ुदा की राह में जान माल ख़र्च करके जन्नत पाने वाले ईमानदारों की एक मिसाल है जिससे भरपूर मेहरबानी का इज़हार होता है कि अल्लाह तआला ने उन्हें जन्नत अता फ़रमाना उनके जान व माल का एवज़ क़रार दिया और अपने आपको ख़रीदार फ़रमाया. यह सर्वोत्तम सम्मान है कि वह हमारा ख़रीदार बने और हमसे ख़रीदे, किस चीज़ को, न हमारी बनाई हुई, न हमारी पैदा की हुई. जान है तो उसकी पैदा की हुई, माल है तो उसका अता किया हुआ. जब अन्सार ने रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से अक़बा की रात बैअत की तो अब्दुल्लाह बिन रवाहा रदियल्लाहो अन्हो ने अर्ज़ की, या रसूलल्लाह अपने रब के लिये और अपने लिये कुछ शर्त फ़रमा लीजिये जो आप चाहें. फ़रमाया मैं अपने रब के लिये तो यह शर्त करता हूँ कि तुम उसकी इबादत करो और किसी को उसका शरीक न ठहराओ. और अपने लिये यह कि जिन चीज़ों से तुम अपने जान माल को बचाते और मेहफ़ूज़ रखते हो, उसको मेरे लिये भी गवारा न करो. उन्होंने अर्ज़ किया कि हम ऐसा करें तो हमें क्या मिलेगा. फ़रमाया जन्नत.

(2) ख़ुदा के दुश्मनों को.

(3) ख़ुदा की राह में.

(4) इससे साबित हुआ कि तमाम शरीअतों और मिल्लतों में जिहाद का हुक्म था.

(5) तमाम गुनाहों से.

(6) अल्लाह के फ़रमाँबरदार बन्दे जो सच्चे दिल से उसकी इबादत करते हैं और इबादत को अपने ऊपर लाज़िम जानते हैं.

(7) जो हर हाल में अल्लाह की प्रशंसा करते हैं.

(8) यानी नमाज़ों के पाबन्द और उनको ख़ूबी से अदा करने वाले.

(9) और उसके आदेशों का पालन करने वाले, ये लोग जन्नती हैं.

(10) कि वो अल्लाह से किया हुआ एहद पूरा करेंगे तो अल्लाह तआला उन्हें जन्नत में दाख़िल फ़रमाएगा.

(11) इस आयत के उतरने की परिस्थितियों में मुफ़स्सिरों के विभिन्न क़ौल हैं. (1) नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अपने चचा अबू तालिब से फ़रमाया था कि मैं तुम्हारे लिये इस्तग़फ़ार करूंगा जब तक कि मुझे मना न किया जाए. तो अल्लाह ने यह आयत नाज़िल फ़रमाकर मना फ़रमा दिया. (2) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि मैंने अपने रब से अपनी वालिदा की क़ब्र की ज़ियारत की इजाज़त चाही. उसने मुझे इजाज़त दे दी. फिर मैंने उनके लिये इस्तग़फ़ार की इजाज़त चाही, तो मुझे इजाज़त न दी और मुझपर आयत नाज़िल हुई “मा काना लिन नबिय्ये…” (नबी और ईमान वालों के लायक़ नहीं कि मुश्रिकों की बख़्शिश चाहें अगरचे वो रिश्तेदार हों . सूरए तौबह, आयत 113) आयत उतरने की परिस्थिति की यह वजह सही नहीं है, क्योंकि यह हदीस हाकिम ने रिवायत की और इसको सही बताया और ज़हबी ने हाकिम पर भरोसा करके मीज़ान में इसको सही बताया, लेकिन मुख़्तसिरूल मुस्तदरक में ज़हबी ने इस हदीस को ज़ईफ़ बताया और कहा कि अय्युब बिन हानी को इब्ने मुईन ने ज़ईफ़ बताया है. इसके अलावा यह हदीस बुख़ारी की हदीस के विरूद्ध भी है जिसमें इस आयत के उतरने का कारण आपकी वालिदा के लिये इस्तग़फ़ार करना नहीं बताया गया बल्कि बुख़ारी की हदीस से यही साबित है कि अबू तालिब के लिये इस्तग़फ़ार करने के बारे में यह हदीस आई. इसके अलावा और हदीसें, जो इस मज़मून की हैं जिनको तिबरानी और इब्ने सअद और इब्ने शाहीन वग़ैरह ने रिवायत किया है, वो सबकी सब ज़ईफ़ हैं. इब्ने सअद ने तबक़ात में हदीस निकालने के बाद उसको ग़लत बताया और मुहद्दिसों के सरदार इमाम जलालुद्दिन सियूती ने अपने रिसाले अत्तअज़ीम वल मिन्नत में इस मज़मून की सारी हदीसों को कमज़ोर बताया. लिहाज़ा यह वजह शाने नुज़ूल में सही नहीं और यह साबित है, इसपर बहुत दलीलें क़ायम हैं कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की वालिदा अल्लाह की वहदत को मानने वाली और दीने इब्राहीम पर थीं.  (3) कुछ सहाबा ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से अपने पूर्वजों के लिये इस्तिग़फ़ार करने की प्रार्थना की थी. इसपर यह आयत उतरी.

(12) शिर्क पर मरे.

(13) यानी आज़र.

(14) इससे या तो वह वादा मुराद है जो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने आज़र से किया था कि अपने रब से तेरी मग़फ़िरत की दुआ करूंगा या वह वादा मुराद है जो आज़र ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से इस्लाम लाने का किया था. हज़रत अली मुर्तज़ा रदियल्लाहो अन्हो से रिवायत है कि जब यह आयत उतरी, “सअस्तग़फ़िरों लका रब्बी” (क़रीब है कि मैं तेरे लिये अपने रब से माफ़ी मांगूंगा – सूरए मरयम, आयत 47) तो मैं ने सुना कि एक शख़्स अपने माँ बाप के लिये दुआए मग़फ़िरत कर रहा है. जबकि वो दोनों मुश्रिक थे. तो मैं ने कहा तू मुश्रिकों के लिये मग़फ़िरत की दुआ करता है, उसने कहा, क्या इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने आज़र के लिये दुआ न की थी, वह भी तो मुश्रि क था. ये वाक़िआ मैंने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से अखज़ किया. इसपर यह आयत उतरी और बताया गया कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का इस्तग़फ़ार इस्लाम की उम्मीद से था जिसका आज़र आपसे वादा कर चुका था और आप आज़र से इस्तग़फ़ार का वादा कर चुके थे. जब वह उम्मीद जाती रही तो आपने उससे अपना सम्बन्ध तोड़ लिया.

(15) और इस्तग़फ़ार करना छोड़ दिया.

(16) कसरत से दुआ मांगने वाले, गिड़गिड़ाने वाले.

(17) यानी उनपर गुमराही का हुक्म करे और उन्हें गुमराहों में दाख़िल फ़रमा दे.

(18) मानी ये हैं कि जो चीज़ वर्जित है और उससे रूका रहना वाजिब है, उसपर अल्लाह तआला तब तक अपने बन्दों की पकड़ नहीं फ़रमाता जब तक उसकी मुमानिअत यानी अवैधता का साफ़ ऐलान अल्लाह की तरफ़ से न आजाए. लिहाज़ा मुमानिअत से पहले उस काम को करने में हर्ज नहीं. (मदारिक) इससे मालूम हआ कि जिस चीज़ की शरीअत से मुमानिअत न हो, वह जायज़ है. जब ईमान वालों को मुश्रिकों के लिये इस्तग़फ़ार करने से मना फ़रमाया गया तो उन्हें डर हुआ कि हम पहले जो इस्तग़फ़ार कर चुके हैं कहीं उसपर पकड़ न हो. इस आयत से उन्हें तसल्ली दी गई और बताया गया कि मुमानिअत का बयान होने के बाद उस काम को करते रहने से पकड़ की जाती हैं.

(19) यानी ग़ज़वए तबूक में, जिसे ग़ज़वए उसरत भी कहते हैं, इस ग़ज़बे में उसरत का यह हाल था कि दस दस आदमियों की सवारी के लिये ऊंट था. थोड़ा थोड़ा करके इसी पर सवार हो लेते थे. और खाने की कमी का यह हाल था कि एक एक खजूर पर कई कई आदमी बसर करते थे. इस तरह की हर एक ने थोड़ी थोड़ी चूस कर एक घूँट पानी पी लिया. पानी की भी अत्यन्त कमी थी. गर्मी सख़्त थी, प्यास ग़लबा और पानी  ग़ायब, इस हाल में सहाबा अपनी सच्चाई और यक़ीन और ईमान और महब्बत के साथ हुज़ूर पर मर मिटने के लिये डटे रहे. हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ ने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह, अल्लाह तआला से दुआ फ़रमाईये. फ़रमाया, क्या तुम्हें यह ख़्वाहिश है. अर्ज़ किया जी हाँ . तो हुज़ूर ने दस्ते मुबारक उठा कर दुआ फ़रमाई और अभी हाथ उठे हुए ही थे कि अल्लाह तआला ने बादल भेजा. बारिश हुई और लश्कर सैराब हुआ. लश्कर वालों ने अपने अपने बर्तन भर लिये. इसके बाद जब आगे चले तो ज़मीन सूखी थी. बादल ने लश्कर के बाहर बारीश ही नहीं की. वह ख़ास इसी लश्कर को सैराब करने के लिये भेजा गया था.

(20) और वो इस सख़्ती में रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से अलग होना गवारा करें.

(21) और वो साबिर रहे और अडिग रहे और उनकी वफ़ादारी मेहफ़ूज़ रही और जो ख़तरा दिल में गुज़रा था उसपर शर्मिन्दा हुए.

(22) तौबह से जिनका ज़िक्र आयत “वआख़रूना मुरजौना लिअम्रिल्लाहे” (और कुछ मौक़ूफ़ रखे गए अल्लाह के हुक्म पर – सूरए तौबह, आयत 106) में है. ये तीन लोग, कअब बिन मालिक, हिलाल बिन उमैया और मराह बिन रबीअ हैं. ये सब अन्सारी थे. रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने तबूक से वापस होकर उनसे जिहाद में हाज़िर न होने के कारण पूछे और फ़रमाया, ठहरो जब तक कि उनके रिश्तेदारों और दोस्तों ने उनसे बातचीत छोड़ दी,  ऐसा मालूम होता था कि उनको कोई पहचानता ही नहीं और उनकी किसी से शनासाई ही नहीं. इस हाल पर उन्हें पचास दिन गुज़रे.

(23) और उन्हें कोई ऐसी जगह न मिल सकी जहाँ एक पल के लिये उन्हे क़रार होता. हर वक़्त परेशानी और रंज, बेचैनी में जकड़े हुए थे.

(24) रंज और ग़म की सख़्ती से न कोई साथी है, जिससे बात करें, न कोई दुख बाँटने वाला, जिसे दिल का हाल सुनाएं, वहशत और तन्हाई, और रात दिन का रोना बिलकना.

(25) अल्लाह तआला ने उनपर रहम फ़रमाया और.