सूरए तौबह – सातवाँ रूकू

सूरए तौबह – सातवाँ रूकू

अल्लाह तुम्हें माफ़ करे(1)
तुमने उन्हें क्यों इज़्न (आज्ञा) दे दिया जब तक खुले न थे तुम पर सच्चे और ज़ाहिर न हुए थे झूटे {43} और वो जो अल्लाह और क़यामत पर ईमान रखते हैं तुमसे छुट्टी न मांगेंगे उससे कि अपने माल और जान से जिहाद करें और अल्लाह ख़ूब जानता है परहेज़गारों को {44} तुमसे यह छुट्टी वही माँगते है जो अल्लाह और क़यामत पर ईमान नहीं रखते(2)
और उनके दिल शक में पड़े हैं तो वो अपने शक में डांवाडोल है(3){45}
उन्हें निकलना मंजूर होता (4)
तो उसका सामान करते मगर ख़ुदा ही को उनका उठना नापसन्द हुआ तो उनमें काहिली भर दी(5)
और फ़रमाया गया कि बैठे रहो बैठे रहनेवालों के साथ(6){46}
अगर वो तुम में निकलते तो उनसे सिवा नुक़सान के तुम्हें कुछ न बढ़ता और तुम में फ़ितना डालने को तुम्हारे बीच में ग़ुराबें (कौए) दौड़ाते(7)
और तुम में उनके जासूस मौजूद हैं,(8)
और अल्लाह ख़ूब जानता है ज़ालिमों को {47} बेशक उन्होंने पहले ही फ़ितना चाहा था (9)
और ऐ मेहबूब तुम्हारे लिये तदबीरें उलटी पलटीं(10)
यहां तक कि हक़ आया(11)
और अल्लाह का हुक्म ज़ाहिर हुआ(12)
और उन्हें नागवार था{48} और उनमें कोई तुमसे यूं अर्ज़ करता है कि मुझे रूख़सत दीजिये और फ़ितने में न डालिये(13)
सुन लो वो फ़ितने ही में पड़े (14)
और बेशक जहन्नम घेरे हुए है काफ़िरों को {49} अगर तुम्हें भलाई पहुंचे (15)
तो उन्हें बुरा लगे और अगर तुम्हें कोई मुसीबत पहुंचे (16)
तो कहें(17)
हमने अपना काम पहले ही ठीक कर लिया था और ख़ुशियां मनाते फिर जाएं {50} तुम फ़रमाओ हमें न पहुंचेगा मगर जो अल्लाह ने हमारे लिये लिख दिया, वह हमारा मौला है, और मुसलमानों को अल्लाह ही पर भरोसा चाहिये {51} तुम फ़रमाओ तुम हमपर किस चीज़ का इन्तिज़ार करते हो मगर दो ख़ूबियों में से एक का (18)
और हम तुमपर इस इन्तिज़ार में हैं कि अल्लाह तुमपर अज़ाब डाले अपने पास से (19)
या हमारे हाथों (20)
तो अब राह देखो हम भी तुम्हारे साथ राह देख रहे हैं (21){52}
तुम फ़रमाओ कि दिल से ख़र्च करो या नागवारी से तुमसे हरगिज़ क़ुबूल न होगा (22)
बेशक तुम बेहुक्म लोग हो {53} और वो जो ख़र्च करते हैं उसका क़ुबूल होना बन्द न हुआ मगर इसीलिये कि वो अल्लाह और रसूल के इन्क़ारी हुए और नमाज़ को नहीं आते मगर जी हारे और ख़र्च नहीं करते मगर नागवरी से (23{54}
तो तुम्हें उनके माल और उनकी औलाद का अचंभा न आए अल्लाह यही चाहता है कि दुनिया की ज़िन्दगी में इन चीज़ों से उनपर वबाल डाले और कुफ़्र ही पर उनका दम निकल जाए (24){55}
और अल्लाह की क़समें खाते हैं (25)
कि वो तुम में से हैं (26)
और तुम में से नहीं (27)
हाँ वो लोग डरते हैं (28){56}
और अगर पाएं कोई पनाह या ग़ार (ख़ोह) या समा जाने की जगह तो रस्सियां तुड़ाते उधर फिर जाएंगे(29){57}
और उनमें कोई वह है कि सदक़े (दान) बाँटने में तुमपर तअना करता है (30)
तो अगर उसमें (31)
से कुछ मिले तो राज़ी हो जाएं और न मिले तों जभी वो नाराज़ हें {58} और क्या अच्छा होता अगर वो इस पर राज़ी होते जो अल्लाह व रसूल ने उनको दिया और कहते हमें अल्लाह काफ़ी है अब देता है हमें अल्लाह अपने फ़ज़्ल से और अल्लाह का रसूल हमें अल्लाह ही की तरफ़ रग़बत (रूचि) है (32){59}

तफ़सीर
सूरए तौबह – सातवाँ रूकू

(1) ” अल्लाह तुम्हें माफ़ करे” से कलाम की शुरूआत सम्बोधित व्यक्ति के आदर और सम्मान को बढ़ा चढ़ाकर दिखाने के लिये है. और अरब की भाषा में यह आम बात है कि सामने वाले की ताज़ीम और इज़्ज़त के लिये ऐसे कलिमें बोले जाते हैं. क़ाज़ी अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह ने शिफ़ा शरीफ़ में फ़रमाया, जिस किसी ने इस सवाल को प्रकोप क़रार दिया उसने ग़लती की, क्योंकि ग़ज़वए तबूक में हाज़िर न होने और घर रह जाने की इजाज़त माँगने वालों को इजाज़त देना न देना दोनों हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के इख़्तियार में था और आप इसमें मुख़्तार थे. चुनांचे अल्लाह तआला ने फ़रमाया “फ़ाज़न मिलन शिअता मिन्हुम” आप उनमें से जिसे चाहे इजाज़त दीजिये. तो “लिम अज़िन्ता लहुम (तुमने उन्हें क्यों इज़्न दे दिया) फ़रमाया, ग़ुस्से के लिये नहीं बल्कि यह इज़हार है कि अगर आप उन्हें इजाज़त न देते तो भी वो जिहाद में जाने वाले न थे. और “अल्लाह तुम्हें माफ़ करे” के मानी ये हैं कि अल्लाह तआला माफ़ करे, गुनाह से तो तुम्हें वास्ता ही नहीं. इस में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की भरपूर इज़्ज़त अफ़ज़ाई और तस्कीन व तसल्ली है कि मुबारक दिल पर “तुमने उन्हें क्यों इजाज़त दे दी” फ़रमाने से कोई बोझ न हो.

(2) यानी मुनाफ़िक़ लोग.

(3) न इधर के हुए न उधर के हुए. न काफ़िर के साथ रह सके न ईमान वालों का साथ दे सके.

(4) और जिहाद का इरादा रखते.

(5) उनके इजाज़त चाहने पर.

(6) बैठ रहने वालों से औरतें बच्चे बीमार और अपंग लोग मुराद है.

(7) और झूठी झूठी बातें बनाकर फ़साद फैलाते.

(8) जो तुम्हारी बातें उनतक पहुंचाएं.

(9) और वो आपके सहाबा को दीन से रोकने की कोशिश करते जैसा कि अब्दुल्लाह बिन उबई सलोल मुनाफ़िक़ ने उहद के दिन किया कि मुसलमानों को बहकाने के लिये अपनी जमाअत लेकर वापस हो गया.

(10) और उन्होंने तुम्हारा काम बिगाड़ने और दीन में फ़साद डालने के लिये बहुत छल कपट किये.

(11) यानी अल्लाह तआला की तरफ़ से सहायता और मदद.

(12) और उसका दीन ग़ालिब रहा.

(13) यह आयत जद बिन क़ैस मुनाफ़िक़ के बारे में उतरी जब नबीये करीम सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ग़ज़वए तबूक के लिये तैयारी फ़रमाई तो जद बिन क़ैस ने कहा, या रसूलल्लाह, मेरी क़ौम जानती है कि मैं औरतों का बड़ा शैदाई हूँ, मुझे डर है कि मैं रूएम की औरतों को देखूंगा तो मुझसे सब्र न हो सकेगा. इसलिये आप मुझे यहीं ठहरने की इजाज़त दीजिये और उन औरतों में फ़ितना न डालिये. मैं आपकी माल से मदद करूंगा. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा फ़रमाते हैं कि यह उसका बहाना था और उसमें दोहरी प्रवृत्ति के सिवा कोई बुराई न थी. रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उसकी तरफ़ से मुंह फेर लिया और उसे ठहर जाने की इजाज़त दे दी. उसके बारे में यह आयत उतरी.

(14) क्योंकि जिहाद से रूक रहना और रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के हुक्म का विरोध बहुत बड़ा फ़ितना है.

(15) और तुम दुश्मन पर विजयी हो और ग़नीमत तुम्हारे हाथ आए

(16) और किसी तरह की सख़्ती पेश आए.

(17) मुनाफ़िक़, कि चालाकी से जिहाद में न जाकर.

(18) या तो विजय और ग़नीमत मिलेगी या शहादत और मग़फ़िरत, क्योंकि मुसलमान जब जिहाद में जाता है तो वह अगर ग़ालिब हो जब तो विजय और माल और बड़ा इनाम पाता है और अगर अल्लाह की राह में मारा जाए तो उसको शहादत हासिल होती है, जो उसकी सबसे बड़ी मुराद है.

(19) और तुम्हें आद व समूद की तरह हलाक करे.

(20) तुमको क़त्ल और क़ैद के अज़ाब में गिरफ़्तार करे.

(21) कि तुम्हारा क्या अंजाम होता है.

(22) यह आयत जद बिन क़ैस मुनाफ़िक़ के जवाब में उतरी जिसने जिहाद में न जाने की इजाज़त तलब करने के साथ यह कहा था कि मैं अपने माल से मदद करूंगा. इस पर अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि तुम ख़ुशी से दो या नाख़ुशी से, तुम्हारा माल क़ुबूल न किया जाएगा. यानी रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम उसको न लेंगे क्योंकि यह देना अल्लाह के लिये नहीं है.

(23) क्योंकि उन्हें अल्लाह की रज़ा और ख़ुशी मंज़ूर नहीं.

(24) तो वह माल उनके हक़ में राहत का कारण न हुआ बल्कि वबाल हुआ.

(25) मुनाफ़िक़ लोग इस पर.

(26) यानी तुम्हारे दीन व मिल्लत पर हैं, मुसलमान हैं.

(27) तुम्हें धोखा देते और झूठ बोलते हैं.

(28) कि अगर उनकी दोग़ली प्रवृत्ति ज़ाहिर हो जाए तो मुसलमान उनके साथ वही मामला करेंगे जो मुश्रिकों के साथ करते हैं. इसलिये वो तक़ैय्या (सामने कुछ और अन्दर कुछ) करके अपने आपको मुसलमान ज़ाहिर करते हैं.

(29) क्योंकि उन्हें रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और मुसलमानों से इन्तिहा दर्जे की दुशमनी है.

(30) यह आयत ज़ुल-ख़ुवैसिरह तमीमी के बारे में उतरी. इस शख़्स का नाम हरक़ूस बिन ज़ुहैर है और यही ख़ारिजियों की अस्ल और बुनियाद है. बुख़ारी व मुस्लिम की हदीस में है कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ग़नीमत का माल बाँट रहे थे तो ज़ुल-ख़ुवैसिरह ने कहा, या रसूलल्लाह इन्साफ़ कीजिये. हुज़ूर ने फ़रमाया, तुझे ख़राबी हो, मैं न इन्साफ़ करूंगा तो कौन करेगा. हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हों ने अर्ज़ किया, मुझे इजाज़त दीजिये कि इस मुनाफ़िक़ की गर्दन मार दूँ. हुज़ूर ने फ़रमाया कि इसे छोड़ दो. इसके और भी साथी हैं कि तुम उनकी नमाज़ों के सामने अपनी नमाज़ों को और उनके रोज़ों के सामने अपने रोज़ों को हक़ीर देखोगे. वो क़ुरआन पढ़ेंगे और उनके गलों से न उतरेगा. वो दीन से ऐसे निकल जाएंगे जैसे तीर शिकार से.

(31) सदक़ात और दीन.

(32) कि हम पर अपना फ़ज़्ल और फैलाए और हमें लोगों के मालों से बेपर्वाह करदे, बे नियाज़ कर दे.

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