सूरए तौबह – पाँचवाँ रूकू

सूरए तौबह – पाँचवाँ रूकू

और यहूदी बोले उज़ैर अल्लाह का बेटा है(1)
और नसरानी (ईसाई) बोले मसीह अल्लाह का बेटा है, ये बातें वो अपने मुंह से बकते हैं(2)
अगले काफ़िरों की सी बात बनाते हैं अल्लाह उन्हें मारे, कहाँ औंधे जाते हैं (3){30}
उन्होंने अपने पादरियों और जोगियों को अल्लाह के सिवा ख़ुदा बना लिया(4)
और मरयम के बेटे मसीह को(5)
और उन्हें हुक्म न था(6)
मगर यह कि एक अल्लाह को पूजें उसके सिवा किसी की बन्दगी नहीं उसे पाकी है उनके शिर्क से{31}चाहते हैं कि अल्लाह का नूर (7)
अपने मुंह से बुझा दें और अल्लाह न मानेगा मगर अपने नूर का पूरा करना (8)
पड़े बुरा मानें काफ़िर{32} वही हैं जिसने अपना रसूल (9)
हिदायत और सच्चे दीन के साथ भेजा कि उसे सब दीनों पर ग़ालिब करे(10)
पड़े बुरा माने मुश्रिक {33} ऐ ईमान वालों बेशक बहुत पादरी और जोगी लोगों का माल नाहक़ खा जाते हैं (11)
और अल्लाह की राह से (12)
रोकते हैं और वो कि जोड़ कर रखते हैं सोना और चांदी और उसे अल्लाह की राह में ख़र्च नहीं करते (13)
उन्हें ख़ुशख़बरी सुनाओ दर्दनाक अज़ाब की {34} जिस दिन वह तपाया जाएगा जहन्नम की आग में(14)
फिर उससे दाग़ेंगे उनकी पेशानियाँ और कर्वटें और पीठें (15)
यह है वह जो तुमने अपने लिये जोड़ कर रखा था तो अब चखो मज़ा उस जोड़ने का{35} बेशक महीनों की गिनती अल्लाह के नज़दीक बारह महीने हैं (16)
अल्लाह की किताब (17)
जब से उसने आसमान और ज़मीन बनाए उनमें से चार हुरमत (धर्मनिषेध) वाले हैं, (18)
यह सीधा दीन है तो इन महीनों में (19)
अपनी जान पर ज़ुल्म न करो और मुश्रिकों से हर वक़्त लड़ो जैसा वो तुम से हर वक़्त लड़ते हैं, और जान लो कि अल्लाह परहेज़गारों के साथ है (20) {36}
उनका महीने पीछे हटाना नहीं मगर और कुफ़्र में बढ़ना (21)
इससे काफ़िर बहकाये जाते हैं एक बरस उसे (22)
हलाल ठहराते हैं और दूसरे बरस उसे हराम मानते हैं कि उस गिनती के बराबर हो जाएं जो अल्लाह ने हराम फ़रमाई(23)
और अल्लाह के हराम किये हुए हलाल कर लें उनके बुरे काम उनकी आँखों में भले लगते हैं, और अल्लाह काफ़िरों को राह नहीं देता {37}

तफ़सीर
सूरए तौबह – पाँचवाँ रूकू

(1) किताब वालों की बेदीनी का जो ऊपर ज़िक्र फ़रमाया गया यह उसकी तफ़सील है कि वो अल्लाह की जनाब में ऐसे ग़लत अक़ीदे रखते हैं और मख़लूक़ को अल्लाह का बेटा बनाकर पूजते हैं. रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में यहूदियों की एक जमाअत आई. वो लोग कहने लगे कि हम आपका अनुकरण कैसे करें, आपने हमारा क़िबला छोड़ दिया और आप उज़ैर को ख़ुदा का बेटा नहीं समझते. इस पर यह आयत उतरी.

(2) जिन पर न कोई दलील न प्रमाण, फिर अपनी जिहालत से इस खुले झुट को मानते भी हैं.

(3) और अल्लाह तआला के एक होने पर, तर्क क़ायम होने और खुले प्रमाण मिलने के बावुजूद, इस कुफ़्र में पड़ते हैं.

(4) अल्लाह के हुक्म को छोड़कर उनके हुक्म के पाबन्द हुए.

(5) कि उन्हें भी ख़ुदा बनाया और उनकी निस्बत यह ग़लत अक़ीदा रखा कि वो ख़ुदा या ख़ुदा के बेटे हैं या ख़ुदा ने उनके अन्दर प्रवेश किया है.

(6) उनकी किताबों में, न उनके नबियों की तरफ़ से.

(7) यानी इस्लाम या सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत की दलीलें.

(8) और अपने दीन को ग़लबा देना.

(9) मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

(10) और उसकी हुज्जत मज़बूत करे और दूसरे दीनों को उससे स्थगित करे. चुनांचे ऐसा ही हुआ. ज़ुहाक का क़ौल है कि यह हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने नुज़ूल के वक़्त ज़ाहिर होगा जबकि कोई दीन वाला ऐसा न होगा जो इस्लाम में दाख़िल न हो जाए. हज़रत अबू हुरैरा की हदीस में है, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के ज़माने में इस्लाम के सिवा हर मिल्लत हलाक हो जाएगी.

(11) इस तरह कि दीन के आदेश बदल कर लोगों से रिश्वतें लेते हैं और अपनी किताबों में, सोने के लालच में, हेर फेर करते हैं और पिछली किताबों की जिन आयतों में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तारीफ़ और विशेषताएं दर्ज हैं, माल हासिल करने के लिये उनमें ग़लत व्याख्याएं और फेर बदल करते हैं.

(12) इस्लाम से, और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान लाने से.

(13) कंजूसी करते हैं और माल के हुक़ूक़ अदा नहीं करते. ज़कात नहीं देते. सदी का क़ौल है कि यह आयत ज़कात का इन्कार करने वालों के बारे में उतरी जबकि अल्लाह तआला ने पादरियों और राहिबों के लालच का बयान फ़रमाया, तो मुसलमानों को माल जमा करने और उसके हुक़ूक़ अदा न करने से डराया. हज़रत इब्ने उमर रदियल्लाहो अन्हो से रिवायत है कि जिस माल की ज़कात दी गई वह ख़ज़ाना नहीं, चाहे दफ़ीना ही हो. और जिसकी ज़कात न दी गई, वह ख़ज़ाना है जिसका ज़िक्र क़ुरआन में हुआ कि उसके मालिक को उससे दाग़ दिया जाएगा. रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से सहाबा ने अर्ज़ किया कि सोने चांदी का तो यह हाल मालूम हुआ फिर कौन सा माल बेहतर है जिसको जमा किया जाए. फ़रमाया, ज़िक्र करने वाली ज़बान और शुक्र करने वाला दिल, और नेक बीबी जो ईमानदार की उसके ईमान पर मदद करें यानी परहेज़गार हो कि उसकी सोहबत से ताअत व इबादत का शौक़ बढ़े. (तिरमिज़ी). माल का जमा करना मुबाह है, मज़मूम नहीं जब कि उसके हुक़ूक़ अदा किये जाएं. हज़रत अब्दुर रहमान बिन औफ़ और हज़रत तलहा वग़ैरह सहाबा मालदार थे और जो सहाबा कि माल जमा करने से नफ़रत रखते थे वो उन पर ऐतिराज़ न करते थे.

(14) और गर्मी की सख़्ती से सफ़ेद हो जाएगा.

(15) जिस्म के चारों तरफ़, और कहा जाएगा.

(16) यहाँ यह बयान फ़रमाया गया कि शरीअत के एहकाम चाँद के महीनों पर हैं.

(17) यहाँ अल्लाह की किताब से, यह लौहे मेहफ़ूज़ मुराद है या क़ुरआन, यह वह हुक्म जो उसने अपने बन्दों पर लाज़िम किया.

(18) तीन जुड़े ज़ुलक़ादा, ज़िलहज व मुहर्रम और एक अलग रजब. अरब लोग जिहालत के दौर में भी इन महीनों का आदर करते थे और इनमें लड़ाई क़त्ल और ख़ून हराम जानते थे. इस्लाम में इन महीनों की हुरमत और अज़मत और ज़्यादा की गई.

(19) गुनाह और नाफ़रमानी से.

(20) उनकी मदद फ़रमाएगा.

(21) नसी शब्दकोष में समय के पीछे करने को कहते हैं और यहाँ शहरे हराम (वर्जित महीने) की हुरमत का दूसरे महीने की तरफ़ हटा देना मुराद है. जिहालत के दौर में अरब, वर्जित महीनों यानी ज़ुलक़अदा व ज़िलहज व मुहर्रम व रजब की पाकी और महानता के मानने वाले थे. तो जब कभी लड़ाई के ज़माने में ये वर्जित महीने आजाते तो उनको बहुत भारी गुज़रते. इसलिये उन्होंने यह किया कि एक महीने की पाकी दूसरे की तरफ़ हटाने लगे. मुहर्रम की हुरमत सफ़र की तरफ़ हटा कर मुहर्रम में जंग जारी रखते और बजाय इसके सफ़र को माहे हराम बना लेते और जब इससे भी हुरमत हटाने की ज़रूरत समझते तो उसमें भी जंग हलाल कर लेते और रबीउल अव्वल को माहे हराम क़रार देते इस तरह हुरमत साल के सारे महीनों में घूमती और उनके इस तरीक़े से वर्जित महीनों की विशेषता ही बाक़ी न रही. इसी तरह हज को मुख्तलिफ़ महीनों में घुमाते फिरते थे. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हज्जतुल वदाअ में ऐलान फ़रमाया कि नसी के महीने गए गुज़रे हो गए, अब महीनों के औक़ात जो अल्लाह की तरफ़ से मुक़र्रर किये गए हैं, उनकी हिफ़ाजत की जाए और कोई महीना अपनी जगह से न हटाया जाए. इस आयत में नसी को वर्जित क़रार दिया गया और कुफ़्र पर कुफ़्र की ज़ियादती बताया गया, क्योंकि इसमें वर्जित महीनों में जंग की हुरमत को हलाल जानना और ख़ुदा के हराम किये हुए को हलाल कर लेना पाया जाता है.

(22) यानी वर्जित महीने को या इस हटाने को.

(23) यानी वर्जित महीने चार ही रहें, इसकी तो पाबन्दी करते है, और उनकी निश्चितता तोड़ कर अल्लाह के हुक्म की मुख़ालिफ़त. जो महीना हराम था उसे हलाल कर लिया, उसकी जगह दूसरे को हराम क़रार दे दिया.

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