सूरए तौबह – पहला रूकू

सूरए तौबह – पहला रूकू

(1) सूरए तौबह मदीना में उतरी, इसमें 129 आयतें और 16 रूकू हैं.
बेज़ारी का हुक्म सुनाना है अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ से उन मुश्रिकों को जिनसे तुम्हारा मुआहिदा था और वो क़ायम न रहे (2){1}
तो चार महीने ज़मीन पर चलो फिरो और जान रखो कि तुम अल्लाह को थका नहीं सकते(3)
और यह कि अल्लाह काफ़िरों को रूस्वा करने वाला है (4){2}
और मुनादी पुकार देना है अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ से सब लोगों में बड़े हज के दिन (5)
कि अल्लाह बेज़ार है मुश्रिकों से और उसका रसूल तो अगर तुम तौबह करो(6)
तो तुम्हारा भला है और अगर मुंह फेरो(7)
तो जान लो कि तुम अल्लाह को न थका सकोगे (8)
और काफ़िरों को ख़ुशख़बरी सुनाओ दर्दनाक अज़ाब की{3} मगर वो मुश्रिक जिनसे तुम्हारा मुआहिदा था फिर उन्होंने तुम्हारे एहद में कुछ कमी नहीं की(9)
और तुम्हारे मुक़ाबिल किसी को मदद न दी तो उनका एहद ठहरी हुई मुद्दत तक पूरा करो, बेशक अल्लाह परहेज़गारों को दोस्त रखता है {4} फिर जब हुरमत वाले महीने निकल जाएं तो मुश्रिकों को मारो (10)
जहाँ पाओ (11)
और उन्हें पकड़ो और क़ैद करो और हर जगह उनकी ताक में बैठो फिर अगर वो तौबह करें (12)
और नमाज़ क़ायम रखें और ज़कात दें तो उनकी राह छोड़ दो, (13)
बेशक अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है {5} और ऐ मेहबूब अगर कोई मुश्रिक तुमसे पनाह मांगे(14)
तो उसे पनाह दो कि वह अल्लाह का कलाम सुने फिर उसे उसकी अम्न की जगह पहुंचा दो (15)
यह इसलिये कि वो नादान लोग हैं(16){6}

तफ़सीर
सूरए तौबह – पहला रूकू
(1) सूरए तौबह मदनी है मगर इसके आख़िर की आयतें “लक़द जाअकुम रसूलुन” से आख़िर तक, उनको कुछ उलमा मक्की कहते हैं. इस सूरत में सौलह रूकू, 129 आयतें, चार हज़ार अठहत्तर कलिमे और दस हज़ार चार सौ अठासी अक्षर हैं. इस सूरत के दस नाम हैं इनमें से तौबह और बराअत दो नाम ख़ास हैं. इस सूरत के अव्वल में बिस्मिल्लाह नहीं लिखी गई. इसकी अस्ल वजह यह है कि जिब्रील अलैहिस्सलाम इस सूरत के साथ बिस्मिल्लाह लेकर नाज़िल ही नहीं हुए थे और नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने बिस्मिल्लाह लिखने का हुक्म नहीं फ़रमाया. हज़रत अली मुर्तज़ा रदियल्लाहो अन्हो से रिवायत है कि बिस्मिल्लाह अमान है और यह सूरत तलवार के साथ अम्न उठा देने के लिये उतरी.

(2) अरब के मुश्रिकों और मुसलमानों के बीच एहद था. उनमें से कुछ के सिवा सब ने एहद तोड़ा तो इन एहद तोड़ने वालों का एहद ख़त्म कर दिया गया और हुक्म दिया गया कि चार महीने वो अम्न के साथ जहाँ चाहें गुज़ारें, उनसे कोई रोक टोक न की जाएगी. इस अर्से में उन्हें मौक़ा है, ख़ूब सोच समझ लें कि उनके लिये क्या बेहतर है. और अपनी एहतियातें कर लें और जान लें कि इस मुद्दत के बाद इस्लाम कुबूल करना होगा या क़त्ल. यह सूरत सन नौ हिजरी में मक्का की विजय से एक साल बाद उतरी. रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने इस सन में हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हो को अमीरे हज मुक़र्रर फ़रमाया था और उनके बाद अली मुर्तज़ा को हाजियों की भीड़ में यह सूरत सुनाने के लिये भेजा. चुनांचे हज़रत अली ने दस ज़िलहज को बड़े शैतान के पास खड़े होकर निदा की, ऐ लोगो, मैं तुम्हारी तरफ़ अल्लाह के रसूल का भेजा हुआ आया हूँ. लोगों ने कहा, आप क्या पयाम लाए हैं ? तो आपने तीस या चालीस आयतें इस मुबारक सूरत की पढ़ीं. फिर फ़रमाया, मैं चार हुक्म लाया हूँ (1) इस साल के बाद कोई मुश्रिक काबे के पास न आए (2) कोई शख़्स नंगा होकर काबे का तवाफ़ न करें (3) जन्नत में ईमान वाले के अलावा कोई दाख़िल न होगा. (4) जिसका रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ एहद है वह एहद अपनी मुद्दत तक रहेगा और जिसकी मुद्दत निर्धारित नहीं है उसकी मीआद चार माह पर पूरी हो जाएगी. मुश्रिकों ने यह सुनकर कहा कि ऐ अली, अपने चचा के बेटे को ख़बर दो कि हमने एहद पीठ पीछे फैंक दिया हमारे उनके बीच कोई एहद नहीं है, सिवाय नेज़े बाज़ी और तलवार बाज़ी के. इस वाक़ए में हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ की ख़िलाफ़त की तरफ़ लतीफ़ इशारा है कि हुज़ूर ने हज़रत सिद्दीक़े अकबर को तो अमीरे हज बनाया और हज़रत अली को उनके पीछे सूरए बराअत पढ़ने के लिये भेजा, तो हज़रत अबू बक्र इमाम हुए और हज़रत अली मुक़तदी. इससे हज़रत अबू बक्र की हज़रत अली पर फ़ज़ीलत साबित हुई.

(3) और इस मोहलत के बावुज़ूद उसकी पकड़ से बच नहीं सकते.

(4) दुनिया में क़त्ल के साथ और आख़िरत में अज़ाब के साथ.

(5) हज को हज्जे अकबर फ़रमाया इसलिये कि उस ज़माने में उमरे को हज्जे असग़र कहा जाता था. एक क़ौल यह भी है कि इस हज को हज्जे अकबर इसलिये कहा गया कि उस साल रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हज फ़रमाया था और चूंकि यह जुमए को वाक़े हुआ था इसलिये मुसलमान उस हज को, जो जुमए के दिन हो, हज्जे वदाअ जैसा जान कर हज्जे अकबर कहते हैं.

(6) कुफ़्र और उज्र से.

(7) ईमान लाने और तौबह करने से.

(8) यह बड़ी चुनौती है और इसमें यह ललकार है कि अल्लाह तआला अज़ाब उतारने पर क़ादिर और सक्षम है.

(9) और उसको उसकी शर्तों के साथ पूरा किया. ये लोग बनी ज़मरह थे जो कनाना का एक क़बीला है. उनकी मुद्दत के नौ माह बाक़ी रहे थे.

(10) जिन्हों ने एहद तोड़ा.

(11) हरम से बाहर या हरम में, किसी वक़्त या स्थान का निर्धारण नहीं है.

(12) शिर्क और कुफ़्र से, और ईमान क़ुबूल कर लें.

(13) और क़ैद से रिहा कर दो और उनके साथ सख़्ती न करो.

(14) मोहलत के महीने, गुज़रने के बाद, ताकि आप से तौहीद के मसअले और क़ुरआन शरीफ़ सुनें जिसकी आप दावत देते हैं.

(15) अगर ईमान न लाए. इस से साबित हुआ कि मोहलत दिये गए शख़्स को तकलीफ़ न दी जाए और मुद्दत गुज़रने के बाद उसको दारूल इस्लाम में ठहरने का हक़ नहीं.

(16) इस्लाम और उसकी हक़ीक़त को नहीं जानते, तो उन्हें अम्न देना ख़ास हिकमत है ताकि कलामुल्लाह सुनें और समझें.

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