सूरए तौबह – दूसरा रूकू

सूरए तौबह – दूसरा रूकू

मुश्रिकों के लिये अल्लाह और उसके रसूल के पास कोई एहद क्यों कर होगा (1)
मगर वो जिनसे तुम्हारा मुआहिदा मस्जिदे हराम के पास हुआ, (2)
तो जबतक वो तुम्हारे लिये एहद पर क़ायम रहें तुम उनके लिये क़ायम रहो बेशक परहेज़गार अल्लाह को ख़ुश आते हैं{7} भला किस तरह (3)
उनका हाल तो यह है कि तुमपर क़ाबू पाएं तो न क़राबत का लिहाज़ करें न एहद का, अपने मुंह से तुम्हें राज़ी करते हैं(4)
और उनके दिलों में इन्कार है और उनमें अक्सर बेहुक्म हैं (5){8}
अल्लाह की आयतों के बदले थोड़े दाम मोल लिये (6)
तो उसकी राह से रोका (7)
बेशक वो बहुत ही बुरे काम करते हैं {9} किसी मुसलमान में न क़राबत का लिहाज़ करें न एहद का (8)
और वही सरकश है{10} फिर अगर वो (9)
तौबह करें और नमाज़ क़ायम रखें और ज़कात दें तो वो तुम्हारे दीनी भाई हैं, (10)
और हम आयतें मुफ़स्सल बयान करते हैं जानने वालों के लिये (11){11}
और अगर एहद करके अपनी क़समें तोड़े और तुम्हारे दीन पर मुंह आएं तो कुफ़्र के सरग़नों से लड़ों (12)
बेशक उनकी क़समें कुछ नहीं इस उम्मीद पर कि शायद वो बाज़ आएं (13){12}
क्या उस क़ौम से न लड़ोगे जिन्होंने अपनी क़समें तोड़ीं (14)
और रसूल के निकालने का इरादा किया (15), 
हालांकि उन्हीं की तरफ़ से पहल हुई है, क्या उनसे डरते हो, तो अल्लाह इसका ज़्यादा मुस्तहक़ है कि उससे डरो अगर ईमान रखते हो {13} तो उनसे लड़ो अल्लाह उन्हें अज़ाब देगा तुम्हारे हाथों और उन्हें रूस्वा करेगा (16)
और तुम्हें उनपर मदद देगा (17)
और ईमान वालों का जी ठण्डा करेगा{14} और उनके दिलों की घुटन दूर फ़रमाएगा (18),
और अल्लाह जिसकी चाहे तौबह कुबूल फ़रमाएगा (19)
और अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है {15} क्या इस गुमान में हो यूंही छोड़ दिये जाओगे, और अभी अल्लाह ने पहचान न कराई उनकी जो तुम में से जिहाद करेंगे(20)
और अल्लाह और उसके रसूल और मुसलमानों के सिवा किसी को अपना राज़दार न बनाएंगे(21)
और अल्लाह तुम्हारे कामों से ख़बरदार है {16}

तफ़सीर सूरए तौबह – दूसरा रूकू

(1) कि वो बहाना बाज़ी और एहद-शिकनी किया करते हैं.

(2) और उनसे कोई एहद-शिकनी ज़ाहिर न हुई जैसा कि बनी कनाना और बनी ज़मरह ने की थी.

(3) एहद पूरा करेंगे और कैसे क़ौल पर क़ायम रहेंगे.

(4) ईमान और एहद पूरा करने के वादे करके.

(5) एहद तोड़ने वाले कुफ़्र में सरकश, बे मुरव्वत, झूट से न शर्माने वाले. उन्होंने….

(6) और दुनिया के थोड़े से नफ़े के पीछे ईमान और क़ुरआन छोड़ बैठे, और जो रसूले करीम सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से एहद किया था वह अबू सुफ़ियान के थोड़े से लालच देने से तोड़ दिया.

(7) और लोगों को दीन इलाही में दाख़िल होने से तोड़ दिया.

(8) जब मौक़ा पाएं क़त्ल कर डालें, तो मुसलमानों को भी चाहिये कि जब मुश्रिकों पर पकड़ मिल जाए तो उनसे दरगुज़र न करें.

(9) कुफ़्र और एहद तोड़ने से बाज़ आएं और ईमान क़ुबूल करके.

(10) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि इस आयत से साबित हुआ कि क़िबला वालों के ख़ून हराम है.

(11) इससे साबित हुआ कि आयतों की तफ़सील पर जिसकी नज़र हो, वह आलिम है.

(12) इस आयत से साबित हुआ कि जो काफ़िर ज़िम्मी दीने इस्लाम पर ज़ाहिर तअन करे उसका एहद बाक़ी नहीं रहता और वह ज़िम्मे से ख़ारिज हो जाता है, उसको क़त्ल करना जायज़ है.

(13) इस आयत से साबित हुआ कि काफ़िरों के साथ जंग करने से मुसलमानों की ग़रज़ उन्हें कुफ़्र और बदआमाली से रोक देना है.

(14) और सुलह हुदैबिया का एहद तोड़ा और मुसलमानों के हलीफ़ क़ुज़ाआ के मुक़ाबिल बनी बक्र की मदद की.

(15) मक्कए मुकर्रमा से दारून नदवा में मशवरा करके.

(16) क़त्ल व क़ैद से.

(17) और उनपर ग़लबा अता फ़रमाएगा.

(18) यह तमाम वादे पूरे हुए, और नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़बरें सच्ची हुई और नबुव्वत का सुबूत साफ़ से साफ़तर हो गया.

(19) इसमें ख़बर है कि कुछ मक्का वाले कुफ़्र से बाज़ आकर तौबह कर लेंगे. यह ख़बर भी ऐसी ही वाक़े हुई. चुनांचे अबू सुफ़ियान और इकरिमा बिन अबू जहल और सुहैल बिन अम्र ईमान से मुशर्रफ़ हुए.

(20) इख़्लास के साथ अल्लाह की राह में.

(21) इससे मालूम हुआ कि मुख़लिस ग़ैर-मुख़लिस में इम्तियाज़ कर दिया जाएगा और तात्पर्य इससे मुसलमानों को मुश्रिकों के साथ उठने बैठने और उनके पास मुसलमानों के राज़ पहुंचाने से मना करना है.

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