सूरए तौबह – तीसरा रूकू

सूरए तौबह – तीसरा रूकू

मुश्रिकों को नहीं पहुंचता कि अल्लाह की मस्जिदें आबाद करें (1)
ख़ुद अपने कुफ़्र की गवाही देकर (2)
उनका तो सब किया-धरा अकारत है, और वो हमेशा आग में रहेंगे (3){17}
अल्लाह की मस्जिदें वही आबाद करते हैं जो अल्लाह और क़यामत पर ईमान लाते और नमाज़ क़ायम करते हैं और ज़कात देते हैं (4)
और अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरते,(5)
तो क़रीब है कि ये लोग हिदायत वालों में हों {18} तो क्या तुमने हाजियों की सबील (प्याऊ) और मस्जिदे हराम की ख़िदमत उसके बराबर ठहराली जो अल्लाह और क़यामत पर ईमान लाया और अल्लाह की राह में जिहाद किया, वो अल्लाह के नज़दीक बराबर नहीं, और अल्लाह ज़ालिमों को राह नहीं देता (6) {19}
वो जो ईमान लाए और हिजरत की और अपने माल जान से अल्लाह की राह में लड़े अल्लाह के यहाँ उनका दर्जा बड़ा है, (7)
और वही मुराद को पहुंचे (8){20}
उनका रब उन्हें ख़ुशी सुनाता है अपनी रहमत और अपनी रज़ा की (9)
और उन बाग़ों की जिनमें उन्हें सदा की नेअमत है {21} हमेशा हमेशा उनमें रहेंगे, बेशक अल्लाह के पास बड़ा सवाब है {22} ऐ ईमान वालो अपने बाप और अपने भाईयों को दोस्त न समझो अगर वो ईमान पर कुफ़्र पसन्द करें, और तुम में जो कोई उनसे दोस्ती करेगा तो वही ज़ालिम हैं (10){23}
तुम फ़रमाओ अगर तुम्हारे बाप और तुम्हारे बेटे और तुम्हारे भाई और तुम्हारी औरतें और तुम्हारा कुटुम्ब और तुम्हारी कमाई के माल और वह सूद जिसके नुक़सान का तुम्हें डर है और तुम्हारी पसन्द का मकान ये चीज़ें अल्लाह और उसके रसूल और उसकी राह में लड़ने से ज़्यादा प्यारी हो तो रास्ता देखों यहाँ तक कि अल्लाह अपना हुक्म लाए (11)
और अल्लाह फ़ासिक़ों को राह नहीं देता {24}
तफ़सीर
सूरए तौबह – तीसरा रूकू

(1) मस्जिदों से मस्जिदे हराम काबए मुअज़्ज़मा मुराद है. इसको बहुवचन से इसलिये ज़िक्र फ़रमाया कि वह तमाम मस्जिदों का क़िबला और इमाम है. उसका आबाद करने वाला ऐसा है जैसे तमाम मस्जिदों का आबाद करने वाला. बहुवचन लाने की यह वजह भी हो सकती है कि मस्जिदे हराम का हर कोना मस्जिद है, और यह भी हो सकती है कि मस्जिदों से जिन्स मुराद हो और काबए मुअज़्ज़मा इसमें दाख़िल हो क्योंकि वह उस जिन्स का सदर है. क़ुरैश के काफ़िरों के सरदारों की एक जमाअत जो बद्र में गिरफ़्तार हुई और उनमें हुज़ूर के चचा हज़रत अब्बास भी थे, उनको सहाबा ने शिर्क पर शर्म दिलाई और अली मुर्तज़ा ने तो ख़ास हज़रत अब्बास को सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के मुक़ाबिल आने पर बहुत सख़्त सुस्त कहा. हज़रत अब्बास कहने लगे कि तुम हमारी बुराईयाँ तो बयान करते हो और हमारी खूबियाँ छुपाते हो. उनसे कहा गया, क्या आपकी कुछ ख़ूबियाँ भी हैं. उन्होंने कहा, हाँ हम तुम से अफ़ज़ल हैं, हम मस्जिदे हराम को आबाद करते हैं, काबे की खिदमत करते हैं, हाजियों को सैराब करते हैं, असीरों को रिहा कराते हैं. इसपर यह आयत उतरी कि मस्जिदों का आबाद करना काफ़िरों को नहीं पहुंचता क्योंकि मस्जिद आबाद की जाती है अल्लाह की इबादत के लिये, तो जो ख़ुदा ही का इन्कारी हो, उसके साथ कुफ़्र करे, वह क्या मस्जिद आबाद करेगा. आबाद करने के मानी में भी कई क़ौल हैं, एक तो यह कि आबाद करने से मस्जिद का बनाना, बलन्द करना, मरम्मत करना मुराद है. काफ़िर को इससे मना किया जाएगा. दूसरा क़ौल यह है कि मस्जिद आबाद करने से उसमें दाख़िल होना बैठना मुराद है.

(2) और बुत परस्ती का इक़रार करके, यानी ये दोनों बातें किस तरह जमा हो सकती हैं कि आदमी काफ़िर भी हो और ख़ास इस्लामी और तौहीद के इबादत ख़ाने को आबाद भी करे.

(3) क्योंकि कुफ़्र की हालत के कर्म मक़बूल नहीं, न मेहमानदारी न हाजियों की ख़िदमत, न क़ैदियों का रिहा कराना, इसलिये कि काफ़िर का कोई काम अल्लाह के लिये तो होता नहीं, लिहाज़ा उसका अमल सब अकारत है, और अगर वह उसी कुफ़्र पर मरजाए तो जहन्नम में उनके लिये हमेशा का अज़ाब है.

(4) इस आयत में यह बयान किया गया कि मस्जिदों के आबाद करने के मुस्तहिक़ ईमान वाले हैं. मस्जिदों के आबाद करने में ये काम भी दाख़िल हैं, झाडू देना, सफ़ाई करना, रौशनी करना और मस्जिदों को दुनिया की बातों से और ऐसी चीज़ों से मेहफ़ूज़ रखना जिनके लिये वो नहीं बनाई गई. मस्जिदे इबादत करने और ज़िक्र करने के लिये बनाई गई हैं और इल्म का पाठ भी ज़िक्र में दाख़िल है.

(5) यानी किसी की रज़ा को अल्लाह की रज़ा पर किसी अन्देशे से भी प्राथमिकता नहीं देते. यही मानी हैं अल्लाह से डरने और ग़ैर से न डरने के.

(6) मुराद यह है कि काफ़िरों को ईमान वालों से कुछ निस्बत नहीं, न उनके कर्मों को उनके कर्मों से, क्योंकि काफ़िर के कर्म व्यर्थ हैं चाहे वो हाजियों के लिये सबील लगाएं या मस्जिदे हराम की ख़िदमत करें, उनके आमाल को ईमान वालों के आमाल के बराबर क़रार देना ज़ुल्म है. बद्र के दिन जब हज़रत अब्बास गिरफ़्तार होकर आए तो उन्होंने रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सहाबा से कहा कि तुमको इस्लाम और हिजरत और जिहाद में सबक़त हासिल है. तो हमको भी मस्जिद हराम की ख़िदमत और हाजियों के लिये सबीलें लगाने का गौरव प्राप्त है. इस पर यह आयत उतरी और ख़बरदार किया गया कि जो अमल ईमान के साथ न हों वो बेकार हैं.

(7) दूसरों से.

(8) और उन्हीं को दुनिया और आख़िरत की ख़ुशनसीबी मिली.

(9) और यह सबसे बड़ी ख़ुशख़बरी है, क्योंकि मालिक की रहमत और ख़ुशनूदी बन्दे का सबसे बड़ा मक़सद और प्यारी मुराद है.

(10) जब मुसलमानों को मुश्रिकों के साथ मिलने जुलने, उठने बैठने और हर तरह के सम्बन्ध तोड़ने का हुक्म दिया गया तो कुछ लोगों ने कहा यह कैसे सम्भव है कि आदमी अपने बाप भाई वग़ैरह रिश्तेदारों से सम्बन्ध तोड़ दे. इस पर यह आयत उतरी और बताया गया कि काफ़िरों से सहयोग जायज़ नहीं चाहे उनसे कोई भी रिश्ता हो. चुनांचे आगे इरशाद फ़रमाया.

(11) और जल्दी आने वाले अज़ाब में जकड़े या देर में आने वाले में. इस आयत से साबित हुआ कि दीन के मेहफ़ूज़ रखने के लिये दुनिया की मशक़्क़त बरदाश्त करना मुसलमान पर लाज़िम है और अल्लाह और उसके रसूल की फ़रमाँबरदारी के मुक़ाबिले दुनिया के ताल्लुक़ात की कुछ हैसियत नहीं और ख़ुदा व रसूल की महब्बत ईमान की दलील है.

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