सूरए तौबह – चौथा रूकू

सूरए तौबह – चौथा रूकू

बेशक अल्लाह ने बहुत जगह तुम्हारी मदद की (1)
और हुनैन के दिन जब तुम अपनी कसरत (ज़्यादा नफ़री) पर इतरा गए थे तो वह तुम्हारे कुछ काम न आई(2)
और ज़मीन इतनी वसाऐ (विस्तृत) होकर तुम पर तंग हो गई(3)
फिर तुम पीठ देकर फिर गए {25} फिर अल्लाह ने अपनी तसकीन उतारी अपने रसूल पर (4)
और मुसलमानों पर (5)
और वो लश्कर उतारे जो तुम ने न देखे(6)
और काफ़िरों को अज़ाब दिया(7)
और इन्कार करने वालों की यही सज़ा है {26} फिर उसके बाद अल्लाह जिसे चाहेगा तौबह देगा(8)
और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है {27},
ऐ ईमान वालो मुश्रिक निरे नापाक हैं (9)
तो इस सब के बाद वो मस्जिदे हराम के पास न आने पाएं (10)
और अगर तुम्हें मोहताजी (दरिद्रता) का डर है (11)
तो बहुत जल्द अल्लाह तुम्हें धनवान कर देगा अपने फ़ज़्ल से अगर चाहे(12)
बेशक अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है {28} लड़ो उनसे जो ईमान नहीं लाते अल्लाह पर और क़यामत पर (13)
और हराम नहीं मानते उस चीज़ को जिसको हराम किया अल्लाह और उसके रसूल ने(14)
और सच्चे दीन (15)
के ताबे (अधीन) नहीं देते यानी वो जो किताब दिये गए जब तक अपने हाथ से जिज़िया न दें ज़लील होकर(16){29}

तफ़सीर
सूरए तौबह – चौथा रूकू

(1) यानी रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ग़ज़वात यानी लड़ाईयों में मुसलमानों को काफ़िरों पर ग़लबा अता फ़रमाया, जैसा कि बद्र और क़ुरैज़ा और नुज़ैर और हुदैबिया और मक्का की विजय में.

(2) हुनैन एक घाटी है ताइफ़ के क़रीब, मक्कए मुकर्रमा से चन्द मील के फ़ासले पर, यहाँ मक्का की विजय से थोड़े ही रोज़ बाद क़बीलए हवाज़िन व सक़ीफ़ से जंग हुई. इस जंग में मुसलमानों की संख्या बहुत ज़्यादा, बारह हज़ार या इससे अधिक थी और मुश्रिक चार हज़ार थे. जब दोनों लश्कर आमने सामने हुए तो मुसलमानों में से किसी ने अपनी कसरत यानी बड़ी संख्या पर नज़र करके कहा कि अब हम हरगिज़ नहीं हारेंगे. रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को बहुत बुरा लगा. क्योंकि हुज़ूर हर हाल में अल्लाह पर भरोसा फ़रमाते थे और तादाद के कम या ज़्यादा होने पर नज़र न रखते थे. जंग शुरू हुई और सख़्त लड़ाई हुई. मुश्रिक भागे और मुसलमान ग़नीमत का माल लेने में व्यस्थ हो गए तो भागे हुए लश्कर ने इस मौक़े का फ़ायदा उठाया और तीरों की बारिश शुरू कर दी. और तीर अन्दाज़ी में वो बहुत माहिर थे. नतीजा यह हुआ कि इस हंगामे में मुसलमानों के क़दम उखड़ गए, लश्कर भाग पड़ा. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के पास सिवाय हुज़ूर के चचा हज़रत अब्बास और आपके चचाज़ाद अबू सुफ़ियान बिन हारिस के और कोई बाक़ी न रहा. हुज़ूर ने उस वक़्त अपनी सवारी को काफ़िरों की तरफ़ आगे बढ़ाया और हज़रत अब्बास को हुक्म दिया कि वह बलन्द आवाज़ में अपने साथियों को पुकारें. उनके पुकारने से वो लोग लब्बैक लब्बैक कहते हुए पलट आए और काफ़िरों से जंग शुरू हो गई. जब लड़ाई ख़ूब गर्म हुई. तब हुज़ूर ने अपने दस्ते मुबारक में कंकरियाँ लेकर काफ़िरों के मुंहों पर मारीं और फ़रमाया, मुहम्मद के रब की क़सम, भाग निकले. कंकरियों का मारना था कि काफ़िर भाग पड़े और रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उनकी ग़निमतें मुसलमानों को तक़सीम फ़रमा दीं. इन आयतों में इसी घटना का बयान है.

(3) और तुम वहाँ ठहर न सके.

(4)  कि इत्मीनान के साथ अपनी जगह क़ायम रहे.

(5) कि हज़रत अब्बास रदियल्लाहो अन्हो के पुकारने से नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में वापस आए.

(6) यानी फ़रिश्ते जिन्हें काफ़िरों ने चितकबरे घोड़ों पर सफ़ेद लिबास पहने अमामा बांधे देखा. ये फ़रिश्ते मुसलमानों की शौकत बढ़ाने के लिये आए थे. इस जंग में उन्होंने लड़ाई नहीं की. लड़ाई सिर्फ़ बद्र में की थी.

(7) कि पकड़े गए, मारे गए, उनके अयाल और अमवाल मुसलमानों के हाथ आए.

(8) और इस्लाम की तौफ़ीक़ अता फ़रमाएगा, चुनांचे हवाज़िन के बाक़ी लोगों को तौफ़ीक़ दी और वो मुसलमान होकर रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुए और हुज़ूर ने उनके क़ैदियों को रिहा फ़रमा दिया.

(9) कि उनका बातिन ख़बीस है और वो न तहारत करते हैं न नापाकियों से बचते हैं.

(10) न हज के लिये, न उमरे के लिये. और इस साल से मुराद सन नौ हिजरी है. और मुश्रिकों के मना करने के मानी ये हैं कि मुसलमान उनको रोकें.

(11) कि मुश्रिकों को हज से रोक देने से व्यापार को नुक़सान पहुंचेगा और मक्का वालों को तंगी पेश आएगी.

(12) इकरिमा ने कहा, ऐसा ही हुआ. अल्लाह तआला ने उन्हें ग़नी कर दिया. बारिशें ख़ूब हुई. पैदावार कसरत से हुई. मक़ातिल ने कहा कि यमन प्रदेश के लोग मुसलमान हुए और उन्होंने मक्का वालों पर अपनी काफ़ी दौलत ख़र्च की. अगर चाहे फ़रमाने में तालीम है कि बन्दे को चाहिये कि अच्छाई और भलाई की तलब और आफ़तों के दूर होने के लिये हमेशा अल्लाह की तरफ़ मुतवज्जह रहे और सारे कर्मो को उसी की मर्ज़ी से जुड़ा जाने.

(13) अल्लाह पर ईमान लाना यह है कि उसकी ज़ात और सारी सिफ़ात और विशेषताओं को माने और जो उसकी शान के लायक़ न हो, उसकी तरफ़ निस्बत न करे. कुछ मफ़स्सिरों ने रसूलों पर ईमान लाना भी अल्लाह पर ईमान लाने में दाख़िल क़रार दिया है. तो यहूदी  ईसाई अगरचे अल्लाह पर ईमान लाने का दावा करते हैं लेकिन उनका यह दावा बिल्कुल ग़लत है क्योंकि यहूदी अल्लाह के लिये जिस्म और तश्बीह के, और ईसाई अल्लाह के हज़रत ईसा के शरीर में प्रवेश कर जाने को मानते हैं. तो वो किस तरह अल्लाह पर ईमान लाने वाले हो सकते हैं. ऐसे ही यहूदियों में से जो हज़रत उज़ैर को और ईसाई हज़रत मसीह को ख़ुदा का बेटा कहते हैं, तो उनमें से कोई भी अल्लाह पर ईमान लाने वाला न हुआ. इसी तरह जो एक रसूल को झुटलाए, वह अल्लाह पर ईमान लाने वाला नहीं. यहूदी और ईसाई बहुत से नबियों को झुटलाते हैं लिहाज़ा वो अल्लाह पर ईमान लाने वालों में नहीं. मुजाहिद का क़ौल है कि यह आयत उस वक़्त उतरी जबकि नबिये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को रोम से जंग करने का हुक्म दिया गया, और इसीके नाज़िल होने के बाद ग़ज़वए तबूक हुआ. कल्बी का क़ौल है कि यह आयत यहूदियों के क़बीले क़ुरैज़ा और नुज़ैर के हक़ में उतरी. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उनसे सुलह मंजूर फ़रमाई और यही पहला जिज़िया है जो मुसलमानों को मिला और पहली ज़िल्लत है जो काफ़िरों को मुसलमानों के हाथ से पहुंची.

(14) क़ुरआन और हदीस में, और कुछ मु़फ़स्सिरों का क़ौल है कि मानी ये हैं कि तौरात व इंजील के मुताबिक अमल नहीं करते, उनमें हेर फेर करते हैं, और अहकाम अपने दिल से घड़ते है.

(15) इस्लाम दीने इलाही.

(16) एहद में बन्धे किताब वालों से जो ख़िराज लिया जाता है उसका नाम जिज़िया है. यह जिज़िया नक़द लिया जाता है. इसमें उधार नहीं. जिज़िया देने वाले को ख़ुद हाज़िर होकर देना चाहिये. पैदल हाज़िर हो, खड़े होकर पेश करे. जिज़िया क़ुबूल करने में तुर्क व हिन्दू किताब वालों के साथ जुड़े हैं सिवा अरब के मुश्रिकों के, कि उनसे जिज़िया क़ुबूल नहीं. इस्लाम लाने से जिज़िया मुक़र्रर करने की हिकमत यह है कि काफ़िरों को मोहलत दी जाए ताकि वो इस्लाम की विशेषताओं और दलीलों की शक्ति देखें और पिछली किताबों में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़बर और हुज़ूर की तारीफ़ देखकर इस्लाम लाने का मौक़ा पाएं.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: