8- सूरए अनफ़ाल – आठवाँ रूकू

8- सूरए अनफ़ाल – आठवाँ रूकू

और हरगिज़ काफ़िर इस घमण्ड में न रहें कि वो(1)
हाथ से निकल गए बेशक वो आजिज़ नहीं करते (2){59}
और उनके लिये तैयार रखो जो क़ुव्वत तुम्हें बन पड़े(3)
और जितने घोड़े बांध सको कि उनसे उनके दिलों में धाक बिठाओ जो अल्लाह के दुश्मन और तुम्हारे दुश्मन हैं (4)
और उनके सिवा कुछ औरों के दिलों में जिन्हें तुम नहीं जानते (5)
अल्लाह उन्हें जानता है, और अल्लाह की राह में जो कुछ खर्च करोगे तुम्हें पूरा दिया जाएगा (6)
और किसी तरह घाटे में नहीं रहोगे {60} और अगर वो सुलह की तरफ़ झुकें तो तुम भी झुको (7)
और अल्लाह पर भरोसा रखो बेशक वहीं है सुनता जानता {61} और अगर वो तुम्हें धोखा दिया चाहें (8)
तो बेशक अल्लाह तुम्हें काफ़ी है, वही है जिसने तुम्हें ज़ोर दिया अपनी मदद का और मुसलमानों का {62} और उनके दिलों में मेल कर दिया (9)
और अगर तुम ज़मीन में जो कुछ है सब ख़र्च कर देते उनके दिल न मिला सकते(10)
लेकिन अल्लाह ने उनके दिल मिला दिये बेशक वही है ग़ालिब हिकमत वाला{63} ऐ ग़ैब की ख़बरें बताने वाले(नबी) अल्लाह तुम्हें क़ाफ़ी है और ये जितने मुसलमान तुम्हारे पैरो (मानने वाले) हुए (11){64}

तफ़सीर सूरए अनफ़ाल -आठवाँ रूकू

(1)  बद्र की लड़ाई से भाग कर क़त्ल और क़ैद से बच गए और मुसलमानों के

(2) अपने गिरफ़्तार करने वाले को, उसके बाद मुसलमानों को ख़िताब होता है.

(3) चाहे वो हथियार हों या क़िले या तीर अन्दाज़ी. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने इस आयत की तफ़सीर में क़ुव्वत के मानी रमी यानी तीर अन्दाज़ी बताए.

(4) यानी काफ़िर मक्के वाले हों या दूसरे.

(5) इब्ने जै़द का क़ौल है कि यहाँ औरों से मुनाफ़िक़ मुराद हैं. हसन का क़ौल है कि काफ़िर जिन्न.

(6) उसको भरपूर इनाम मिलेगा.

(7) उसने सुलह क़ुबूल कर ली.

(8) उनसे सुलह का इज़हार धोखा देने के लिये करें.

(9) जैसा कि औस व ख़ज़रज क़बीलों में महब्बत और दोस्ती पैदा कर दी, जबकि उनमें सौ बरस से ज़्यादा की दुश्मनी थी और बड़ी बडी लड़ाइयाँ होती रहती थीं. यह सिर्फ़ अल्लाह की मेहरबानी है.

(10) यानी उनकी आपसी दुश्मनी इस हद तक पहुंच गई थी कि उन्हें मिला  देने के सारे साधन बेकार हो चुके थे और कोई सूरत बाक़ी न रही थी. ज़रा ज़रा सी बात में बिगड़ जाते और सदियों तक जंग बाक़ी रहती. किसी तरह दो दिल न मिल सकते. जब रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम तशरीफ़ लाए और अरब लोग आप पर ईमान लाए और उन्होंने आपका अनुकरण किया तो यह हालत दूर हुई और ईमानी महब्बतें पैदा हुई. यह रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का रौशन चमत्कार है.

(11) सईद बिन जुबैर हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत करते हैं कि यह आयत हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो के ईमान लाने के बारे में उतरी. ईमान से सिर्फ़ तैंतीस मर्द और छ: औरतें माला माल हो चुकी थीं तब हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो ईमान लाए. इस क़ौल की बिना पर यह आयत मक्की है. नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के हुक्म से मदनी सूरत में लिखी गई. एक क़ौल यह है कि यह आयत बद्र की लड़ाई में जंग शुरू होने से पहले उतरी. इस सूरत में यह आयत मदनी है. और मूमिनीन से यहाँ एक क़ौल में अन्सार, एक में तमाम मुहाजिर और अन्सार मुराद हैं.

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8- सूरए अनफ़ाल – नवाँ रूकू

8- सूरए अनफ़ाल – नवाँ रूकू

ऐ ग़ैब की ख़बरें बताने वाले ! मुसलमानों को जिहाद की तरग़ीब (प्रेरणा) दो, अगर तुम में के बीस सब्र वाले होंगे दो सौ पर ग़ालिब होंगे,  और अगर तुम में के सौ हों तो काफ़िरों के हज़ार पर ग़ालिब आएंगे इसलिये कि वो समझ नहीं रखते(1){65}
अब अल्लाह ने तुमपर से तख़फ़ीफ़ (कटौती) फ़रमाई और उसे इल्म है कि तुम कमज़ोर हो तो अगर तुम में से सौ सब्र वाले हों दो सौ पर ग़ालिब आएंगे, और अगर तुम में के हज़ार हों तो दो हज़ार पर ग़ालिब आएंगे अल्लाह के हुक्म से और अल्लाह सब्र वालों के साथ है {66} किसी नबी को लायक़ नहीं कि काफ़िरों को ज़िन्दा क़ैद करे जब तक ज़मीन में उनका ख़ून ख़ूब न बहाए (2)
तुम लोग दुनिया का माल चाहते हो (3)
और अल्लाह आख़िरत चाहता है(4)
और अल्लाह ग़ालिब हिकमत वाला है {67} अगर अल्लाह पहले एक बात लिख न चुका होता (5)
तो ऐ मुसलमानों तुम ने जो काफ़िरों से बदले का माल ले लिया उसमें, तुमपर बड़ा अज़ाब आता {68} तो खाओ जो ग़नीमत तुम्हें मिली हलाल पाकीज़ा (6) और अल्लाह से डरते रहो बेशक अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है {69}

तफ़सीर सूरए अनफ़ाल -नवाँ रूकू

(1) यह अल्लाह तआला की तरफ़ से वादा और बशारत है कि मुसलमानों की जमाअत साबिर रहे तो अल्लाह की मदद से दस गुने काफ़िर पर ग़ालिब रहेगी, क्योंकि काफ़िर जाहिल है और उनकी ग़रज़ जंग से, न सवाब हासिल करने की है, न अज़ाब का ख़ौफ़ है. जानवरों की तरह लड़ते भिड़ते हैं. तो वो अल्लाह के लिये लड़ने वालों के मुक़ाबले में क्या ठहर सकेंगे. बुख़ारी शरीफ़ की हदीस में है कि जब यह आयत उतरी तो मुसलमानों पर फ़र्ज़ कर दिया गया कि मुसलमानों का एक नफ़र दस के मुक़ाबले से न भागे. फिर आयत “अलआना ख़फ्फ़फ़ल्लाहो” नाज़िल हुई तो यह लाज़िम किया गया कि एक नफ़र सौ दो सौ के मुक़ाबले में क़ायम रहे यानी दस गुने से मुक़ाबले अनिवार्यता स्थगित हुई और दुगने के मुक़ाबले से भागना मना रखा गया.

(2) और काफ़िरों के क़त्ल में बढ़ा चढ़ा कर कुफ़्र की ज़िल्लत और इस्लाम की शान का इज़हार न करे. मुस्लिम शरीफ़ वग़ैरह की हदीसों में है कि जंगे बद्र में सत्तर काफ़िर क़ैद करके सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के समक्ष लाए गए. हुज़ूर ने उनके बारे में सहाबा से मशवरा तलब किया. अबूबक्र सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हो ने अर्ज़ किया कि यह आपकी क़ौम और क़बीले के लोग हैं मेरी राय में इन्हें फ़िदिया लेकर छोड़ दिया जाए. इससे मुसलमानों का क़ुव्वत भी पहुंचेगी और क्या अजब है कि अल्लाह तआला इन लोगों को इस्लाम नसीब करे. हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि उन लोगों ने आपको झुटलाया, आपको मक्कए मुकर्रमा में न रहने दिया. ये कुफ़्र के सरदार और सरपरस्त हैं, इनकी गर्दनें उड़ाइये. अल्लाह तआला ने आपको फ़िदिया से ग़नी किया है. अली मुर्तज़ा को अक़ील पर और हज़रत हमज़ा को अब्बास पर और मुझे मेरे रिश्तेदार पर मुक़र्रर कीजिये कि उनकी गर्दनें मार दें. आख़िरकार फ़िदिया ही लेने की राय क़रार पाई और जब फ़िदिया लिया गया तो आयत उतरी.

(3) यह सम्बोधन ईमान वालों को है, और माल से फ़िदिया मुराद है.

(4) यानी तुम्हारे लिये आख़िरत का सवाब जो काफ़िरों के क़त्ल और इस्लाम की इज़्ज़त पर निर्भर है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि यह हुक्म बद्र में था जब कि मुसलमान थोड़े थे. फिर जब मुसलमानों की संख्या अधिक हुई और वो अल्लाह के करम से ताक़तवर हुए तो क़ैदियों के हक़ मे नाज़िल हुई “फ़ इम्मा मन्नम वअदु व इम्मा फ़िदाअन” (फिर उसके बाद चाहे एहसान करके छोड़ दो, चाहे फ़िदिया ले लो – सूरए मुहम्मद, आयत 4) और अल्लाह तआला ने अपने नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और मुमिनीन को इख़्तियार दिया कि चाहे काफ़िरों को क़त्ल करे चाहें उन्हें ग़ुलाम बनाएं, चाहे फ़िदिया लें, चाहें आज़ाद करें. बद्र के क़ैदियों का फ़िदिया चालीस ओक़िया सोना प्रति क़ैदी था जिसके सोलह सौ दिरहम हुए.

(5) यह कि इज्तिहाद पर अमल करने वाले की पकड़ न की जाएगी. और यहाँ सहाबा ने इज्तिहाद ही किया था और उनकी फ़िक्र में यही बात आई थी कि काफ़िरों को ज़िन्दा छोड़ देने में उनके दीन को क़ुव्वत मिलती है और इसपर नज़र नहीं की गई कि क़त्ल में इस्लाम की इज़्ज़त और काफ़िरों के लिये सबक़ है. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का इस दीनी मामले में सहाबा की राय दरियाफ़्त फ़रमाना इज्तिहाद के जायज़ होने की दलील है. या “किताबुम मिनल्लाहे सबक़ा” से वह मुराद है जो उसने लौहे मेहफ़ूज़ में लिखा कि बद्र वालों पर अज़ाब न किया जाएगा.

(6) जब ऊपर की आयत उतरी तो नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सहाबा ने जो फ़िदिये लिये थे उनसे हाथ रोक लिये. इसपर यह आयत उतरी और बयान फ़रमाया गया कि तुम्हारी ग़नीमतें हलाल की गई, उन्हें खाओ . सही हदीसों में है अल्लाह तआला ने हमारे लिये ग़नीमतें हलाल कीं, हम से पहले किसी के लिये हलाल न की गई थीं.

8- सूरए अनफ़ाल – दसवाँ रूकू

8- सूरए अनफ़ाल – दसवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)

ऐ ग़ैब की ख़बरें बताने वाले! जो क़ैदी तुम्हारे हाथ में हैं उनसे फ़रमाओ (1)
अगर अल्लाह ने तुम्हारे दिल में भलाई जानी (2)
तो जो तुमसे लिया गया (3)
उससे बेहतर तुम्हें अता फ़रमाएगा और तुम्हें बख़्श देगा और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है (4){70}
और ऐ मेहबूब अगर वो (5)
तुमसे दग़ा चाहेंगे  (6)
तो उससे पहले अल्लाह ही की ख़यानत कर चुके हैं जिस पर उसने इतने तुम्हारे क़ाबू में दे दिये(7)
और अल्लाह जानने वाला हिकमत वाला है {71} बेशक जो ईमान लाए और अल्लाह के लिये (8)
घर बार छोड़े और अल्लाह की राह में अपने मालों और जानों से लड़े(9)
और वो जिन्होंने जगह दी और मदद की (10)
वो एक दूसरे के वारिस हैं (11)
और वो जो ईमान लाए (12)
और हिजरत न की तुम्हें उनका तर्का कुछ नहीं पहुंचता जब तक हिजरत न करें और अगर वो दीन में तुमसे मदद चाहें तो तुमपर मदद देना वाजिब (अनिवार्य) है मगर ऐसी क़ौम पर कि तुम में उनमें मुआहिदा है, और अल्लाह तुम्हारे काम देख रहा है {72} और काफ़िर आपस में एक दूसरे के वारिस हैं (13)
ऐसा न करोगे तो ज़मीन में फ़ितना और बड़ा फ़साद होगा (14){73}
और वो जो ईमान लाए और हिजरत की और अल्लाह की राह में लड़े और जिन्होंने जगह दी और मदद की वही सच्चे ईमान वाले हैं, उनके लिये बख़्शिश है और इज़्ज़त की रोज़ी (15){74}
और जो बाद को ईमान लाए और हिजरत की और तुम्हारे साथ जिहाद किया वो भी तुम्हीं में से हैं (16)
और रिश्ते वाले एक दूसरे से ज़्यादा नज़दीक हैं अल्लाह की किताब में (17)
बेशक अल्लाह सब कुछ जानता है {75}

तफ़सीर सूरए अनफ़ाल -दसवाँ रूकू

(1) यह आयत हज़रत अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब रदियल्लाहो अन्हो के बारे में उतरी जो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के चचा हैं. यह क़ुरैश के काफ़िरों के उन दस सरदारों में से थे जिन्होंने बद्र की लड़ाई में काफ़िरों के लश्कर के खाने की ज़िम्मेदारी ली थी और यह इस ख़र्च के लिये बीस ओक़िया सोना साथ लेकर चले थे (एक ओक़िया चालिस दिरहम का होता है) लेकिन उनके ज़िम्मे जिस दिन ख़िलाना ठहरा था, ख़ास उसी रोज़ जंग का वाक़िआ पेश आया  और लड़ाई में खाना खिलाने की फ़ुर्सत और समय न मिला तो यह बीस ओक़िया उनके पास बच रहा. जब वह गिरफ़्तार हुए और यह सोना उनसे ले लिया गया तो उन्होने दरख़्वास्त की कि यह सोना उनके फ़िदिये में लगा लिया जाए. मगर रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने इन्कार फ़रमाया इरशाद किया जो चीज़ हमारी मुख़ालिफ़त में ख़र्च करने के लिये लाए थे वह न छोड़ी जाएगी. और हज़रत अब्बास पर उनके दो भतीजों अक़ील इब्ने अबी तालिब और नोफ़ल बिन हारिस के फ़िदिये का बार भी डाला गया. तो हज़रत अब्बास ने अर्ज़ किया या मुहम्मद, तुम मुझे इस हाल में छोड़ोगे कि मैं बाक़ी उम्र क़ुरैश से मांग मांग कर बसर किया करूं. तो हुज़ूर ने फ़रमाया कि फिर वह सोना कहाँ है जो तुम्हारे मक्कए मुकर्रमा से चलते वक़्त तुम्हारी बीबी उम्मुल फ़ज़्ल ने दफ़्न किया है और तुम उनसे कह आए हो कि ख़बर नहीं मुझे क्या हादसा पेश आए, अगर मैं जंग में काम आजाऊं तो यह तेरा है, और अब्दुल्लाह और उबैदुल्लाह का, और फ़ज्ल और क़स्सिम का (सब उनके बेटे थे). हज़रत अब्बास ने अर्ज़ किया कि आपको कैसे मालूम हुआ. हुज़ूर ने फ़रमाया मुझे मेरे रब ने ख़बर दी है. इसपर हज़रत अब्बास ने अर्ज़ किया मैं गवाही देता हूँ बेशक आप सच्चे हैं और मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई मअबूद नहीं और बेशक आप उसके बन्दे और रसूल हैं. मेरे इस राज़ पर अल्लाह के सिवा कोई सूचित न था. और हज़रत अब्बास ने अपने भतीजों अक़ील और नोफ़ल को हुक्म दिया वो भी इस्लाम ले आए.

(2) ईमान की सच्चाई और नियत की दुरूस्ती से.

(3) यानी फ़िदिया.

(4) जब रसूल करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के पास बहरीन का माल आया जिसकी मिक़दार अस्सी हज़ार थी तो हुज़ूर ने ज़ोहर की नमाज़ के लिये वुज़ू किया और नमाज़ से पहले पहले कुल का कुल माल तक़सीम कर दिया और हज़रत अब्बास रदियल्लाहो अन्हु को हुक्म दिया कि इसमें से ले लो. तो जितना उनसे उठ सका उतना उन्होंने ले लिया. वह फ़रमाते थे कि यह उससे बेहतर है कि जो अल्लाह ने मुझ से लिया और मैं उसकी मग़फ़िरत की उम्मीद रखता हँ. उनकी मालदारी का यह हाल हुआ कि उनके बीस ग़ुलाम थे, सब के सब ताजिर और उनमें सब से कम पूंजी जिसकी थी उसकी बीस हज़ार की थी.

(5) वो क़ैदी.

(6) तुम्हारी बैअत से फिर कर, और कुफ़्र इख़्तियार करके.

(7) जैसा कि वो बद्र में देख चुके हैं कि क़त्ल हुए, गिरफ़्तार हुए. आयन्दा भी अगर उनके यही तौर तरीक़े रहे तो उन्हें उसी का उम्मीदवार रहना चाहिए.

(8) और उसी के रसूल की महब्बत में उन्होंने अपने.

(9) ये पहले पहले के मुहाजिर हैं.

(10) मुसलमानों की, और उन्हें अपने मकानों में ठहराया. ये अन्सार हैं. इन मुहाजिरों और अन्सार दोनों के लिये इरशाद होता है.

(11) मुहाजिर अन्सार के और अन्सार मुहाजिर के. यह विरासत आयत “व उलुल अरहामे बादुहुम औला बि बअदिन” (और रिश्ते वाले अल्लाह की किताब में एक दूसरे से ज़्यादा क़रीब हैं- सूरए अहज़ाब, आयत 6 ) से स्थगित हो गई.

(12) और मक्कए मुकर्रमा ही में मुक़ीम रहे.

(13) उनके और ईमान वालों के बीच विरासत नहीं. इस आयत से साबित हुआ कि मुसलमानों को काफ़िरों के साथ उठने बैठने और उनकी विरासत से मना किया गया और उनसे अलग रहने का हुक्म दिया गया और मुसलमानों पर आपस में मेल जोल रखना लाज़िम किया गया.

(14) यानी अगर मुसलमानों में आपस में सहकार्य और सहयोग न हो और वो एक दूसरे के मददगार होकर एक ताक़त न बन जाएं तो कुफ़्फार मज़बूत होंगे और मुसलमान कमज़ोर, और यह बड़ा फ़ितना व फ़साद है.

(15) पहली आयत में मुहाजिरों और अन्सार के आपसी सम्बन्धों और उनमें से हर एक के दूसरे के सहायक व मददगार होने का बयान था. इस आयत में उन दोनों के ईमान की तस्दीक़ और उनपर अल्लाह की रहमत होने का ज़िक्र है.

(16) और तुम्हारे ही हुक्म में है ऐ मुहाजिरों और ऐ अन्सार. मुहाजिरों के कई तबक़े हैं. एक वो हैं जिन्होंने पहली बार मदीनए तैय्यिबह को हिजरत की. इन्हें मुहाजिरीने अव्वलीन कहते हैं. कुछ वो हज़रात हैं जिन्हों ने पहले हबशा हिजरत की, फिर मदीनए तय्यिबह की तरफ़, उन्हें असहाबुल हिजरतैन कहते हैं. कुछ हज़रात वो हैं जिन्हों ने सुलह हुदैबिया के बाद मक्का की विजय से पहले हिजरत की, ये असहाबे हिजरते सानिया कहलाते हैं. पहली आयत में मुहाजिरीने अव्वलीन का ज़िक्र है और इस आयत में असहाबे हिजरते सानिया का.

(17) इस आयत से हिजरत से सम्बन्धित विरासत स्थगित की गई और सगे सम्बन्धियों की विरासत साबित हुई.