8- सूरए अनफ़ाल – दूसरा रूकू

8- सूरए अनफ़ाल – दूसरा रूकू

जब उसने तुम्हें ऊंघ से घेर दिया तो उसकी तरफ़ से चैन थी(1)
और आसमान से तुमपर पानी उतारा कि तुम्हें उससे सुथरा करदे शैतान की नापाकी तुमसे दूर फ़रमादे और तुम्हारे दिलों को ढारस बंधाए और उससे तुम्हारे क़दम जमादे(2){11}
जब ऐ मेहबूब, तुम्हारा रब फ़रिश्तों को वही भेजता था कि मैं तुम्हारे साथ हूँ तुम मुसलमानों को साबित रखो(3)
बहुत जल्द काफ़िरों के दिलों में हैबत डालूंगा तो काफ़िरों की गर्दनों से ऊपर मारो और उनकी एक एक पोर (जोड़) पर चोट लगाओ(4){12}
यह इसलिये कि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल से मुख़ालिफ़त की, और जो अल्लाह और उसके रसूल से मुख़ालिफ़त करे तो बेशक अल्लाह का अज़ाब सख़्त है {13} यह तो चखो(5)
और उसके साथ यह है कि काफ़िरों को आग का अज़ाब है (6){14}
ऐ ईमान वालों जब काफ़िरों के लाम से तुम्हारा मुक़ाबला हो तो उन्हें पीठ न दो (7){15}
और जो उस दिन उन्हें पीठ देगा लड़ाई का हुनर करने या अपनी जमाअत में जा मिलने को तो वह अल्लाह के ग़ज़ब में पलटा और उसका ठिकाना दोज़ख़ है और क्या बुरी जगह पलटने की (8){16}
तो तुमने उन्हें क़त्ल न किया बल्कि अल्लाह ने (9)
उन्हें क़त्ल किया और ऐ मेहबूब वह ख़ाक जो तुमने फैंकी तुमने न फैंकी बल्कि अल्लाह ने फैंकी और इसलिये कि मुसलमानों को उससे अच्छा इनाम अता फ़रमाए, बेशक अल्लाह सुनता जानता है(10){17}
तो लो और उसके साथ यह है कि अल्लाह काफ़िरों का दाव सुस्त करने वाला है {18} ऐ काफ़िरों अगर तुम फ़ैसला मांगते हो तो यह फ़ैसला तुमपर आचुका (11)
और अगर बाज़ आओ तो तुम्हारा भला है(12)
और अगर तुम फिर शरारत करो तो हम फिर सज़ा देंगे और तुम्हारा जत्था तुम्हें कुछ काम न देगा चाहे कितना ही बहुत हो और उसके साथ यह है कि अल्लाह मुसलमानों के साथ है {19}

तफ़सीर सूरए अनफ़ाल -दूसरा रूकू

(1) हज़रत इब्ने मसऊद रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि ग़नूदगी अगर जंग में हो तो अम्न है और अल्लाह की तरफ़ से है, और नमाज़ में हो तो शैतान की तरफ़ से है. जंग में ऊंघ का अम्न होना इससे ज़ाहिर है कि जिसे जान का डर हो उसे नींद और ऊंघ नहीं आती, वह ख़तरे और बैचैनी में रहता है. सख़्त डर वक़्त ऊंघ आना, अम्न पाने और डर निकल जाने की दलील है. कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा है कि जब मुसलमानों को डर हुआ और बहुत ज़्यादा प्यास लगी तो उन पर ऊंघ डाल दी गई जिससे उन्हें राहत हासिल हुई और थकान और प्यास दूर हुई और वो दुश्मन से जंग करने पर क़ादिर हुए. यह ऊंघ उनके हक़ में नेअमत थी और एक साथ सबको आई. बड़ी जमाअत का सख़्त डर की हालत में इस तरह एक साथ ऊंघ जाना, ख़िलाफ़े आदत है. इसलिये कुछ उलमा ने फ़रमाया, यह ऊंघ चमत्कार के हुक्म में है. (ख़ाज़िन)

(2) बद्र के दिन मुसलमान रेगिस्तान में उतरे. उनके और उनके जानवरों के पाँव रेत में धंस जाते थे और मुश्रिक उनसे पहले पानी पर क़ब्ज़ा कर चुके थे. सहाबा में कुछ हज़रात को वुज़ू की, कुछ को ग़ुस्ल की ज़रूरत थी और प्यास की सख़्ती थी, तो शैतान ने वसवसा डाला कि तुम गुमान करते हो कि तुम हक़ पर हो, तुम में अल्लाह के नबी हैं और तुम अल्लाह वाले हो और हाल यह है कि मुश्रिक लोग ग़ालिब होकर पानी पर पहुंच गए, तुम बग़ैर वुज़ू और ग़ुस्ल किये नमाज़ें पढ़ते हो तो तुम्हें दुश्मन पर विजयी होने की किस तरह उम्मीद है. तो अल्लाह तआला ने मेंह भेजा जिससे जंगल सैराब हो गया और मुसलमानों ने उससे पानी पिया और ग़ुस्ल किये और वुज़ू किये और अपनी सवारियों को पिलाया और अपने बर्तनों को भरा और ग़ुबार बैठ गया, ज़मीन इस क़ाबिल हो गई कि उस पर क़दम जमने लगे और यह नेअमत विजय और कामयाबी हासिल होने की दलील है.

(3) उनकी मदद करके और उन्हें बशारत दे कर.

(4) अबूदाउद ज़मानी, जो बद्र में हाज़िर हुए थे, फ़रमाते हैं कि मैं मुश्रिक की गर्दन मारने के लिये उसके दरपे हुआ. उसका सर मेरी तलवार पहुंचने से पहले ही कट कर गिर गया, तो मैंने जान लिया कि उसको किसी और ने क़त्ल किया. सहल बिन हनीफ़ फ़रमाते हैं कि बद्र के दिन हम में से कोई तलवार से इशारा करता था तो उसकी तलवार पहुंचने से पहले ही मुश्रिक का सर जिस्म से जुदा होकर गिर जाता था. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने एक मुठ्ठी कंकरियाँ काफ़िरों पर फैंक कर मारीं तो कोई काफ़िर ऐसा न बचा जिसकी आँख़ों में उसमें से कुछ पड़ा न हो. बद्र का यह वाक़िआ शुक्रवार की सुबह सत्तरह रमज़ान सन दो हिजरी में पेश आया.

(5) जो बद्र में पेश आया और काफ़िर मक़तूल और क़ैद हुए, यह तो दुनिया का अज़ाब है.

(6) आख़िरत में.

(7) यानी अगर काफ़िर तुमसे ज़्यादा भी हों तो उनके मुक़ाबले से न भागो.

(8) यानी मुसलमानों में से जो जंग में काफ़िरों के मुक़ाबले से भागा वह अल्लाह के ग़ज़ब में गिरफ़्तार हुआ, उसका ठिकाना दोज़ख़ है. सिवाय दो हालतों के, एक तो यह कि लड़ाई का हुनर या कर्तब करने के लिये पीछे हटा हो, वह पीठ देने और भागने वाला नहीं है. दूसरे, जो अपनी जमाअत में मिलने के लिये पीछे हटा, वह भी भागने वाला नहीं समझा जाएगा.

(9) जब मुसलमान बद्र की लड़ाई से लौटे तो उनमें से एक कहता था कि मैं ने फ़लाँ को क़त्ल किया दूसरा कहता कि मैंने उसको क़त्ल किया. इस पर यह आयत उतरी और फ़रमाया गया कि इस क़त्ल को तुम अपने ज़ोर और क़ुव्वत से मत जोड़ो कि हक़ीक़त में अल्लाह की मदद और उसकी तक़वियत और ताईद है.

(10) विजय और कामयाबी.

(11) यह सम्बोधन मुश्रिकों से हैं जिन्होंने बद्र में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से जंग की और उनमें से अबू जहल ने अपनी और हुज़ूर की निस्बत यह दुआ कि यारब हम मे जो तेरे नज़दीक अच्छा हो, उसकी मदद कर और जो बुरा हो, उसे मुसीबत में जकड़. और एक रिवायत में है कि मुश्रिकों ने मक्कए मुकर्रमा से बद्र को चलते वक़्त काबए मुअज़्ज़मा के पर्दों से लिपट कर यह दुआ की थी कि यारब अगर मुहम्मद सच्चाई पर हों, तो उनकी मदद फ़रमा और अगर हम हक़ पर हैं, तो हमारी मदद कर. इस पर यह आयत उतरी कि जो फ़ैसला तुमने चाहा था वह कर दिया गया और जो समूह सच्चाई पर था, उसको विजय दी गई. यह तुम्हारा मांगा हुआ फ़ैसला है. अब आसमानी फ़ैसले से भी, जो उनका तलब किया हुआ था, इस्लाम की सच्चाई साबित हुई. अबू जहल भी इस जंग में ज़िल्लत और रूस्वाई के साथ मारा गया और उसका सर रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के हुज़ूर में हाज़िर किया गया.

(12) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ दुश्मनी और हुज़ूर के साथ जंग करने से.

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