8- सूरए अनफ़ाल – तीसरा रूकू

8- सूरए अनफ़ाल – तीसरा रूकू

ऐ ईमान वालो अल्लाह और उसके रसूल का हुक्म मानो(1)
और सुन सुनाकर उससे न फिरो  {20} और उन जैसे न होना जिन्हों ने कहा हमने सुना और वो नहीं सुनते(2){21}
बेशक सब जानवरों में बदतर अल्लाह के नज़दीक वो हैं जो बहरे गूंगे हैं जिनको अक़्ल नहीं(3){22}
और अगर अल्लाह उन्हें कुछ भलाई(4)
जानता तो उन्हें सुना देता और अगर (5)
सुना देता जब भी आख़िर मुंह फेर कर पलट जाते (6){23}
ऐ ईमान वालों अल्लाह और रसूल के बुलाने पर हाज़िर हो (7)
जब रसूल तुम्हें उस चीज़ के लिये बुलाएं जो तुम्हें ज़िन्दगी बख़्शेगी(8)
और जान लो कि अल्लाह का हुक्म आदमी और उसके दिली इरादों से हायल (बाधक) हो जाता है और यह कि तुम्हें उसकी तरफ़ उठना है {24} और उस फ़ितने से डरते रहो जो हरगिज़ तुम में ख़ालिस ज़ालिमों को ही न पहुंचेगा(9)
और जान लो कि अल्लाह का अज़ाब सख़्त है{25} और याद करो (10)
जब तुम थोड़े थे मुल्क में दबे हुए (11)
डरते थे कहीं लोग तुम्हें अचानक न ले जाएं तो उसने तुम्हें (12)
जगह दी और अपनी मदद से ज़ोर दिया और सुथरी चीज़ें तुम्हें रोज़ी दें (13)
कि कहीं तुम एहसान मानो{26} ऐ ईमान वालों अल्लाह और रसूल से दग़ा न करो (14)
और न अपनी अमानतों में जान बूझकर ख़यानत {27} और जान रखो कि तुम्हारे माल और तुम्हारी औलाद सब फ़ितने हैं (15)
और अल्लाह के पास बड़ा सवाब है (16){28}

तफ़सीर सूरए अनफ़ाल -तीसरा रूकू

(1) क्योंकि रसूल की फ़रमाँबरदारी और अल्लाह की फ़रमाँबरदारी एक ही चीज़ है, जिसने रसूल की इताअत की, उसने अल्लाह की इताअत की.

(2) क्योंकि जो सुनकर फ़ायदा न उठाए, और नसीहत हासिल न करे, उसका सुनना सुनना ही नहीं है. यह मुनाफ़िक़ों और मुश्रिकों का हाल है. मुसलमानों को इस हाल से दूर रहने का हुक्म दिया जाता है.

(3) न वो सत्य सुनते हैं, न सत्य बोलते हैं, न सच्चाई को समझते हैं, कान और ज़बान और अक़्ल से फ़ायदा नहीं उठाते. जानवरों से भी गए गुज़रे हैं. क्योंकि वो जान बूझकर बहरे गूंगे बनते हैं और अक़्ल से दुश्मनी करते हैं. यह आयत बनी अब्दुद दार बिन कुसई के हक़ में उतरी जो कहते थे कि जो कुछ मुहम्मद लाए, हम उससे बहरे गूंगे अंधे हैं. ये सब लोग उहद की लड़ाई में मारे गए और उनमें से सिर्फ़ दो व्यक्ति ईमान लाए, मुसअब बिन उमैर और सुवैबित बिन हुरमला.

(4) यानी सिद्क़ और रग़बत.

(5) मौजूदा हालत में, यह जानते हुए, कि उनमें सिद्क़ और रग़बत नहीं है.

(6) क्योंकि दुशमनी, और सच्चाई से विरोध के कारण.

(7) क्योंकि रसूल का बुलाना अल्लाह ही का बुलाना हैं. बुख़ारी शरीफ़ में सईद बिन मुअल्ला से रिवायत है, फ़रमाते हैं कि मैं मस्जिद में नमाज़ पढ़ता था, मुझे रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने पुकारा. मैं ने जवाब न दिया. फिर मैं ने ख़िदमत में हाज़िर होकर अर्ज़ किया या रसूलल्लाह, मैं नमाज़ पढ़ रहा था. हुज़ूर ने फ़रमाया, क्या अल्लाह तआला ने यह नहीं फ़रमाया है कि अल्लाह और रसूल के बुलाने पर हाज़िर हो. ऐसा ही दूसरी हदीस शरीफ़ में है कि हज़रत उबई बिन कअब नमाज़ पढ़ते थे. हुज़ूर ने उन्हें पुकारा. उन्हों ने जल्दी नमाज़ पूरी करके सलाम अर्ज़ किया. हुज़ूर ने फ़रमाया तुम्हें जवाब देने से किस चीज़ ने रोका. अर्ज़ किया, हुज़ूर मैं नमाज़ में था. हुज़ूर ने फ़रमाया, क्या तुमने क़ुरआन पाक में यह नहीं पाया कि अल्लाह और रसूल के बुलाने पर हाज़िर हो. अर्ज़ किया, बेशक, आयन्दा ऐसा न होगा.

(8) इस चीज़ से या ईमान मुराद है, क्योंकि काफ़िर मुर्दा होता है, ईमान से उसको ज़िन्दगी हासिल होती है. क़तादा ने कहा कि वह चीज़ क़ुरआन है, क्योंकि इससे दिलों की ज़िन्दगी है और इसमें निजात है, और दोनों जगत की इस्मत है. मुहम्मद बिन इस्हाक़ ने कहा कि वह चीज़ जिहाद है, क्योंकि उसकी बदौलत अल्लाह तआला ज़िल्लत के बाद इज़्ज़त अता फ़रमाता है. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि वह शहादत है, इसलिये कि शहीद अपने रब के नज़दीक ज़िन्दा हैं.

(9) बल्कि अगर तुम उससे न डरे और उसके कारणों यानी ममनूआत को तर्क न किया और वह फ़ितना नाज़िल हुआ तो यह न होगा कि उसमें ख़ास ज़ालिम और बदकार ही जकड़े हों बल्कि वह नेक और बद सबको पहुंच जाएगा. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला ने ईमान वालों को हुक्म दिया कि वो अपने बीच ममनूआत न होने दें, यानी अपनी ताक़त भर बुराइयों को रोकें और गुनाह करने वालों को गुनाह से मना करें. अगर उन्हों ने ऐसा न किया तो अज़ाब उन सब को आम होगा. ख़ताकार और ग़ैर ख़ताकार सबको पहुंचेगा. हदीस शरीफ़ में है, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला ख़ास लोगों के अमल पर आम अज़ाब नहीं करता जबतक कि आम तौर पर लोग ऐसा न करें कि ममनूआत को अपने बीच होता देखते रहे और उसके रोकने और मना करने पर क़ादिर हों, इसके बावुजूद न रोकें, न मना करें. जब ऐसा होता है तो अल्लाह तआला अज़ाब में ख़ास और आम सब को जकड़ता है. अबू दाऊद की हदीस में है कि जो शख़्स किसी क़ौम में बुराई में सक्रिय हो और वो लोग क़ुदरत के बावुजूद उसको न रोकें, तो अल्लाह तआला उन्हें मरने से पहले अज़ाब में जकड़ता है. इससे मालूम हुआ कि जो क़ौम अल्लाह की मना की हुई चीज़ों से नहीं रूकती, और लोगों को गुनाहों से नहीं रोकती, वह अपने इस फ़र्ज़ के छोड़ने की सज़ा में अज़ाब में जकड़ी जाती है.

(10) ऐ ईमान वाले मुहाजिरीन, इस्लाम के शुरू में हिजरत करने से पहले मक्कए मुकर्रमा में.

(11) क़ुरैश तुमपर ग़ालिब थे और तुम.

(12) मदीनए तैय्यिबह में.

(13) यानी ग़नीमत के माल, जो तुमसे पहले किसी उम्मत के लिये हलाल नहीं किये गए थे.

(14) फ़र्ज़ों का छोड़ देना अल्लाह तआला से ख़यानत करना है और सुन्नत का तर्क करना रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से. यह आयत अबू लुबाबा हारून बिन अब्दुल मुन्ज़र अन्सारी के हक़ में नाज़िल हुई. वाक़िआ यह था कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने बनी क़ुरैज़ा के यहूदियों का दो हफ़्ते से ज़्यादा समय तक घिराव किया. वो इस घिराव से तंग आ गए और उनके दिल डर गए, तो उनसे उनके सरदार कअब बिन असद ने यह कहा कि अब तीन शक्लें हैं, या तो उस शख़्स यानी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तस्दीक़ करो और उनकी बैअत कर लो, क्योंकि ख़ुदा की क़सम, वह अल्लाह के भेजे हुए नबी हैं, यह ज़ाहिर हो चुका. और यह वही रसूल हैं जिनका ज़िक्र तुम्हारी किताब में है. उन पर ईमान ले आए, तो जान माल आल औलाद सब मेहफ़ूज रहेंगे. मगर इस बात को क़ौम ने न माना तो कअब ने दूसरी शक्ल पेश की और कहा कि तुम अगर इसे नहीं मानते तो आओ पहले हम अपने बीबी बच्चों को क़त्ल कर दें फिर तलवारें खींचकर मुहम्मद और उनके साथियों के मुक़ाबले में आएं कि अगर हम इस मुक़ाबले में हलाक भी हो जाएं तो हमारे साथ अपने बाल बच्चों का ग़म तो न रहे. इस पर क़ौम ने कहा कि बाल बच्चों के बाद जीना ही किस काम का. तो कअब ने कहा कि यह भी मंजूर नहीं है तो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से सुलह की दरख़्वास्त करो, शायद उसमें बेहतरी की कोई सूरत निकल आए. तो उन्होंने हुज़ूर से सुलह की दरख़्वास्त की लेकिन हुज़ूर ने मंज़ूर नहीं फ़रमाया, सिवाय इसके कि अपने हक़ में सअद बिन मआज़ के फ़ैसले को मंज़ूर करें. इस पर उन्होंने कहा कि हमारे पास अबू लुबाबा को भेज दीजिये क्योंकि अबू लुबाबा से उनके सम्बन्ध थे और अबू लुबाबा का माल और उनकी औलाद और उनके बाल बच्चे सब बनी क़ुरैज़ा के पास थे. हुज़ूर ने अबू लुबाबा को भेज दिया. बनी क़ुरैज़ा ने उनसे राय दरियाफ़्त की कि क्या हम सअद बिन मआज़ का फ़ैसला मंज़ूर करलें कि जो कुछ वो हमारे हक़ में फ़ैसला दें वह हमें क़ुबूल हो. अबू लुबाबा ने अपनी गर्दन पर हाथ फेर कर इशारा किया कि यह तो गले कटवाने की बात है. अबू लुबाबा कहते हैं कि मेरे क़दम अपनी जगह से हटने न पाए थे कि मेरे दिल में यह बात जम गई कि मुझसे अल्लाह और उसके रसूल की ख़यानत वाक़े हुई. यह सोचकर वह हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में तो न आए, सीधे मस्जिद शरीफ़ पहुंचे और मस्जिद शरीफ़ के एक सुतून से अपने आपको बंधवा लिया और अल्लाह की क़सम खाई कि न कुछ खाएंगे न पियेंगे यहाँ तक कि मर जाएं या अल्लाह तआला उनकी तौबह क़ुबूल करें. समय समय पर उनकी बीबी आकर उन्हें नमाज़ों के लिये और इन्सानी हाजतों के लिये खोल दिया करतीं और फिर बांध दिये जाते थे. हुज़ूर को जब यह ख़बर पहुंची तो फ़रमाया कि अबू लुबाबा मेरे पास आते तो मैं उनके लिये मग़फ़िरत की दुआ करता लेकिन जब उन्होंने यह किया है तो मैं उन्हें न खोलूंगा जब तक अल्लाह तआला उनकी तौबह क़ुबूल न करे. वह सात दिन बंधे रहे, न कुछ खाया न पिया. यहाँ तक कि बेहोश होकर गिर गए. फिर अल्लाह तआला ने उनकी तौबह क़ुबूल की. सहाबा ने उन्हें तौबह क़ुबूल होने की ख़ुशख़बरी दी तो उन्होंने कहा मैं ख़ुदा की क़सम न खुलूँगा जब तक रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मुझे ख़ुद न खोलें. हज़रत ने उन्हें अपने मुबारक हाथों से खोल दिया. अबू लुबाबा ने कहा, मेरी तौबह उस वक़्त पूरी होगी जब मैं अपनी क़ौम की बस्ती छोड दूँ जिसमें मुझ से यह ख़ता सरज़द हुई और मैं अपने कुल माल को अपनी मिल्क से निकाल दूँ. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, तिहाई माल का सदक़ा करना काफ़ी है. उनके बारे में यह आयत उतरी.

(15) कि आख़िरत के कामों में रूकावट बनता है.

(16) तो समझ वाले को चाहिये कि उसी का तलबगार रहे और माल व औलाद के कारण उससे मेहरूम न हो.

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