8- सूरए अनफ़ाल – छटा रूकू

8- सूरए अनफ़ाल – छटा रूकू

ऐ ईमान वालों जब किसी फ़ौज से तुम्हारा मुक़ाबला हो तो साबित क़दम (डटे) रहो और अल्लाह की याद बहुत करो(1)
कि तुम मुराद को पहुंचो {45} और अल्लाह और उसके रसूल का हुक्म मानो और आपस में झगड़ों नहीं कि फिर बुज़दिली करोगे और तुम्हारी बंधी हुई हवा जाती रहेगी (2)
और सब्र करो, बेशक अल्लाह सब्र वालों के साथ है(3){46}
और उन जैसे न होना जो अपने घर से निकले इतराते और लोगों के दिखाने को और अल्लाह की राह से रोकते (4)
और उनके सब काम अल्लाह के क़ाबू में हैं {47} और जबकि शैतान ने उनकी निगाह में उनके काम भले कर दिखाए (5)
और बोला आज तुमपर कोई शख़्श ग़ालिब आने वाला नहीं और तुम मेरी पनाह में हो तो जब दोनों लश्कर आमने सामने हुए उलटे पाँव भागा और बोला मैं तुमसे अलग हूँ (6)
मैं वह देखता हूँ जो तुम्हें नज़र नहीं आता (7)
मैं अल्लाह से डरता हूँ (8)
और अल्लाह का अज़ाब सख़्त है {48}

तफ़सीर सूरए अनफ़ाल -छटा रूकू

(1) उससे मदद चाहो और काफ़िरों पर क़ाबू पाने की दुआएं करो. इससे मालूम हुआ कि इन्सान को हर हालमें लाज़िम है कि वह अपने दिल और ज़बान को अल्लाह के ज़िक्र में लगाए रखे और सख़्ती और परेशानी में भी उससे ग़ाफ़िल न हो.

(2) इस आयत से मालूम हुआ कि आपसी झगड़े शिथिलता, कमज़ोरी और बेवक़ारी का कारण हैं और यह भी मालूम हुआ कि आपसी झगड़ों से मेहफ़ूज़ रहने की विधि ख़ुदा और रसूल की फ़रमाँबरदारी और दीन का पालन है.

(3) उनका सहायक और मददगार.

(4) यह आयत क़ुरैश के काफ़िरों के बारे में उतरी जो बद्र में बहुत इतराते और घमण्ड करते आए थे. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने दुआ की – यारब ये क़ुरैश आगए घमण्ड और अहंकार में डूबे हुए और जंग के लिये तैयार. तेरे रसूल को झुटलाते हैं. यारब, अब वह मदद इनायत हो जिसका तूने वादा किया था. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि जब अबू सुफ़ियान ने देखा कि क़ाफ़िले को कोई ख़तरा नहीं रहा तो उन्होंने क़ुरैश के पास संदेश भेजा कि तुम क़ाफ़िले की मदद के लिये आए थे, अब उसके लिये कोई ख़तरा नहीं हैं, इस लिये वापस जाओ इसपर अबू जहल ने कहा कि ख़ुदा की क़सम हम वापस न होंगे यहाँ तक कि हम बद्र में उतरें, तीन दिन वहां ठहरें, ऊंट ज़िब्ह करें, बहुत से खाने पकाएं, शराब पियें, कनीज़ों का गाना बजाना सुनें. अरब में हमारी शोहरत हो और हमारी हैबत हमेशा बाक़ी रहे. लेकिन अल्लाह को कुछ और ही मंज़ूर था. जब वो बद्र में पहुंचे तो शराब के जाम की जगह उन्हें मौत का प्याला पीना पड़ा और कनीज़ों के गाने बजाने के बदले रोने वालियां उन्हें रोई. अल्लाह तआला मूमिनों को हुक्म फ़रमाता है कि इस वाक़ए से सबक़ पकड़ें और जान लें कि घमण्ड और अहंकार का अंजाम ख़राब है. बन्दे को इख़लास और ख़ुदा व रसूल की इताअत चाहिये.

(5) और रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की दुशमनी और मुसलमानो के विरोध में जो कुछ उन्होंने किया था उस पर उनकी प्रशंसा की और उन्हें बुरे कामों पर क़ायम रहने की रूचि दिलाई और जब क़ुरैश ने बद्र में जाने पर सहमति कर ली तो उन्हें याद आया कि उनके और बनी बक्र क़बीले के बीच शत्रुता है. संभव था कि वो यह ख़याल करके वापसी का इरादा करते. यह शैतान को मंज़ूर न था. इसलिये उसने यह धोखा किया कि वह सुराक़ह बिन मालिक बिन जअसम बनी कनानह के सरदार की सूरत में नमूदार हुआ और एक लश्कर और एक झण्डा साथ लेकर मुश्रिकों से आ मिला. और उनसे कहने लगा कि मैं तुम्हारा ज़िम्मेदार हूँ आज तुम पर कोई ग़ालिब आने वाला नहीं. जब मुसलमानों और काफ़िरों के दोनों लश्कर आमने सामने हुए तो रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने एक मुठ्ठी मिट्टी मुश्रिकों के मुंह पर मारी और वो पीठ फेर कर भागे और हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम इब्लीसे लईन की तरफ़ बढ़े जो सुराक़ह की शक्ल में हारिस बिन हिशाम का हाथ पकड़े हुए था. वह हाथ छुड़ा कर अपने गिरोह समेत भागा. हारिस पुकारता रह गया, सुराक़ह, सुराक़ह, तुम तो हमारे ज़ामिन हुए थे, कहाँ जाते हो. कहने लगा मुझे वह नज़र आता है जो तुम नहीं देख पा रहे हो. इस आयत में इसी घटना का बयान है.

(6) और अम्न की जो ज़िम्मेदारी ली थी उससे सुबुकदोश होता हूँ. इस पर हारिस बिन हिशाम ने कहा कि हम तेरे भरोसे पर आए थे, तू इस हालत में हमें रूस्वा करेगा. कहने लगा –

(7) यानी फ़रिश्तों की फ़ौज़.

(8) कहीं वह मुझे हलाक न कर दे. जब काफ़िरों को हार हुई और वो पराजित होकर मक्कए मुकर्रमा पहुंचे तो उन्होंने मशहूर किया कि हमारी हार और पराजय का कारण सुराक़ह हुआ. सुराकह को यह ख़बर पहुंची तो उसे अचंभा हुआ और उसने कहा ये लोग क्या कहते हैं, न मुझे उनके आने की ख़बर, न ज़ाने की. पराजय हो गई तब मैंने सुना है. क़ुरैश ने कहा, तू अमुक अमुक दिन हमारे पास आया था. उसने क़सम खाई कि यह ग़लत है. तब मालूम हुआ कि वह शैतान था.

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