8- सूरए अनफ़ाल – दसवाँ रूकू

8- सूरए अनफ़ाल – दसवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)

ऐ ग़ैब की ख़बरें बताने वाले! जो क़ैदी तुम्हारे हाथ में हैं उनसे फ़रमाओ (1)
अगर अल्लाह ने तुम्हारे दिल में भलाई जानी (2)
तो जो तुमसे लिया गया (3)
उससे बेहतर तुम्हें अता फ़रमाएगा और तुम्हें बख़्श देगा और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है (4){70}
और ऐ मेहबूब अगर वो (5)
तुमसे दग़ा चाहेंगे  (6)
तो उससे पहले अल्लाह ही की ख़यानत कर चुके हैं जिस पर उसने इतने तुम्हारे क़ाबू में दे दिये(7)
और अल्लाह जानने वाला हिकमत वाला है {71} बेशक जो ईमान लाए और अल्लाह के लिये (8)
घर बार छोड़े और अल्लाह की राह में अपने मालों और जानों से लड़े(9)
और वो जिन्होंने जगह दी और मदद की (10)
वो एक दूसरे के वारिस हैं (11)
और वो जो ईमान लाए (12)
और हिजरत न की तुम्हें उनका तर्का कुछ नहीं पहुंचता जब तक हिजरत न करें और अगर वो दीन में तुमसे मदद चाहें तो तुमपर मदद देना वाजिब (अनिवार्य) है मगर ऐसी क़ौम पर कि तुम में उनमें मुआहिदा है, और अल्लाह तुम्हारे काम देख रहा है {72} और काफ़िर आपस में एक दूसरे के वारिस हैं (13)
ऐसा न करोगे तो ज़मीन में फ़ितना और बड़ा फ़साद होगा (14){73}
और वो जो ईमान लाए और हिजरत की और अल्लाह की राह में लड़े और जिन्होंने जगह दी और मदद की वही सच्चे ईमान वाले हैं, उनके लिये बख़्शिश है और इज़्ज़त की रोज़ी (15){74}
और जो बाद को ईमान लाए और हिजरत की और तुम्हारे साथ जिहाद किया वो भी तुम्हीं में से हैं (16)
और रिश्ते वाले एक दूसरे से ज़्यादा नज़दीक हैं अल्लाह की किताब में (17)
बेशक अल्लाह सब कुछ जानता है {75}

तफ़सीर सूरए अनफ़ाल -दसवाँ रूकू

(1) यह आयत हज़रत अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब रदियल्लाहो अन्हो के बारे में उतरी जो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के चचा हैं. यह क़ुरैश के काफ़िरों के उन दस सरदारों में से थे जिन्होंने बद्र की लड़ाई में काफ़िरों के लश्कर के खाने की ज़िम्मेदारी ली थी और यह इस ख़र्च के लिये बीस ओक़िया सोना साथ लेकर चले थे (एक ओक़िया चालिस दिरहम का होता है) लेकिन उनके ज़िम्मे जिस दिन ख़िलाना ठहरा था, ख़ास उसी रोज़ जंग का वाक़िआ पेश आया  और लड़ाई में खाना खिलाने की फ़ुर्सत और समय न मिला तो यह बीस ओक़िया उनके पास बच रहा. जब वह गिरफ़्तार हुए और यह सोना उनसे ले लिया गया तो उन्होने दरख़्वास्त की कि यह सोना उनके फ़िदिये में लगा लिया जाए. मगर रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने इन्कार फ़रमाया इरशाद किया जो चीज़ हमारी मुख़ालिफ़त में ख़र्च करने के लिये लाए थे वह न छोड़ी जाएगी. और हज़रत अब्बास पर उनके दो भतीजों अक़ील इब्ने अबी तालिब और नोफ़ल बिन हारिस के फ़िदिये का बार भी डाला गया. तो हज़रत अब्बास ने अर्ज़ किया या मुहम्मद, तुम मुझे इस हाल में छोड़ोगे कि मैं बाक़ी उम्र क़ुरैश से मांग मांग कर बसर किया करूं. तो हुज़ूर ने फ़रमाया कि फिर वह सोना कहाँ है जो तुम्हारे मक्कए मुकर्रमा से चलते वक़्त तुम्हारी बीबी उम्मुल फ़ज़्ल ने दफ़्न किया है और तुम उनसे कह आए हो कि ख़बर नहीं मुझे क्या हादसा पेश आए, अगर मैं जंग में काम आजाऊं तो यह तेरा है, और अब्दुल्लाह और उबैदुल्लाह का, और फ़ज्ल और क़स्सिम का (सब उनके बेटे थे). हज़रत अब्बास ने अर्ज़ किया कि आपको कैसे मालूम हुआ. हुज़ूर ने फ़रमाया मुझे मेरे रब ने ख़बर दी है. इसपर हज़रत अब्बास ने अर्ज़ किया मैं गवाही देता हूँ बेशक आप सच्चे हैं और मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई मअबूद नहीं और बेशक आप उसके बन्दे और रसूल हैं. मेरे इस राज़ पर अल्लाह के सिवा कोई सूचित न था. और हज़रत अब्बास ने अपने भतीजों अक़ील और नोफ़ल को हुक्म दिया वो भी इस्लाम ले आए.

(2) ईमान की सच्चाई और नियत की दुरूस्ती से.

(3) यानी फ़िदिया.

(4) जब रसूल करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के पास बहरीन का माल आया जिसकी मिक़दार अस्सी हज़ार थी तो हुज़ूर ने ज़ोहर की नमाज़ के लिये वुज़ू किया और नमाज़ से पहले पहले कुल का कुल माल तक़सीम कर दिया और हज़रत अब्बास रदियल्लाहो अन्हु को हुक्म दिया कि इसमें से ले लो. तो जितना उनसे उठ सका उतना उन्होंने ले लिया. वह फ़रमाते थे कि यह उससे बेहतर है कि जो अल्लाह ने मुझ से लिया और मैं उसकी मग़फ़िरत की उम्मीद रखता हँ. उनकी मालदारी का यह हाल हुआ कि उनके बीस ग़ुलाम थे, सब के सब ताजिर और उनमें सब से कम पूंजी जिसकी थी उसकी बीस हज़ार की थी.

(5) वो क़ैदी.

(6) तुम्हारी बैअत से फिर कर, और कुफ़्र इख़्तियार करके.

(7) जैसा कि वो बद्र में देख चुके हैं कि क़त्ल हुए, गिरफ़्तार हुए. आयन्दा भी अगर उनके यही तौर तरीक़े रहे तो उन्हें उसी का उम्मीदवार रहना चाहिए.

(8) और उसी के रसूल की महब्बत में उन्होंने अपने.

(9) ये पहले पहले के मुहाजिर हैं.

(10) मुसलमानों की, और उन्हें अपने मकानों में ठहराया. ये अन्सार हैं. इन मुहाजिरों और अन्सार दोनों के लिये इरशाद होता है.

(11) मुहाजिर अन्सार के और अन्सार मुहाजिर के. यह विरासत आयत “व उलुल अरहामे बादुहुम औला बि बअदिन” (और रिश्ते वाले अल्लाह की किताब में एक दूसरे से ज़्यादा क़रीब हैं- सूरए अहज़ाब, आयत 6 ) से स्थगित हो गई.

(12) और मक्कए मुकर्रमा ही में मुक़ीम रहे.

(13) उनके और ईमान वालों के बीच विरासत नहीं. इस आयत से साबित हुआ कि मुसलमानों को काफ़िरों के साथ उठने बैठने और उनकी विरासत से मना किया गया और उनसे अलग रहने का हुक्म दिया गया और मुसलमानों पर आपस में मेल जोल रखना लाज़िम किया गया.

(14) यानी अगर मुसलमानों में आपस में सहकार्य और सहयोग न हो और वो एक दूसरे के मददगार होकर एक ताक़त न बन जाएं तो कुफ़्फार मज़बूत होंगे और मुसलमान कमज़ोर, और यह बड़ा फ़ितना व फ़साद है.

(15) पहली आयत में मुहाजिरों और अन्सार के आपसी सम्बन्धों और उनमें से हर एक के दूसरे के सहायक व मददगार होने का बयान था. इस आयत में उन दोनों के ईमान की तस्दीक़ और उनपर अल्लाह की रहमत होने का ज़िक्र है.

(16) और तुम्हारे ही हुक्म में है ऐ मुहाजिरों और ऐ अन्सार. मुहाजिरों के कई तबक़े हैं. एक वो हैं जिन्होंने पहली बार मदीनए तैय्यिबह को हिजरत की. इन्हें मुहाजिरीने अव्वलीन कहते हैं. कुछ वो हज़रात हैं जिन्हों ने पहले हबशा हिजरत की, फिर मदीनए तय्यिबह की तरफ़, उन्हें असहाबुल हिजरतैन कहते हैं. कुछ हज़रात वो हैं जिन्हों ने सुलह हुदैबिया के बाद मक्का की विजय से पहले हिजरत की, ये असहाबे हिजरते सानिया कहलाते हैं. पहली आयत में मुहाजिरीने अव्वलीन का ज़िक्र है और इस आयत में असहाबे हिजरते सानिया का.

(17) इस आयत से हिजरत से सम्बन्धित विरासत स्थगित की गई और सगे सम्बन्धियों की विरासत साबित हुई.

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